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बन के सब चिल्ला पड़े- धिक्-धिक् है यह कौन!

नामवर सिंह की हस्तलिपि में मैंने पहली बार कुछ पढ़ा. रोमांच हो आया. इसका शीर्षक भले ‘एक स्पष्टीकरण’ है, लेकिन ऐसा लगता नहीं है कई यह किसी के लिखे विशेष के सन्दर्भ में दिया गया स्पष्टीकरण है. आप सब पढ़िए और निर्णय कीजिये- प्रभात रंजन. (नोट- साथ में, मूल पत्र …

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समय चुप रहने का नहीं बल्कि चुप रहकर बोलते जाने का है

ऋतु कुमार ‘ऋतु’। आप लोगों में से बहुत कम इस नाम से वाकिफ होंगे,उससे भी कम उसकी रची कविताओं से। उसके जीवन से तो सबसे कम। उसका परिचय और इतिहास इतना ही है कि वह उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गांव में 29 मार्च 1970को जन्मा और 15 अगस्त 2009 को जिस्म की बंदिश से आजाद …

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हिंदी के मगध में मौलिकता की कमी नहीं है

विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएस) के भारतीय भाषा कार्यक्रम की तरफ से हिंदी में समाज-विज्ञान के क्षेत्र में मौलिक लेखन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से ‘प्रतिमान’ नामक पत्रिका की शुरुआत की है, जिसके विद्वान संपादक हैं अभय कुमार दुबे. उनकी इस पहल का स्वागत करते हुए हम ‘प्रतिमान’ का …

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