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Tag Archives: prabhat ranjan

भैया एक्सप्रेस और चाचा की टिप्पणी

‘बया’ पत्रिका का नया अंक अरुण प्रकाश पर एकाग्र है. इसमें मैंने भी अरुण प्रकाश जी के ऊपर कुछ संस्मरणनुमा लिखा है. देखिएगा- प्रभात रंजन  ================================= जब भी अरुण प्रकाश याद आते हैं मुझे अपना गाँव याद आ जाता है. सीतामढ़ी में इंटरमीडिएट का विद्यार्थी था. राजनीतिशास्त्र के प्राध्यापक मदन …

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जो राष्ट्रीय नहीं है वह क्या अंतरराष्ट्रीय होगा

कल हिंदी दिवस है. हिंदी के आह-वादी और वाह-वादी विमर्श से हटकर मैंने कुछ लिखा है. यह लेख मूल रूप से ‘प्रभात खबर’ के लिए लिखा था. अब आपके लिए- प्रभात रंजन  ========================================= हर साल हिंदी दिवस के आसपास हिंदी को लेकर दो तरह की चर्चाएँ होने लगती हैं- आह-वादी …

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प्रभात रंजन की कविताएँ

ये मेरी कविताएँ नहीं हैं, बल्कि ६०-७० के दशक के प्रसिद्ध कवि प्रभात रंजन की कविताएँ हैं. मेरे जन्म के समय ये इतने प्रसिद्ध थे कि कहते मेरे दादाजी ने उनके नाम पर ही मेरा नाम रखा था. हालांकि परिवार में इस बात को लेकर मतभेद है, क्योंकि मेरे पापा …

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क्या है ‘फिफ्टी शेड्स ऑफ ग्रे’ ?

प्रकाशन के साल भर के भीतर जिसकी तीन करोड़ से अधिक प्रतियाँ बिक गई, तकरीबन चालीस देशों में जिसके प्रकाशन-अधिकार देखते-देखते बिक गए, कुछ ही समय में यह अब तक की सबसे तेजी से बिकने वाली पेपरबैक किताब बन गई, इ. एल. जेम्स लेखिका से दुनिया की मशहूर सेलिब्रिटी बन …

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‘जानकी पुल’ एक कहानी है

अपने-पराये सब पूछते हैं कि ब्लॉग का नाम जानकी पुल क्यों? इस नामकरण के पीछे मेरी अपनी यही कहानी है. कहानी में पुल नहीं बन पाया, इसलिए यहां आभासी दुनिया में पुल बनाने की कोशिश है यह- प्रभात रंजन. —————————–       ऐसा लगा जैसे कोई भूली कहानी याद आ गई …

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पौड़ी के पहाड़ प्यारे

सत्यानन्द निरूपम ऐसे संपादक हैं जो मुझसे कुछ भी लिखवा लेते हैं, अनुवाद करवा लेते हैं. अब सरिता के यात्रा विशेषांक के लिए लिखे गए इस यात्रा वृत्तान्त को ही लीजिए. मैं घूमता तो बरसों से रहा हूं, लेकिन कभी किसी यात्रा पर लिखा नहीं. पहली बात यात्रा-वृत्तान्त लिखा तो …

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हिंदी पुस्तक बाजार: कैसा रहा व्यापार

20 वां पुस्तक मेला समाप्त हो गया. खबर आई कि हिंदी किताबों के स्टॉल्स पर अधिक भीड़ रही. ‘इण्डिया टुडे’ ने लिखा कि प्रकाशकों की युवा पीढ़ी हिंदी प्रकाशन के परिदृश्य को बदल रही है. हिंदी प्रकाशन का परिदृश्य किस तरह बदल रहा है, इसको लेकर मेरा यह लेख कल …

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‘मोनोक्रोम’ एक पुरानी कहानी

मैं मूलतः कहानियां लिखता हूँ. लेकिन जानकी पुल पर उनको कम ही साझा करता हूँ. आज अपनी एक पुरानी कहानी साझा कर रहा हूँ. ‘मोनोक्रोम’ नामक यह कहानी भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित  मेरे पहले कहानी संग्रह ‘जानकी पुल’ में संकलित है- प्रभात रंजन  ‘अल कौसर’ के बाहर चहलकदमी करते हुए …

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अपनी हिंदी में बेस्टसेलर की तलाश

 हिंदी में ‘बेस्टसेलर’ की चर्चा एक बार फिर शुरु हो गई है. एक ज़माना था जब पत्रिकाओं में निराला की कविताओं के नीचे चमत्कारी अंगूठी का विज्ञापन छपता था. राही मासूम रज़ा जासूसी दुनिया के लिए जासूसी उपन्यास लिखा करते थे, पुस्तकों के एक ही सेट में गुलशन नंदा और …

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क्या हिंदी किताबों का पाठकों के साथ सीधा संबंध बन पायेगा?

पुस्तकों के भविष्य को लेकर कुछ दिनों पहले मैंने यह लेख लिखा था. आज आपसे साझा कर रहा हूँ. आखिर इंटरनेट के युग में पुस्तकों का क्या स्वरुप बनेगा, वह सीधे पाठकों तक पहुँच पायेगी या पहले की ही तरह लाइब्रेरी में ‘डंप’ होती रहेगी? ऐसे ही कुछ सवालों के …

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