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1.
क्यों देती हैं
स्त्रियाँ गाली?
कल उस दबंग मुंहजोर औरत को
जिसका मर्द,कहीं भाग गया,
जिसका मर्द,कहीं भाग गया,
सौंप कर चार बच्चे
जो मेरी गली के बाहर
बस स्टैंड पर लगाती है
छोटी सी चाय की दुकान,
एक रिक्शेवाले के भद्दे मजाक
पर देते सुना एक उतनी ही भद्दी गली
एक अनचाहा सा ख्याल आया,
छेड़ने लगा मुझे जैसे मार्च में
छेडती है कभी धूलभरी अनामंत्रित आंधी
कभी कभी अनचाहे ही,
"क्यों देती हैं स्त्रियाँ गाली?"
कैसे हो जाया करती हैं निर्लज्ज और बेशरम
क्या नहीं जानती कि
सिर्फ संस्कार पिलायें जाते हैं
हमें घुट्टी में,
जो जुड़ जाते हैं हमसे जैसे उँगलियों के साथ नाखून
जिनसे अलग होना बड़ा दुखदायी होता है
एक औरत के लिए,
हम महान औरतें जो सुशोभित हैं
देवी के पद पर,
कैसे ला पाती हैं मिश्री जैसी जबान पर
इतने गंदे शब्द,
तब भी, जबकि लगभग हर घृणित गाली
शुरू होती है हम से
और ख़त्म हो जाती है हमारे ही दबे-ठके
अंगों पर,
नंगा कर जाती है हमें सरेबाजार,
चाहे कितना भी सहेजती रहें हम आंचल,
क्या भरी सभा में बालों से खींच कर लायी गयी
रजस्वला अबला को देनी चाहिए गाली,
या जिसे लूटकर फोड़ दी जाती हैं ऑंखें
एक उबल पड़ने को आतुर पौरुष द्वारा
क्या गाली आई होगी उसकी जबान पर,
या एक दुरात्मा द्वारा छली गयी
उस औरत को, जो अपहृत की गयी थी
पुष्पक विमान में, देनी चाहिए कोई गाली,
यूँ हर रोज़ आहत होती हैं कितनी ही
कितनी ही अस्मिताएं और तार-तार हुए
वजूद को समेटती हैं बिसूरते हुए
अपहृत, बलित्कृत, प्रताड़ित,
कभी दागी जाती हैं अहम् के सलाखों से,
तो कभी नोंची जाती हैं
जैसे हड्डी से मांस नोचते होंगे कसाई,
कदम कदम पर झेलती हैं जाने कैसे कैसे
दुराचार, अपनी देह और आत्मा पर,
उन्हें दफन हो जाना, मौन हो जाना,
कदम कदम पर घुटना अपने ही खोल में,
हर रोज़ मौत को आमंत्रित करना
तो खूब सुहाता है
किन्तु गाली......?
जो मेरी गली के बाहर
बस स्टैंड पर लगाती है
छोटी सी चाय की दुकान,
एक रिक्शेवाले के भद्दे मजाक
पर देते सुना एक उतनी ही भद्दी गली
एक अनचाहा सा ख्याल आया,
छेड़ने लगा मुझे जैसे मार्च में
छेडती है कभी धूलभरी अनामंत्रित आंधी
कभी कभी अनचाहे ही,
"क्यों देती हैं स्त्रियाँ गाली?"
