राग और विराग से बनी प्रभाष परम्परा

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प्रभाष जोशी की 75 वीं जयंती पर यशस्वी पत्रकार प्रियदर्शन का यह आलेख उस परंपरा की बात करता है जिसने हिंदी पत्रकारिता में बहुत से ‘एकलव्यों’ को प्रेरित किया. उन्होंने जनसत्ता नामक एक अखबार की शुरुआत की जो अपने आप में एक परंपरा बन गई, सच्चाई और विवेक की परंपरा- जानकी पुल.
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प्रभाष जोशी के निधन के कुछ दिन बाद जब वसुंधरा के मेवाड़ इंस्टीट्यूट में उनकी श्रद्धांजलि सभा हो रही थी, तब हमारे साथी पत्रकार अरुण त्रिपाठी ने एक बड़ी महत्त्वपूर्ण बात कही थी। उन्होंने कहा था कि प्रभाष जोशी ने जितने भीम और अर्जुन तैयार किए, उससे कहीं ज़्यादा एकलव्य तैयार किए। अर्थ स्पष्ट था कि प्रभाष जोशी के साथ सीधे काम करते हुए जितने लोगों ने सीखा है, उससे कहीं ज़्यादा प्रभाष जोशी को दूर से देखने वाले लोगों ने सीखा है। लेकिन प्रभाष जोशी और उनसे सीखने वालों के संदर्भ में एकलव्य का यह रूपक सिर्फ यहीं ठहर नहीं जाता कि लोगों ने उनकी पत्रकारिता देखकर, उनकी मूर्ति बनाकर उनसे पेशेवर पत्रकारिता के तेवर सीखे, वह इससे आगे जाकर याद दिलाता है कि अपने आख़िरी वर्षों में प्रभाष जोशी बड़ी निष्ठा से उन समुदायों के बीच भी रचनात्मक हस्तक्षेप और संवाद में लीन थे जहां से एकलव्य आते हैं। झारखंड के आदिवासी नौजवानों के बीच वे कई बार आते-जाते रहे, दिल्ली में भी उनसे जुड़े आयोजन कराते रहे। ऐसे ही एक आयोजन में उन्होंने मुझे बोलने को कहा था और मेरे बोलने के बाद, जैसे पीठ थपथपाते हुए, कहा था, यह जनसत्ता की परंपरा है।

क्या थी वह जनसत्ता की परंपरा जिसे अब हममें से बहुत सारे लोग प्रभाष परंपरा के रूप में पहचानना चाहते हैं? क्योंकि ऐसे एकाधिक अवसर आए, जब प्रभाष जी ने मेरे साथ बातचीत में इस परंपरा का ज़िक्र किया था। इस सवाल पर बात करने से पहले यह साफ कर दूं कि मैं उन लोगों में हूं जो खुद को प्रभाष जोशी के एकलव्यों की कतार में पाता हूं। मैंने उनके संपादक रहते कभी उनके साथ काम नहीं किया। बल्कि मैं शायद पहला पत्रकार था जो प्रभाष जी के जनसत्ता के संपादक का पद छोड़ने के बाद नियुक्त किया गया था। हालांकि तब भी वे संपादकीय सलाहकार थे, लेकिन वे अखबार के कामकाज में नियमित दखल नहीं देते थे।

हालांकि बाद के वर्षों में जनसत्ता के दफ़्तर से लेकर जनसत्ता सोसाइटी के घर तक मेरा उनसे जो रिश्ता बना, उसने इस एकलव्य को अपनी ही बनाई मूर्ति को कुछ करीब से जीते-जी देखने दिया। जाहिर है, मूर्ति अलग थी, व्यक्ति अलग था। मूर्ति संपूर्ण थी, नितांत अपनी कल्पना और इच्छा से बनी थी, लेकिन निष्प्राण थी। व्यक्ति में मूर्ति वाली संपूर्णता नहीं थी, लेकिन स्पंदन और जीवन था जिसे ठीक से महसूस किया जा सकता था।

