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बाबा की सियार, लुखड़ी की कहानी और डा॰ रामविलास शर्मा

लिटरेट वर्ल्ड की ओर अपने संस्मरण स्तंभ की खातिर डा॰ रामविलास शर्मा की यादों को उनके तीसरे पुत्र विजय मोहन शर्मा एवं पुत्रवधू संतोष से बातचीत द्वारा शब्दबद्ध करने का प्रयास किया गया था। डा॰ शर्मा विजय के पास रहकर ही 20 वर्षों तक लगातार अपनी साहित्य साधना करते रहे थे। डा॰ शर्मा के तीन पुत्र एवं तीन पुत्रियों में सबसे बड़े पुत्र गुजर चुके हैं। दूसरे पुत्र आगरा में हैं जबकि तीन बहनों में एक दिल्ली, दूसरी बड़ौदा और तीसरी राजस्थान में रह रही हैं।

यह संस्मरण पुत्र विजय मोहन शर्मा और पुत्रवधु संतोष से संगीता की मार्च 2003 में हुई बातचीत पर आधारित है।

सी–358, विकासपुरी, नई दिल्ली। यह बिल्कुल मुख्य सड़क पर स्थित है जहां से होकर सारे दिन कितनी ही बसें गुजरती रहती हैं। छोटा सा ही उनका बरामदा है जहाँ से उन बसों का आना–जाना देखा जा सकता है। डा॰ रामविलास शर्मा को घुटने में दर्द की वजह से जबसे पार्क में टहलने जाना मना हुआ था तब से अपनी हर सुबह वे बरामदे के उन्हीं सीमित घेरे में टहला करते थे। पर क्या उनके विचारों का भी कोई दायरा था उस बरामदे की तरह। उनकी नजरें वहां से गुजरती बसों और सड़क पर चल रहे इक्के–दुक्के लोगों से वास्ता तो बनाती ही होंगी और वे भी उनके विचारों में जरूर आते होंगे। वहीं बरामदे में खड़े कुछ पाये जरूर कुछ पलों के लिए ही सही उनके ध्यान के बीच यानी बसों, लोगों और भी मन में चल रही अनेक गुत्थियों जैसे नामवर सिंह को इस बार कैसे करारा जवाब दिया जाए या निराला होते तो…या अभी अपने रिकार्डर में जिस विषय पर बोलना है उसमें और क्या जरूरी चीजें जुड़ सकती है… में जरूर खड़े हो जाते होंगे। और रुक जाता होगा वह निरंतर चल रहा विचारों का क्रम। तब वे उसे जोड़ते होंगे या टूटा ही छोड़ देते होंगे। मुझे क्या पता? डा॰ शर्मा ने अपने अंतिम 20 वर्षों को लगातार यहीं रहकर जिया था। उन्हें टहलना भी होता था तो वे अपने इसी बरामदे में टहलने के लिए बकायदा तैयार होते थे। यानी बुश्सर्ट, पैंट और जूता–मौजा पहनकर वे टहलते थे और पुनः उन्हीं लुंगी–बनियान में उनकी अगली सुबह, शाम और दिन हुआ करते थे। वे ज्यादातर कहीं जाने से कतराते थे कि उनका समय बरबाद होगा और लिखने–पढ़ने में हर्ज होगा।

हिन्दी एकेडमी ने डा॰ शर्मा पर 45 मिनट की फिल्म बनाई है जो एडिट होकर 30 मिनट की तैयार हुई है। फिल्म का क्रम ठीक उसी तरह से रखा गया है जैसे–जैसे डा॰शर्मा ने बचपन से होकर आलोचना के क्षेत्र में अपना नाम शीर्ष पर पहुँचाया। यानी गांव से शूटिंग शुरू हुई फिर झांसी, लखनऊ, आगरा तब दिल्ली। डा॰ शर्मा को अपने गांव से कुछ ज्यादा ही लगाव रहा। वे कहा करते थे कि कोई ऐसा दिन नहीं था जब वे सपने में गांव नहीं देखते थे। विजय मोहन शर्मा बताते हैं कि ‘मुझे लगता है कि पिताजी का बहुत थोड़ा समय ही गांव में बीता होगा।’