कैसे हो जाया करती हैं निर्लज्ज और बेशरम
क्या नहीं जानती कि
सिर्फ संस्कार पिलायें जाते हैं
हमें घुट्टी में,
जो जुड़ जाते हैं हमसे जैसे उँगलियों के साथ नाखून
जिनसे अलग होना बड़ा दुखदायी होता है
एक औरत के लिए,
हम महान औरतें जो सुशोभित हैं
देवी के पद पर,
कैसे ला पाती हैं मिश्री जैसी जबान पर
इतने गंदे शब्द,
तब भी, जबकि लगभग हर घृणित गाली
शुरू होती है हम से
और ख़त्म हो जाती है हमारे ही दबे-ठके
अंगों पर,
नंगा कर जाती है हमें सरेबाजार,
चाहे कितना भी सहेजती रहें हम आंचल,
क्या भरी सभा में बालों से खींच कर लायी गयी
रजस्वला अबला को देनी चाहिए गाली,
या जिसे लूटकर फोड़ दी जाती हैं ऑंखें
एक उबल पड़ने को आतुर पौरुष द्वारा
क्या गाली आई होगी उसकी जबान पर,
या एक दुरात्मा द्वारा छली गयी
उस औरत को, जो अपहृत की गयी थी
पुष्पक विमान में, देनी चाहिए कोई गाली,
यूँ हर रोज़ आहत होती हैं कितनी ही
कितनी ही अस्मिताएं और तार-तार हुए
वजूद को समेटती हैं बिसूरते हुए
अपहृत, बलित्कृत, प्रताड़ित,
कभी दागी जाती हैं अहम् के सलाखों से,
तो कभी नोंची जाती हैं
जैसे हड्डी से मांस नोचते होंगे कसाई,
कदम कदम पर झेलती हैं जाने कैसे कैसे
दुराचार, अपनी देह और आत्मा पर,
उन्हें दफन हो जाना, मौन हो जाना,
कदम कदम पर घुटना अपने ही खोल में,
हर रोज़ मौत को आमंत्रित करना
तो खूब सुहाता है
किन्तु गाली......?
2.
गुनहगार
हाँ वह गुनहगार है
क्योंकि सूंघ सकती है उस मिटटी को
क्योंकि सूंघ सकती है उस मिटटी को
जिसमें बहुत गहराई से दफ़न है कई रातें
रातें जो दम तोड़ गयी रौशनी की एक चाह में
रातें जो दम तोड़ गयी रौशनी की एक चाह में
नाजायज़ है जो तुम्हारे मुताबिक,
कुफ्र है लांघना सली-गडी मान्यताओं की दहलीज़
क्योंकि धकेल दिया जाता है ऐसे दुस्साहसियों को
फतवों और निर्वासन के खौफनाक रास्तों पर,
वह गुनहगार है
क्योंकि नहीं गिरवी रख पाई अपनी आत्मा
जब बढ़ रहे थे फतवों के नरपिशाच उसकी ओर
जिनकी डोरी थी तथाकथित धर्म के ठेकेदारों के हाथों
में,
औरत जो होती है किसी की बेटी, बहन, प्रेयसी, पत्नी
और माँ,
देखती हैं जब खुदको उनकी आँखों से ,
तो सारी शक्लें गडमड हो बदल जाती
हैं महज एक किताब में,
वह गुनहगार है
क्योंकि ठंडा नहीं होता उसका खून
उन तमाम सियाह रातों के बावजूद,
जब भटक रही थीं संवेदनाएं
शरण और ठोकरों की खुली पगडंडियों पर,
वो स्याही जम गयी है उसकी सुर्ख आखों में
जिसे सहेजती है वह जतन से
जानती है कि उसकी नापाक कलम से
निकले हर हर्फ़ को जरूरत है इसकी,
वह गुनहगार है
क्योंकि जानती है कि वे तमाम औरतें
जो ख़ामोशी से सौप देती हैं अपना जिस्म,
अपनी जबान और अपनी आत्मा तक
खतरा नहीं है किसी के लिए
दुकानों और कारखानों में पिसता वह मासूम
बचपन खतरा नहीं है किसी के लिए
हर वो गोली, बारूद और मशीनगन, जिसमें
छिपी हैं
न जाने कितनी निर्दोष जानें
खतरा नहीं है किसी के लिए
वह गुनहगार है
क्योंकि तलाशती है
एक मजबूत दीवार जिसके साये में सुस्ता सके
उसके लगातार दौड़ते कदम और उसके रखवाले
जिनके लिए जरूरी है चाय की आखिरी घूँट तक
छोड़ दे ढोंग उसकी निगहबानी का,
वह जानती है कि
किसी दिन एक लिबलिबी दबेगी
और सुनाई देगी एक चीख, एक
धमाका और खून की कुछ बूँदें गिरेंगी
जिनसे किया जायेगा तिलक इतिहास की पेशानी पर
दुनिया देखेगी कि वो तब भी सफ़ेद नहीं होगा,
उस रात सो जायेंगे चैन की नींद, इन्साफ
के तमगे अपनी छाती
पर सजाये कुछ लोग
कि दुनिया अब सुरक्षित है
और सुरक्षित है धर्मग्रंथों के तमाम नुस्खे
3.
