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Tag Archives: rajkamal prakashan

राही मासूम रज़ा के उपन्यास ‘टोपी शुक्ला’ का एक अंश

आज राही मासूम रज़ा की पुण्यतिथि है। उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘टोपी शुक्ला’ का एक अंश पढ़िए और उनको याद कीजिए। अंश राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित उपन्यास से साभार प्रस्तुत है- ======================= टोपी और अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी! हो सकता है कि आपमें से बहुत-से लोगों को यह बात आश्चर्य में डाल …

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राजकमल, पुरानी दिल्ली और दिल्ली पुलिस

कल 28 फ़रवरी से राजकमल प्रकाशन अपने 75 वें साल में प्रवेश कर जाएगा। अपने 74 वें स्थापना दिवस को इस बार राजकमल कुछ अनूठे अन्दाज़ में मना रहा है। सीधे पाठकों के बीच पहुँचने के अभियान के साथ। आप भी जानना चाहते हैं तो इसको पढ़ सकते हैं- ========================== …

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फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी ‘तीन बिंदियाँ’

सोशल मीडिया पर थ्री डॉट्स की चर्चा की चर्चा गर्म है। याद आई फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी ‘तीन बिंदियाँ’। रेणु जी के कहानी संग्रह ‘ठुमरी’ में यह कहानी शामिल है। संकलन का प्रकाशन राजकमल प्रकाशन से हुआ है- ======================= गीताली दास अपने को सुरजीवी कहती है। नाद-सुर-ताल आदि के सहारे …

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सांता जो किताबें लेकर आने वाला है!

हमारे जीवन में पर्व त्योहारों का बहुत महत्व है। अपनी अपनी ख़ुशियों को साझा करने के अवसर होते हैं ये पर्व त्योहार। पिछले कुछ दिनों से ऐसे मौक़ों को राजकमल प्रकाशन समूह किताबों के साथ मनाने की योजना लेकर आता रहा है। यह समूह इस बार क्रिसमस पर ‘किताबों वाले …

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सुरेंद्र मोहन पाठक की आत्मकथा ‘निंदक नियरे राखिए’ का एक अंश

