विश्व पुस्तक में क्या रहे ट्रेंड?

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इस बार पुस्तक मेले में चार दिन जाना हुआ. पहले सोचा था नहीं जाऊँगा. लेकिन एक बार जाइए तो बार-बार जाने का मन करता है. एक साथ इतने बड़े लेखकों से मुलाकात, बातें, बतकही- अच्छा लगने लगता है. आज लिख रहा हूँ तो सबकी याद आ रही है. अच्छा मौका होता है. अपने बढ़ते लेखक समाज के नए नए लोगों से मिलना, पुरानों की संगत करना. अच्छा लगने लगता है.

किताबें खरीदते हैं, चाय पीते हैं, बतकही करते हैं, अलग अलग हॉल्स में घूमते हैं, अच्छी अच्छी किताबें दिखती हैं. कुछ अलग दीखता है तो उसकी तरफ ध्यान चला जाता है. आज नवीन शाहदरा के साक्षी प्रकाशन के स्टाल पर 100 रुपये में हंसराज रहबर की इकबाल की शायरी मिल गई. बहुत अच्छा लगा.

हर तरफ फागुन के महीने का प्यार था. अलग बात है कि पूरे मेले के दौरान तीन दिन ऐसे आये जिनकी वजह से आने वालों की संख्या अपेक्षा से कम रही- पहले दिन अरविन्द केजरीवाल का शपथ ग्रहण, दूसरे दिन क्रिकेट विश्वकप में भारत-पाकिस्तान का मैच, और आखिरी इतवार को भारत-दक्षिण अफ्रीका का रोमांचक मैच. बहरहाल, प्यार ही प्यार था. रवीश कुमार के लप्रेक संग्रह ‘इश्क में शहर होना’, फ़िल्मी गीतकार इरशाद कामिल के नज्मों के संकलन ‘एक महीना नज्मों का’ के अलावा नीलिमा चौहान तथा अशोक कुमार पाण्डेय सम्पादित पुस्तक ‘बेदाद-ए-इश्क रुदाद-ए-शादी’ की चर्चा खास तौर पर की जा सकती है. इश्क इस बार पुस्तक मेले का ख़ास ट्रेंड था.

बहरहाल, मेले में जाने वाले किसी भी व्यक्ति को यह अहसास हो सकता था कि रवीश कुमार की किताब इस बार हासिल-ए-मेला किताब रही. मैं विश्व पुस्तक मेले में 1996 से नियमित तौर पर जाता हूँ. तब विश्व पुस्तक मेला दो साल में एक बार आयोजित होता था. मुझे याद है 1996-97 के पुस्तक मेले में अलका सरावगी के उपन्यास ‘कलिकथा वाया बाईपास’ की कितनी धूम थी. उस एक उपन्यास की सफलता ने युवा लेखकों की नई खेप तैयार की. मैं खुद भी उसके बाद लेखक बनने वालों में हूँ. हिंदी रचनाशीलता में कलिकथा एक बहुत बड़ा शिफ्ट था. मेरा अपना मानना है कि उसके बाद हिंदी रचनाशीलता में ‘लप्रेक’ बहुत बड़ा शिफ्ट होने वाला है. इसमें कोई संदेह नहीं कि इसने एक नए ट्रेंड की शुरुआत की है. अगर कोई लेखक यह कहता है कि इसके प्रभाव का पता भविष्य में चलेगा तो वह जरूर वर्तमान से आँखें चुरा रहा है.

इरशाद कामिल की किताब का बिक्री के मामले में कैसा प्रदर्शन रहा यह तो नहीं पता लेकिन मेले में उसकी कोई चर्चा नहीं रही. प्रचार प्रसार में यह किताब साफ़ तौर पर पिछड़ती दिखाई दी. स्टार लांच, मीडिया स्टोरी से हिंदी में अगर किताबों की बिक्री के ऊपर, उनकी व्याप्ति के ऊपर अधिक असर पड़ना होता तो हिन्द युग्म हिंदी का नंबर वन प्रकाशन होता.

बहरहाल, ‘गुलाब के बदले किताब’ जैसे ख़ूबसूरत स्लोगन के बावजूद इरशाद कामिल की किताब अपनी कोई ख़ास जगह नहीं बना पाई जबकि बिना किसी स्लोगन के ही दखल प्रकाशन की किताब बेदाद-ए-इश्क रुदाद-ए-शादी की मेले के अंत तक आते आते अच्छी चर्चा रही. किताबें अब अच्छे आइडिया से चलती हैं- इस किताब ने यह साबित किया.

