ओमा शर्मा की ‘अदब से मुठभेड़’

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आज लेखक ओमा शर्मा की पुस्तक ‘अदब से मुठभेड़’ का लोकार्पण है. हिंद पॉकेट बुक्स से प्रकाशित इस पुस्तक में  राजेन्द्र यादव, मन्नू भंडारी, प्रियंवद और शिवमूर्ति और मशहूर पेंटर मकबूल फ़िदा हुसैन से समय समय पर लिए गये लम्बे साक्षात्कारों को संकलित किया गया है. ओमा शर्मा लो प्रोफाइल रहकर काम करते हैं, जबकि किताबें उनकी हाई प्रोफाइल होती हैं. प्रस्तुत है पुस्तक की भूमिका- माडरेटर 
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      पसंदीदा लेखकों-कलाकारों की रचनाओं के साथ-साथ उनके सृजन की प्रक्रिया और उसे संचालित-प्रभावित करने वाले जीवन में मेरी दिलचस्पी रही है। गालिब, प्रेमचन्द, गांधी, सार्त्र, लिंकन, चेखव, गेटे, स्वाइग और बाल्ज़ाक जैसे महानों के आत्मकथात्मक/जीवनीपरक अध्ययन इसीलिए बार-बार पढ़े जाने को लालायित करते रहे हैं। धर हिन्दी में ‘आवारा मसीहा’, ‘कलम का सिपाही’ या ‘निराला की साहित्य साधना के अलावा, हमारे लेखकों के जीवनीपरक अध्ययनों का नितान्त अभाव ही है। संस्थागत संरक्षण के तत जो कुछ प्रयास किए गए हैं, उनमें न तो गहन आलोचनात्मक आजमाइश दिखती है और न उस सर्जक के कृतित्व और व्यक्तित्व को आवश्यक तौर पर जोड़ने-मरोड़ने वाले जीवन को उसकी निजी, सामाजिक एवं समकालीन स्थितियों के बरक्स समझने, परखने और प्रश्नांकित करने की कोशिश। मोनोग्राफ्स रूपी ये कवायदें साहित्य और कला के विद्यार्थी को न तो उस कलाकार के रचना-जगत में जाने को उकसाती हैं और न उन कृतियों से जुड़े उसके अन्तर-जगत में झांकने को प्रेरित करती हैं

      लेखकों-कलाकारों के साक्षात्कारों के जरिए, जैसा पश्चिम के ‘पेरिस रिव्यू’ की सुदीर्घ परम्परा से जाहिर है, इस कमी की प्रकारान्तर से भरपाई सम्भव की जा सकती है। बल्कि, आलोचना से कहीं परे जाकर उसमें रचना के भीतरी अर्थों, परतों और मंतव्यों को ही नहीं, उसकी बुनियादी प्रेरणाओं, प्रक्रिया और परिवेश को भी जाना-समझा जा सकता है जिससे उसकी रचनाओं को समझने में सहूलियत रहे।
      हिन्दी साहित्य में दिग्गज लेखकों के साक्षात्कार प्रचुरता में मिलते ज़रूर हैं लेकिन वहां साक्षात्कार-कर्ता और साक्षात्कार-दाता के बीच आदर या स्तुतिभाव इतना ज्यादा हावी रहता है कि रचना से परे लेखकीय मंसाओं की निशानदेही नहीं हो पाती है। शायद वह उसका उद्देश्य भी नहीं होती है। यहाँ संकलित साक्षात्कारों में उस परम्परा की लगभग अवहेलना से ज्यादा, एक विद्यार्थीनुमा सहजता  और स्वच्छंदता से इन उस्तादों की कला, लेखकी, वैचारिकी,रचनाप्रक्रिया और इन सबके आसवन को अन्जाम देते सृजन को उनके तमाम अन्तरविरोधों और आवेगों के साथ छूने की नीयत रही है। सभी लेखकों-कलाकारों के चयन के पीछे इनकी रचनात्मकता और विशिष्ठता के प्रति मेरा सम्मान और लगाव रहा है। यह अलग बात है कि सभी से कमोबेश आत्मीयता भी रही है जिसकी बिना पर उनके अन्छुए या असहज करने वाले कोनों की तरफ उन्हें एकाग्र कर सका। वैसे कहना होगा कि मेरे कुछ-कुछ दुस्साहसी और निजता को कुरेदते प्रश्नों को सभी ने सही परिप्रेक्ष्य में लिया।