सुरेंद्र मोहन पाठक की आत्मकथा का तीसरा खंड ‘निंदक नियरे राखिए’ हाल में ही प्रकाशित हुआ है। राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित इस पुस्तक के एक अंश का आनंद लीजिए- ====================== यहाँ मैं पिछले साठ साल से चले आ रहे पुरानी दिल्ली के अनोखे संडे बुक बाजार का जिक्र करना चाहता हूँ जो भारत में तो अनोखा, बाकमाल है ही, मुमकिन है एशिया में—या दुनिया में भी—ऐसे बुक बाजार की कोई मिसाल न हो। शुरुआत में ये बुक बाजार जामा मस्जिद के करीब के—अब बन्द हो चुके—जगत सिनेमा से लेकर एडवर्ड पार्क—अब सुभाष पार्क—की नुक्कड़ तक, यानी दरियागंज, नेताजी सुभाष मार्ग के उस ओर के क्रॉसिंग के सिग्नल तक, सड़क की दोनों ओर लगता था, फिर फैलता, पसरता दाएँ घूमकर दिल्ली गेट तक, फिर और दाएँ घूमकर आसफ अली रोड पर डिलाइट सिनेमा तक पहुँच गया था। जब ऐसा हुआ था तो जगत सिनेमा वाला शुरुआती सेगमेंट बन्द हो गया था और बाजार की हदूद डिलाइट सिनेमा से लेकर सुभाष पार्क के चौराहे तक सड़क की एक ही तरफ—गोलचा सिनेमा की तरफ—कायम हो गई थीं। पुस्तक प्रेमियों में वो बाजार इतना पॉपुलर था—अब भी है—कि हर इतवार को, कोई भी मौसम हो, वहाँ मेले जैसा माहौल होता था। बरसात के मौसम में भी कितने ही ग्राहक और पटड़ी वाले बरसात बन्द होने का इन्तजार करते पाए जाते थे। केवल दो मर्तबा, छब्बीस जनवरी और पन्द्रह अगस्त को, वो बाजार बन्द होता था भले ही वो दोनों सरकारी त्योहार इतवार को न हों। छब्बीस जनवरी को उस रूट से परेड ने गुजरता होता था और पन्द्रह अगस्त को उधर से ही गुजरकर प्रधानमंत्री लाल किला पहुँचते थे, ध्वजारोहन की रस्म पूरी करते थे और किले की प्राचीर से कौम से मुखातिब होते थे। लिहाजा पहले ही बुक बाजार की हाकर्स यूनियन को खबर कर दी जाती थी कि उन दोनों सरकारी त्योहारों के पहले इतवार को बाजार नहीं लगेगा। चौदह अगस्त और पच्चीस जनवरी की शाम को तो सुभाष मार्ग की दुकानें, शोरूम्स जबरन बन्द करा दिए जाते थे और दुकानों के तालों को सील लगा दी जाती थी जो त्योहार गुजर जाने के बाद भी अगर उस रोज टूटी पाई जाती थी तो दुकान के मालिक के लिए वो सिक्योरिटी ब्रीच का गम्भीर मसला बन जाता था। उस बुक बाजार की मशहूरी से मुब्तला कई ऐसे हॉकर जिनका किताबों से कोई लेना-देना नहीं था, खासतौर से सर्दियों में गर्म कपड़ों की, जींस, टी-शर्ट्स वगैरह की रेहड़ियाँ लगाने लगे थे, लेकिन उनका वो हंगामा बावजूद पुलिस की शह के सुभाष पार्क के चौक और गोलचा सिनेमा तक भी सीमित रहता था। किताबों वाले उन रेहड़ियों से असुविधा तो महसूस करते थे लेकिन संडे बुक बाजार में रेहड़ी वालों की घुसपैठ पर उनकी पेश नहीं चलती थी। फिर ग्राहक भी ऐसे कमिटिड थे कि हर हाल में पहुँचते थे, दूर-दूर से आते थे, कारों पर आते थे पर पहुँचते थे। कई बार उस बुक बाजार पर क्लोजर का संकट आया—दो-तीन बार बन्द भी हुआ—क्योंकि कभी लोकल लीडर को वो चुभने लगा, कभी दरियागंज थाने का थानाध्यक्ष नाराज हो गया तो कभी वैसे ही उस बाजार को इलाके की हफ्तावरी जनरल न्यूसेंस करार दिया गया। जब पहली बार वो नौबत आई तो हाॅकरों ने उसका इतना तीव्र विरोध किया कि वो मीडिया की निगाह का भी मरकज बना और दिल्ली से प्रकाशित होने वाले तमाम अखबारों ने उस सिलसिले में लीड स्टोरीज़ छापीं। यहाँ तक कि खुशवन्त सिंह और अनिल धारकर जैसे नामचीन लेखकों और पत्रकारों ने उस बन्दी का प्रबल विरोध किया, बाकायदा उस बुक बाजार को आइकॉनिक बुक बाजार बताया जिसको बन्द किया जाना प्रशासन की नादानी थी और पुस्तक प्रेमियों का बड़ा नुकसान था। नतीजतन बाजार फिर चालू हो गया। लेकिन गौरतलब बात है कि वो संडे बाजार तब भी बन्द न हुआ जबकि ऐन सुभाष मार्ग पर प्रस्तावित मेट्रो रूट का महीनों टनल वर्क चालू रहा। तीन बार यूँ बाजार बन्द हुआ, बन्दी की कोई साफ वजह किसी की समझ में न आई लेकिन खुसर-पुसर यही रही कि किसी को—क्या पता किसको, जबकि सबको पता था—खटक रहा था। एक बार तो खुद उस निर्वाचन क्षेत्र का संसद सदस्य दखलअन्दाज हुआ तो वो बाजार खुला। आखिरी बार—हाल ही में सन् 2019 के उत्तरार्ध में ही सुप्रीम कोर्ट के हुक्म से बन्द हुआ तो किसी की पेश न चली। हाॅकरों की यूनियन ने भी तीव्र विरोध किया तो उन्हें कोई वैकल्पिक जगह दी जाने का आश्वासन मिला। वैकल्पिक जगह रामलीला मैदान था, जिसे हॉकरों की यूनियन ने रिजैक्ट कर दिया। अब वो बाजार आसफ अली रोड पर डिलाइट सिनेमा के सामने के महिला पार्क में लगता है और हॉकर्स उस नयी जगह से खुश हैं। उस बुक बाजार का मैं नियमित पैट्रन था, हर इतवार को मैं वहाँ जाता था और ढेर पुरानी, दुर्लभ, अनुपलब्ध पुस्तकें खरीदकर लाता था। एक बार को करतब हुआ। बल्कि चमत्कार हुआ। मुझे वहाँ पटड़ी पर से स्ट्रेंट मैगजीन के सौ साल—रिपीट, सौ साल—पुराने अंक मिले। और ये वो अंक थे जिनमें से हर एक में सर आर्थर कॉनन डायल के फिक्शन हीरो शरलॉक होम्ज की मूल कथा छपी थी। खुद बेचने वाले दुकानदार को उनके दुर्लभ होने की न कोई समझ थी न कद्र थी। सीरियल वाइज छब्बीस इशू मुझे पाँच-पाँच रुपये में मिले। यहाँ ये बात भी काबिलेजिक्र है कि उस बाजार के सारे ही हॉकर अल्पशिक्षा प्राप्त कबाड़िए नहीं हैं। पिछले दस-बारह सालों में मैंने देखा था कि कुछ हॉकर किताब की अहमियत को समझने लग गए थे और अपनी समझ को किसी खास किताब को रेयर बताकर बाकायदा कैश करते थे। मैंने एक बार खुद एडगर वॉलेस का एक नावल—ओरिजिनल कीमत 25 सैंट। तब के डॉलर रेट के मुताबिक दो रुपये—खरीदने की कोशिश की तो उसने अस्सी रुपये माँगे। वजह पूछी तो बोला, रेयर बुक थी। मैंने कहा, मेरे पास एडगर वालेस के ऐसे पन्द्रह नावल थे, वो चालीस-चालीस रुपये में ले ले। …

