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Tag Archives: arun dev

जो मेरी रचना का मित्र नहीं वह मेरा मित्र नहीं!

आज हिंदी दिवस है लेकिन बजाय रोने ढोने के या ‘जय हिंदी! जय हिंदी!’ का झंडा उठाने के बजाय आज पढ़ते हैं हिंदी की आलोचना को लेकर कवि-लेखक, ‘समालोचन’ जैसे सुपरिचित ब्लॉग के मॉडरेटर अरुण देव के विचार- मॉडरेटर. ==========================  १. हिंदी के आदि संपादक आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी जब रेलवे …

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स्त्री के बालों से डरती है सभ्यता

आज युवा कवि अरुण देव की कविता. इतिहास, आख्यान के पाठों के बीच उनकी सूक्ष्म दृष्टि, बयान की नफासत सहज ही ध्यान आकर्षित कर लेती है. इसमें कोई संदेह नहीं कि उनका मुहावरा, उनकी शब्दावली समकालीन कविता में सबसे अलग है. आज संयोग से अरुण का जन्मदिन भी है. इसी …

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सरयू में काँप रही थी अयोध्या की परछाईं

अरुण देव की इस कविता में इतिहास के छूटे हुए सफों का ज़िक्र  है, उनमें  भूले हुए प्रसंग अक्सर पुराने दर्द की तरह उभर आते हैं. उनकी कवि-दृष्टि  वहाँ तक जाती है जहाँ से हम अक्सर नज़रें फेर लिया करते हैं. इस कविता में तहजीब की उस गली का दर्द …

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