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Tag Archives: पीयूष दईया

‘मार्ग मादरज़ाद’ की कविताएँ: पीयूष दईया

आजकल लेखन में ही कोई प्रयोग नहीं करता कविता में करना तो दूर की बात है। सब एक लीक पर चले जा रहे हैं। लेकिन कवि संपादक पीयूष दईया अपनी लीक के मार्गी हैं। कम लिखते हैं, लेकिन काया और माया के द्वंद्व में गहरे धँस कर लिखते हैं। सेतु …

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विष्णु खरे की एक असंकलित कविता

विष्णु खरे की एक असंकलित कविता कवि-संपादक पीयूष दईया ने उपलब्ध करवाई है।  विष्णु खरे की स्मृति को प्रणाम के साथ- मॉडरेटर ================ वसन्त  वे दौड़ कर दीवार तक पहुँच जाते हैं दरारों में झाँक वापस मेरी ओर गर्दन मोड़ कर मेरी पीठ से पूछते हैं क्या तुम गंधस्नाता वासन्ती बयार …

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मनोहर श्याम जोशी की कुछ दुर्लभ कविताएँ

कवि-संपादक पीयूष दईया इन दिनों दुर्लभ रचनाओं, कृतियों की खोज में लगे हुए हैं. उनके हाथ मनोहर श्याम जोशी जी की ये दुर्लभ कविताएँ लगीं. वैसे तो जोशी जी की सम्पूर्ण कविताएँ उनके मरणोपरांत ‘कूर्मांचली की कविताएँ’ शीर्षक से पुस्तकाकार प्रकाशित हो चुकी हैं. लेकिन ये कवितायें उस संकलन में …

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जीवन और कला के अंतर्संबंधों की बेहतरीन किताब ‘सिमिट सिमिट जल’

कुछ किताबें ज्ञान बढाने के लिए होती हैं, कुछ मन को गुदगुदाने के लिए, कुछ गर्मी की छुट्टियों में पहाड़ों पर पेड़ के नीचे लेटकर पढने के लिए. गर्मी की छुट्टियाँ शुरू हो चुकी हैं. अगर आप इन छुट्टियों में कहीं जाने की योजना बना रहे हैं तो मेरा आग्रह …

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अज्ञेय का दुर्लभ और अप्राप्य निबंध ‘पानी का स्वर’

रज़ा फाउंडेशन, दिल्ली की एक लघु परियोजना के अन्तर्गत कवि-सम्पादक मित्र पीयूष दईया हिन्दी और अंग्रेजी भाषा की अप्राप्त रचना-सामग्री एकत्र कर रहे हैं—-विभिन्न विद्यानुशासनों और विधाओं की रचनाएँ। इसी सिलसिले में उन्हें अज्ञेय जी के कुछ आलेख मिले हैं। उन्हीं में से एक अप्राप्त निबन्ध जो (आजकल’ में प्रकाशित …

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विशुद्ध आत्मा के कवि पीयूष दईया का काव्य पाठ

हम पीयूष दईया के इस काव्यपाठ के साथ काव्य पाठ की सीरीज शुरू कर रहे हैं. एक गहरे दार्शनिक कवि के काव्यपाठ से- प्रभात रंजन  

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पाठक की भूख को शांत करने वाला साहित्य वार्षिकांक ‘दीप भव’

‘लोकमत समाचार’ की साहित्य वार्षिकी ‘दीप भव’ का इन्तजार बना रहता है. इसलिए नहीं कि उसमें मेरी रचना छपी थी. वह तो हर बार नहीं छपती है न. लेकिन पीछे 4-5 सालों से यह वार्षिकी हर बार निकल रही है. इन्तजार इसलिए रहता है कि यह भीड़ से हटकर होता …

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पीयूष दईया की तीन कविताएं

पीयूष दईया समकालीन कविता में सबसे अलग आवाज रखते हैं. सफलता-असफलता के मुहावरों से दूर. उनकी कविताओं को पढना जीवन को कुछ और करीब से जानना होता है. उनकी तीन नई कविताएं आपके लिए- प्रभात रंजन ======================= कभी खेलो मत यही खेल है 1।। क़ातिल स्त्रियों से छल करना सीखना …

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सूर्योदय हो रहा है मेरी भौंहों की घाटी बीच

महाराष्ट्र में नेरुर पार के एक तटवर्ती गांव में 1946 में जन्मे श्री प्रभाकार कोलते स्वातन्त्र्योत्तर भारत में आधुनिक अमूर्त-कला की पहली पीढ़ी में रज़ा, गायतोण्डे, रामकुमार प्रभृति के बाद अग्रणी नामों में से एक हैं। जे. जे. स्कूल ऑफ़ आर्ट, मुम्बई में औपचारिक कला-शिक्षा प्राप्त करने के बाद श्री …

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