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Tag Archives: praveen kumar jha

एक ऐसी कहानी जिसे ब्रिटिश छुपाना चाहते थे और हिंदुस्तानी भुलाना

प्रवीण कुमार झा की चर्चित पुस्तक ‘कुली लाइंस’ पर यह टिप्पणी लिखी है कवि यतीश कुमार ने- मॉडरेटर ========================== अखिलेश का ‘निर्वासन’ पढ़ा था और वो मेरा  ‘गिरमिटिया’ शब्द से पहला परिचय था। जहाँ सूरीनाम,1985 में आए एक्ट का जिक्र था। गोसाईगंज से सूरीनाम तक रामअजोर पांडे के बाबा और बिहार …

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‘सोचो अगर हम इंडिया न गए होते, तो इंडिया आज कहाँ होता?’

नॉर्वे प्रवासी डॉक्टर प्रवीण कुमार झा ने ‘कुली लाइंस’ किताब लिखकर इंडियन डायस्पोरा की दास्तान सुनाई। आज स्वाधीनता दिवस के दिन वे परदेस में भारतीय होने का मतलब समझा रहे हैं। उनकी और जानकी पुल की तरफ़ से सबको आज़ादी मुबारक-मॉडरेटर ======================================== गाड़ियों की सस्ती-टिकाऊ सर्विस के चक्कर में गाड़ी-मिस्त्री …

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अख्तरी:हमें इल्म ही न हो कि हमने संगीत सीख लिया!

यतीन्द्र मिश्र लिखित-सम्पादित किताब ‘अख्तरी: सोज़ और साज का अफ़साना’ किताब पर संगीत पर रसदार लेखन करने वाले और इन दिनों अपनी किताब ‘कुली लाइंस’ के उत्सुकता जगाने वाले लेखक प्रवीण कुमार झा की टिप्पणी पढ़िए- मॉडरेटर ===================================== हालिया एक संगीत चर्चा में बात हुई कि भारत में संगीत–लेखन का …

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‘कश्मीरनामा’ के बहाने कश्मीर पर बात

अशोक कुमार पाण्डेय की किताब ‘कश्मीरनामा’ कश्मीर पर एक सुशोधित पुस्तक है. राजपाल एन संज प्रकाशन से प्रकाशित इस पुस्तक पर जब नॉर्वे प्रवासी डॉक्टर प्रवीण झा की यह टिप्पणी पुस्तक की समीक्षा नहीं है बल्कि इस पुस्तक के बहाने कश्मीर पर एक अच्छी टिप्पणी है- मॉडरेटर ========================== शायद डेढ़ वर्ष पहले …

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हम जैसों को अमृतलाल वेगड़ जी कल्पनाओं में ही मिले, और कल्पना में ही दूर हो गए

नर्मदा नदी की यात्रा करके उस पर किताबें लिखने वाले अमृतलाल वेगड़ आज नहीं रहे. उनकी स्मृति में यह श्रद्धांजलि लिखी है नॉर्वे-प्रवासी डॉक्टर लेखक प्रवीण झा ने- मॉडरेटर ================================= हम जैसों को अमृतलाल जी कल्पनाओं में ही मिले, और कल्पना में ही दूर हो गए। जैसे कुमार गंधर्व, जैसे …

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दुनिया की सबसे नीरस किताब कौन सी होगी?

नॉर्वे-प्रवासी डॉक्टर प्रवीण झा के लेखन से, लेखन की धार से हम सब अच्छी तरह परिचित हैं. न उनके पास लिखने के लिए विषयों की कमी पड़ती है, न कभी भाषा में झोल पड़ता है. बस एक बात और कि इस बार जानकी पुल पर उनकी चिट्ठी बहुत दिनों बाद …

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चिनार के झड़ते पत्ते और कोरिया की रानी री

प्रवीण झा नौर्वे में रेडियोलोजिस्ट हैं. शायद ही कोई ऐसा विषय है जिसके ऊपर वे न लिखते हों. इस बार जानकी पुल पर बड़े दिनों बाद लौटे हैं. एक अनूठे गद्य के साथ- मॉडरेटर =============================================== राजा की गद्दी। अनुवाद यही ठीक रहेगा। एक बहुमंजिली इमारत की इक्कीसवीं मंजिल का वो …

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फांकी युग है और सब फांकीबाज़ हैं!

