Home / फिल्म समीक्षा / अपनी निरर्थकता में संदिग्ध अस्वीकार

अपनी निरर्थकता में संदिग्ध अस्वीकार

उदय प्रकाश ने जब से साहित्य अकादेमी पुरस्कार लौटाने की घोषणा की है बहस का सिलसिला थमता नजर नहीं आ रहा. इसकी शुरुआत वरिष्ठ कवि-आलोचक विष्णु खरे के एक लेख से हुई थी. कल आपने अरुण महेश्वरी का लेख पढ़ा, आज फिर विष्णु खरे की प्रतिक्रिया- मॉडरेटर 
==========================
श्री उदय प्रकाश ने 2010-11 के अपने साहित्य अकादेमी पुरस्कार को लौटाने के इरादे का  ऐलान करते हुए लिखा है कि ‘’पिछले समय से हमारे देश में लेखकों,कलाकारों,चिंतकों और बौद्धिकों के प्रति जिस तरह का हिंसक,अपमानजनक,अवमाननापूर्ण व्यवहार लगातार हो रहा है जिसकी ताज़ा कड़ी प्रख्यात लेखक और विचारक तथा साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित कन्नड़ साहित्यकार श्री कलबुर्गी की मतान्ध हिन्दुत्ववादी अपराधियों द्वारा की गयी कायराना और दहशतनाक हत्या है,उसने मेरे जैसे अकेले लेखक को भीतर से हिला दिया है…मैं…(अपनी) ‘मोहनदास’ नामक कृति पर प्रदान किए गए…पुरस्कार को…लौटाता हूँ’’.

इस लेखक को इतना याद है कि 1981 में विख्यात आम्बेडकरवादी  तेलुगु लेखक-नाटककार श्री ‘नार्ल’ ने अपने लघु-नाटक ‘’सीता जोस्यं’’ पर दिए गए अकादेमी पुरस्कार को इसलिए लौटाने की घोषणा की थी कि अकादेमी की ही अंग्रेज़ी पत्रिका ‘’इंडियन लिटरेचर’’ में अकादेमी के ही एक मुलाजिम ने उसकी अत्यंत नकारात्मक समीक्षा की थी.इस मामले पर भारी विवाद हुआ था और अकादेमी के तत्कालीन सचिव तथा अध्यक्ष दोनों  ने उसपर गहरा खेद प्रकट किया लेकिन अध्यक्ष ने ‘’नार्ल’’ से अनुरोध किया था कि एक बड़े लेखक की हैसियत से वह महान फ़्रांसीसी दार्शनिक वोल्तैर का कथन स्मरण रखते हुए अपनी आलोचना करने का अधिकार दूसरे को दें.’’नार्ल’’ ने इस तर्क को नहीं माना और अपनी घोषणा पर अडिग रहे किन्तु,दूसरी ओर,अकादेमी ने भी उनके अस्वीकार को अलिखित रूप से अस्वीकार कर दिया और ‘’नार्ल’’ के जीवन-काल में तथा उसके बाद अब तक वह ‘’सीता जोस्यं’’ को अपनी पुरस्कार-सूची में रखे हुए है.यही नहीं,उसके द्वारा प्रकाशित ‘’एन्साइक्लोपीडिया ऑफ़ इंडियन लिटरेचर’’ में उस पर प्रो. मोहन लाल की प्रशंसा-भरी एक समीक्षा भी है.अकादेमी ने 2008 में ‘’सीता जोस्यं’’ का अंग्रेज़ी अनुवाद भी प्रकाशित किया है – शायद दूसरी भाषाओँ में भी करवाया हो.

साहित्य अकादेमी के नियमों में लेखक द्वारा पुरस्कार लौटाने और अकादेमी द्वारा उसे वापिस ले लेने का कोई  प्रावधान नहीं है.वह तभी हो सकता है जबकि अकादेमी की जनरल काउंसिल पुरस्कार के नियमों को उसके लिए संशोधित करे.पुरस्कार-सम्बंधित कोई भी वर्तमान या नए अधिकार या निर्णय अकादेमी के सेक्रेटरी या चेयरमैन को नहीं सौंपे जा सकते.यदि उदय प्रकाश अकादेमी को पुरस्कार राशि नक़द या चैक के रूप में सम्मान-चिन्ह सहित लौटाएंगे भी तो अकादेमी पलट कर इन दोनों को उन्हें ही लौटाने पर बाध्य है.ब्लैक होने के आशंका से वह कैश तो छुएगी भी नहीं, और फिर जैसी भी हो, राशि को किस मद में डालेगी और सम्मान-चिन्ह को किस तोशेखाने में में डंप करेगी ? यदि दोनों को उदय प्रकाशजी रवीन्द्र भवन के दरवाज़े पर भी डाल आए तो सुबह संभ्रमित सफ़ाई-कर्मचारी उन्हें कूड़ेदान के लायक ही समझेंगे.

