एक अदभुत प्यार की कहानी: चार्ली चैपलिन की फिल्म ‘सिटी लाइट्स’

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चार्ली चैपलिन की फिल्म ‘सिटी लाइट्स’ पर एक सुंदर लेख लिखा है सैयद एस तौहीद ने- जानकी पुल।
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कवित्वमय फिल्मकार चैपलिन की फिल्मों का संग्रह बनाने पर आप गंभीरता से विचार करें तो उसमें ‘सिटी लाईट्स’ का होना अनिवार्य होगा। उनकी फनकारी के ज्यादातर पहलुओं को एक जगह देखने का एक दुर्लभ अवसर यहां से बेहतर कहीं नहीं मिलेगा। इससे गुजरते हुए भूमिका-प्रोत्साहन-मूकानिभय में अभिनेता का शारीरिक तारतम्य सुंदर बन पडा है। फिर यहां मेलोड्रामा के पुट एवं थोडे अल्हडपन के सामानांतर इनायतभरी अदाकारी का एक मिश्रण देखा जा सकता है। बाकी खूबियों में आप यह ना भूलें कि लिटिल ट्रांप का सर्वकालिक किरदार भी यहां जी रहा। विश्व सिनेमा विकास के नजरिए से इस फिल्म के समय टाकी का उदय हुए भी कुछ बरस बीत चुके थे। चैपलिन की यह पेशकश उनकी मूक फिल्मों में आखिरी कगार पर खडी थी। कहीं ना कहीं उन्हें भी आभास रहा होगा कि अब फिर से मूक फिल्में बनने में मुश्किल होगी। टाकी की हलचल से प्रभावित होकर ‘सिटी लाईट्स’ को भी टाकी रूप में बनाने पर थोडा झुके, लेकिन रुक कर मूक व टाकी में बीच का निर्णय लिया। चैपलिन की धुनों से सजा एक आकर्षक बैकग्राउंड संगीत व ध्वनि प्रयोग इस मूक फिल्म को खास बनाता है। फिल्म के ओपनिंग दृश्य में सांकेतिक भाषणों के प्रयोग से तत्कालीन राजनिति के उपहास का हौसला नजर आया। यहां  संबोधन के नाम से राजनेताओं के मुख पर फालतु-बेतुके व कर्कश लफ्ज़ आरोपित हैं। टाकी फिल्मों में संवाद चलन का दिलचस्प मजाक यह था। उनके निशाने पर नजर आने वाले बाक़ी चीजों में शालीन कहे जाने वाले लोगों की कटुता-फूहडता-आडम्बर शामिल था। यह संभ्रात लोग ट्रांप किस्म के बेसहारा-प्यारे शख्सियतों से काफी निर्ममता से पेश आए। पांच-एक बरस बाद रिलीज हुई एक फिल्म में चैपलिन ने संवाद को फिर साउंडट्रेक की तरह रखा।
चैपलिन ने जो किया उसमें एक खास संगत नजर रही : उनके लिटिल ट्रांप ने खुद को संवादों के जरिए कभी व्यक्त नहीं किया। अधिकांश मूक फिल्मों में संवादों का एक सुंदर भ्रम बनाया गया। देखकर महसूस होगा कि किरदार मूक नहीं परंतु हमें वो संवाद सुनाए नहीं गए। समकालीन फिल्मकार कीटन के किरदार चापलीन की तुलना में स्पष्ट रूप से सुने जाने वाले थे। लेकिन स्वांग व अंगविक्षेप के मसीहा ट्रांप के लिए शारीरिक भंगिमाएं ही भाषा थी। वो समकालीन किरदारों से एक अलग दुनिया का नजर आता है। बाक़ी की सीमाओं से बाहर खडा शख्स—जिसे लोग बाहरी आवरण पर  परखते हैं। अजनबी-अनजान में बंधु-परिवार खोजने वाला बेघर-आवारा । दुनिया की दुनियादारी में घुलने वास्ते उसके पास काम के अलावा भाषा नहीं। कभी-कभार उसके लिए संवाद जरुर होना ठीक महसूस होता है।  लेकिन शायद ट्रांप को उसकी जरूरत नहीं पडी। मूक सिनेमा के ज्यादातर किरदारों की तरह वो भी संवादों की भाषा कभी-कभार इस्तेमाल कर सकते थे। नए चलन को अपनाकर आराम की जिंदगी गुजर कर सकते थे। लेकिन किया नहीं। अधिकांश फिल्मों में मानवीयता को खोज की संगत में पेश किया गया।
