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हर गाँव शहर अब गूँज उठे जनगणमन के स्वर से

प्रसिद्ध कवि सुशील सिद्धार्थ के दो जनगीत आज प्रस्तुत हैं, भ्रष्टाचार के खिलाफ हो रहे, जन-लोकपाल के लिए हो रहे आंदोलन के सन्दर्भ को ध्यान में रखते हुए उन्होंने ये गीत लिखे हैं- जानकी पुल. १. अन्नाजी की बात पर विचार होना चाहिए अन्नाजी की बात पर विचार होना चाहिए …

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पर्वत पर्वत धारा फूटे लोहा मोम सा गले रे साथी

गोरख पांडे क्रांति के कवि थे. आज जनांदोलन के इस दौर में उनकी कुछ कविताएँ ध्यान आईं. आप भी पढ़िए- जानकी पुल. समय का पहिया समय का पहिया चले रे साथी  समय का पहिया चले  फ़ौलादी घोड़ों की गति से आग बरफ़ में जले रे साथीसमय का पहिया चलेरात और …

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ज़माने भर को को है उम्मीद उसी से

आज ज़हीर रह्मती की ग़ज़लें. वे नए दौर के संजीदा शायर हैं. ‘कुछ गमे-जानां, कुछ गमे दौरां’ के शायर. अपने समय की विडंबनाएं भी उनके शेरों में हैं तो जीवन की दुश्वारियां भी- जानकी पुल. 1. इशारे मुद्दतों से कर रहा है अभी तक साफ़ कहते डर रहा है. ज़माने …

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