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Tag Archives: arvind das

तथ्य और सत्य के बीच फेक न्यूज

युवा पत्रकार अरविन्द दास का यह लेख फेक न्यूज को लेकर चल रही बहस को कई एंगल से देखता है. उसके इतिहास में भी जाता है और वर्तमान पेचीदिगियों से भी उलझता है. अरविन्द दास पत्रकार हैं, पत्रकारिता पर शोध कर चुके हैं और हाल में ही उनके लेखों का …

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नागार्जुन से तरौनी कभी छूटा नहीं

आज बाबा नागार्जुन की पुण्यतिथि है. इस अवसर पर युवा पत्रकार-लेखक अरविन्द दास का यह लेख प्रस्तुत है, जिसमें उनके गाँव तरौनी की यात्रा का भी वर्णन है. यह लेख उनके शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक ‘बेखुदी में खोया शहर: एक पत्रकार के नोट्स’ में संकलित है. बाबा को सादर प्रणाम के …

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वीरेन डंगवाल की सम्पूर्ण कवितायें पर अरविंद दास की टिप्पणी

अभी हाल में ही नवारुण प्रकाशन से जनकवि वीरेन डंगवाल की सम्पूर्ण कविताओं की किताब प्रकाशित हुई है। उसके ऊपर एक सारगर्भित टिप्पणी युवा लेखक-पत्रकार अरविंद दास की- मॉडरेटर ============================================= समकालीन हिंदी कविता की बनावट और बुनावट दोनों पर लोक की छाप स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ती है. लोक की …

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ऑनलाइन समाचार की दुनिया में नयापन क्यों नहीं है?

ऑनलाइन समाचारों की दुनिया पर ‘हिंदी में समाचार’ जैसी शोधपरक पुस्तक के लेखक अरविन्द दास का लेख- मॉडरेटर =============== श्रीदेवी की दुखद मौत बॉलीवुड और उनके फैन्स के लिए सदमे से कम नहीं था. उनकी मौत होटल के बाथटब में दुर्घटनावश डूबने के कारण हुई, लेकिन टेलीविजन न्यूज चैनल ने …

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‘ऑनलाइन’ प्रतिरोध को ‘ऑफलाइन’ प्रतिरोध से जोड़े जाने की जरुरत है

‘not in my name’ कैम्पेन फिल्मकार सबा दीवान के फेसबुक वाल से शुरू हुआ और देश भर में फैला. सरकार डिजिटल इण्डिया की बात करती है. देश के लोगों ने दिखा दिया कि डिजिटल इण्डिया का क्या मतलब होता है. लेकिन भाषा को लेकर कुछ सवाल उठे. क्या देशी भाषाओं …

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मृत्यु-गंध में लिपटी स्वदेश दीपक की ‘बगूगोशे’ की ख़ूशबू

जगरनॉट बुक्स से स्वदेश दीपक की आखिरी कहानियों का संग्रह प्रकाशित हुआ है- बगूगोशे. इस संग्रह पर युवा लेखक-पत्रकार अरविन्द दास की लिखत पढ़िए. कितनी आत्मीयता से लिखा है- मॉडरेटर ======================================= मृत्यु-गंध कैसी होती है/ वह एक ऐसी खुशबू है/ जो लंबे बालों वाली/ एक औरत के ताजा धुले बालों …

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आपातकाल के 40 साल बाद: मीडिया और मोदी सरकार

एनडीटीवी के मालिक प्रणय रॉय के घर पड़े छापे के बाद से यह बहस तेज हो गई है कि उस छापे के माध्यम से सरकार मीडिया को क्या सन्देश देना चाहती थी? इस प्रकरण के बहाने एक सुचिंतित लेख लिखा है अरविन्द दास ने. अरविन्द पत्रकारिता से पीएचडी कर चुके …

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मैथिली सिनेमा को भी ‘अनारकली’ का इंतज़ार है

  अरविन्द दास ने मीडिया पर बहुत अच्छी शोधपूर्ण पुस्तक लिखी है. एक प्रतिष्ठित मीडिया हाउस में काम करते हैं. समकालीन विषयों पर बारीक नजर रखते हैं और सुचिंतित लिखते हैं. अब यही लेख देखिये मैथिली सिनेमा की दशा-दिशा पर कितना बढ़िया लिखा है- मॉडरेटर ===================== ‘अनारकली ऑफ आरा ‘फ़िल्म …

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हिंदी में एकांगी मीडिया मंथन

अरविंद दास ने जेएनयू से मीडिया पर पीएचडी कर रखी है। मेरे जानते हिन्दी में मीडिया पर जो गिनी चुनी शोधपूर्ण पुस्तकें हैं उनमें एक अरविंद दास की किताब भी है- हिंदी में समाचार। एक मीडिया संस्थान में काम भी करते हैं। बहरहाल, मीडिया और विज्ञापन को लेकर उनकी या …

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