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थोड़ा पैसा आ जाने दो फ्रेम नया हम मढ़ लेंगे

अविनाश की पहली पहचान कवि के रूप में ही रही है. वे प्रयोगधर्मी हैं. हमेशा कुछ नया-नया करते रहते हैं. इधर उन्होंने छंदों में कुछ गीतनुमा-ग़ज़ल नुमा लिखा है. इनको पढ़कर मैं मुग्ध होता जा रहा हूँ. पारंपरिक छंदों की गजब की रवानी है इनमें. इनकी कुछ रचनाएँ आज साझा …

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स्त्री को इस समाज से एक लेखक बतौर सम्मान और पहचान चाहिए

कुछ अर्सा पहले मैत्रेयी पुष्प जी ने युवा लेखिकाओं के ऊपर एक टिप्पणी जनसत्ता में की थी। उसकी आग अभी तक ठंडी नहीं पड़ी है। अभी लखनऊ कथाक्रम में गीताश्री ने एक जोरदार भाषण दिया। फिलहाल पेश है वंदना राग का लेख—- जानकी पुल-  ————————————————-        कितना विचित्र समय है। …

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मृत्यु तो जीवन का शृंगार है

विजयदान देथा के निधन पर कई अखबारों में लेख, सम्पादकीय आये. आज सुबह दो अखबारों में सम्पादकीय पढ़ा- ‘दैनिक हिन्दुस्तान’ और ‘जनसत्ता’ में. ‘जनसत्ता’ का यह सम्पादकीय ख़ास लगा. कितने कम शब्दों में उनके बारे में कितना कुछ कह जाती है. जिन्होंने न पढ़ा हो उनके लिए- प्रभात रंजन. ========= …

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