शायद
यही एक जरिया है मेरे प्रतिकार का
फिल्म चलती है,
समेटती है जाने कितने ही दृश्यों को
एक डायलोग से शुरू हो ख़त्म हो जाती है
एक डायलोग पर,
मध्यांतर में भी उभरते हैं कितने ही दृश्य,
एक तानाशाह डालता है अपना जाल
और हर बार फंस जाते हैं तेल के कुछ कुँए,
वहीँ सर झुकाए खड़ा है कोई आखिरी
गोली की तलाश में,
लिए हुए अपने नाम और कारनामों की तख्ती,
ये धमक, आवाज़ है गिरा दी गयीं
चंद आस्थाओं की
जो खड़ी थी सदियों से बामियान में,
जैसे रेत की तरह गिर जाता है एक मुजस्मा,
जो नहीं जानता खुद की पहचान और देखता है
खून भरी आँखों में अपने नए नए नाम,
एक शहंशाह बांटता है सहायता, क़र्ज़
और समर्थन के
रंगीन गुब्बारे,
बदले में भर लेता है अपनी जेबें स्वाभिमान, आज़ादी
और
कटी हुई जबानों से,
कहीं एक मजबूत पहाड़ की गौरवान्वित चोटी
बदल जाती है छोटे कमजोर पत्थरों में,
जिनसे खेल रहे हैं कुछ नामालूम लुटेरे
और लिख रहे हैं जमीनों पर कभी न मिटने वाली इबारतें,
और बदल जाती हैं हजारों जिंदगियां
जीरो ग्राऊंड में,
कुछ लोग तब पोपकोर्न खाते है, कुछ
ऊंघते हैं,
कुछ दबाते हैं अपनी चीखों को,
तब मेरी गूंगी ज़बान और कांपते
हाथ
ढूँढ़ते है कागज़,
शायद यही एक जरिया है मेरे प्रतिकार का.....
4.
अर्धांगिनी
तुमने हर कसम
को एक साथ खाया था,
पर क्यों उसकी कसम
पत्थर की लकीर है
और तुम्हारी ओस की बूंद,
विवाह के अग्नि कुंड में
आहुति दी थी उसने
सब रिश्तों की,
जब बांधा
तुम्हारे प्रेम का मंगलसूत्र,
पर तुम्हारे सब सरोकार भी
बंध गए थे संग
उसके,
वह हर दिन बनती रही
तुम्हारी अर्धांगिनी, मित्र,
माँ और दासी,
और तुमने बनना पसंद किया
स्वामी और केवल स्वामी,
क्यों नहीं बुझ पायी उस
अग्नि कुंड की ज्वाला
और हर दिन मांगती रही
एक नयी आहुति,
रिश्ते-नाते, मित्र,
महत्वाकांक्षाएं,
रूचि-अभिरुचि
और उसके होंठों की
वो निश्छल हंसी,
बदले में रोज सौंपते रहे
तुम जिम्मेदारी और कर्तव्य के
नित नए उपहार,
कल पढ़ा उसने कहीं
अर्धांगिनी का अर्थ,
और उलट-पुलट कर
देखते हुए उस विचित्र
ग्रन्थ को,
सोचा उसने कई बार कि
इसमें अर्धांग का जिक्र क्यों नहीं........
5.