अधिकांश फिल्मों में मानवीयता को आविष्कार की संगत में पेश किया गया। उनकी यह फिल्म भी उसी किस्म की रही क्योंकि यहां चैपलिन के सबसे दिलचस्प हंसोड दृश्य नजर आएंगे। आप कुश्ती के सीन को याद करें…खुद को प्रतिद्वंदी से किसी तरह अलग रखने खातिर हीरो द्वारा कदमों का चपल इस्तेमाल हंसी रोक नहीं सकेगा। ओपनिंग सीन जहां एक महान वीर की  प्रतिमा दिखाने के बहाने उसकी गोद में पडे हीरो को दिखाया गया। उस ऊंची प्रतिमा पर चढने की कोशिश में ट्रांप का पैंट मजाहिया रूप से वीर की तलवार से फंसा रह गया था। अपने मतवाले अमीर शराबी मित्र को डूबने से बचाने के क्रम में पर्वत का एक टुकडा गले बंधवा लेता है। फिर वो दृश्य जिसमें सिटी निगल लेने की वजह से कुत्तों का झुंड हास्यास्पद रूप से पीछे लग गया। लुटेरो से जुझने वाला सीन एवं नाइटक्लब डांसर को जबरदस्ती के साथी से बचाने वाला भी देखने लायक था । आपको वो हंसी के पल भी याद आएंगे कि जिसमें सफाई कर्मचारी बना हीरो घोडों की परेड से बचने के चक्कर में हांथियों की परेड से घिर गया। शराबी दोस्त द्वारा शराब की बाटल पैंट पर उडेल डालने वाला सीन भी देखें।
चैपलिन की अदाकारी में छुअन व रुकी हुई प्रतिक्रिया की कला पर महारत हासिल थी। फूलवाली नबीना युवती के इलाज का खर्च लेकर उसके घर आए अभिनेता का सीन देखें। अमूमन असमझदार रहने वाला ट्रांप बडी समझदारी से थोडा-बहुत रूपया खुद की जरूरत के लिए रख लेता है। उदारता का स्तर देखें कि युवती द्वारा हांथों को स्पर्श कर चुमने पर वो बाक़ी रुपया भी शर्माते हुए निकाल देता है। चैपलिन व किटन दोनों नें खुद को काल्पनिक किरदारों के माध्यम रखा। चापलीन अधिकांश रुप से ट्रांप किरदार में नजर आए। यह चरित्र एक बेदखल-आवारा जिंदगी जीने को मजबूर था।  लोगों की किनाराकशी एक शाश्वत सच की तरह उससे लिपटी हुई थी। ज्यादातर एक ही रणनीति को लेकर काम करने वाला ट्रांप खुद को दुहराता सा लगता है। उसकी असंतुलित शारीरिक मूवमेंट परेशान लोगों को उसमें जोडों के दर्द से परेशान मरीज नजर आ सकता है। लेकिन अमूमन ट्रांप की अदाएं सभी को पसंद आएंगी। उनकी सिटी लाईट्स को मानवीय संवेगों की विजय का गान कहना गलत ना होगा। चापलीन का ‘लिटिल ट्रांप’ विलासिता व फकीरी के दो भावों में सहजता से गमन कर गया ।  न्याय व मानवता का निवेदन करने वाला आदमी। बेशक एक दुर्लभ किस्म की शख्सियत का उनमें वास था।
एक फिल्म में जेल से रिहा ट्रांप फिर से वहीं आने की बार बार कोशिश करता नजर आया।  