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बाबू कुंवर सिंह तोहरे राज बिना…

1857 के जुबानी किस्से

अभी हाल में ही रूपा एंड कंपनी से इतिहासकार पंकज राग की पुस्तक आई है 1857 ओरल ट्रेडिशन पुस्तक में उन्होंने लोकगीतों एवं किस्से-कहानियों के माध्यम से 1857 के विद्रोह को समझने का प्रयास किया है। प्रस्तुत है उसका एक छोटा-सा अंश जिसका संबंध कुंवर सिंह से जुडे किस्सों से है।



आम जनता के मानस में इस विद्रोह में भाग लेना जीवन और मृत्यु के कर्मों में भाग लेने से कम आवश्यक कर्म नहीं था। ऐसे अनेक लोकगीत हैं जिनमें इस बात का वर्णन मिलता है कि किस तरह राजा कुंवर सिंह और उनके छोटे भाई अमर सिंह युद्ध की तैयारी अनुष्ठानपूर्वक किए गए स्नान और शरीर पर चंदन का लेप लगाकर करते थे, यहां तक कि पंडित बुलाकर लड़ाई पर जाने का शुभ मुहुर्त भी पूछते थेः

सिर से गुसुल किया बनाई

चनन लगौलन आठों अंग

वर्दी पेटी ले मंगाओ

झालम झार ले मंगाओ

या

ई बाबू ने जोर किया

पंडितजी को लिए बुलाए

सुनो पंडितजी मेरी बात

सगुन दो बिचार

इसी तरह, लड़ाई के अंतिम दौर में गंगा नदी पार करते हुए तोप का गोला लगने से कुंवर सिंह का एक हाथ बेकामिल हो गया। ऐसा कहा जाता है कि अपनी तलवार के एक झटके में ही उन्होंने अपना वह घवाहिल हाथ उतारकर पवित्र नदी गंगा को अंतिम प्रणाम स्वरूप भेंट कर दियाः

रामा गोली आई लागल दहिना हथवा ना

रामा काटि दिहले लेके तरवरवा रे ना

रामा वीर भगत के इहे निशनवा रे ना

एक दिलचस्प उदाहरण गोरखपुर के डुमरी एस्टेट के बंधु सिंह का है। 1857 में उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ छापामार लड़ाई लड़ी और ऐसा माना जाता है कि वे अंग्रेजों के कटे हुए सिर तड़कुल्हा गांव की देवी तड़कुल्हा देवी को चढ़ाते थे। किस्से-कहानियों में कहा जाता है कि आखिरकार जब वे पकड़े गए तथा 12 अगस्त 1857 को गोरखपुर के अलीनगर चौराहे पर जब उनको फांसी पर चढ़ाया जा रहा था तो जल्लाद की रस्सी सात बार टूट गई थी। आखिरकार जब उसने तड़कुल्हा देवी से विनती की कि वे बंधु सिंह को शहीद मान लें तब उसको फांसी पर लटकाया जा सका। उस तरफ के लोग तो आज तक यह मानते हैं कि जिस उसे फांसी पर चढ़ाया गया था उस दिन आसपास के इलाके में ताड़ के सात पेड़ गिरे थे जो सात बार रस्सी टूटने के प्रतीक थे। देवी के मंदिर के पीछे वाला पोखर लाल हो गया था उस दिन। 1857 के संदर्भ में बहादुरी और विद्रोह धार्मिक आस्था और विश्वासों के भी निर्धारक पहलू हो गए।

1857 के संदर्भ में धर्म का मतलब भी अलग-अलग जगहों पर लोगों के लिए अलग-अलग हो जाता था। 19वीं शतब्दी के मध्य में भारत में धर्म का मतलब अधिक विस्तृत था और उसके अंतर्गत नैतिक और सामाजिक मूल्यों से जुड़े समस्त पहलू आते थे। इसके अंतर्गत वे सारे आचार-विचार आते थे जिनके अनुसार जीवन को संचालित किया जाना चाहिए। इसलिए धर्म रक्षा का मतलब होता था समस्त जीवन पद्धति की रक्षा, 1857 के संदर्भ में जिसका अर्थ हो सकता था उन अपराधियों के खिलाफ लड़ना जो इस धर्म को हानि पहुंचा रहे थे।

आम जन चेतना में मर्दानगी तथा वीरता से जुड़े पहलू इस प्रकार की जीवन पद्धति की रक्षा से जुड़ गए। जो लोग घर में आराम से पड़े हुए थे और जिन्होंने संघर्ष का रास्ता अपनाने से मना कर दिया उनका मज़ाक उड़ाया जाता था। जैसा नीचे की पंक्तियों में औरतें ऐसे कायरों का उपहास इस तरह से करती हैं-

लागे शरम लाज घर में बैठ जाहू

मरद से बनि के लुगइया ए हरि

पहिरके साड़ी; चूड़ी; मुँहवा छिपाई लेहु

राखि लेबि तोहरी पगड़िया ए हरि।

1857 के संदर्भ में इस प्रकार के सम्मान का भाव समाज के विभिन्न तबकों में देखा जा सकता है। पटना के प्रसिद्ध विद्रोही पीर अली से जब अंग्रेजों ने गिरफ्तारी के बाद यह कहा कि अगर वे विद्रोहियों के बारे में कुछ जानकारी दें तो उनकी जान बख्श दी जाएगी। कहा जाता है कि जवाब में उसने कहा कि कुछ मामलों में जान बचाना अच्छा होता है लेकिन कुछ मामलों में जान देना ही बेहतर होता है। जो लोग उस लड़ाई का हिस्सा थे लोगों की नजर में वे सम्मान के लिए एक आवश्यक लड़ाई लड़ रहे थे। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जब लोगों ने विद्रोहियों को पकड़ने में सरकार की मदद करने से इंकार कर दिया।

सम्मान की इस लड़ाई में शक्ति अर्जित करने के लिए मर्दानगी और वीरता से जुड़े सांस्कृतिक पहचानों का सहारा भी लिया गया। सांस्कृतिक मुहावरों एवं पहचानों के माध्यम से अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई शायद अलग सांस्कृतिक वितान की धारणा को पुष्ट करता है, विद्रोही जिसे अंग्रेजों के अतिक्रमण से बचाने का प्रयास कर रहे थे। इसीलिए कुंवर सिंह की हार ने आम विद्रोहियों को यह कहने के लिए विवश किया कि उनमें होली खेलने की जरा भी इच्छा नहीं रह गई हैः

बाबू कुंवर सिंह तोहरे राज बिना,

अब न रंगइबो केसरिया।

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2 comments

  1. bahut badhiya hai sir bahut bahut badhai.

  2. kinvadantiyan evam lok kathaen bhi ek samanantar itihas ka srijan karti hain .

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