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पप्पू यादव की आत्मकथा का एक अंश

किताब लिखने का अधिकार सबको है, उनको पढने न पढने का अधिकार भी हमारा है. राजेश रंजन @ पप्पू यादव की आत्मकथा ‘द्रोहकाल का पथिक’कोई साहित्यिक कृति नहीं है, लेकिन 90 के दशक के बाद की राजनीति से उभरे एक नेता की आत्मकथा है. विमोचन के एक दिन पहले से …

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ओमप्रकाश वाल्मीकि ने हिंदी की चौहद्दी का विस्तार किया

ओमप्रकाश वाल्मीकि जी के प्रति एक छोटी सी श्रद्धांजलि ‘दैनिक हिन्दुस्तान’ में प्रकाशित हुई. मैंने ही लिखी है- प्रभात रंजन  ====================== ओमप्रकाश वाल्मीकि की एक कविता ‘शब्द झूठ नहीं बोलते’ की पंक्तियाँ हैं- मेरा विश्वास है/तुम्हारी तमाम कोशिशों के बाद भी/शब्द ज़िन्दा रहेंगे/समय की सीढ़ियों पर/अपने पाँव के निशान/गोदने के लिए/बदल …

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बिना देखे ही भोजपुरी फिल्मों को गाली देने का फैशन है

पटना में आयोजित भोजपुरी फिल्म फेस्टिवल के बहाने भोजपुरी सिनेमा की दशा-दिशा पर तौहीद शहबाज़(दिलनवाज) का एक गंभीर लेख- जानकी पुल. ============================== भोजपुरी सिनेमास्थापना कीस्वर्ण जयंतीमना रहाहै। परंतुयह उत्सवसे अधिक आत्म–मंथनका समयहै। पचासबरस कायह सफरतमाम मुश्किल पड़ाव सेहोकर यहां तक पहुंचाहै। लेकिनआज कीस्थिति भीखास उत्साहजनकनहीं। कहसकते हैं कि पहुंचेभी तोकहां पहुंचगए। भोजपुरीसिनेमा इतिहासके …

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