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Tag Archives: sadan jha

रोजनामचा है, कल्पना है, अनुभव है!

हाल में ही रज़ा पुस्तकमाला के तहत वाणी प्रकाशन से युवा इतिहासकार-लेखक सदन झा की ललित गद्य की पुस्तक आई है ‘हाफ सेट चाय और कुछ यूँही’. प्रस्तुत है उसकी भूमिका और कुछ गद्यांश- मॉडरेटर ================ किताब के बारे में: एक रोजनामचा है. यहाँ कल्पना है, अनुभव है. दोस्तों के …

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लिटरेरी एजेंट और हिंदी का प्रकाशन जगत

सदन झा इतिहासकार हैं. सेंटर फॉर सोशल स्टडीज, सूरत में एसोसियेट प्रोफ़ेसर हैं. उनका यह लेख हिंदी के ‘पब्लिक स्फेयर’ की व्यावहारिकताओं और आदर्शों के द्वंद्व की अच्छी पड़ताल करता है और कुछ जरूरी सवाल भी उठाता है. एक बहसतलब लेख- मॉडरेटर ============================ चंद रोज पहले मैंने अपने फेसबुक वाल …

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सदन झा की कुछ दिलचस्प छोटी कहानियाँ

इतिहासकार सदन झा सेंटर फ़ॉर सोशल स्टडीज़, सूरत में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं। राष्ट्रीय झंडे पर उन्होंने महत्वपूर्ण काम किया है और उनके कई शोध लेख देश-विदेश की पत्र-पत्रिकाओं में छप चुके हैं। सदन कभी-कभार कहानियाँ भी लिखते हैं और कुछ पत्रिकाओं में उनकी कुछ कहानियाँ पहले भी छप चुकी हैं। …

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हम सब भी इंसान रूप में कुछ-कुछ गधे ही हैं

सदन झा इतिहासकार हैं. आधुनिक इतिहास के गहरे अध्येता, सिम्बल्स को लेकर बहुत अच्छा काम कर चुके हैं. यूपी के गधा विमर्श में उन्होंने एक अलक्षित पहलू की तरफ ध्यान दिलाया है. पढने लायक- मॉडरेटर ============================================= हर दफे चुनाव कुछ नये शगूफे लेकर आता है। फिर, यूपी चुनाव की बड़ी …

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नेहरु के भारत की खोज

अगले साल नेहरु की मृत्यु के पचास साल हो जायेंगे. नेहरु ने इतिहास की कई किताबें लिखीं लेकिन नेहरु के इतिहास-दृष्टि की चर्चा कम होती है. युवा इतिहासकार सदन झा का यह संक्षिप्त लेकिन सारगर्भित लेख नेहरु के इतिहास दृष्टि अच्छी झलक देता है. आपके लिए- जानकी पुल. =========================================== यदि …

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कौन तय करेगा कि कार्टून का अर्थ क्या हो?

हाल के कार्टून विवाद के बहाने  युवा इतिहासकार सदन झा का यह लेख. सदन ने आजादी से पहले के दौर के दृश्य प्रतीकों पर काम किया है, विशेषकर चरखा के प्रतीक पर किए गए उनके काम की बेहद सराहना भी हुई है. इस पूरे विवाद को देखने का एक अलग …

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भीड़, जनसमुदाय और राजनीति अन्‍ना के बहाने

युवा इतिहासकार सदन झा हर चीज़ में कुछ नया, कुछ अलग देखते हैं. हमारे देखे हुए को, सुने हुए को एक लग अंदाज़ में दिखाते-सुनाते हैं. लोककथाओं की शैली में गहरी विद्वत्ता झलकती है. अब भीड़ के बहाने यही लेख देखिये- जानकी पुल.  अरे रे राष्ट्रियश्‍यालक! एह्येहि स्‍वस्‍याविनयस्‍य फलमनुभव। (तत: …

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ज्ञानी होइ सो अरथु लगावै, मुरख होइ उठि जाइ

युवा इतिहासकार सदन झाकी पकड़ शास्त्र और लोक दोनों पर ही समान रूप से और गहरी है. लोक-ज्ञान पर इस लेख को पढकर इसकी ताकीद की जा सकती है. आधुनिक औपचारिक शिक्षा से अलग  ज्ञान की एक संचित परंपरा रही है, जिससे हमारा नाता टूटता जा रहा है. उन्हीं टूटे …

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