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कलाकार का मन कवि-मन होता है

जाने-माने शिल्पकार-चित्रकार सीरज सक्सेना हिंदी के अच्छे, संवेदनशील लेखक भी हैं. उनके लेखों का संग्रह ‘आकाश एक ताल है’ वाग्देवी प्रकाशन से प्रकाशित हो रहा है. इसकी भूमिका प्रसिद्ध पत्रकार, लेखक ओम थानवी ने लिखी है. प्रस्तुत है ओमजी की भूमिका- मॉडरेटर ======================== कलाकार का मन कवि-मन होता है। कैनवस …

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लाल शाहबाज़ कलंदर की दरगाह के बारे में ओम थानवी ने क्या लिखा था?

कल जब टीवी पर यह समाचार देखा कि सूफी फ़कीर शाहबाज़ कलंदर की मजार पर धमाका हुआ है तो मुझे ओम थानवी की किताब ‘मुअनजोदड़ो’ की याद आई. उस किताब में उन्होंने सेवण शरीफ की यात्रा का जिक्र किया है- “बाहर उजाला हो गया था. बस एक कस्बे में रुकी …

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क्या ओम थानवी को भुला दिया जाना चाहिए?

हमेशा की तरह आज भी सुबह उठकर सबसे पहले जनसत्ता अखबार खोला. ओम थानवी का नाम संपादक की जगह नहीं मिला. जबकि अखबार में कोई बदलाव नहीं दिखा लेकिन न जाने क्यों पढ़ते हुए एक सूनापन, खालीपन महसूस हुआ. होता है 16 साल से उनका नाम देख रहा था. इन …

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हाथी-घोड़ा-पालकी

लोकसभा चुनाव संपन्न हुए, हार-जीत तय हो गई. आज कई अखबारों में चुनाव परिणामों का विश्लेषण देखा-पढ़ा. ‘जनसत्ता’ संपादक ओम थानवी का यह विश्लेषण कुछ अधिक व्यापक, संतुलित और बेबाक लगा. आप भी पढ़िए- प्रभात रंजन  ==================================== न कांग्रेस को इस पतन की उम्मीद थी, न भाजपा को ऐसे आरोहण …

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हिंदी के शब्दों का हिंदी में खुलासा

‘जनसत्ता’ संपादक, बेहतरीन गद्यकार ओम थानवी भाषा, भाषा प्रयोग को लेकर गंभीरता से लिखने वाले विचारकों में हैं। कई बार हिन्दी भाषा के प्रयोगों पर चर्चा करते हुए वे कट्टर लगने लगते हैं, कई बार बेहद जरूरी सवाल उठाते हैं। जैसे आज उन्होने अपने स्तम्भ ‘अनंतर’ में महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय …

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‘अपने अपने अज्ञेय’ निस्‍संदेह विरल और औपन्‍यासिक है

अज्ञेय के जन्मशताब्दी वर्ष में उनके मूल्यांकन-पुनर्मूल्यांकन के अनेक प्रयास हुए। अनेक पुस्तकें उस साल आई। लेकिन सबसे यादगार पुस्तक रही ‘अपने अपने अज्ञेय’। जिसका सम्पादन किया ओम थानवी ने। देर से ही सही दो खंडों के इस संस्मरण संग्रह पर एक अच्छा लेख लिखा है ओम निश्चल ने- जानकी …

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पत्रकारिता की शिक्षा गैर-पत्रकार कैसे देते हैं?

कल ‘जनसत्ता’ संपादक ओम थानवी ने प्रेस परिषद के अध्यक्ष न्यायमूर्ति मार्कण्डेय काटजू के इस कथन के बहाने कि मीडिया में आने के लिए न्यूनतम योग्यता तय होनी चाहिए, मीडिया शिक्षा पर वाजिब सवाल उठाये हैं. ओम थानवी का यह लेख अपने अकाट्य तर्कों के साथ बेहब वाजिब सवाल उठाता है …

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अब वापस कुछ साहित्योत्सव की बात

आज जयपुर साहित्योत्सव पर जनसत्ता संपादक ओम थानवी ने बहुत संतुलित ढंग से लिखा और बेहद विस्तार से उसके प्रभावों, उसकी सीमाओं का आकलन भी किया है. विवादों के घटाटोप के पीछे उसके सार्थक हस्तक्षेप की चर्चा दब कर रह गई, उसके कुछ पूर्वाग्रहों-दुराग्रहों की चर्चा पीछे रह गई. सब …

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पांचवें युद्ध की बात भारत क्यों छेड़ने बैठे?

ऐसे समय में जब भाजपा की ओर से लगातार युद्ध का माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है, पहले सुषमा स्वराज का बयान आया, आज ‘जनसत्ता’ में तरुण विजय ने भी लिखा है, बौद्धिक समुदाय का यह कर्तव्य बनता है कि युद्ध के खिलाफ माहौल बनाया जाए. आज ‘जनसत्ता’ …

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लेखक समुदाय और संगठनों को आत्मालोचना की भी जरूरत है

दिल्ली में हुई दुर्भाग्यपूर्ण घटना के बाद हुए आंदोलन के में लेखकों-लेखक संगठनों की भूमिका को लेकर आज जनसत्ता में संपादक ओम थानवी और निर्मला जैन के लेख प्रकाशित हुए हैं. ओम थानवी ने पिछले हफ्ते जो लेख लिखा था उसे लेकर सोशल मीडिया में बड़ी बहस चली. इस लेख …

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