इस अस्वीकार से एक गंभीर मसला और उठेगा – अकादेमी हर पुरस्कृत कृति को अपनी अन्य मान्यता-प्राप्त भाषाओँ में अनूदित-प्रकाशित करवाने के लिए नियमतः बाध्य है.उदय प्रकाशजी  की पुरस्कृत कहानी अपनी एकमात्रता में  ख़फ़ीफ़ ही है – उसके कुछ अनुवाद तो अभी ही अकादेमी की प्रकाशन-सूची या -प्रक्रिया में होंगे.उनपर लाखों नहीं तो कुछ हज़ार रुपए खर्च हो चुके होंगे और कुछ के कॉन्ट्रैक्ट पर दस्तखत हुए होंगे.मालूम नहीं मूल लेखक को प्रति-अनुवाद कुछ रक़म नसीब होती है या नहीं.यदि कृति  पुरस्कृत ही न रही तो नियमतः उसके उन प्रकाशित अनुवादों को बेचा भी न जा सकेगा और सिर्फ़ उपयुक्त मशीनों में डाल कर उन्हें लुग्दी या धज्जी-धज्जी पुर्ज़ा-पुर्ज़ा करना पड़ेगा,कॉन्ट्रैक्ट वापस लेने होंगे.कुछ सार्वजनिक सूचनाएँ भी देनी पड़ें.Faecesbook और जाने कहाँ-कहाँ उदय प्रकाशजी के हज़ारों likers बताए जाते हैं फिर भी वह निराला-मुक्तिबोध की तरह एक persecuted,hounded,बेचारे,विपन्न,नाचीज़ समझे गए लेखक ही हैं – तब शायद दिल्ली-कलकत्ता के उनके फ़्रीडरिष एंगेल्सनुमा समनाम शुभचिंतकद्वय अकादेमी के गोदाम से अनबिकी प्रतियों को रिमेंडर के रेट पर खरीद कर उन्हें दे दें.सहानुभूति-लहर में कुछ तो बिक ही जाएँगी.

फिर कुछ मनचले यह अफ़वाह भी उड़ा रहे थे कि उदय प्रकाशजी अकादेमी के लिए अपने कुलदेवता अशोक वाजपेयी पर एक मैग्नम ओपस बनाने जा रहे हैं जिसकी ग्लोबल रिलीज़ उस ईश्वरतुल्य बर्थडे बॉय के 75वें हैप्पी बर्डे पर होनी थी.उसका क्या होगा,कालिया ? और पुरानी फिल्मों का ? जैसा कि गोपाल शर्मा के ज़माने में मुकेशभाई रेडियो सीलोन पर  अपने मखमली कंठ से गाते थे – अरी ज़िंदगी तूने ये क्या किया है ,किसे याद रक्खूँ,किसे भूल जाऊँ ?

लेकिन हमें ख़ुद को पहले पैरा और संजीदगी की जानिब लौटाना होगा.उदय प्रकाशजी ने सुनिश्चित तौर पर कहा है कि प्रो. कलबुर्गी को ‘’मतान्ध हिन्दुत्ववादी अपराधियों’’ ने मारा है.उनके पास सिवा एक नाटकीय अंदाज़ के प्रमाण क्या है ? हिंदी के गीदड़ों,ग्रामसिंहों और लकड़बग्घों को पता नहीं है कि कन्नड़ के विख्यात ज्ञानपीठ-विजेता लेखक-नाटककार चंद्रशेखर कम्बार केन्द्रीय साहित्य अकादेमी के उपाध्यक्ष भी हैं,स्वयं पहले कई बार अभिव्यक्ति के आत्यंतिक खतरे उठा चुके हैं,पुलिस-सुरक्षा में रहे हैं.उनका कहना है कि यदि ( कलबुर्गी हत्याकांड तक पहुँचने-पहुंचाने वाली ) समस्याएँ राजनीतिक उद्देश्यों से प्रेरित हैं,तो उनका नैतिक हल कैसे पाया जा सकता है ? यदि वह राजनीति से प्रेरित हैं या धर्मान्धता-मतांधता-कट्टरवाद की करतूत हैं तो क्या उन्हें रोकने का कोई रास्ता नहीं है ? आज लोगों में अपराधों को लेकर सहिष्णुता है.संवाद की अवहेलना है.जब दो पक्ष बैठ कर बात नहीं करना चाहते,तो शांति कैसे हो सकती है ?

