बीती हुई उम्र एक किताब की तरह है

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कमला प्रसाद जी को गए एक साल हो गया. हर पीढ़ी के लेखकों से गहरा जुड़ाव रखने वाले इस लेखक-आलोचक-संपादक को याद करते हुए प्रस्तुत है उनकी यह आत्म कहानी जो सेवाराम त्रिपाठी, विजय अग्रवाल और आशीष त्रिपाठी द्वारा लिए गए साक्षात्कार पर आधारित है और इसे हमने ‘शीतल वाणी’ पत्रिका से लिया है- जानकी पुल.
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दइ टटिया निकरि चला हो, अरे निकरि चला महाराज हो
कौने माया मा अरझे हैं प्रान हो,दइ टटिया निकरि चला हो
        जीवन की अति-पुरानी याद ऐसे ही किसी गीत से जुड़ी है। लोग भगत, लमटेरा या भोलादानी गाते हुए, कीर्तन करते, शंख बजाते, घंटे बजाते हुए एक पुराने गांव से निकलकर एक नए गांव की ओर जा रहे हैं। गांव क्या है- जमीन का एक टुकड़ा है, ऊबड़-खाबड़, जिसे बसाने जा रहे हैं लोग। एक यात्रा है जिसके पीछे विस्थापन है। भजन-कीर्तन और शंख की आवाज के पीछे एक पीड़ा है, रोष है सरस्वती नदी सा विलुप्त….। गांव उखड़ रहा था।
        हमारा गांव धौरहरा रीवा राज्य की रैगांव जागीर का हिस्सा था। जब मैं बहुत छोटा था, शायद चार-पांच साल का, धौरहरा को उखाड़ने का आदेश हुआ। धौरहरा अकेला गांव नहीं था, यह लगभग रिवाज था गांवों के विस्थापन का। जब गांव कुछ पुराना हो जाता, गोबर, सो ज़मीन सड़ी-गली चीजों व अन्य कारणों से बहुत उपजाऊ होती थी और बहुत ऊंची कई गुना कीमतों पर बिकती थी। गांव जागीर के आदेश पर उखड़ा और पास में तीन-चार फर्लांग की दूरी पर एक दूसरी जगह में बसा। मेरा जन्म पुराने गांव में हुआ। घर के पीछे की गड़हिन जिसमें मैं अक्सर छुप-छुप कर नहाता था, अमरूद का पेड़ जिसकी मिठास की प्रसिद्धि थी और जिसे खाने के लिए लोग लालायित रहते थे, आज भी याद आते हैं। विस्थापन हुआ। लोग निकले, मैं भी अपनी उमर के लड़कों के साथ कूदता-फुदकता गाता-नाचता नए गांव में आ गया। गांव बसा, घर बनाने में मैं भी सबकी मदद करता। मिट्टी मचाता, ले आता, दीवाल बनती जाती, घर बनता जाता।
        विस्थापन की इसी यात्रा में मैंने शोषण का पहला विरोध देखा। गांव की बागरी कौम का एक बूढ़ा आदमी था देवी बाबू। नए गांव में अपना नया घर बनाते हुए वह बहुत गुस्से में था। अनावश्यक गाली-गलौज करता, बड़बड़ाता। कहता-कहां अच्छे खासे रह रहे थे, इन राजाओं-महाराजाओं को हमारे दुख से क्या मतलब! ऐसी ही कुछ छोटी-मोटी बातों को छोड़ दें तो कोई विरोध या विद्रोह का स्वर मैंने बचपन में नहीं सुना। अलबत्ता लोग जागीर के सिपाहियों, पटवारियों से बहुत डरते थे। उनके सामने तो कुछ न कहते पर पीठ पीछे सभी उनके प्रति अपना आक्रोश व्यक्त करते। बड़बड़ाहट में छिपी वह आग बहुत धीमी थी, पर थी। लोगों ने उसे मन की गोरसी में राख के भीतर छिपा दिया था।
        मेरा जन्म बेहद गरीब किसान परिवार में हुआ था। खेती आज की तरह उत्पादक नहीं थी। हर दूसरे तीसरे साल अकाल पड़ता था। कुछ बड़े किसानों के पास ही खाने को हमेशा अनाज रहता। मजूर और छोटे किसान उनके हाथ-पांव जोड़ते, भीख मांगते। वे बहुत महंगे दामों पर बेचते, पैसा न होने पर खेत गहन कर लेते। किसानों की हालत बहुत खराब रहती। जीना मुश्किल होता। मैंने अपनी आंखों से देखा है कि लोग सामा, कोदो, कैंथे, आंवले से किसी तरह गुजारा करते। भूख के कारण कई लोग मर भी जाते। हमारे घर की हालत बहुत खराब थी। बाबा की मृत्यु पिता जी के बचपन में ही हो गई थी। जो जमीन उनके पास थी वह पास के एक पंडित जी के यहां गहन पर रखी थी। एक-दो एकड़ जो जमीन बची थी, उससे घर का खर्च नहीं चलता था। जिस साल फसल नहीं होती, किसी तरह जुगत से दाना-दाना इकट्ठा कर जीवन चलता। कई बार मां, चाची और दादी दूसरे के खेतों से अनाज बीनकर लाते तब कहीं चूल्हा जलता।