वरिस्थ लेखक भगवान दास मोरवाल ने बहुत अच्छी तरह एनजीओ संस्कृति को लेकर लिखे गए अपने उपन्यास को चर्चा के केंद्र में बनाए रखने का प्रयास किया लेकिन पाठकों में इस तरह के उपन्यासों को लेकर अब ख़ास रुझान नहीं बचा है. मोटे-मोटे उपन्यास अब कोई नहीं पढना चाहता जब तक कि उसका विषय शम्सुर्ररहमान फारुकी के उपन्यास ‘कई चाँद थे सरे आसमां’ जैसा न हो. अब समय आ गया है कि लेखक पाठक तक पहुंचे. संघर्ष, विचारधारा के लेखन का वह दौर बीत चुका है जब मोटे मोटे विचारपरक उपन्यासों को पढना सामाजिक संघर्ष का हिस्सा माना जाता था.

बहरहाल, मेले में हिन्द पॉकेट बुक्स ने अच्छी वापसी की उसने कम कीमत पर साहित्यिक लेखकों की किताबों को छापने-बेचने का काम शुरू किया है, जो सफल रहा. किताबों की पैकेजिंग अच्छी है, हालाँकि चयन उतना अच्छा नहीं है. बहरहाल, कल को चयन भी अच्छा हो जायेगा. वितस्ता से आई अनुज धर की किताब ‘नेताजी रहस्य गाथा’ किताब को मैंने लोगों को लाइन लगाकर खरीदते देखा. एक हमने भी खरीदी. नेताजी से जुड़े फाइलों को खोलने को लेकर सरकार ने आरटीआई के जवाब में इनकार कर दिया. उसके बाद से नेताजी के जीने मरने का रहस्य और गहरा गया है. किताब में अनुज धर ने बड़ी मेहनत से इसकी पड़ताल करने की कोशिश की है.  

हिंदी के साहित्यिक प्रकाशकों के हॉल में इस बार राजा पॉकेट बुक्स ने बड़ा स्टाल लगाया था और उसके स्टाल पर प्रेमचंद, शरतचंद्र, मंटो, बंकिम, टैगोर की कृतियों के साथ प्रसाद के उपन्यास इरावती और कंकाल भी सस्ते संस्करण में आकर्षक साज सज्जा के साथ उपलब्ध थे.

पुस्तक मेले में लोकार्पण का उत्साह रहा, जो होना भी चाहिए. मेले में किताबों का लोकार्पण नहीं होगा तो क्या एमएसजी का लांच होगा.

एक बात अंत में, पिछले कुछ मेलों से हिंदी के हॉल में बड़ी संख्या में नए लेखक-लेखिकाएं, युवा पाठक आने लगे हैं. यह सोशल मीडिया का प्रभाव है. लेखकों के साथ सेल्फी, ग्रुप फोटो मेले में खींचे जा रहे थे, फेसबुक पर तस्वीरें चमक रही थी. धीरे धीरे लगता है साहित्य का ग्लैमर वापस आ रहा है. हिंदी का ग्लैमर वापस आ रहा है. हाँ, अंत में चलते-चलते मेले में आने की वजह से ही शायद रवीश कुमार फेसबुक पर सबसे अधिक सेल्फी में आने वाले सेलिब्रिटी के रूप में ट्रेंड कर रहे थे.
आज सुबह मन उदास है. मेला ख़त्म, अपने एकांत में वापसी. कॉलेज, डेडलाइन, शेड्यूल…

जब यह सब टूट जाता है तो मेला होता है. किताबों का ही नहीं हम लेखकों का भी मेला होता है. सब याद आ रहा है!

जय पुस्तक! जय मेला!  
प्रभात रंजन 

5 COMMENTS

  1. आपने तो जैसे एक पूरा खाका ही खींच के रख दिया मेले का…| लग रहा है, सच में मेले के नाम को सार्थक कर गया यह पुस्तक मेला…|
    अच्छा लगा आपकी नज़र से इस मेले को देखना…|

  2. अच्छा लगा। आप मेले को एक लेखक की नजर के साथ एक आम पाठक की नजर से भी देखते हैं।

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