बहुत दिनों बाद प्रवीण झा अपने व्यंग्यावतार में प्रकट हुए हैं. इस बार एक नए युग की घोषणा कर रहे हैं- फांकी युग की. आइये पढ़िए- मॉडरेटर ================= फेसबुक के एक पोस्ट पर ‘लाइक’ गिन रहा था कि कवि कक्का का मेसैज आ गया। “आज फिर फांकिए?” गाँव गया था तो कक्का को ‘स्मार्ट-फ़ोन’ दे आया था। अब कक्का ‘व्हाट्स-ऐप्प’ करते हैं। मैनें फ़ोन घुमाया। “प्रणाम कक्का! कुछ गलती हो गयी?” “जीते रहो! लेकिन कुछ लिखो, तो पढ़ कर लिखो। आंकड़े लिखो। रिफ़रेंस दो। गप्प ही देना है तो आओ साथ भांग घोटते गप्प देंगें।” “कक्का! एक पत्रकार मित्र ने कहा लेख लिखो, तो लिख दिया।” “राम मिलाए जोड़ी। एक पत्रकार और एक फंटूसी डॉक्टर मिलकर अर्थव्यवस्था समझा रहे हैं। यहाँ भी वही, टी.वी. पर भी वही। सड़क सेपकड़ पैनल में बिठा लेते हैं। सब बेसिरपैर गप्प मारते हैं फांकीबाज!” “कक्का! अब मैं कौन सा टी.वी. पर बोल रहा हूँ? फ़ेसबुक पर ही तो…” “अच्छा! तो फ़ेसबुक है कि फांकीबुक?  तुम्हारी कोई गलती नहीं। यह युग ही ‘फांकी-युग’ है।।” “फांकी-युग? कक्का! यह ज्यादा हो गया। यह तो तकनीकी युग है। डिजिटल युग।” “तकनीकी युग तो बना ही फाँ…रने के लिए है।” कक्का की पीक थूकने की आवाज आई। “क्यों कक्का? तकनीक से सब आसान हो गया।” “तकनीक का आविष्कार ही हुआ कि मनुष्य फांकी मार सके। सब काम कम्पूटर करे, आदमी फूटानी मारे। टॉफ्लर का किताब सब पढ़ो।बूझाएगा। फ्यूचर शॉक पढ़ो फ्यूचर शॉक।” “अच्छा कक्का! अब ये भी बता दें कि आपका ये युग शुरू कब हुआ?” “1984 ई. में।” “अब यह क्या है कक्का?” “चौरासी! अड़तालीस का उल्टा चौरासी। ऐप्पल का कम्प्यूटर आया। ऐड्स का वायरस आया। नया वाला गाँधी आया। रूस में गोर्बाचोव चमका,अमरीका में रीगन। और वो गाना आया, प्यार प्यार प्यार, तोहफा तोहफा तोहफा….” “अाप और आपके तर्क। सब भांग का असर है कक्का। यह प्रगतिवादी युग है।” “किसका? हिंदी का? साठ में साफ हो गया।” “तो क्या 84 के बाद कुछ लिखा नहीं गया?” “लिखा तो गया, पर पढ़ा नहीं गया। सब फांकीबाज!” “ऐसे न कहिए कक्का। हाँ! हिंदुस्तान में अंग्रेजी का जमाना आया।” …

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जेमिथांग घाटी वाले नक्सल बाबा की चिट्ठी

इधर लेखिका अरुंधती राय को लेकर वाद-विवाद संवाद चल रहा है उधर नक्सली बाबा की चिट्ठी आ गई. अपने नॉर्वे-प्रवासी डॉक्टर प्रवीण कुमार झा को मिली है यह चिट्ठी. आप भी पढ़िए- मॉडरेटर ============================================== कल जेमिथांग घाटी वाले नक्सल बाबा की चिट्ठी आई। नक्सल बाबा मेरे पुराने बंगाली मित्र हैं।अंग्रेजी …

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धर्म जनता की अफीम है- कार्ल मार्क्स

अपने नॉर्वे प्रवासी डॉ प्रवीण झा का लेखन का रेंज इतना विस्तृत है कि कभी कभी आश्चर्य होता है. उनके अनुवाद में प्रस्तुत है आज कार्ल मार्क्स के उस प्रसिद्ध लेख का अनुवाद किया है जिसमें मार्क्स ने लिखा था कि धर्म जनता की अफीम है- मॉडरेटर ============= यह लेख …

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