डर
पुरुष ने देखा प्रेम से,
और कहा, कितनी सुंदर हो तुम,
शर्मा गयी स्त्री,
पुरुष ने देखा कौतुक से,
और कहा कुछ नहीं,
स्त्री ने पाया,
उसकी आँखों के लाल डोरों को,
अपने जिस्म पर रेंगते हुए
असंख्य साँपों में बदलते हुए,
इस बार डर गयी स्त्री................
6.
विलुप्त
प्रजाति
ओ नादान स्त्री,
सुन रही हो खामोश, दबी आहट
उस प्रचंड चक्रवात की
बेमिसाल है जिसकी मारक क्षमता,
जो बढ़ रहा तुम्हारी ओर मिटाते हुए तुम्हारे
नामोनिशान,
जानती हो गुम हो जाती हैं समूची सभ्यताएं
ओर कैलंडर पर बदलती है सिर्फ तारीख,
क्या बहाए थे आंसू किसी ने मेसोपोटामिया के लिए
या सिसका था कोई बेबिलोनिया के लिए
क्या फर्क पड़ेगा यदि एक दिन
दर्ज हो जाएगी एक ओर विलुप्त प्रजाति
इतिहास के पन्नो में,
तुम्हारे लहू से सिंची गयी इस दुनिया में
यूँ ही गहराता रहेगा लिंग-अनुपात
और इतिहास दर्ज करता रहेगा
दिन, महीने, साल
और दशक
सुनो, तुम साफ कर दी जाती रहोगी
सफेदपोशों के कुर्तों पर पड़ी गन्दगी की तरह,
सुनो आधी दुनिया,
तुम्हारे सीने पर ठोकी जाती है सदा
तुम्हारे ही ताबूत की कीलें
और तुम गाती हो सोहर, रखती हो सतिये,
बजाती हो जोर से थाली,
मनाती हो जश्न अपने ही मातम का,
ओर भूल जाती हो कि एक दिन मंद पड़ जायेंगे
वे स्वर क्योंकि बच्चे माँ की कोख से जन्मते हैं,
नहीं बना पाएंगे वे ऐसे कारखाने जहाँ ख़त्म हो जाती
है
जरूरत एक औरत की,
क्यों उन आवाज़ों में अनसुनी कर देती हो
दबा दी गयी वे अजन्मी चीखें,
जो कभी गाने वाली थीं
झूले पर तीज के गीत,
महसूस करो उस अजगर की साँसें
जो सुस्ताता है तुम्हारे ही बिस्तर पर
तुम्हारी ही शकल में
और लील लेता है तुम्हारा ही समूचा वजूद धीरे
धीरे,
तुम्हारी हर करवट पर घटती है तुम्हारी ही गिनती,
क्यों बन जाती हो संहारक अपने ही लहू की,
दर्ज करो कि कभी भी विलुप्त नहीं होते
भेड़ों की खाल में छिपे भेड़िये ओर
लकड़बग्घे
ओर भेड़ें यदि सीख लेंगी चाल का बदलाव
तो एक दिन गायब हो जायेगा उनके माथे से
सजदे का निशान,
तुम्हारी आत्मा में सेंध लगा,
तुममें समाती ओर तुम्हे मिटाने का ख्वाब पालती
हर आवाज़ बदलनी चाहिए उस उपजाऊ
मिटटी में
जिसमें जन्मेंगी वे आवाजें जो गायेंगी हर साल
"अबके
बरस भेज, भैया को बाबुल"......................
7.
प्रेम को पाने, खोने, पाने और फिर खो देने
के इस खेल में,
हर बार खुदके टुकड़ों को समेटते हुए भूल
जाया करती हूँ मैं गिनती,
सोचती हूँ आज सूरज को भर लूं अपनी मुट्ठी में
और महसूस करूँ उसकी तपिश को
जल जाने की हद तक,
कौन जाने पिघल जाये बर्फ का वो अदृश्य आवरण
तो हर दिन जमा रहा रहा है मुझे रफ्ता रफ्ता
यूँ खुद को एक सख्त पथरीले पदार्थ में
बदलते देखना शायद मेरी विवशता है,
मानती हूँ अब और टुकडें होना या उन्हें समेटना
संभव नहीं,
पर जो आर्द्रता बची है दिल के किसी कोने में
क्या बदलने देगी मुझे पत्थर में,
या मुझ पर तारी वो शीतलता क्या एक दिन
हावी हो जाएगी मेरे वजूद पर,
और बदल जाउंगी में एक सांस लेती
हिम-शिला में..........