तब गांव में पढ़ने–लिखने की कोई व्यवस्था नहीं थी। डा॰ शर्मा कुल छह भाई थे जिनमें इनका नम्बर दूसरा था।इन्हें बचपन में ही अपने पिता के पास पढ़ने के लिए झांसी भेज दिया गया। डा॰ शर्मा के व्यक्तित्व पर उनके दादा का बहुत प्रभाव था। उनके दादा उन्हें किस्से–कहानियां, लोकोक्तियां खूब सुनाया करते थे और डा॰ शर्मा को प्रोत्साहित भी करते थे। उन्हीं दिनों डा॰ शर्मा ने हनुमान जी पर कुछ तुकबन्दी की थी, जिसे संभाल कर उनके दादा ने मंदिर में रख दी थी। डा॰ शर्मा ने खुद लिखा है कि उन्हें दादा की कही गई कहानियां बहुत पसंद आती थीं। उन कहानियों को वे दृश्यों के साथ महसूस किया करते थे। बैसवाड़ा तो वैसे भी अपनी लोकसंस्कृति के लिए मशहूर है। कहानी सुनने का शौक डा॰ शर्मा को बाद तक रहा। जब बाबा से कहानी सुनने की उनकी उम्र नहीं रही तब वे बच्चों को सिखाकर बाबा के पास भेजते कि बाबा को कहो कहानी सुनाएंगे – ‘सियार और लुखड़ी का कहानी’। और जब बाबा कहानी कहते तब वे चुपचाप दूर से ही बैठकर उन कहानियों को फिर–फिर सुनते थे। विजय बताते हैं कि ‘पिताजी में साहित्य के संस्कार बहुत हद तक पिताजी के बाबा की वजह से आया होगा।’ झांसी जाने के बाद जब वे छुट्टियों में घर आया करते थे तब उनके बाबा उनसे पूछते थे कि ‘तुम्हें गिरधर की कितनी कुण्डलियां याद हैं।’ डा॰ शर्मा कहते – ‘एक भी नहीं।’ तब उनके बाबा कह पड़ते – ‘भला यह भी कोई पढ़ाई है।’ खैर उनकी पढ़ाई झांसी के सरस्वती पाठशाला से शुरू हो गई। वहां के कुछ शिक्षकों की याद उन्हें लगातार बनी रही। वे शिक्षक उन्हें पहाड़ पर चढ़ना, मिट्टी के खिलौने बनाना, पेंटिग बनाना आदि सिखाते थे। उसके बाद वे मैकडोनाल्ड स्कूल, झांसी में पढ़ने लगे। इसी स्कूल के चटर्जी साहब मास्टर जी से उनका आखिर तक सम्पर्क बना रहा। वो स्वयं बांग्ला में लिखते थे और इन्हें अपनी भाषा में लिखने के लिए प्रोत्साहित करते थे। उस समय डा॰ शर्मा जब अंग्रेजी में कोई लेख लिखते तब मास्टर चटर्जी उन्हें पूरी क्लास के बीच में पढ़कर सुनाते थे। डा॰ शर्मा कहा करते थे कि इससे उन्हें तब बड़ा प्रोत्साहन मिलता था।

उनका साहित्यक खेल कुछ इस तरह शुरू हुआ। उन्होंने हायर सेकेन्डरी में गणित विषय ले रखा था और उस विषय में उनका मन लगता नहीं था। उनके एक मित्र थे गणित क्लास में, दोनों एक–दूसरे की कॉपी में कविता लिखा करते थे। गांव में डा॰शर्मा के पिता कई बार ‘रामलीला’ आयोजित करते थे, उन्हें पूरी ‘रामचरितमानस’ कंठस्थ थी। उनके पिता इनसे कहते ‘रामायण’ पढ़ो। ये पढ़ते और वे सुनते। जब डा॰ शर्मा से कोई गलती होती थी तब वे उन्हें टोकते थे ऐसे नहीं, ये ऐसे होगा। ‘रामलीला’ में इनका पूरा परिवार भाग लेता था। कोई दशरथ, कोई परशुराम तो कोई लक्ष्मण की भूमिका अदा करता था। इन सबसे अलग डा॰ शर्मा प्राम्टर का काम करते थे। ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ की लड़ाइयों को वे जनजातियों की आपसी लड़ाई के रूप में देखते थे। लेकिन जिस पर वे विश्वास करते थे टूटकर करते थे।