        आर्थिक विपन्नता ने पिता को पान बेचने पर मजबूर किया, चाचा भी जबलपुर चले गए। वे साल में एक-दो बार आते और पिता को कुछ रुपया दे जाते, मदद के लिए। लोग पिता को नाम धरते, क्या ब्राह्मण होकर बरइयों का काम करते हैं। पिता गरीबी से लड़ने के बहाने शायद एक किस्म का मौन विरोध भी कर रहे थे व्यवस्था से। वे दस-पंद्रह दिन में सतना जाते, पान ले आते और बेचते। उस समय जमींदारी में कुछ लोग नियमित पान खाने वाले हुआ करते थे। धार्मिक कामों में भी पान की आवश्यकता होती। कुछ मिलाकर वे कोशिश कर रहे थे आर्थिक विपन्नता से लड़ने की। बाद में मैं जब नौकरी में आ गया तो मैंने मना किया फिर भी वे इसे करते रहे। उनका यह विद्रोह मुझे बार-बार याद आता है। ५७ या ५८ तक घर बहुत छोटा था, इसी साल घर का विस्तार किसी तरह पिता जी ने करवाया। खेती भी नए सिरे से शुरू हुई।
        मेरी शिक्षा पर भी आर्थिक विपन्नता का असर पड़ा। तरह-तरह की कोशिशों के बाद किसी तरह पढ़ पाता। गरीबी को लेकर एक किस्म की हीन भावना पूरी पढ़ाई के दौरान रही। माध्यमिक शिक्षा के लिए जब सतना आया तब कहीं ठीक-ठाक कपड़े मिले। कई बार दोस्तों की मदद भी पढ़ाई के लिए मिलती। आठवीं पास करके 1955 में घर की आर्थिक दिक्कतों के चलते ही मैंने स्कूल में नौकरी कर ली। घर की जरूरतें थीं। बहनें शादी के लिए तैयार हो गई थीं और भी बहुत कुछ। नौकरी में आने से धीरे-धीरे घर की आर्थिक स्थिति सुधरी। बहनों की शादियां कीं। खाने-पीने का ठीक-ठाक हो गया। जीवन की जरूरतें पूरी होने लगीं। बाद में 1959 में पिता जी की मृत्यु के साथ ही परिवार की सभी जिम्मेदारियां मुझ पर आ गईं।
        बचपन से ही इन स्थितियों के चलते मैं प्रश्नों से जूझने लगा था। गरीबी, बेचैनी, तकलीफें, कर्ज का दबाव ये ऐसे प्रश्न थे जिन पर रात-रात भर चिन्ताएं और बातचीत चलती। मुझे अपने आसपास के उन लागों पर गुस्सा आता जो अपनी उच्च आर्थिक स्थितियों के कारण हमें हीन भाव से देखते। उन बच्चों पर क्रोध आता जो सफेद लकदक रहते और हम लोगों को चिढ़ाते। जैसे हम चड्डी पहनकर स्कूल गए तो चिढ़ा रहे हैं, हमारे पास पहनने के लिए चप्पल नहीं हैं, जूते नहीं हैं और वे हमारे सामने अपने जूतों का बखान कर रहे हैं- खूब गुस्सा आता था कि ऐसा क्यों है? दिमाग में बचपन से ही प्रश्नों के जो बीज पड़े उन्होंने मुझे माक्र्सवादी चिंतन को अपनाने में बड़ी मदद की। मेरी जीवन स्थितियां मुझे उस ओर ले गईं।

        हमारा परिवार एक संयुक्त परिवार था। बाबा की मृत्यु के बाद पिता और चाचा जी साथ ही रहते थे। दादी थीं, मां थीं, चाची थीं, मैं था, बहनें थीं, चाचा जी की बेटियां थीं। छोटा भाई प्रमोद काफी बाद में पैदा हुआ। चाचा का एक बेटा था बचपन में ही जिसकी मृत्यु हो गई थी। पिता जी का स्वभाव समन्वयी था, चाचा का गुस्सैल। चाचा पिता को कुछ कह भी लेते तो भी वे कुछ न बोलते। पिता जी अपनी और भाई की बेटियों को एक-सा मानते। कोई भेद-भाव कभी नहीं किया। परिवार की स्त्रियों के प्रति भी उनका व्यवहार बेहद संतुलित और जनतांत्रिक था। तेज आवाज में डांटते, मारते हमने उन्हें कभी नहीं देखा। नाराज होने पर खाना और बोलना छोड़कर वे अपनी नाराजगी प्रकट करते थे। मां इसे समझतीं, दुखी होतीं और उन्हें मना लेतीं।
