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हंस प्रकाशन राजकमल प्रकाशन परिवार का हिस्सा बना

प्रेमचंद के पुत्र अमृत राय द्वारा 1948 में स्थापित हंस प्रकाशन आज से राजकमल प्रकाशन समूह का हिस्सा हो गया है। प्रेमचंद की जयंती के दिन की यह उल्लेखनीय घटना है। हंस प्रकाशन का ऐतिहासिक महत्व रहा है और इसकी अपनी समृद्ध विरासत है। आशा है अब हम नए सिरे …

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‘मम्मी शिमला गई थीं ‘महाभोज’ लिखने के लिए’- रचना यादव

यह एक पुरानी बातचीत है रचना यादव से।संगीता ने रचनाजी  से यह बातचीत वेबपत्रिका लिटरेट वर्ल्ट के लिए अगस्त 2003 में की थी।रचना यादव हिन्दी की मशहूर कथा-लेखिका मन्नू भंडारी और बहुचर्चित लेखक-संपादक राजेन्द्र यादव की बेटी हैं। रचना को उसके मम्मी पापा और सभी जानने वाले टिंकू ही पुकारते हैं। रचना ने एडवर्टाइजिंग में मास …

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महात्मा गांधी के बारह दूत

रामचंद्र गुहा के इस लेख का अनुवाद ‘हंस’ के नए अंक में प्रकाशित हुआ है। अनुवाद मैंने किया है- प्रभात रंजन ================================= कई साल पहले जब मैं नेहरू स्मृति संग्रहालय एवं पुस्तकालय में काम कर रहा था तो मुझे किसी अज्ञात तमिल व्यक्ति का पोस्टकार्ड मिला जो उसने महान भारतीय …

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मार तमाम के दौर में ‘कहीं कुछ नहीं’

मैंने अपनी पीढ़ी के सबसे मौलिक कथाकार शशिभूषण द्विवेदी के कहानी संग्रह ‘कहीं कुछ नहीं’ की समीक्षा  ‘हंस’ पत्रिका में की है। राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित इस संग्रह की समीक्षा हंस के नए अंक में प्रकाशित हुई है। जिन्होंने न पढ़ी हो उनके लिए- प्रभात रंजन सन 2000 के बाद …

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कृष्णा सोबती उनकी जीजी थीं

हंस पत्रिका का अप्रैल अंक कृष्णा सोबती की स्मृति को समर्पित था, जिसका सम्पादन अशोक वाजपेयी जी ने किया है। इस अंक में कृष्णा जी को याद करते हुए उनकी भतीजी ने एक आत्मीय संस्मरण लिखा है जिसका अंग्रेज़ी से अनुवाद मैंने किया है। आपने न पढ़ा तो तो पढ़िएगा- …

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