8.
बाज आओ
घर- बाहर, झाड़ू-पोंछा, चूल्हा,चौका,
कपडे, बर्तन, पति, रिश्ते, बच्चे,
कितने बंधनों में बांधा है तुम्हें
बड़ी बेहया हो फिर भी लिखती हो,
कितनी ही बार चलायी है अवरोधों की कैंची
तुम्हारी जबान पर
पर ये क्यों बदल लेती है नया रूप
तुम्हारा मौन तो तब भी सर्वमान्य था
पर क्यों बदली है ये कलम में
सुनो नहीं चाहिए कोई झाँसी की रानी उन्हें,
और नक्कारखाने में तूती सी बजकर
क्या साबित करना चाहती हो,
याद करों उन हांथों को जो जिन्दा चुन देते हैं
तुम्हे दीवार में,
या
झोंक दी जाती हो किसी तंदूर में,
कितने जन्म लोगी और कितनी अग्निपरीक्षाएं
और चाहिए तुम्हे,
हर बार खड़ी हो जाती हो,
झाड़ते हुए चिता की धूल और
ख़ामोशी से जुट जाती हो संभालने, सजाने, बढ़ाने
इस
दुनिया को, और लिखने?
क्यों नहीं मार देती इस छटपटाहट को,
देखो कि सब्जी में नमक क्यों कम है,
या बच्चों के होमवर्क पर कितने स्टार मिले हैं,
पढ़ी लिखी हो तो करो बनिए और दूधवाले का हिसाब
या कमाओ कि घर न सही उन सभी चीज़ों के भुगतान की
किश्तों में
तुम्हारा बराबर हिस्सा है
जो लगाती है गृहस्वामी के रुतबे में चार चाँद,
सुनो ये घर तुम्हारा है, सजाओ
इसे करीने से,
बिछ जाओ रोज़ कालीन की तरह,
बनाओ रोज़ सुंदर बाल, लाली-पावडर क्या चाहिए तुम्हे,
देखो वो गुडिया कितनी सुंदर है, ओर
उसका सर हिलता है केवल हाँ में,
छि ! फ़ेंक दो वो कलम और कागज़,
सुनो तुम्हारा छौंक लगाना भर देता है
सारे घर को एक मनभावन सुगंध में,
और तुममें रची मसालों की वो गंध ही तुम्हारी पहचान
है,
चाहिए तो खरीदो गहने-कपडे और भूल जाओ वो
रास्ता जो जाता है किताबों की दुकान की ओर,
वर्ना दफन कर दी जाओगी अपने ही खोल में,
उस ओर जाते हर रास्ते में बिछा दिए जायेंगे,
कंकड़, कांच ओर नुकीली कीलें
और झोंक दिए जायेंगे हर कदम पर सैकड़ों अंगारे,
अब तो बाज आओ और सिर्फ छौंक लगाओ ......................
9.