तो दरअसल अखबार जनसत्ता और पत्रकार प्रभाष जोशी के बीच ही कहीं वह परंपरा सांस लेती है जिसे हम प्रभाष परंपरा कहते हैं। अपने तईं इस परंपरा में मैं सबसे ज़्यादा दो चीज़ें पाता था- स्वाभिमान और साहस। इत्तिफाक से एकलव्य के रूप में भी जब रांची में बैठकर मैं जनसत्ता बांचता था तब भी वहां सबसे आकर्षक यही दो चीज़ें थीं- पूरे अखबार होने का दर्प और कुछ भी छाप सकने का साहस। 1984 में इंदिरा गांधी की मृत्यु के बाद प्रभाष जोशी ने जनसत्ता के पहले पन्ने पर जो संपादकीय लिखा था, उसका शीर्षक भी इसी भाव से मिलता था- यही गर्व और हौसला हमें मिले।यानी प्रभाष जोशी के भीतर साहस और स्वाभिमान वे गुण थे जिसे वे दूसरों में सबसे ज़्यादा सराहते रहे, दूसरों से अर्जित करने की कामना भी करते रहे।

यहां यह भी बता दूं कि उन दिनों प्रभाष जोशी का जनसत्ता नहीं, राजेंद्र माथुर का नवभारत टाइम्स मेरा प्रिय अखबार हुआ करता था। यही नहीं, राजेंद्र माथुर की भाषा मेरे ऊपर कुछ ऐसा जादू करती थी कि उसमें बंधकर रह जाता था। बरसों बाद राजेंद्र माथुर के साथ काम करने वाले पत्रकार अरुण रंजन ने एक गपशप में मुझसे अपने अनुभव साझा करते हुए कहा था कि वे लोग राजेंद्र माथुर के कमरे में जाते थे तो धरती पर चल कर जाते थे, लौटते थे तो लगता था कि बादल पर बैठकर लौट रहे हों। मुझे अचानक खयाल आया कि राजेंद्र माथुर का लिखा पढ़ने का भी प्रभाव कुछ ऐसा ही हुआ करता था- वे जैसे जटिल से जटिल विषयों को काफी सरल और चमकदार रूपकों में बांधकर अपने पाठकों को बौद्धिकता के सात आसमान घुमा लाते थे।

लेकिन प्रभाष जोशी का अंदाज़ फिर भी दूसरा था। उनकी मूल ज़मीन उनकी संवेदना से बनती थी। निस्संदेह उनमें बौद्धिकता ज़रा भी कम नहीं थी, ठीक उसी तरह जैसे राजेंद्र माथुर में अपनी तरह की संवेदनशीलता भी भरपूर थी, लेकिन अगर राजेंद्र माथुर की भाषा और वैचारिकता के तंतु मूलतः रूपकाश्रित थे तो प्रभाष जोशी का लेखन मूलतः संवेदनाश्रित था। प्रभाष जोशी डूब कर लिखते थे- यह लिखना कम जीना ज़्यादा था। उनकी पत्रकारिता जैसे सबकुछ में सहभागी हो उठती थी। राजनीति हो, खेल हो, धर्म हो, जीवन-शैली हो, जब भी वे कलम उठाते तो विषय के ही नहीं, उसके किरदारों के भी बेहद क़रीब हो जाते थे। जैसे वह आग और पानी के बिल्कुल क़रीब चले आते थे, उसमें अपनी कलम तपाते और डुबोते थे और फिर लिखते थे। यह कलम अगर लकड़ी की होती तो जल या गल जाती, वह सोने की थी इसलिए दमकती रही, निखरती रही।