गिरीश कर्नाड को कौन नहीं जानता ? उन्हें भी जीवन भर धमकियाँ और चेतावनियाँ मिलती रही हैं और वह अब भी पुलिस-सुरक्षा में हैं.उन्होंने प्रो.कलबुर्गी के बारे में जो कहा है उससे हिन्दुत्ववादियों को दोषी समझनेवालों को सदमा पहुँचेगा.कार्नाड का मानना है कि प्रो.कलबुर्गी की ह्त्या के पीछे विचारधारागत कारण न होकर एक जातिविशेष की अंतर्कलह है.वह लगातार ‘पञ्चपीठ’ की ,जो वीरशैव सम्प्रदाय के पाँच मठ हैं, आलोचना करते थे.  (कर्नाटक) समाज की संस्कृति ही हिंस्र हो चुकी है.उधर प्रबुद्ध लेखक बरगुरु रामचन्द्रप्पा ने सभी प्रगतिशील ताक़तों से एकजुट होने की अपील की है.कर्नाटक के इन लेखक-बुद्धिजीवियों की प्रतिक्रियाओं से सबक मिलता है कि प्रो.कल्बुर्गी की हत्या का मामला डॉ नरेन्द्र अच्युत दाभोलकर और कॉ. गोविन्द पानसरे की हत्याओं से शायद अलग और सांस्कृतिक-सामाजिक रूप से कहीं जटिलतर है.वह पुरस्कार लौटा देने के ड्रामे की  नहीं,गहनतर पड़ताल की माँग करता है.स्थिति को भुनाने की अवसरवादी जल्दबाज़ी में हम अपनी उंगलियाँ और जुबान तो जला ही सकते हैं,प्रगतिकामी विवेक,चिंतन और कार्रवाई को हास्यास्पद तथा संदिग्ध भी बना सकते हैं.

हम यह नहीं कहते कि गिरीश कार्नाड या चंद्रशेखर कम्बार या किसी भी और की हर बात को वेदवाक्य मान लिया जाए – आजकल किसी पर भी शत-प्रतिशत श्रद्धालु भरोसा नहीं किया जा सकता,खुद पर भी नहीं,अंत तक यह भी नहीं कहा जा सकता कि क्या सही साबित होगा,सुदूर संभावना यह भी हो सकती  है कि प्रो कलबुर्गी की हत्या के लिए सत्तारूढ़ पार्टी,केंद्र सरकार,या साहित्य अकादेमी का पोषक संस्कृति मंत्रालय  ही ज़िम्मेदार हों – लेकिन यदि भर्त्सना या कोई और ठोस कार्रवाई  करनी ही है तो फिलहाल शुरूआत हमें कर्नाटक और महाराष्ट्र की संदिग्ध पुलिसों और सरकारों से करनी होगी.इन दोनों राज्यों की न्यायपालिका को suo motu कार्रवाई करनी चाहिए.सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति तक भी बात पहुँचाई जा सकती है.लेकिन यह सभी क्षेत्रों  के बुद्धिजीवियों द्वारा सड़क पर उतरने से होगा,रवीन्द्रनाथ ठाकुर की लज्जावनत आवक्षमूर्ति के सामने साहित्य अकादेमी के पोर्च में एक लाख की गड्डी और प्रशस्ति-पट्ट फेंकने की निष्प्रयोजन एकल सैल्फ़ी या photo-opportunity से नहीं.ऐसे चतुर आत्मप्रचार-बुभुक्षु बचकानेपन से तो हम हिन्दुत्ववादियों सहित सारे प्रगति-विरोधी तत्वों के हाथ और इरादे मज़बूत ही करेंगे.
  •  
  •  
  •  
  •  
  •   
  •  
  •  
  •  