        मेरी मां और चाची सगी बहनें थीं। वे बेहद दुखी परिवार से आयीं। महामारी में उनका परिवार एक साथ खत्म हो गया। पिता-माता, चार भाई सबको खोकर वे बेहद अकेला अनुभव करती थीं। मां और चाची विवाह के बाद कभी मायके नहीं गईं। मां की एक भाभी थीं, वे कोठी के पास के एक गांव कंचनपुर में अपने मायके में रहती थीं, वे मां को अपने यहां बुलाती थीं। मैं भी जाता था। मां अपने पिता या भाइयों के बारे में बात करते ही भावुक हो जातीं, आंसू छलछला जाते थे। घर में उनके मायके का प्रसंग छिड़ा नहीं कि वे रोईं।
        बचपन में मैं मां से ज्यादा दादी के नजदीक था। गांव की सामंती मर्यादाओं के कारण मां-बाप मुझसे एक किस्म की दूरी रखते। मैं घर का पहला लड़का था। मेरे लिए काफी पूजा-पाठ हुए थे। इसीलिए दादी मुझे ‘प्राण आधार कहती थीं। मैं ज्यादातर उन्हीं के साथ रहता था, उन्हीं के साथ खाता, उन्हीं के साथ सोता। मैं बचपन में नटखट था- उन्हें परेशान करता, उनके सिर पर चढ़ जाता। वे मेरे बचपन को लेकर मुझे विचित्र-विचित्र बातें बतातीं। एक बार उन्होंने बताया कि मैं जब आठ दिन का था तो पलंग पर सोते हुए मुझे सांप ने चारों ओर से घेर लिया। वे बेहद डर गईं। उनके अनुसार जब उन्होंने नाग देवता की प्रार्थना की तब सांप गया। एक बार बताया कि गांव के पास पटपरनाथ (सिंहपुर) मेरा मुंडन कराने जा रही थीं। ऐसे उन्होने बदलना बदी थी यानी कि  मन्नत मांगी थी। वे गांव से पैदल जा रही थीं कि बहुत ऊपर से एक बांध के मोघे में गिर गया। लोग डर गए। नीचे आए तो देखा कि मैं ठीक हूं। वे मुझे बेहद प्यार करतीं, प्राणों की तरह मुझे सहेज कर रखतीं। मैं भी उनके पास रहता। उनकी मृत्यु पर मुझे याद है मैंने उनकी अर्थी नहीं बांधने दी थी बहुत देर तक। बरसों तक उनके लिए रोता रहा। आज भी उनकी याद आती है तो मन भारी हो जाता है। दादी के रहते मां-पिता के करीब कभी नहीं रहा। बाद में बड़े होने पर उनके मातृत्व पितृत्व को महसूस किया, जाना समझा।

        मेरी पढ़ाई भी अलग ढंग से शुरू हुई। मेरे घर के सामने लल्लू भाई का परिवार रहता था। लल्लू भाई मुझे गांव के रिश्ते से चाचा मानते थे मेरे पांव छूते थे, मैं उनको भाई कहता और उनकी पत्नी को भौजी। रिश्ते की विचित्रता देखिए यही भौजी मेरी पहली गुरु बनीं। वे विकलांग थीं और चौथी तक पढ़ी थीं। दादी ने उनसे कहा कि इसको पढ़ाया करो। मैं तीन-चार साल का रहा होऊंगा। उस उम्र की बातें मुझे याद नहीं हैं, भौजी ही बताती हैं कि पाटी पूजन वगैरह करके उन्होंने अक्षर ज्ञान शुरू किया। जब वे कहतीं कहो कहो तो अक्षरों को न दोहराकर मैं कहता- वो चिडि़या उड़ रही है, वो कुत्ता जा रहा है। इस बात पर वे मुझे तमाचे जड़ देतीं। भौजी के अनुसार इस तरह मेरी शिक्षा शुरू हुई।