दरअसल प्रभाष जोशी अपने लिए, अपनी पत्रकारिता के लिए सच का संधान इसी तरह करते थे। यह सच है कि उन्होंने जितने कागद कारे किए थे, उससे पहले बहुत सारे कागद बांचे भी थे, उनका अपना अध्ययन बहुत विपुल और विविध था, लेकिन अंततः जिस कबीर को सुनना उन्हें प्रिय था, शायद उसी की तर्ज पर वे कागद की लेखी छोड़कर आंखन देखी कहने पर यकीन रखते थे। उनका सच उनके अनुभव संसार से बनता था। उनकी पत्रकारिता के अलग-अलग दौर को देखने पर यह बात कुछ स्पष्ट भी होती है। बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद उन्होंने जैसे निजी स्तर पर बीजेपी और संघ परिवार के वैचारिक ध्वंस की ठान ली थी। जब तक मस्जिद गिरी नहीं थी, शायद उन्हें लगता था कि बीजेपी का उग्रवाद एक हद के आगे नहीं जाएगा, कि हिंदू समाज की बहुलतावादी परंपरा संघ परिवार के क़दम अंततः रोक लेगी। इसीलिए उसके पहले बीजेपी को लेकर उनके लेखन में एक तरह की नरमी भी दिखती है। लेकिन बाबरी मस्जिद ध्वंस जैसे उनकी तीसरी आंख खोल देता है। उन्हें समझने में देर नहीं लगती कि हिंदू समाज की नुमाइंदगी की दावेदारी करने वाली भारतीय जनता पार्टी और उसके पीछे खड़ा संघ परिवार मूलतः वह लुंपेन तत्व है, जो सिर्फ बाबरी मस्जिद तोडकर रुक नहीं जाएगा, वह हिंदू धर्म और परंपरा के उस बहुलतावाद को भी तहस-नहस कर देगा, जो उनका अपना आध्यात्मिक संबल रहा है। इसके बाद भारतीय जनता पार्टी की पिटाई का कोई अवसर जैसे वे जाने नहीं देते। उन्होंने लेख लिखे, टीवी पर बहस की, बीजेपी के हिंदुत्व को लगातार प्रश्नांकित किया, उसके वैचारिक फ़र्जीवाडे को तार-तार किया- और यह सब करते हुए किसी सेक्युलर मुहावरे का सहारा लेने की जगह उन्होंने अपनी बहुलतावादी परंपरा का सहारा लिया। जबकि ये वे दिन थे जब भारतीय जनता पार्टी अटल बिहारी वाजपेयी के मुखौटे के सहारे कई राज्यों और केंद्र तक में सरकार चला रही थी और लेखक, कलाकार और पत्रकार अपनी निष्ठाएं बदलने में लगे थे। जाहिर है, यह अपने अनुभूत सच से उपजा साहस ही था जिसने प्रभाष जी को यह लंबी लड़ाई लड़ने के लिए तैयार किया।

अपने निजी अनुभवों के आधार पर मैं कुछ इस साहस और स्वाभिमान की व्याख्या करने की कोशिश कर सकता हूं। जनसत्ता में मेरी नियुक्ति के करीब साल भर तक प्रभाष जोशी का मुझसे किसी तरह का संवाद नहीं रहा- बस एक अवसर को छोड़कर, जब अपने एक लेख में विलंब को लेकर उन्होंने बहुत तीखे ढंग से मेरी ख़बर ली थी। मैं भी उनसे बच-बच कर ही चलता था। लेकिन यह शायद नवंबर 1997 की बात रही होगी जब मैंने नीरद सी चौधरी पर जनसत्ता में ही एक टिप्पणी लिखी- तब उन्होंने सौ साल पूरे किए थे। अगले दिन दोपहर को मैं बैठा हुआ था कि उन्होंने मुझे बुलवाया। मैं कुछ उलझा हुआ सा उनके पास पहुंचा तो उन्होंने लगभग गले लगा लिया- पंडित , बहुत अच्छा लिखा है, यह जनसत्ता की परंपरा है।
जैसा मैंने शुरू में लिखा है- इस परंपरा शब्द का उल्लेख उन्होंने कई बार किया था। तो क्या थी यह परंपरा जिससे प्रभाष जी ने उस शाम मुझे जोड़ लिया था?  उस शाम उनसे बातचीत करते हुए मेरी समझ में आया कि इसके पहले भी मेरा लिखा वे देखते रहे हैं। जाहिर है, अध्ययन और आलोचनात्मक विवेक को वे इस परंपरा का हिस्सा मानते थे- उस साहस को भी जो इस विवेक से निकलता है। कुछ संकोच के साथ लिखने की इच्छा होती है कि तब शायद मैं उन्हें इस विवेक से लैस लगा होऊंगा।