      इस क्रम की शुरूआत एक मुराद की तरह शिखर कथाकार राजेन्द्र यादव से हुई। राजेन्द्रजी मेरे प्रिय लेखकों में रहे हैं। बीती सदी के उत्तरार्द्ध में हिन्दी साहित्य में उनकी जीवन्त उपस्थिति रही है। एक लेखक के साथ-साथ, संपादक के तौर पर युवा प्रतिभाओं के प्रोत्साहन तथा स्त्री एवं दलित विमर्श को केन्द्रीयता प्रदान कराने में उन्होंने संस्था की सी विराट भूमिका निभाई। वे अपने दौर के सबसे विवादास्पद लेखकचरित्र तो थे ही, साथ ही बेहद अध्ययनशील, लोकतांत्रिक, जीवन्त और समभाव रखने वाले भी थे। लेकिन उनके यहाँ भी परतें और बारीकियां भी थीं। प्रकशन के समय यहाँ कही उनकी कई बातों, स्थापनाओं और स्वीकारोक्तियों पर लेखक-पाठक समुदाय में महीनों चर्चा चलती रही जिसे देखकर वे अपनी तरह संतुष्ट होते। ‘‘….ये मेरा इन्टरव्यू है ही नहीं, ये तो इन्टैरोगेशन है…’’ वे तंज कसते और अपने खास अंदाज़ में ‘‘…देखो, हमेशा सवाल शाश्वत होते हैं, जवाब नहीं….’’ जैसे फलसफे के साथ बातों को अलग फलक पर तान देते। उनके प्रति मेरी कई जिज्ञासाएं अधूरी ही रह गयी थीं मगर फिर भी इस साक्षात्कार को कई संकलनों और भाषाओं ने अपनाया।
      प्रिय कथाकार मन्नू भंडारी का साक्षात्कार उन पर निकाले जाने वाले विशेषांक के उपलक्ष्य में किया गया। नई कहानी’ आन्दोलन की चर्चित तिकड़ी के बीच उठने-बैठने वाली मन्नूजी ने जिस सहजता, शालीनता और दो टूक ढंग से अपने समय और आस-पास की हलचलों, प्रवृत्तियों, अन्तरधाराओं और पीड़ाओं को अपने लेखन में पठनीयता की कसौटियों पर कसते हुए सृजित किया है,वह उन्हें विशिष्ट कर देता है। यह अकारण नहीं है कि अस्वस्थता के चलते अरसे से कथा लेखन से विमुख रहने के बावजूद वे आज भी व्यापक पाठक समुदाय की पसंद बनी हुई हैं। उनका व्यक्तित्व और लेखन राजेन्द्रजी से सर्वथा भिन्न रहा है। लेखन की तरह उनके आचरण की सादगी उनकी पहचान सरीखी है। साहित्य और कलाओं का अन्ततः उद्देश्य मनुष्य के आचरण और सोच की जिस बेहतरी और परिष्करण के लिए इंगित होता है, वे मानो उसी का सास्वरूप हैं। लालच-प्रलोभन से कोसों दूर, वे एक विशुद्ध लेखक की नियति और यकीन से जीती हैं। राजेन्द्रजी और उनके बीच कुछ स्थितियों और घटनाओं की साझेदारी के कारण दोनों को एक साथ पढ़कर सिक्के के दोनों पहलुओं से वाकिफ हुआ जा सकता है।
      प्रियंवद और शिवमूर्ति सन अस्सी के बाद उभरे ऐसे लेखक हैं जिन्होंने अपनी पीढ़ी में खास पहचान अर्जित की है। दोनों ने कथा साहित्य में पठनीयता की वापसी कराई है और अपनी तरह से अगली कथा पीढ़ियों को प्रभावित किया है। प्रियंवद जहाँ प्रेम, प्रकृति, रोमांस, अतिरेक और बाजार की आंधी से आगाह करने वाले लेखक हैं तो शिवमूर्ति अपने सृजन और ठाट-बाट में पूरी तरह देशज जीवन से जुड़े हुए। शिवमूर्ति को भट्टे, संरपंच, चुनाव, किसानी, जाति समीकरण, अकिंचन और शोषण उलझाए रहते हैं तो प्रियंवद को नदी, चांदनी, कोठे, कचहरियाँ, उमस, अमलतास, बार, संगीत, अकेलापन और इनके बीच पिघलता जीवन लुभाता है। एक के यहाँ महमूद की बेबसी है तो दूसरे के यहाँ अनवर की। प्रियंवद के यहाँ अधेड़ औरत की गूढ़ वेदना और बूढ़े का उत्सववैचित्रय है तो शिवमूर्ति के पास केशर-सुरजी की जिजीविषा और बिसराम-लीडरजी की धारावाहिक कुटिल तिकड़में। शिवमूर्ति यदि प्रेमचन्द-रेणु की परम्परा से सम्बद्ध हैं तो प्रियंवद सम्भवतः कहीं निर्मल वर्मा से। लेकिन अपने-अपने कथा-क्षेत्रों में दोनों ही एकनिष्ठा और दक्षता से तीन दशकों से सक्रीय हैं। दोनों की सोहबत अलहदा मिजाज की होते हुए भी जीवन्त और समृद्ध करती है। यह भी ध्यातव्य हो कि वे हिन्दी की उजाड़ होती उस परम्परा के चुनिन्दा वारिसों में होंगे जो अपनी सीमाओं की स्वीकारोक्ति के साथ-साथ बदलते यथार्थ को नालबद्ध करने के लिए स्वयं को नए सिरे से संपादित किए जाने को तत्पर दिखते हैं।
