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Tag Archives: shashibhushan dwivedi

मार तमाम के दौर में ‘कहीं कुछ नहीं’

मैंने अपनी पीढ़ी के सबसे मौलिक कथाकार शशिभूषण द्विवेदी के कहानी संग्रह ‘कहीं कुछ नहीं’ की समीक्षा  ‘हंस’ पत्रिका में की है। राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित इस संग्रह की समीक्षा हंस के नए अंक में प्रकाशित हुई है। जिन्होंने न पढ़ी हो उनके लिए- प्रभात रंजन सन 2000 के बाद …

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शशिभूषण द्विवेदी की कहानी ‘अभिशप्त’

शशिभूषण द्विवेदी नई-पुरानी कहानी के सीमांत के कथाकार हैं. नए तरह की जीवन स्थितियों-परिस्थितियों की आहट सबसे पहले जिन कथाकारों में सुनाई पड़ने लगी उनमें शशिभूषण सबस अलग हैं. उनकी कहानी ‘अभिशप्त’ मुझे बहुत पसंद है जो एक लम्बे अंतराल के बाद प्रकाशित उनके नए कहानी संग्रह ‘कहीं कुछ नहीं’ …

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बर्बाद जीनियस थे(हैं) ब्रजेश्वर मदान

ब्रजेश्वर मदान को मैं तब से जानता था जब डीयू में पढ़ते हुए फ्रीलांसिंग शुरू की थी. दरियागंज में ‘फ़िल्मी कलियाँ’ के दफ्तर में उनसे मिलने जाया करता था. वे उसके संपादक थे. मनोहर श्याम जोशी से जब बाद में मिलना हुआ और उनसे एक गहरा नाता बना तो वे …

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काशीनाथ सिंह के उपन्यास ‘उपसंहार’ का पाठ-विश्लेषण

बड़ा लेखक वह होता है जो अपने ही बनाए सांचे को बार-बार तोड़ता है, फिर नया गढ़ता है. काशीनाथ सिंह का नया उपन्यास ‘उपसंहार’ ‘काशी के अस्सी’ के पाठकों को पहले चौंकाता है फिर अपने साथ बहाकर ले जाता है. कृष्ण के अंतिम दिनों को आधार बनाकर लिखा गया यह …

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मैं मनुष्य ही बने रहना चाहता हूँ- विश्वनाथ त्रिपाठी

हाल में ही प्रसिद्ध आलोचक, लेखक और सबसे बढ़कर एक बेजोड़ अध्यापक विश्वनाथ त्रिपाठी ने अपने जीवन के 80 साल पूरे कर लिए. लेकिन अभी भी वे भरपूर ऊर्जा से सृजनरत हैं. अभी हाल में ही उनकी किताब आई है ‘व्योमकेश दरवेश‘, जो हजारी प्रसाद द्विवेदी के जीवन-कर्म पर है. उनसे …

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