विजय मोहन कहते हैं ‘जब पिताजी इंटरमीडिएट (झांसी) में थे तभी से कविताएं लिखनी शुरू कर दी थी। उनकी एक डायरी है मेरे पास वह सन् 1929–30 की है।उनके हाथ की लिखी करीब 16 कविताएं हैं उसमें। उस डायरी में डा॰ शर्मा ने स्वयं मूल्यांकन करते हुए कुछ को Good तो कहीं very good और किसी को बेकार बताया है। उन्होंने हिन्दी में कविताएं और अंग्रेजी में comments लिखे हुए हैं। बाद में उन्होंने वहां से कुछ कविताएं उठाकर उसे संकलन में डाला है। उनकी अप्रकाशित कविताओं में ‘प्रत्यागमन’ भी एक है। वह कविता कुछ इस तरह है–

प्रत्यागमन

(अप्रकाशित कविता)

‘कान्तिहीन अति म्लान धूल धूसरित थके से!

कौन कहां जा रहे? क्लांत इस भांति ठगे से!!

गोधूली का समय! निशा में कहां रहोगे!

पास न कोई ग्राम–धाम दुख अमित सहोगे!!

अरे अभी तो वयस तुम्हारा है नवीन सा!

किंतु केश अधिकांश श्वेत मुख हुआ दीन सा!!

नेत्र हुए द्युतिहीन अस्थियां मुझको दिखतीं!

अरे! वेदनायें वस्त्रों से फूटी पड़ती!!’

‘बस करिये इन अर्थहीन बकवादों से क्या?

मूक वेदनाओं से! केशों से! मुख से क्या??

सज्जनता का पुरस्कार पाकर लौटा हूं!!

सहते–सहते दुःख यातनाएं जेलों की!

मरणासन्न हुआ सह जेलों की!!’…

अरे ‘विधाता’ निठुर कहो क्यों इतना बनते!

देवतुल्य इन जीवों से क्यों इतना तनते!!

झांसी से लखनऊ आने पर रामविलास शर्मा का कविता से संबंध बढ़ता ही गया। डा॰ शर्मा के अनुसार ‘निराला’ के सम्पर्क में आने से उनका जीवन ही कवितामय हो गया था। ‘निराला’ उनके प्रिय कवि थे। ‘निराला’ पर जो आक्षेप हुए थे तथा जिनसे वह जूझ रहे थे, झांसी रहते समय रामविलास उनसे अधिक परिचित नहीं थे। सन् 1934 में यह संघर्ष ही उन्हें आलोचना के क्षेत्र में घसीट लाया और उनका पहला आलोचनात्मक लेख ‘निराला’ की काव्य प्रतिभा के समर्थन में प्रकाशित हुआ। डा॰ शर्मा के अनुसार, संभव है, यह संघर्ष न होता – मेरे प्रिय कवि पर द्वेषपूर्ण आरोपों की वर्षा न की गई होती – तो मैं आलोचना के क्षेत्र में आता ही नहीं। एक बार डा॰ शर्मा ने अपने भाई को लिखा था ‘कविता लिखने में जितनी शारीरिक यातना होती है, मानसिक आनंद उतना ही अधिक। किन्तु अब–कुछ ऐसा हो गया है कि मैं कविता लिखे बिना रह ही नहीं सकता हूं।’ जब वे बारहवीं में थे तभी महाराणा प्रताप पर ‘सूर्यास्त’ नाम से नाटक लिखा था जिसमें यह दिखाने की कोशिश की कि महाराणा प्रताप जंगलों कैसे मारे–मारे फिर रहे थे।

