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Tag Archives: प्रेमचंद

‘रंगभूमि’ का रंग और उसकी भूमि

प्रेमचंद का साहित्य जब से कॉपीराईट मुक्त हुआ है तब से उनकी कहानियों-उपन्यासों के इतने प्रकाशनों से इतने आकार-प्रकार के संस्करण छपे हैं कि कौन सा पाठ सही है कौन सा गलत इसको तय कर पाना मुश्किल हो गया है. बहरहाल, मुझे उनका सबसे प्रासंगिक उपन्यास ‘रंगभूमि’ लगता है. इतना …

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‘चाहे हमें कारतूस से मार दिया जाए लेकिन हम समाज की बुराई को लगातार उठाते रहेंगे’

सुरेश कुमार लखनऊ विश्वविद्यालय के शोधार्थी हैं. उन्होंने नवजागरणकालीन पत्रकारिता पर लिखते हुए इस लेख में यह बताया है कि किस तरह पत्रकारिता के कारण उस ज़माने में हिंदी के बड़े बड़े लेखकों-संपादकों को धमकियाँ मिलती रहती थीं लेकिन वे डरते नहीं थे बल्कि अड़े रहते थे. समाज की बुराइयों …

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मैं बहुत ही निम्नकोटि के चित्रपट देख रहा हूँ-प्रेमचंद

संपादक-कवि पीयूष दईया अपनी शोध योजना के दौरान दुर्लभ रचनाओं की खोज करते हैं और हमसे साझा भी करते हों. इस बार तो उन्होंने बहुत दिलचस्प सामग्री खोजी है. 1930 के दशक में प्रेमचंद का एक इंटरव्यू गुजराती के एक पत्र में प्रकाशित हुआ. बाद में वह प्रेमचंद सम्पादित पत्रिका …

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प्रेमचंद पर महादेवी वर्मा का लेख

आज महादेवी वर्मा का जन्मदिन है. बीसवीं शताब्दी में स्त्री लेखन को एक मुकम्मल पहचान देने वाली इस लेखिका ने जीवन और लेखन अपनी शर्तों पर किया और अपने लेखन के बल पर हिंदी में अमिट पहचान बनाई. आज उनके जन्मदिन पर उनका यह छोटा सा लेख जो उन्होंने प्रेमचंद …

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प्रेमचन्द के नाम शहरी बाबू की पाती

धर्मग्रंथों के बाद हिंदी में सबसे अधिक उनकी रचनाएँ पढ़ी गईं और धार्मिक कथा-लेखकों-कवियों के बाद वे हिंदी समाज के सबसे अधिक समादृत लेखक हैं. मुझे उनके लेखन से अधिक उनका लेखकीय व्यक्तित्व प्रभावित करता है, प्रेरित करता है. वे कुछ और नहीं थे लेखक थे, प्रेमचंद लेखन  के माध्यम …

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प्रेमचंद कैसे बने मुंशी प्रेमचंद?

प्रेमचंद के मुंशी प्रेमचंद बनने की यह कहानी पढ़ी तो आपसे साझा करने का मन हुआ. डॉ. जगदीश व्योम ने लिखी है. जहाँ पढ़ा उसक सन्दर्भ लेख के नीचे यथास्थान दे दिया है- मॉडरेटर  ========================================================== सुप्रसिद्ध साहित्यकारों के मूल नाम के साथ कभी-कभी कुछ उपनाम या विशेषण ऐसे घुल-मिल जाते …

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