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नाटक नहीं होना था, नाटक हुआ

२०१३ के रंग महोत्सव में मंटो की जिंदगी पर आधारित ‘अजोका’ की प्रस्तुति के न होने को लेकर प्रसिद्ध लेखक अपूर्वानंद ने कुछ गंभीर सवाल उठाये हैं और सामूहिक प्रयासों से उसके अक्षरा थियेटर में आयोजित किए जाने के बारे में लिखा. यह महत्वपूर्ण लेख आज ‘जनसत्ता’ में प्रकाशित हुआ …

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मैं हिंदी साहित्य की एकता हो गया हूँ

कल जब मैं गुलजार साहब का लिखा गीत ‘जब एक कज़ा से गुजरो तो इक और कज़ा मिल जाती है’ सुन रहा था कि कवि-आलोचक विष्णु खरे का यह पत्र ईमेल में प्राप्त हुआ. इन दिनों वे स्लोवाकिया की राजधानी ब्रातिस्लावा में प्रवास पर हैं.   उन्होंने इस पत्र को प्रकाशित करने …

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जब एक क़ज़ा से गुज़रो तो इक और क़ज़ा मिल जाती है

उम्र से लम्बी सड़कों पर ‘गुलज़ार’ 19 जनवरी की शाम गुलज़ार रही, गुलज़ार के नाम रही। मौक़ा था कवि-चिकित्सक विनोद खेतान लिखित पुस्तक “उम्र से लम्बी सड़कों पर गुलज़ार” के लोकार्पण का। ‘वाणी’ से प्रकाशित इस पुस्तक में लेखक ने बड़े आत्मीय ढंग से गुलज़ार के फ़िल्मी गीतों की परतों …

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