आग
और पानी
कहा था किसी ने मुझे
कि आग और पानी का कभी मेल नहीं होता
सुनो मैंने इसे झूठ कर दिखाया है,
तुम्हारे साथ रहने की ये प्रबल उत्कंठा,
परे है सब समीकरणों से,
और अनभिज्ञ है, किसी भी रासायनिक या भौतिक
प्रक्रिया से,
हर बार तुम्हारे मिथ्या दंभ की आग में
बर्फ सी जली हूँ मैं
हर बार मेरी शीतलता ने
छूआ है तुम्हारे अहम् के
तपते अंगारों को
और देखो
भाप बनकर उडी नहीं मैं,
बहे जा रही हूँ युगों से नदी बनकर
और जब सुलग उठती हूँ
तुम्हारे क्रोध के दानावल से,
तो अक्सर फूट पड़ता है कोई
गर्म जल का सोता
हमारी भावनाओं के टकराव के
उद्गम से,
खोती हूँ खुद के कुछ कतरे,
देती हूँ आहुति में
थोडा सा स्वाभिमान,
थोड़ी सी सहनशीलता
बदलती हूँ अपनी सतह के कुछ अंश गर्म
छींटों में,
पर मेरे अंतस में सदा बहती है
उल्लास की एक नदी,
जो मनाती है उत्सव हर मिलन का,
नाचती है छन्न छन्न की स्वर लहरी पर,
कभी सुलग उठते हो
अपने पौरुष के अभिमान में
ज्वालामुखी
से तुम
तो बदल देती हूँ लावे में अपना अस्तित्व
क्योंकि मेरा बदलाव ही शर्त है
हमारे सम्बन्ध की,
पर फिर से बहती हूँ दुगने वेग से,
भूलकर हर तपन,
मेरा अनुभव है
आग और पानी का मिलन
इतना भी दुष्कर नहीं होता.....
10.
चाँद
कभी कभी किसी शाम को,
दिल क्यों इतना तनहा होता है
कि भीड़ का हर ठहाका
कर देता है
कुछ और अकेला,
और चाँद जो देखता है सब
पर चुप रहता है,
क्यों नहीं बन जाता
उस टेबल का पेपरवेट
जहाँ जिंदगी की किताब
के पन्ने उलटती जाती है,
वक़्त की आंधी,
या क्यों नहीं बन जाता
उस नदी में एक संदेशवाहक कश्ती
जिसके दोनों किनारे
कभी नहीं मिलते,
बस ताकते हैं एक टक
एक दूसरे को, सालों तक,
वक़्त के साथ उनकी धुंधलाती आँखों का
चश्मा भी तो बन सकता है
चाँद,
या बन सकता नदी के बीच
रौशनी का एक खम्बा,
और पिघला सकता है
कुछ जमी हुई अनकही बातें,
जो तैर रही है एक मुकाम
की तलाश में,
और जब शर्मिंदा हो
अपनी चुप्पी पे
छुप जाता है किसी बदली
के पीछे
तो क्यों झांकता है धुंध की
चादर के पीछे से,
जिसके हर छेद से गिरती है
सर्द ख़ामोशी,
और ले लेती है वजूद को
आहिस्ता-आहिस्ता
अपनी गिरफ्त में,
तब हर बीता पल फ़ैल कर
होता जाता है
मीलों लम्बा,
उन फासलों को तय करती यादें
जब थक कर आराम करती है
तो क्यों नहीं बन जाता चाँद
बेखुदी का नर्म तकिया,
और क्यों नहीं सुला देता
एक मीठी लम्बी नींद
सुनाकर लल्ला लल्ला लोरी,
यूँ और भी बहुत से काम हैं
चाँद के करने के लिए,
अगर छोड़ दे सपनों की पहरेदारी.....

परिपक्वता का साक्ष्य प्रस्तुत करती कविताएं. लगातार निखार आरहा है अभिव्यक्ति में, और कविताओं के विषय-चयन में भी विविधता दिखाई दे रही है.
ReplyDeleteबहुत बहुत बधाई....अंजु...मुझे तुम्हारी कवितायें हमेशा ही अच्छी लगती हैं.....
ReplyDeleteश्रोतिया सर से सहमत .. अंजू की काव्य यात्रा के हर पड़ाव से गुज़रना हुआ है और जिस तेज़ी से वह आगे जा रही है वह सराहनीय है . सुन्दर भविष्य की शुभकामनाओं के साथ ...
ReplyDeleteअपनी अभिव्यक्तियो और संप्रेषण में बेहद सधी हुई कवितायें... बहुत-बहुत बधाई अंजू ...