About Prabhat Ranjan

Check Also

कबीर सिंह एब्‍नॉर्मल और एक्‍स्‍ट्रा नाॅॅर्मल है, उसे न्‍यू नॉर्मल न बनाएं

कबीर सिंह फ़िल्म जब से आई है तबसे चर्चा और विवादों में है। इस फ़िल्म …

8 comments

  1. यह देखना बहुत ही मजेदार है कि कवि श्री विष्णु खरे जी को साहित्य अकादेमी की मुश्किलों की कितनी चिंता है। विष्णु खरे जी की नैतिक चिंताओं और साहित्य अकादेमी की मुश्किलों को ध्यान में रखते हुए मैं उदय प्रकाश जी अनुरोध करता हूँ कि वह अपने फैसले पर पुनर्विवार करें और साथ में श्री विष्णु खरे जी को इस बात के लिए धन्यवाद भी दें कि विष्णु जी ने साहित्य अकादेमी की मजेदार मुश्किलों के प्रति उनका ध्यान खींचा। उनको यह भी वादा करना चाहिए कि भविष्य में पुरस्कार लेने या वापस करने आदि के संदर्भ में वह कोई भी फैसला श्री विष्णु जी और नीली आभाओं वाले परम क्रांतिकारी कवि, संपादक श्री नीलाभ आदि तमाम वगैरह वगैरह से पूछ कर करेंगे।

  2. This comment has been removed by the author.

  3. जितना महत्वपूर्ण उदय प्रकाश जी का साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने की घोषणा करना है उतना ही महत्वपूर्ण है विष्णु खरे जी का लिखा यह तथ्यात्मक लेख है !

    पर तथाकथित हिन्दी साहित्यकारों ने हिंदी साहित्यकारों ने आपसी रंजिशों और दोस्तियों की इस प्रदूषित प्रथा में न तो आलोचनाओं की जगह छोड़ी है ना ही विरोधों की |

    मतलब अन्ध-विश्वास वाले इस "हिन्दी देवताओं के भक्तिकाल" में किसी को भी नायक बना लो और किसी को भी विरोध करने पर बेवजह खलनायक | फिर लगे हाथ अपना चेहरे की कालिख धो लो और अपने अपने स्वार्थ की डुबकियाँ लगाओ |

    विरोधों के लिए कहीं कोई स्वीकार्यता नही दिखती , चीजों को बेवजह ईर्ष्या और शत्रुता जैसे शब्दों से जोड़ दिया जाता है |

    मैं उदय प्रकाश जी के पुरस्कार लौटाने के फैसले के समर्थन में हूँ ( विरोध का अकादमिक कारक न जानने के कारण जैसे साहित्य अकादमी क्यों और कैसे दोषी है , उन्होंने साहित्य अकादमी से कोई संवाद किया या नही,अपने विचारों से अवगत कराया या नही , यह पूर्वोत्तर फैसला है या उत्तरोत्तर ,) किन्तु विष्णु खरे जी के इस विचारणीय लेख में का स्वागत करता हूँ….

  4. आपका यह चिट्ठीनुमा गद्यांश ध्यान पूर्वक पढ़ने के बाद "क्या श्री विष्णु खरे को साहित्य अकादमी सम्मान प्राप्त हो चुका है?" इस सवाल का जवाब आपके प्रिय पाठक यही देना चाहेंगे "नही।" आपने साहित्य अकादमी की मौजूदा व्यवस्था के मद्देनज़र लौटाये जा रहे सम्मान के जिस हश्र का खाका खीचा है वह न केवल अद्भुत है बल्कि काबिले विनोद है। जिन समस्याओं की ओर आपने अपनी अनुभवी दृष्टि डाली है उससे पता लगता है आप बड़े ही हसोढ़ और मज़ाकिया इंसान होंगे। लेखकों को आपकी यह भविष्यवाणी पढ़ते ही साहित्य अकादमी के प्रति करुणा अवश्य होगी।

  5. तथ्यात्मक एवं बेहतरीन

  6. शानदार। धारदार। तर्कपूर्ण।

  7. बहुत ही सही जवाब

  8. सचमुच 'लाजवाब' !

Leave a Reply

Your email address will not be published.