मैं भारत में नहीं रहता हूं मैं अपने घर में रहता हूं

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महीनों से चल रहे चुनावी चक्र से बोर हो गए हों,  राजनीतिक महाभारत से ध्यान हटाना चाहते हों तो कुछ अच्छी कविताएं पढ़ लीजिए. हरेप्रकाश उपाध्याय की हैं- जानकी पुल.
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1.
जिन चीजों का मतलब नहीं होगा
………………
मैं भारत में नहीं रहता हूं
मैं अपने घर में रहता हूं
मेरे घर का कोई नाम नहीं है
मेरे घर की बगल में कई घर हैं
सबके अपने-अपने घर हैं
सबके घर में अपना-अपना प्यार
बहुत हुआ तो मिल-जुल आए किसी तीज-त्योहार
मैं अपने घर में रहता हूं और कई बार
मुझे लगता है मैं बेघर रहता हूं
घर की छप्पर पर रूक नहीं पाती बारिश धूप सर्दी
मैं मौसम की मार हरमेश अपने सिर पर सहता हूं
मंदिर बहुत हैं
घर बहुत कम हैं
घर में भी मंदिर है
मंदिर में मूर्तियां रहती हैं
मैं मूर्तियों सा नहीं रहना चाहता हूं
मैं किसी बात पर अड़ता हूं
किसी बात से डरता हूं
किसी से घृणा किसी से मुहब्बत करता हूं
मैं फैसले करता हूं
मैं मौके आने पर घर बदलता हूं
आपसे मैं कह सकता हूं
रहने दीजिए अपने चढ़ावे पान फूल इत्र सुगंध
मैं घर से निकलकर कुछ देर में घर लौटता हूं
घरों के बीच
मैं बहुत सारे घरों के बारे में सोचता हूं
घरों के बारे में सोचते हुए मैं
दरअसल घरों में रहनेवाले लोगों के बारे में सोचता हूं
मुझे उन लोगों के बारे में भी सोचना होगा जिनके घर नहीं हैं
जिनके घर नहीं हैं
दरअसल वे बेघर नहीं हैं
उनके भी घर हैं
उनके घर में भी उनके अपने-अपने डर हैं
उनका पता अभी दर्ज होना है मतदाता सूची में
उनके पास खोने को कुछ नहीं
पर उन्हें भी दाता होना है
उन्हें ही दरअसल भारत का भाग्यविधाता होना है
घर गिने जाएंगे
जब चुनाव आएंगे
दरअसल जब घिरे गिने जाएंगे तो लोग गिने जाएंगे
उनमें रहनेवाली परेशानियों को नहीं गिना जाएगा
परेशानियां अपने नहीं गिने जाने पर घर में कलह मचाएंगी
बरतन बजेंगे
जोर-जोर से लोगों के बोलने की आवाजें आएंगी
उन आवाजों का कोई मतलब नहीं निकाला जाएगा इस जनतंत्र में…
जिन चीजों का कोई मतलब नहीं निकाला जाएगा
वे चीजें भी रहती आई हैं घर में साधिकार
और रहती रहेंगी लगातार
घर से निकलेंगे लोग
और मैदान में खड़े होंगे तो गाएंगे
राष्ट्रगान
भारत माता की जय बोलेंगे
हाथ लहरा के मुट्ठी बांध के बोलेंगे
भारत माता की जय
हिन्दू होंगे जो
मुसलमानों को देखकर मुस्काएंगे
मुसलमान होंगे जो नजरें फेर गुस्साएंगे
भारत माता को कोई मतलब नहीं कौन क्या चिल्लाया
नेता क्या बोला
अफसर क्या बोला
मास्टर क्या बोला
भारत माता को कोई मतलब नहीं कौन क्या चिल्लाया
भारत माता को अपने घर नहीं लाएंगे लोग
भारत माता को अस्पताल नहीं ले जाएंगे लोग
भारत माता को पार्क में नहीं टहलाएंगे लोग
लोग छुट्टियां मनाएंगे
सिनेमा देखने जाएंगे
सिनेमा में एक नकली हीरो, हीरो हो जाएगा
असली भारत में एक नकली सिनेमा की तर्ज पर कई नकली फिल्में बनेंगी
फिल्मों में गाना होगा नाच होगा लड़ाई होगी
बहुत हुआ तो अंग्रेज होंगे देशभक्त होंगे
भारत माता तो नहीं होगी फिल्मों में
जैसे देशभक्त नहीं होंगे दर्शकों में
क्या, आपको क्या लगता है…?
छुट्टियों के बाद अपने-अपने काम पर चले जाएंगे लोग
काम से लौटकर घर आएंगे
बहुत हुआ तो
अपनी-अपनी माता के पैर दबाएंगे लोग
भारत माता फिर किसकी माता है
छब्बीस जनवरी के दिन राजमिस्त्री धड़ाधड़ घर की ईंटे जोड़ते हुए
मजाक में पूछता है
भारत माता किसकी माता है…
इस सवाल का कोई मतलब नहीं होगा जनतंत्र में
पर जिन चीजों का मतलब नहीं होगा…
वे भी होंगी
2    
बॉस और बीवी
वह जो मेरा बॉस है
आखिर रोज क्या लेकर लौटता होगा अपने घर
अपनी प्रिय बीवी के लिए
क्या वह अपनी बीवी से
उमगकर करता होगा प्रेम
घर लौटकर चूमता होगा बेतहाशा उसका चेहरा
उतार लेता होगा उन वक्तों में
अपने चेहरे से बनावटी वह सख्त नकाब
क्या उसकी दिल की घड़ी बदल लेती होगी
अपनी चाल
क्या वह दफ्तरी समय की
चिक-चिक, झिक-झिक से अलग
किसी मधुर संगीत में बजने लगती होगी
मैं लौटता हूं लिये
अपनी बीवी के लिए
अपने चेहरे पर गुस्सा, चिंता, धूल-पसीना
जिसे देखते ही वह
अपनी जीभ और होठों से
पोंछ देना चाहती है
मैं डपटता हूं उसे
निकालता हूं उसके हर काम में
बेवजह गलतियां
अपने बॉस की तरह बनाकर सख्त चेहरा
उसकी खबर लेता हूं
मेरी प्रिय पत्नी मुझसे डरने लगती है
उसका डरना भांपकर
मुझे खुद से ही डर लगने लगता है
मैं अपना चेहरा छुपाता हूं
इधर-उधर हो जाता हूं
परेशान हो जाता हूं
मैं पागल हो जाता हूं …
3. 
दफ्तर
मेरे घर से दफ्तर की दूरी
अलग-अलग जगह रहने वाले मेरे सहकर्मियों के लगभग बराबर
एक तरफ से मापो तो सोलह घंटे है
दूसरी तरफ से आठ घंटे है
रोज-रोज जंजीर गिराओ तो कुछ समय, जो कि दूरी का भी एक पैमाना है
इधर से उधर सरक जाता है
इस तरफ से मापो तो भागाभागी