      इस कड़ी में मकबूल फिदा हुसेन का शामिल होना सुखद संयोग था। अरसे से ही हुसेन का जिक्र उनकी कला-कृतियों से अधिक उन विवादों के कारण होता रहा है जो उनसे पैदा हुए। मुद्दत पहले बनाई उनकी सीता-सरस्वती के चित्रों में राष्ट्रवादी-अतिवादी जब-तब हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए हुसेन पर हल्ला बोलने का मौका ईजाद करते रहे। प्रगतिशील किस्म के उद्यमी लेखकों-कलाकारों और चिन्तकों ने हुसेन की कला और उनकी कलागत स्वतंत्रता को लेकर निरन्तर ही इसका प्रतिवाद किया लेकिन हुसेन की तरफ से उनके सवालों पर शायद ही कोई मंतव्य पेश हुआ हो। इतिहास गवाह है कि धर्मांधों और कठमुल्लों से आप बहस नहीं कर सकते हैं लेकिन फिर भी कृति के सर्जक के मंतव्य की अपनी पवित्रता और वैद्यता होती है और जो तार्किकता की हदें छलांगने की कूवत रखती है। हुसेन ने यकीनन एक लम्बा और पुरजोर जीवन जीया। उनके साथ हुई बातचीत के आरम्भ में ही यदि वे बिदके-भड़के नहीं होते और अपनी कला और उसके आसपास के बिन्दुओं पर साफ़दिली से  अपना मन सांझा करते तो कला-जगत को उनके पक्ष को जानने-समझने का एक नायाब अवसर सुलभ हो जाता। यह मुझे बाद में अहसास हुआ कि बाजार के तन्त्र और उसके मनमाने दोहन के हुसेन इस कदर लाभार्थी हो चुके थे कि कला नकी आराधना कम, अरण्य में पसरी ऐसी आरामगाह ज्यादा बन गई थी जहाँ उन्हें अठखेलियों की निर्द्वन्द्व छूट हासिल थी। उनसे संवाद की सम्भावना केवल उनकी सफलता और उपलब्धियों के दायरे में ही सिमट गयी थी जिस पर वे विनम्रता से इतराकर साक्षात्कार-कर्ता को उपकृत करने के अभ्यस्त हो चुके थे कुछ जिक्र पिकासो का, कुछ चर्चा बोम्बे आर्ट ग्रुप की, नंगे पैर चलने का राज, श्वेताम्बरी, माकूल शैर-ओशायरी का तड़का, हिन्दी फिल्मों से जुड़ाव…. और लो किसी भी पत्रपत्रिका की हिट कवर स्टोरी का मसाला तैयार!
      मैं इसी सब से बचते हुए उन्हें कला जगत के यकीनन कम लुभावने मगर रचनात्मक जनपद पर उन्हें एकाग्र करना चाहता था जो दुर्भाग्य से उनके एकतरफा आक्रामक रूख के कारण सम्भव नहीं हो सका। मैंने सोचा था कि उनकी कला जो मोहक पहचान रखती हैऔर शख्सियत जो दिलस्प और चुनौतिपूर्ण थीको मिलाकर, उनके बीच  आपसी तारतम्य बैठाते हुए कुछ लिखूंगा जिसमें उनके साथ अलग-अलग मसलों पर टेप की गयी उनकी बातें इस्तेमाल की जा सकेंगी। लेकिन कोई पांच बरस निकल गए और वह हो न सका… कि एक सुबह ‘कथादेश’ संपादक हरिनारायणजी ने अचानक उनकी मौत की ब्रेकिंग न्यूज साझा करते हुए इस बात-चीत को उन्हें इसी रूप में भेजने को कहा। मुझे हैरानी हुई जब पाठकों ने इसे भी हाथों-हाथ लिया। शायद इसलिए भी कि अब वे जा चुके थे और जैसा उन्होंने मुझे स्वयं बतलाया था, इतनी देर कभी किसी के साथ नहीं बतियाए थे।

      ये साक्षात्कार दरअसल इन चयनित लेखकों-कलाकारों के साथ अदब से की गयी मुठभेड़ें हैं… उनकी कृतियों और निजता के तत्वों को समेटते हुए उनकी वैचारिकी और लेखकी की जड़ें टटोलते हुए उनकी वैकल्पिक जीवनी प्रस्तुत करने की ख्वाहिश सा कुछ यह कितना हो सका है इसे तो पाठक ही तय करेंगे। शिवमूर्ति के

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