जनसत्ता के पृष्ठों पर यह साहस और स्वाभिमान जैसे छलकता रहता था। उस दौर के जनसत्ता के सहयोगियों ने प्रभाष जोशी से और कोई गुण लिया हो या नहीं, वह ऐंठ और तेवर ज़रूर लिया जो आने वाले कई दिनों तक जनसत्ता की शान बना रहा। लोगों को हर सुबह जैसे जनसत्ता से एक उम्मीद रहा करती थी- यह देखने की कि सबकी ख़बर देने और लेने का दावा करने वाला यह अखबार आज किसकी ख़बर ले-दे रहा है। जिसकी जैसे कहीं और सुनवाई नहीं होती थी, वह जनसत्ता में आकर ख़बर छपवा जाता था। पहली बार सत्ता के गलियारों में किसी हिंदी अख़बार की धमक इस कदर महसूस की गई।
हालांकि इन्हीं पन्नों पर कई बार यह साहस दुस्साहस में भी बदलता दिखा और स्वाभिमान की जगह ऐसा अहंकार चला आया कि वह सीमाएं और मर्यादाएं लांघता दिखा। प्रभाष जोशी खुद जिस आज़ादी को सर्वोपरि मानते थे, उसे बहुत दूर तक उन्होंने अपने लोगों को दिया। उन्हें कतई पसंद नहीं था कि पत्रकार किसी का गुलाम लगे- नेताओं का पिछलग्गू तो कतई नहीं। इसलिए जब कभी उनके बहुत आत्मीय जनों ने भी उनकी दी हुई आज़ादी का लाभ उठाते हुए लक्ष्मणरेखा पार की तो एक हद के बाद उन्होंने बहुत निष्ठुर और निर्मम होकर कार्रवाई की। जनसत्ता की वे अंदरूनी कहानियां मुझसे बेहतर दूसरे लोग कह सकते हैं, लेकिन उनका लिखा पढ़ते हुए और उनसे बात करते हुए कई बार यह दिखता रहा कि अपने फ़ैसलों पर दुखी होने के बावजूद वे अमल करते थे।

अब इतने दिन बाद उनको याद करते हुए मैं पाता हूं कि उनका पूरा मानस दरअसल ज़िंदगी के ठाठ से बना था। वे उन तमाम लोगों के प्रवक्ता हो उठने में देर नहीं लगाते थे जिनके मुद्दे में, जिनकी लड़ाई में किसी किस्म की सच्चाई पाते थे। दूसरी बात कि यह ठाठ अंततः एक देशज फ़कीरी का ठाठ था- इस समझ का कि इसे यहीं रह जाना है- सब ठाठ धरा रह जाएगा जब लाद चलेगा बंजारा। इस ठाठ में परंपरा- या कहें- परंपराओं का जल था जिसने इसकी जड़ों को कभी सूखने नहीं दिया। कई लोगों को शिकायत रही कि वे बहुत सारे मोर्चे खोलते रहे, उसे किसी मुकाम तक पहुंचाते नहीं रहे। मुझे लगता है कि यह उनका स्वभाव था- पानी वाला स्वभाव, जो खेतों में रुकता नहीं है, उसे सींच कर आगे बढ़ जाता है। यह ऐसा जल था जिसका गीलापन हमारी आत्मा तक उतर आता था, लेकिन जिसके स्वभाव में ठहरना नहीं था।

तो प्रभाष परंपरा इन सारी चीज़ों को मिला कर बनती है- उसमें राग भी है विराग भी, साहस भी और स्वाभिमान भी, जुड़ाव भी और वीतराग भी, ठाठ भी और फ़कीरी भी, विवेक भी और संवेदना भी। हममें से हर किसी को इस परंपरा से अपनी-अपनी ज़रूरत का सामान मिल जाता है। 

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