ReplyDeleteविविध विषयों पर सार्थक और सुंदर अभिव्यक्ति। बधाई अंजु जी
ReplyDeleteअंजू जी की इन कविताओं का आस्वादन किया। मुखरता के बावजूद अपनी कवि-चिंता के उद्धाटन के लिए ये कविताऍं व्याकुल दिखती हैं। इनकी आवेगमयता को आज की युवा संवेदना के प्रत्याख्यान के रूप में देखा जाना चाहिए। पहली बार इन्हें पढ़ रहा हूँ । अत: बधाई।
ReplyDeleteआपकी काव्य यात्रा यूँ ही चलती रहे... नए आयाम स्थापित करे!
ReplyDeleteबधाई अंजू जी!
और भी बहुत से काम हैं, चाँद के करने के लिए
ReplyDeleteगर छोड़ दे सपनों की पहरेदारी.....
BHAAV BHEE SAHAJ AUR ABHIVYAKTI BHEE SAHAJ .
ReplyDeleteSONE PAR SUHAGA HOTEE AGAR KAVITAAYEN CHHAND
MEIN HOTEE.
अंजू जी की कविताओं में लगातार परिवर्तन दिखाई दे रहे हैं, जो उनकी काव्ययात्रा के प्रति आश्वस्त करते हैं। क्षोभ और प्रतिरोध के स्वर में जो गहराई आ रही है, उसका कारण इन कविताओं में साफ दिखाई दे रहा है और वो यह कि एक कवि के रूप में अंजू अब उन साजिशों की तह में जाकर चीजों को समग्रता में देखने लगी हैं, जहां मौजूदा सवालों के उत्तर मिलते हैं। जैसा सबने लक्ष्य किया ही है कि अंजू जी के काव्य में विषयों का वैविध्य भी दिखाई पड़ रहा है और मुझे यह भी लग रहा है कि मिथक, इतिहास और समसामयिक संदर्भों से कविता को कई आयामों में देख सकने का उनका हौसला और काव्य कौशल आगे चलकर उनकी कविताओं में बड़े बदलाव लायेगा। शुभकामनाएं।
ReplyDeleteआप सभी की सराहना ने भिगो दिया, आपका स्नेह और साथ मेरे लिए सदैव प्रेरणा-प्रद है.....मोहन बाबा की टिप्पणी मेरे लिए एक ऐसा स्नेहिल प्रमाण-पत्र होती है जिसे सदैव संजो कर रख लेना चाहती हूँ, पम्मी जी, अपर्णा दी, हेमा, सुशीला जी, ओम निश्चल जी, अनुपमा, दिल नवाज़ जी, प्राण शर्मा जी, प्रेम चंद गाँधी जी....सभी की हृदय से आभारी हूँ, अपर्णा दी की प्रेरणा हमेशा साथ रहती है और ओम जी और प्रेमचंद जी की विस्तृत टीप ने कविता के प्रति मेरी मेहनत और जिम्मेदारी के लिए मुझे और अधिक सजग कर दिया है.....आप सभी का धन्यवाद.....मैं जानकीपुल, प्रभात रंजन जी, त्रिपुरारी जी को भी धन्यवाद देना चाहूंगी मुझे स्वयं को अभिव्यक्त करने का एक सुअवसर देने के लिए. आभार ..............
