क्रोध भाव और रौद्र रस : विश्व की महान फ़िल्में

0
47
इधर हम फिल्मों के वाद-विवाद में लगे हुए थे आईआईटी पलट युवा लेखक प्रचंड प्रवीर रस सिद्धांत के आधार पर विश्व सिनेमा के विश्लेषण में लगे हुए थे. यह अपने ढंग की अकेली श्रृंखला है जिसमें रसों के आधार पर सिनेमा के साधारणीकरण को देखा गया है. आज रौद्र रस और विश्व सिनेमा- मॉडरेटर 
=====
=====

इस लेखमाला में अब तक आपने पढ़ा:
1.  हिन्दी फिल्मों का सौंदर्यशास्त्र http://www.jankipul.com/2014/06/blog-post_7.html
2. भारतीय दृष्टिकोण से विश्व सिनेमा का सौंदर्यशास्त्र http://www.jankipul.com/2014/07/blog-post_89.html
3.   भयावह फिल्मों का अनूठा संसार http://www.jankipul.com/2014/08/blog-post_8.html
4.   वीभत्स रस और विश्व सिनेमा http://www.jankipul.com/2014/08/blog-post_20.html
5.  विस्मय और चमत्कार : विश्व सिनेमा में अद्भुत रस की फिल्में http://www.jankipul.com/2014/08/blog-post_29.html
6.  विश्व सिनेमा में वीर रस की फिल्में – (भाग) http://www.jankipul.com/2014/09/blog-post_24.html
7.  विश्व सिनेमा में वीर रस की फिल्में -(भाग २) : http://www.jankipul.com/2014/10/blog-post_20.html
8.   शोक, पीड़ा, और कर्त्तव्य: विश्व सिनेमा में करूण रस की फिल्में (भाग) :http://www.jankipul.com/2014/11/blog-post_12.html
9. शोक, पीड़ा, और कर्त्तव्य: विश्व सिनेमा में करूण रस की फिल्में (भाग) – http://www.jankipul.com/2014/11/blog-post_28.html
भारतीय शास्त्रीय सौंदर्यशास्त्र के दृष्टिकोण से विश्व सिनेमा का परिचय कराती इस लेखमाला की दसवीं कड़ी में क्रोध भाव और रौद्र रस की विश्व की महान कृतियों का अवलोकन

क्रोध भाव और रौद्र रस : विश्व की महान कृतियाँ


भरतमुनि के नाट्यशास्त्र के अनुसार रौद्र रस का स्थायीभाव क्रोध है। इसके विभाव क्रोध, बलात्कार, अपशब्द, अपमान, मिथ्या आरोप, धमकी, प्रतिशोध, जलन जैसे कारक हैं। इसके व्यभिचारी भाव गर्व, ईर्ष्या, उत्साह, आवेग, मद, क्रोध, चपलता, उग्रता, स्वेद, कम्पन, रोमांच, स्वरभंग आदि हैं।


क्रोध भाव पाँच तरह के होते हैं . शत्रु के कारण उत्पन्न . श्रेष्ठ पुरुष के कारण उत्पन्न . प्रेमी/ प्रेमिका के कारण उत्पन्न . अनुचर के कारण उत्पन्न . झूठमूठ का क्रोध।

नाटक में क्रोध प्रदर्शित करने के लिये लाल हो गयी आँखें, भौंहों का चढना, होठों को काटना, एक हाथ से दूसरे हाथ को दबाना, गालों की गति का सहारा लिया जाता है नाट्यशास्त्र में रौद्र रस सामान्यतया राक्षसों और दानवों के चित्रण के लिए रखा गया है। संभवतया यह संस्कृत नाटकों के प्रचलित रूपों के दिशा निर्देश हो। वैसे भी नाट्यशास्त्र अपने सिद्धांत के बारे में मौन है और केवल दिशा निर्देश के अलावा कुछ नहीं। रस सिद्धांत के अन्य टीकाकार भी इस पर गहरी चर्चा करते नहीं नजर आते।


प्रथम दृष्टया रौद्र रस और क्रोध के स्थायीभाव से थोड़ी समस्या है। हम पीछे देख चुके हैं कि क्रोध का भाव, वीर रस और वीभत्स रस को ले जाने में सहायक होता है। समस्या है कि कब यह रस बन जाता है और ये स्थायीभाव कितनी देर तक स्थायी रहता है अथवा रह सकता है? रस की जटिलता के संदर्भ में कथाकली का प्रसिद्ध दु:शासन वध वर्णन उल्लेखनीय है। भीम जब दु:शासन का वध करने जाते हैं तो उस समय रौद्र रस जल्दी ही वीर रस में बदलता युद्ध हो जाता है। फिर जब भीम दु:शासन की बाँह उखाड़ कर वीभत्स हत्या करते हुये, उसकी छाती फाड़ कर खून पीते हैं तो यह वीभत्स रस हो जाता है। जब वह

NO COMMENTS

LEAVE A REPLY

ten − seven =