भार से अधिक लड़ना पड़ा हल्केपन से

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आज कुछ कविताएं अच्युतानंद मिश्र की. युवा कविता में अच्युतानंद मिश्र का नाम जाना पहचाना नाम है. गहरे राग से उपजी उनकी कविताएँ में विराग का विषाद है, लगाव में अ-लगाव का कम्पन. अलग रंग, अलग ढंग की कविताएं- मॉडरेटर 
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1.
बिडम्बना

भार से अधिक लड़ना पड़ा हल्केपन से
अंधकार से उतनी शिकायत नहीं थी
रौशनी ने बंद कर रखा था हमारी आँखों को
सोचते हुए चुप होना पड़ता था
बोलते हुए बार बार देखना पड़ता था
उनके माथे की शिकन को
बेवजह मुस्कुराने की आदत का
असर ये हुआ कि
पिता की मृत्यु पर उस रात मैं घंटो हंसा
अपने बच्चे को नींद में मुस्कुराता देख
मैं फफक पड़ता हूँ  
आखिर ये कौन सी बिडम्बना है
कि झूठ बोलने के लिए
सही शब्द ही आते हैं मुझ तक
2. 
दो बहनें
                                                                    
मेट्रो ट्रेन में बैठी हैं
दो बहनें
लौट रही हैं मधुबनी से
छोटी रास्ते भर
भोज की बातें कर रही है
दीदी माय सत्तर की हो गयी हैं
फिर भी आधा सेर चूड़ा-दही खींच लेती है
छोटी कहती है
बुधिया दीदी का बुढ़ापा देखा नहीं जाता
हाँ ,बड़ी आह भरकर कहती है
पिछले जन्म का ही पाप रहा होगा,
बुधिया दीदी का
आठ साल में गौना हुआ और अगले महीने ही
विधवा होकर नैहर लौट गयी
हकलाते हुए छोटी कुछ कहने को होती है
तभी बड़ी उसे रोकते हुए कहती है 
नहीं छोटी, विधवा की देह नहीं
बस जली हुयी आत्मा होती है
वही छटपटाती है
छोटी को लगता है दीदी उसे नहीं
किसी और से कह रही है ये बाते
दीदी का मुंह देखकर
कैसा तो मन हो जाता है छोटी का
बात बदलते हुए कहती है
अब गांव के भोज में पहले सा सुख नहीं रहा
अनमनी सी होती हुयी
बड़ी सिर हिलाती है
छोटी के गोद में बैठे बच्चे को
प्यास लगी है शायद
थैली से वह निकालती है
पेप्सी की बोतल में भरा पानी
उसे बच्चे के मुंह में लगाती है
वह और रोने लगता है 
आँखों ही आँखों में
बड़ी कुछ कहती है
एक चादर निकालती है
चादर से ढककर बच्चे का माथा
छोटी लगाती है उसके मुंह को अपने स्तनों से
बड़ी को जैसे कुछ याद आने लगता है
उसने यूँ ही छोटी को देखा है
माँ का स्तन मुंह में लेकर चुप होते हुए
उस याद से पहले की वह कौन सी धुंधली याद है
जो रह-रह कर कौंधती हैं
शायद उस वक्त माँ रो कर आई थी
लेकिन इस चलती हुयी मेट्रो में माँ का
रोता हुआ चेहरा क्यों याद आ रहा है
बड़ी नहीं बता सकती
लेकिन कुछ है उसके भीतर
जो रह- रहकर बाहर आना चाहता है
वह छिपाकर अपना रोना
छोटी की आँख में देखती है
वहां भी कुछ बूंदे हैं
जिन्हें वह सहेजना सीख रही है
छोटी दो बरस पहले ही आई है दिल्ली,
गौने के बाद
बच्चा दूध पीकर सो गया है
अचानक कुछ सोचते हुए
छोटी कहती है,
दीदी दिल्ली
अब पहले की तरह अच्छी नहीं लगती
लेकिन गावं में भी क्या बचा रह गया है
पूछती है बड़ी
अब दोनों चुप हैं
आगे को बढ़ रही है मेट्रो
लौटने की गंध पीछे छूट रही है 
बड़ी कहती है, हिम्मत करो छोटी
बच्चे की तरफ देखकर कहती है ,
इसकी खातिर
दिल्ली में डर लगता है दीदी
बड़ी को लगता है
कोई बीस साल पीछे से आवाज़ दे रहा है
वह रुक जाती है
कहती है छोटी मेरे साथ चलो इस रास्ते से
लेकिन इन शब्दों के बीच बीस बरस हैं
अनायास बड़ी के मुंह से निकलता है
छोटी मेरे साथ चलो इस रास्ते से
अब रोकना मुश्किल है
बड़ी फफक पड़ती है
छोटी भी रो रही है
लेकिन बीस बरस पहले की तरह नहीं 
इस वक्त ट्रेन को रुक जाना चाहिए
वक्त को भी
पृथ्वी  को भी
ट्रेन का दरवाज़ा खुलता है
भीड़ के नरक में समा जाती हैं दो बहनें


3. 
बच्चे धर्मयुद्ध लड़ रहे हैं
(अमेरिकी युद्धों में मारे गये, यतीम और जिहादी बना दिए गये उन असंख्य बच्चों के नाम)
सच के छूने से पहले
झूठ ने निगल लिया उन्हें
नन्हें हाथ
जिन्हें खिलौनों से उलझना था
खेतों में बम के टुकड़े चुन रहें हैं
वे हँसतें हैं
और एक सुलगता हुआ
बम फूट जाता है
कितनी सहज है मृत्यु यहाँ
एक खिलौने की चाभी
टूटने से भी अधिक सहज
और जीवन, वह घूम रहा है
एक पहाड़ से रेतीले विस्तार की तरफ
धूल उड़ रही है
वे टेंट से बाहर निकलते हैं
युद्ध का अठ्ठासिवां दिन
और युद्ध की रफ़्तार
इतनी धीमी इतनी सुस्त
कि एक युग बीत गया
अब थोड़े से बच्चे
बचे रह गये हैं
फिर भी युद्ध लड़ा जायेगा
यह धर्म युद्ध है
बच्चे धर्म की तरफ हैं
और वे युद्ध की तरफ
सब एक दूसरे को मार देंगे
धर्म के खिलाफ खड़ा होगा युद्ध
और सिर्फ युद्ध जीतेगा
लेकिन तब तक
सिर्फ रात है यहाँ
कभी-कभी चमक उठता है आकाश
कभी-कभी रौशनी की एक फुहार
उनके बगल से गुजर जाती है
लेकिन रात और
पृथ्वी की सबसे भीषण रात
बारूद बर्फ और कीचड़ से लिथड़ी रात
और मृत्यु की असंख्य चीखों से भरी रात 
पीप खून और मांस के लोथड़ो वाली रात
अब आकर लेती है
वे दर्द और अंधकार से लौटते हैं
भूख की तरफ

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