एक दफे झांसी स्कूल में पढ़ने के दौरान इनके स्कूल में गांधी जी और कस्तूरबा आई थीं।तब स्कूल के सारे बच्चे पंक्ति में होकर उनके सामने से गुजरे थे। पंक्ति में रामविलास शर्मा भी थे। तब अंग्रेजी कपड़ों का बहिष्कार हो रहा था। इनके पास एक टोपी थी, उसे इन्होंने फेंक दिया। ये घटना तब की है जब वे आठवीं कक्षा में थे।

डा॰ शर्मा कभी हॉकी बड़े शौक से खेला करते थे। मशहूर हॉकी खिलाड़ी ध्यानचंद के भाई रूपसिंह इनके क्लास फेलो थे। धीरे–धीरे इनकी दिलचस्पी क्रिकेट में बढ़ने लगी और इन्टरमीडिएट के बाद हॉकी खेलना लगभग छूट ही गया जबकि क्रिकेट की इनकी दीवानगी बाद तक बनी रही।

डा॰ शर्मा जब बी॰ए॰ के विद्यार्थी थे तब विवेकानंद की तीन किताबों का अनुवाद किया था। वही इनकी पहली प्रकाशित रचना थी। एम॰ए॰ करने के दौरान इनका परिचय साहित्यकारों से बढ़ने लगा। ‘निराला’ से भी मुलाकात का यही दौर था। संयोग कुछ ऐसा बना कि डा॰ शर्मा और ‘निराला’ साथ रहने लगे एक ही मकान में। ये तकरीबन 1933–34 से 1938 तक की बात होगी। वे लोग लखनऊ के मकबूल गंज में 112 न॰ मकान में ऊपर–नीचे रहते थे। एक और मकान जिसको नारियल वाली गली कहते थे, में ये लोग साथ–साथ रहे हैं। और काफी दिनों तक रहे हैं। उन दिनों वे दोनों साहित्य की बातें खूब किया करते थे। डा॰ शर्मा तब अंग्रेजी विषय से पी॰एच॰डी॰ कर रहे थे तो निराला इनसे पूछते थे कि अंग्रेजी में कौन–कौन अच्छे कवि हैं और उन्होंने अच्छा क्या लिखा है। जबकि डा॰ शर्मा उनसे बंगाली कवि और कविता की बातें किया करते थे। धीरे–धीरे डा॰ शर्मा ने बांग्ला लिखना–पढ़ना सीख लिया। उन दिनों हिन्दी साहित्य के ऊपर बंगाली लिट्रेचर का बड़ा प्रभाव था, रवीन्द्रनाथ टैगोर की वजह से। साहित्यिक लोगों से इनका परिचय बढ़ता ही गया और इसी क्रम में वे अमृतलाल नागर, नरोत्तम नागर और केदारनाथ अग्रवाल के करीब आते गए। ये सब मिलकर लखनऊ में एक साहित्यिक पत्रिका भी निकालने लगे।

विजय बचपन के एक दृश्य को दोहराते हैं – ‘तब मैं बहुत छोटा था। लेकिन वे दृश्य आज भी याद हैं। लखनऊ वाले मकान के आंगन में पानी का एक छोटा हौदी बना हुआ था और छोटी–छोटी बाल्टियां उनके पास रखी होती थीं। पास ही लाल कुआं चौराहे के निकट एक अखाड़ा था।‘निराला’ को भी शौक था कुश्ती–पहलवानी का। ये सब लोग वहां अपना जोर आजमाने जाते और आकर उसी हौदी से बाल्टियां भर–भर कर स्नान करते थे।’ इन सबों को फिजिकल कल्चर का शौक था। दूध गर्म करना, बादाम घिसना वे सब करते थे। इसके अलावा वे सब दोपहर में जबरदस्त साहित्यिक गोष्ठियां किया करते थे। इन लोगों को म्यूजिक का भी शौक था।‘निराला’ स्वयं बढ़िया गाते थे और उनका लड़का म्यूजिक टीचर था। डा॰ शर्मा सभी भाई मिलकर लखनऊ के म्यूजिक के मॉरिश कॉलेज में म्यूजिक सीखने जाया करते थे। डा॰ शर्मा वायलिन, उनसे छोटे भाई सितार और उनसे भी छोटे भाई तबला सीखते थे। कुल मिलाकर बेसिक फिलॉसफी healthy mind in a healthy body की थी।

