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Tag Archives: भगवानदास मोरवाल

भगवानदास मोरवाल के उपन्यास ‘सुर बंजारन’ का एक अंश

एक समय में इस देश में लगने वाले मेलों की ठाठ नौटंकी के बिना अधूरी रहती थी. नौटंकी को गरीबों का सिनेमा कहा जाता था, जिस में गीत-संगीत के साथ कहानी दिखाई जाती थी. नौटंकी विधा को आधार बनाकर भगवानदास मोरवाल ने ‘सुर बंजारन’ नामक उपन्यास लिखा जो वाणी प्रकाशन …

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क्या ‘नरक मसीहा’ साल का सबसे प्रासंगिक उपन्यास है?

हिंदी में यह अच्छी बात है कि आज भी किसी लेखक का कद, पद, प्रचार प्रसार किसी पुस्तक की व्याप्ति में किसी काम नहीं आता. अब देखिये न पिछले साल काशीनाथ सिंह का उपन्यास आया, अखिलेश का उपन्यास आया, मैत्रेयी पुष्पा का उपन्यास आया. सबसे देर से आया भगवानदास मोरवाल …

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प्रेमचंद की परम्परा बचेगी या लप्रेक की परम्परा चलेगी

‘लप्रेक’ एक नई कथा परम्परा की शुरुआत है. लेकिन हर नई शुरुआत को अपनी परम्परा के साथ टकराना पड़ता है, उनके सवालों का सामना करना पड़ता है. आज ‘लप्रेक’ के बहाने हिंदी परम्परा को लेकर कुछ बहासतलब सवाल उठाये हैं हिंदी के प्रतिष्ठित लेखक भगवानदास मोरवाल ने, जिनके उपन्यास ‘नरक …

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