जेल ही उसके लिए ज्यादा सुरक्षित होगी यह सोचकर। लेकिन सिटी लाईट्स में उसका दुख जो कि हमारा भी हो गया कि बेचारे की पहचान उन्हीं लोगों से बनी जो उसे देख नहीं सकते। वो मतवाला शराबी व्यक्तित्व से थोडा कट जाने पर ही ट्रांप को पहचान नहीं पाता। नबीना फूलवाली युवती (विरजिनिया शेरिल) से मुहब्बत भी उसी तरह मर्मस्पर्शी अंत को ही पाएगी। उसका फकीरी आवरण उसे बाक़ी से अलग करता है। संवाद कायम करने के लिए संकेतों का इस्तेमाल करने में लोगों को चिडचिडा कर देता है। एक स्टीरियोटाइप धारणा के दायरे में उसे सीमित कर लोग काफी गलती कर रहे थे। चापलीन का ट्रांप हमलोग के किस्म का नहीं था। जाति-समाज से बेदखल आवारा…अकेला। दुनिया का ठुकराया हुआ आदमी। एक नबीना फूलवाली से बेघर-आवारा का नाता दिलों को स्पर्श कर जाने वाली कहानी को बयान करता है। क्या देख ना पाने कारण ही वो युवती किसी आवारा से मुहब्बत कर बैठी? क्या महज इसी वजह से उसे ट्रांप की फिक्र रही क्योंकि उसने ट्रांप को देखा नहीं था? बेशक युवती को उससे दूर रहने की हिदायत भी मिली हुई थी। जब कभी उसे बुलाने ट्रांप घर चला आया… फूलवाली वहां नहीं मिली।  फिल्म का आखिरी सीन विश्व सिनेमा के सबसे भावुक दृश्यों में शामिल है। नबीना युवती के इलाज का खर्च जो नादान ट्रांप वहन कर गया…रोशनी वापस मिलने पर उसे ही अवारा-लफंगा समझ रही। एक बनावटी मुस्कान के साथ उसे एक गुलाब भेंट करती है। हीरो को उस फूलवाली युवती से मुहब्बत हो चुकी थी। खुद की झूठी अमीर छवि बनाने में कामयाब होकर उसका दिल जीत लिया था। आप यह ना सोंचे कि नबीना फूलवाली युवती व अमीर शराबी का होना चापलीन की इस कहानी में असंगत नजर आते हैं। क्योंकि चापलीन को वास्तविक रुप में ना देख पाने का संगत दोनों को मुख्य किरदार से जोडे हुए है। इस फिल्म का अदभुत बाक्सिंग सीन फिर दीन भावुक दिल तोड देने वाला आखिरी दृश्य जिसमें युवती आंख मिलने बाद अंधपन के साथी को पहचानकर भी अनजाना समझती है। चापलिन इस को भी कविताई रूप में लौटाता है। पूरी फिल्म में नबीना लडकी अवारा ट्रांप को अमीर सहायक मानती रहती है। लेकिन असलियत से रूबरू होने पर दोनों के दरम्यान एक अलग भावुकता का निर्माण होता है। वो रिश्ता जो जान पहचान का होकर भी असलियत सामने अजनबी बन जाता है। 
युवती की प्रतिक्रिया को लेकर हीरो की आंखों में इंतजार व भय का एक साथ होना देखा जा सकता है। वहीं दूसरी तरफ अवसर को लेकर युवती में भी अस्पष्टता व मुहब्बत का मिश्रण नजर आया। हांथ में थोडे बहुत रूपए देने के क्रम में अंधपन के साथी का स्पर्श पहचान लेती है। अंधकार से रोशनी में आकर वो उसकी फिक्र करने वाले को थोडी सकुचाहट से ही सही जान-पहचान का कुबूल कर लेती है। हीरो ने फूलवाली युवती की भलमनसाहत का ठीक अनुमान लगाया…खुदा का शुक्र रहा कि ट्रांप भी खुद को खुद  की शखसियत के प्रकाश में क़ुबूल कर सका। एक तरह से यह मुहब्बत की भी जीत थी। मूक सिनेमा के पहलुओं पर खरी उतरने वाली यह फिल्म साइलेंट होकर भी प्यार की एक अदभुत कहानी सुना गयी ।
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3 COMMENTS

  1. थोड़ी असहमति है कि अंधी लड़की क्या सचमुच ट्रॅम्प को, उसकी मोहब्बत को क़ुबूल करती है भी या नहीं? क्या ये उसकी ट्रॅम्प पर उमड़ आयी दया थी या अपनी बेबसी पर रुलाई, ठीक ठीक कहना मुश्किल है?
    चैप्लिन अपनी सभी फिल्मों में सिटी लाइट्स को सर्वश्रेष्ठ मानते थे. सच में इसकी कोई सानी नहीं।

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