डा॰शर्मा लखनऊ में टेम्पररी लेक्चरर के पद पर रहे। उसके बाद वे सन् 1943 से राजपूत कॉलेज आगरा में लेक्चरर हो गए और वहां 1976 तक यानी अपने रिटायरमेंट तक बने रहे। बाद में वे वहां के वाइस प्रिंसिपल भी बनाए गए। इन सब के साथ उनका लेखन कार्य अनवरत चलता रहा।साहित्य से जुड़े रहने के लिए इन्होंने कितने ही पदों को छोड़ा।

केवल परिवार के सदस्यों के लिए निकाली जाने वाली पत्रिका

हमेशा अपने काम में जुटे रहने वाले डा॰ शर्मा को जैसे ही पता चला कि उनकी पत्नी बीमार हैं तब उन्होंने अपना काम पूरी तरह से छोड़ ही दिया था। 1981 में विजय शर्मा अपने माँ–पिताजी को दिल्ली ले आये। तब से डा॰ शर्मा 2000 तक इन्हीं के पास रहे। उनकी यहां दिचर्या कुछ इस तरह होती थी। वे छह बजे के पहले या मौसम के हिसाब से उठ जाते और घूमने निकल जाते। अगर किसी दिन वे घूमने नहीं जाते तो इसका मतलब होता था कि या तो उनकी तबीयत ठीक नहीं है या कुछ और गड़बड़ है। घूमकर आते ही रेडियो पर समाचार सुनते थे, फिर उनका काम शुरू हो जाता था। तकरीबन वे लगातार एक बजे तक काम करते थे। बीच में या तो नास्ता का ब्रेक होता था या रेडियो पर कोई उनका बहुत ही पसंदीदा कार्यक्रम का समय होता था तो वे उसे जरूर सुनते थे। ‘विविध भारती’ पर 15 मिनट का क्लासिकल म्यूजिक का एक प्रोग्राम आता था। डा॰ शर्मा उसे जरूर सुनते थे। उनकी बहू संतोष कहती हैं –‘मैं स्कूल में पढ़ाती हूं।खाना वे 2 बजे खाते थे। वे मुझसे कहते थे कि खाते समय अपनी रोटियां मैं खुद बना लूंगा।इस तरह वे दिन में रोटी खुद हाथ से थापते–सेंकते थे। परिवार की छोटी से छोटी दिक्कत को भी वे नजरअंदाज नहीं करते थे। डा॰ शर्मा अपनी बेटियों से कहते थे ‘संतोष काम कर रही है उसका हाथ बटाओ।’ संतोष कहती हैं ‘कितनी छोटी–छोटी बातों का ख्याल रखते थे वे। झाडू लगा लिया, अब पोछा मत लगाना। मुझे सिर ढ़क कर रखने में बहुत परेशानी होती थी। उन्हें यह महसूस हो गया और हमारे ब्रदर इन लाव से कहलवाया कि संतोष से कहो कि वे सिर न ढकें। इतनी छोटी–छोटी चीजों का वे ध्यान रखते थे कि…’ रूलाई निकल जाती है संतोष की। संतोष के निःशब्द रूलाई को रिकार्डर रिकार्ड करता जाता है पर आंसुओं के साथ बह रहे कितने ही खामोश शब्द व भावनाएं उसकी पकड़ में नहीं आते। ‘… ‘सचेतक’ में मैंने लिखा है… आप वहीं से ले लीजिए।’

डा॰शर्मा ने लिखा है – ‘पहले व्यक्ति को ईमानदार होना चाहिए, दूसरी बात ये कि बातचीत का रास्ता खुला होना चाहिए। तब ऐसी कोई मुश्किल नहीं है जिसका हल नहीं निकाला जा सके। जो परिवार के लिए सही है, मैं समझता हूँ वही समाज के लिए सही है और वही देश के लिए भी सही है।’