        गांव में स्कूल नहीं था। नजदीक के गांव मसनहा में जागीर की तरफ से चलने वाला स्कूल मेरा पहला औपचारिक शिक्षा केन्द्र बना। कुछ ही दिनों में और पास के गांव इटमा में स्कूल खुला और मैं वहां पढ़ाई करने लगा। प्राथमिक तौर पर कक्षा चार तक मैं यहीं पढ़ा। बहुत सी यादें इन स्कूलों की हैं। मैं और मेरी उम्र के मेरे दोस्त रामकिंकर, रामस्वरूप, बाबूलाल, दुखीराम, रामजस सब सुबह कुछ कलेवा वगैरह करके स्कूल जाते और शाम को लौटते। ये हमजोली विभिन्न जातियों के थे। रामकिंकर और रामस्वरूप बागरी थे, दुखीराम चमार और रामजस ब्राह्मण। इसके बाद भी किसी तरह का भेद या दूरी नहीं थी। पड़ोसी होने के कारण रामकिंकर ज्यादा नजदीक था, मैं उसे कभी किंकिड़ तो कभी किंकड़वा कहकर चिढ़ाया करता। हम साथ-साथ खेलते, पढ़ते, कुश्ती लड़ते। पढ़ने में मैं उससे अच्छा था इससे वह मेरे दबाव में रहता था, पर कुश्ती में हमेशा ही मुझे पछाड़ देता। शरीर उसका मुझसे ज्यादा मजबूत था। मुझे बराबर ये लगा रहता कि मैं थोड़ा मजबूत हो जाऊं और उसको पछाड़ दूं। एक किस्म की प्रतियोगिता थी उससे, इसके बावजूद हम दोनों अनन्य मित्र थे और हमारी खूब पटती थी। अन्य दोस्त भी नजदीक थे। हम सब साथ-साथ स्कूल जाते, खेलते, हंसते-गाते। रास्ते में एक तालाब था, आए दिन हम उसमें देर तक नहाते। तालाब के किनारे कई पेड़ थे, कैथे और आम के। हम उसमें चढ़ने की प्रतियोगिता करते। मैं बचपन से फुर्तीला था, हड़बड़ी में काम करता था। मुझे याद है इसीलिए पिता जी मुझे ‘चिड़बिल्ला कहते थे। मैं दोस्तों से पहले पेड़ों पर चढ़ जाता। हम सब ऊपर बंदर, कुत्ते, बकरी की बोली बोलते थे। हम कबड्डी, गुल्ली-डंडा और भी कई खेल खेलते। वह तालाब हमारे लिए एक पूरी दुनिया था। स्कूल से लौटकर पिताजी के साथ खेतों पर काम करता था।
        इन दोस्तों से मेरे झगड़े भी होते थे। मारपीट भी होती और मैं अक्सर पिटता था। एक बार दोस्तों ने काॅपी मांगी, मैंने नहीं दी। उन्होंने कहा-  तुम घमंडी हो। मैंने कहा- हां हूं। दूसरे दिन उन्होंने स्कूल में मेरी काॅपी चुरा ली। मैं समझ गया। मैंने कहा- काॅपी तुम्हारे पास ही है। उन्होंने मना कर दिया। इसी बात पर झगड़ा हो गया और उन्होंने मुझे मिलकर पीटा। कई दिनों तक मैं उनसे नहीं बोला। उन्होंने काॅपी लौटाई और फिर मेल हो गया। आमतौर पर मेरे मतभेद या झगड़े ऐसी ही बातों पर होते। मेरा गांव बहुत छोटा था जिसमें दूसरी तरह की बदमाशियां नहीं थीं। किसी लड़की को छेड़ना या इस तरह का कुछ भी प्रचलन में नहीं था। इस तरह गांव के जीवन से ही हमें सामाजिकता और नैतिकता की शिक्षा मिली।
        मनसहा और इटमा स्कूल के अध्यापकों में दो अध्यापकों की याद है। इनमें एक थे दीनदयाल पंडित जी। दीनदयाल पंडितजी अविवाहित थे। एक-एक दिन वे सभी बच्चों से सीधा लेते और तीसों दिन का इंतजाम कर लेते थे। वे पढ़ाते बहुत अच्छा थे, उनकी धाक थी। मारते बहुत थे। हम सब उनसे बहुत डरते थे। पता चल जाए कि वे किसी शाम गांव की ओर आ रहे हैं तो कोई पढ़ाई आदि को लेकर हमारी शिकायत न कर दे, इससे हमारी रूह कांपती। उनकी डांट के डर से हम छुपे-छुपे फिरते थे। एक बार मैं कई दिनों तक स्कूल नहीं गया। घर से आता और तालाब में बैठा रहता। एकदिन वे आए। पिताजी से पूछा- बेटा बीमार है क्या? पिताजी ने कहा- नहीं। मुझे पता चला तो घर के पीछे के रास्ते से भाग गया और एक पेड़ पर छुप गया। रात तक नहीं आया तो लोगों ने ढूंढना शुरू किया। रात हो रही थी, भूख बढ़ रही थी। पंडित जी तो लौट गए पर अब घर कैसे लौटें। किसी तरह कुत्ते, बंदर की बोली बोलकर अपने को प्रकट किया और घर वापस आए। नाराज होने पर भी यही तरीका अपनाता, कभी पेड़ पर चढ़ जाता, कभी कुठले में छिपकर बैठ जाता। लोग मनाते तब मानता।

   

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