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झूठ की दुनिया में सत्य को आत्मसात करने के लिए यह किताब पढ़ें

अशोक कुमार पांडेय की किताब ‘उसने गांधी को क्यों मारा’ जब से प्रकाशित हुई है ऐसा लगता है जैसे सोशल मीडिया पर भूचाल आ गया हो। बहुत दिनों बाद किसी किताब का ऐसा स्वागत होते देखा है। यह पुस्तक बताती है कि हिंदी का नया पाठक अपने इतिहास के प्रसंगों …

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आत्मनिर्भरता का  लक्ष्य और मातृभाषा में शिक्षा

अशोक महेश्वरी का यह लेख भारतीय भाषाओं में शिक्षा और आत्मनिर्भरता को लक्ष्य करके लिखा गया है। इस लेख में उन्होंने कई महत्वपूर्ण बिंदु उठाए हैं, जैसे यह कि बाजार की दृष्टि से भारतीय भाषाओं का आकलन किया ही नहीं गया। भारतीय भाषाओं के बीच आपसी आदान-प्रदान के माध्यम से …

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हंस प्रकाशन राजकमल प्रकाशन परिवार का हिस्सा बना

प्रेमचंद के पुत्र अमृत राय द्वारा 1948 में स्थापित हंस प्रकाशन आज से राजकमल प्रकाशन समूह का हिस्सा हो गया है। प्रेमचंद की जयंती के दिन की यह उल्लेखनीय घटना है। हंस प्रकाशन का ऐतिहासिक महत्व रहा है और इसकी अपनी समृद्ध विरासत है। आशा है अब हम नए सिरे …

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पेरियार की दृष्टि में रामकथा

पेरियार ई.वी. रामासामी की किताब ‘सच्ची रामायण’ का प्रकाशन हुआ है। लॉकडाउन के बाद पुस्तकों के प्रकाशन की शुरुआत उत्साहजनक खबर है। पेरियार की दो किताबों के प्रकाशन के साथ राजकमल प्रकाशन ने पाठकोपोयोगी कुछ घोषणाएँ भी की हैं। पहले ई.वी. रामासामी पेरियार की रामकथा पर यह टिप्पणी पढ़िए। अपने …

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पूर्वोत्तर अब पराया नहीं रह गया

उमेश पंत युवा लेखक हैं और इसी साल इनकी यात्रा-पुस्तक आई ‘दूर दुर्गम दुरुस्त‘, जो पूर्वोत्तर यात्रा अनुभवों से उपजी पुस्तक है। हिंदी में पूर्वोत्तर को लेकर कम पुस्तकें लिखी गई हैं यह किताब उस कमी को दूर करने वाली है। राजकमल प्रकाशन समूह से प्रकाशित इस पुस्तक का एक …

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