जब डा॰ शर्मा स्कूल में थे तब उन्हें बड़ा शौक था हस्तलिखित पत्रिका निकालने का। डा॰ शर्मा के भाई पिछले 25 सालों से ‘सचेतक’ पत्रिका निकाल रहे हैं। पूरी पारिवारिक पत्रिका है यह। इसमें परिवार के सदस्यों की जो मर्जी आए लिख सकता है। धीरे–धीरे इससे अमृतलाल नागर और भी कई लोग जुड़ते गए। ‘घर की बात’ की भूमिका में डा॰ शर्मा ने लिखा है– ‘कम्यूनिकेशन का रास्ता खुला होना चाहिए। और ये किताब लोगों को इसलिए पढ़ना चाहिए क्योंकि इसमें हर घर की कहानी है।’

विजय कहते हैं – ‘घर में उन्होंने डेमोक्रेटिक माहौल बना रखा था। हमलोगों को पैर छूने नहीं देते थे।माताजी के पैर छूता था क्योंकि वे इसे पसंद करती थीं।पिताजी हमेशा हाथ मिलाते थे।’ घर के बच्चों के प्रति भी उनका व्यवहार बड़ा दोस्ताना होता था। वे कहते थे– ‘हम चाहते हैं बच्चा हमें अपने विश्वास में लेकर अपनी पूरी बात कह सके।’

वे कहा करते थे कि साहित्य को अपनी जीविका का साधन नहीं बनाना चाहिए। हिन्दी में अगर कोई सिर्फ साहित्य की बदौलत जीना चाहे तो ये बहुत मुश्किल है।‘निराला’ का आखिरी दिनों में क्या हाल हुआ था। अमृतलाल नागर भी अक्सर शिकायतें किया करते थे। ये बातें उनके मन में गहरे बैठ गई थी। आगरा में अखबार वालों ने डा॰ शर्मा का साक्षात्कार लिया था तब इन्होंने कहा – ‘निराला जी’ भूखों मरे और उनकी जीवनी लिखने वालों को पांच हजार का पुरस्कार मिला। यही उस साक्षात्कार का शीर्षक बना। उनका कहना था कि जो सिर्फ हिंदी लेखन को अपने जीवन का आधार बनाएगा उसे बहुत जगह समझौता करना पड़ेगा जिंदगी में और ऐसे समझौते उन्हें बर्दास्त नहीं हो सकते थे। इस तरह लेखक के स्वाभिमान के लिए वे किसी भी तरह का समझौता करने के लिए तैयार नहीं थे।

रामविलास शर्मा जब कोई पुरस्कार ग्रहण करते थे तो उनकी कुछ शर्तें होती थीं। जैसे वे किसी पब्लिक फंकशन में नहीं जाएंगे और किसी नेता से पुरस्कार नहीं लेंगे। वे कहते थे ‘अगर आप मुझे सम्मानित करना चाहते हैं तो मेरे घर आइए।’ और हिन्दी अकादमी के शलाका पुरस्कार देने हेतु उनकी एक्जक्यूटिव कमेटी उनके घर गई। बिरला फांउडेशन के बिरला जी उनके घर गए और उन्हें सम्मानित किया। सम्मानित होने के बाद ऐसा नहीं हुआ कि उन्होंने उनके बारे में कहना छोड़ दिया। पुरस्कार मिलने के अगले ही दिन उन्होंने कहा कि ‘निर्धन जनता का अपमान है यह पुरस्कार।’ पुरस्कार की राशि लेने से वे मना कर देते थे और सम्मान स्वीकार कर लेते थे। इस स्वभाव की वजह से कई बार लोग उन्हें अक्खड़ स्वभाव वाला व्यक्ति समझते थे। घूस लेने–देने के तो जैसे दुश्मन ही थे वे। एक दफे कोई साहब आए थे तो उन्होंने उसे गर्दन से पकड़ कर बाहर निकाल दिया था। गुस्सा तो उन्हें बहुत कम ही आता था पर आता था तो जबरदस्त होता था।