20 COMMENTS

  1. हमेशा की तरह…जाने कितना कुछ सोचने को मजबूर करती कवितायेँ…कई बार पढ़ते पढ़ते रोंगटे भी खड़े हो जाते हैं…अन्दर तक हिला जाती हैं ये कविताएँ…|

  2. हरे भाई, आपकी कवितायें मुझे शुरू से ही खूब लुभाती हैं। इस रोज़ मैंने फोन पर भी कहा था तुम्हें।
    तप्त और अँधेरे कमरे की खिड़की खोलने का हुनर अब कितने कवियों के पास बचा है!!!

  3. हरे भाई, आपकी कवितायें मुझे शुरू से ही खूब लुभाती हैं। इस रोज़ मैंने फोन पर भी कहा था तुम्हें।
    तप्त और अँधेरे कमरे की खिड़की खोलने का हुनर अब कितने कवियों के पास बचा है!!!

  4. सभी कविताएं प्रभावित करती हैं… समय की शिला पर उकेरे हुए लेखों सी। बधाई।

  5. SABSE PAHLE AAPKO TALWAAR KEE DHAAR SEE CHAMAKTEE AUR KHOOBSORAT RACHNAAON KE LIYE BAHUT BAHUT BADHAAEE – HARE PRAKASH JEE – AUR MERE CHAT BOX ME AANE KE LIYE ABHIWAADAN – SHUBH KAAMNAAON SAHIT

  6. बहुत सुन्दर ..बेहतरीन कविताएं ..बहुत बहुत बधाई | सादर

  7. राजनीतिक महाभारत से ध्यान हटाने, और न लगाने के लिए ऐसे ही धुआंधार कवितायेँ चाहिए.

  8. मंदिर बहुत हैं घर बहुत कम हैं घर में भी मंदिर है मंदिर में मूर्तियां रहती हैं मैं मूर्तियों सा नहीं रहना चाहता हूं… बेहतरीन पंक्तियाँ… मंदिरों और मुर्तियों की जड़ता तभी टुटेगी जब मानसिक जड़ता टुटेगी .

  9. हैक कर लिया है कुछ लोगों ने भारत माता को…और इसीलिए हमारा कवि पूछने को मजबूर है…भारत माता किसकी माता है….हरे भाई की कविताएँ गंभीर चिंतन-मनन की उपज है और चुनाव की कडुवाहट दूर करती हैं…

  10. बहुत बेहतरीन पंक्तियाँ .." भारत माता किसकी माता है…
    इस सवाल का कोई मतलब नहीं होगा जनतंत्र में
    पर जिन चीजों का मतलब नहीं होगा…
    वे भी होंगी" दूसरी और तीसरी कविता मे एक नौकरीपेशा व्यक्ति का संसार, उसके डर ,तनाव और अंतर्विरोध बहुत बखूबी चित्रित हैं ..भूलनेवाले कविता के जो चरित्र हैं , वो बहुत जाने पहचाने लोग हैं जिनसे हम रोज़ टकराते हैं , जिनसे हमारा रोज़ साबका पड़ता है.. कुल मिलाकर अपने समय की कविताएं ॥ आनंद आ गया ..

  11. हमें उनके बारे में भी सोचना है जिनके घर नहीं है…घर की सामान्य चर्चा के बीच इस तरह के कई पंच वाक्यांश….जैसे किसी ने सामने एक बड़ा सा आइना धर दिया हो….वाह हरे प्रकाश जी,जवाब नहीं आपकी खतरनाक सादगी भरे लहज़े का।

  12. सुन्दर, मानीख़ेज़ और देर तक दहलाये और जगाये रखने वाली कविता-पंक्ति :

    घर गिने जाएंगे
    जब चुनाव आएंगे

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