ReplyDeleteएक बार फिर "बाज आओ" और "विलुप्त प्रजाति पढ़ीं". इनमे से पहली कविता मुझे हर बार अच्छी लगती है.बाकी की कविताओं में " चाँद " तथा " आग और पानी " पसंद आयीं. खास तौर पर इन दोनों कविताओं का अंत या कहें पंच लाइन प्रभावी हैं.अंजू मेहनत से लिख रही हैं और एक अलग स्वर बनाने का यत्न उनकी कविताओं में स्पष्ट दीखता है.कविताओं में विषय की विविधता पर कई लोगों ने लिखा है लेकिन मुझे लगता है कि वह तो लाजिमी है क्योंकि एक ही विषय पर कोई लगातार नहीं लिखता. महत्वपूर्ण है शिल्प, बिम्ब और प्रतीक जिनमे देशज प्रतीक मुझे ज्यादा पसंद आये.मैं महसूस करता हूँ कि अंजू को शिल्प पर थोडा और ध्यान देना चाहिए.भाषागत एक प्रयोग अटपटा लगा " बर्फ सी जली हूँ मैं ".मेरे अनुसार बर्फ गलती है आग में इसलिए " गली हूँ " प्रयोग बेहतर रहता === आगे कविता के प्रोसेस में इसकी पुष्टि भी होती है.कुलमिलाकर सभी कविताओं की तारीफ़ होनी चाहिए क्योंकि यह केवल कवितायेँ ही नहीं है यह अंजू के प्रतिकार का तरीका भी है जैसा वे स्वयं स्वीकार करती हैं. इस प्रतिकार का स्वागत होना चाहिए. यदि यह होगा तो कवितायेँ स्वयं स्वागत योग्य हो जायेंगी.मेरी कामना है कि अंजू लगातार लिखें. सुबह से एक अमेरकी प्रोफ़ेसर के साथ व्यस्त होने के कारण कवितायेँ देर से देख पाया इसका खेद है.अंजू को उनके लेखन के लिए बधाई और भविष्य के लिए शुभाशंसन.
ReplyDeleteपर जो आर्द्रता बची है दिल के किसी कोने में
ReplyDeleteक्या बदलने देगी मुझे पत्थर में, .....
बहुत खूब... लिखती रहें अंजूजी... हार्दिक बधाई॥
घर- बाहर, झाड़ू-पोंछा, चूल्हा,चौका,
ReplyDeleteकपडे, बर्तन, पति, रिश्ते, बच्चे,
कितने बंधनों में बांधा है तुम्हें
बड़ी बेहया हो फिर भी लिखती हो,
एक से बढ़कर एक कविताएँ .... बहुत सुन्दर अंजू ... हार्दिक बधाई !!!
अंजू जी के काव्य-अभिव्यक्त में आर्द्रता है,अलग स्वर है,विषयों का वैविध्य भी दिखाई पड़ रहा है.क्षोभ और प्रतिरोध में धार है.शिल्प, बिम्ब और प्रतीक सभी कुछ सटीक और बहुत सुन्दर .हार्दिक बधाई.
ReplyDeleteवह हर दिन बनती रही
ReplyDeleteतुम्हारी अर्धांगिनी, मित्र,
माँ और दासी,
और तुमने बनना पसंद किया
स्वामी और केवल स्वामी,
मेरी जैसी हर साधारण औरत की कहानी बता रही हैं आपकी कवितायें... बहुत करीब पा रही हूं इन्हें मैं, खुद के...
शुभकामनायें आपको अंजू जी... हमारी बेचैनियों... हमारे सरोकारों से हमें रुबरु करवाने के लिये...
badhaai ho anju ji ..behad saargarbhit aur paripakv rachnaayen ....!!
ReplyDeleteVery nice Anju, aaj toh sirf do rachanayein padhee hain, baaki padhne ke liye ek do din mein dobara aaoonga....
ReplyDeleteएक से बढकर एक ,बहुत सुन्दर.यह आग जलती रहनी चाहिए,
ReplyDeleteस्त्री मन के दुखों को सामने लाने वाली कविताएँ हैं..रचनात्मकता में क्रमशः निखार आ रहा है...कुछ प्रयोग बहुत अच्छे लगे...
ReplyDelete..
Dhanywad Suman di....main abhari hoon
Deleteयूँ और भी बहुत से काम हैं
ReplyDeleteचाँद के करने के लिए,
अगर छोड़ दे सपनों की पहरेदारी.....
खूब.
अंजू की मेहनत दिखाई दे रही कविताओं में. सबसे बड़ी बात है कि उनकी कविताओं में अब एक चेहरा साफ़ उभरता दिखाई दे रहा है और वह उनका अपना है...
ReplyDelete