जब विजय इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ रहे थे तब उन्हें पता था की घर में थोड़ी तंगी चल रही है, क्योंकि उनके बाकी भाई–बहन भी पढ़ाई कर रहे थे। उनके कॉलेज में ऐसे लोग जिनके पिता की तनख्वाह 500 रूपये से कम हो उन्हें स्कालरशिप देने का प्रावधान था। तब डा॰ शर्मा की तनख्वाह 550 रूपये थी। विजय उन्हें चिट्ठी में लिखते हैं ‘आप अगर ये लिख के भेज दें कि आपकी तनख्वाह 500 रूपये है तो मुझे यह स्कालरशिप मिल जाएगी। तब उन्हें शर्मा का जवाब कुछ इस तरह मिला था – ‘तुम पैसे की चिंता मत करो।तनख्वाह जरूर मेरी 500 रूपये है लेकिन मैं फलाने जगह से इतना, वहां से उतना, कुल 900 रूपये कमा लेता हूँ। जितने पैसे की जरूरत हो लिख दिया करो।’

कुछ लोग डा॰ शर्मा के भावुक व्यवहार को समझ कर उनसे गलत फायदा भी उठाते थे। एक सज्जन उन्हें बहुत मार्मिक चिट्ठियां लिखा करते थे। रामविलास उन्हें पैसे भेज देते थे। फिर कुछ समय बाद उसकी नौकरी लगवाई, उसे उन्होंने छोड़ दिया। जो काम डा॰ शर्मा ने कभी अपने बच्चों के लिए नहीं किया था वे उस व्यक्ति के लिए करते रहे।जब तीसरी बार की लगवाई गई नौकरी भी उस व्यक्ति ने इन्हें बिना बताए छोड़ दी, तब डा॰शर्मा बहुत क्षुब्ध हुए थे और चिट्ठी में लिखा ‘आइंदा मुझे नौकरी के लिए चिट्ठी मत लिखना।’

रामविलास शर्मा अपने भाई को चिट्ठियों में लिखा करते थे कि ‘मैं कभी इंग्लैंड जाकर पी॰एच॰डी॰ करता।’ इस बात की जानकारी उनके लड़के विजय को थी। विजय अकसर काम के सिलसिले में विदेश जाया करते थे।तब डा॰शर्मा उन्हें किताबों की लंबी लिस्ट पकड़ा देते थे। विजय जब लंदन गए तो डा॰ शर्मा की ख्वाहिशों का ख्याल रखते हुए ब्रिटिश म्यूजियम, आर्ट गैलरी वगैरह घूमकर फोटोग्राफ के साथ उन दृश्यों, भावनाओं सहित लम्बी–लम्बी चिट्ठियां लिखा करते थे, जिसके जवाब में डा॰ शर्मा तुरंत विजय को अन्तरदेशीय पत्र लिखते थे। वे लिखते थे– ‘तुमने ये देखा तो ये भी देखा होगा।’ ऐसा लगता था जैसे उन्होंने हर चीज अपनी नजरों से खुद देखा हुआ हो। विजय कहते हैं – ‘तब मुझे लगता था भारत में बैठ कर भी पिताजी इंग्लैंड को बेहतर जानते और समझते हैं। शायद विजुवलाइज करने की वजह से।’ और देखने की क्षमता तो उनमें थी ही तभी तो उनकी गिनती महानतम आलोचकों में होती है। आलोचना शब्द की उत्पत्ति ही लुच् धातु से हुई है जिसका अर्थ है देखना। उनके घर में कई बार पारिवारिक गोष्ठियां भी हुआ करती थीं। अपनी अंतिम परिवारिक गोष्ठी की वीडियो रिकार्डिंग भी करवायी थी डा॰ शर्मा ने। उस दिन वे लगातार पुरानी यादों को दोहराते रहे और इतना हंसे थे कि गला बंद होने को आ गया था।

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About Amrut Ranjan

कूपरटीनो हाई स्कूल, कैलिफ़ोर्निया में पढ़ रहे अमृत कविता और लघु निबंध लिखते हैं। इनकी ज़्यादातर रचनाएँ जानकीपुल पर छपी हैं।

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