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देश का किसान बाढ़ से नहीं, राहत के रुपय पाने की लड़ाई से डरता है!

प्रतिष्ठा सिंह अपने लेखन के माध्यम से बिहार के गाँव-समाज की वास्तविक तस्वीर दिखाती हैं. उनकी किताब ‘वोटर माता की जय’ भी उसी का दस्तावेज़ है. बहरहाल, गाँव-किसानों पर उनकी यह मार्मिक टिप्पणी पढ़कर आँखों में आंसू आ गए. मैं भी किसान का बेटा हूँ. अगर गाँव में खेती के हालात ठीक रहे होते तो शायद मैं भी शहर नहीं आया होता. अंत में एक बात की तरफ और ध्यान गया कि हिंदी की लेखिकाओं के लेखन में गाँव क्यों नहीं आता? क्या उनको इस बात से डर लगता है कि कहीं उनको ‘गंवार’ न समझ लिया जाए? फिलहाल यह लेख-मॉडरेटर

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गाँव जाइए। कोई भी गाँव… बिहार, बंगाल, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हिमाचल, आंध्रा, तमिलनाडु। जो लोग कुछ उम्रदराज़ हैं और अपने गाँव से दूर कहीं नौकरी करते रहे, वे अपने गाँव नहीं जाते। सपरिवार तो कभी भी नहीं। पत्नी वहाँ जाना नहीं चाहती। बेटा, बेटी, बहु गाँव में साधनों की कमी से नाक मुँह सिकोड़ते हैं। ऐसे पुरुषों ने ख़ुद भी अपने गाँव को एक याद-भर कर छोड़ा है। आलम यह है कि अब वे ख़ुद भी गाँव की कमियाँ निकालते पाए जाते हैं। या तो बाबा के या अम्मा के मरते ही ज़मीन का बँटवारा होगा और लगभग सारी ज़मीन बेच दी जाएगी। कोई एक भाई एक छोटा सा टुकड़ा रख लेगा और सोचेगा की अकेले उसी ने परिवार की धरोहर संभाल के रखी है। ऐसे उम्रदराज़ नौकरीशुदा लोग बहुत ग़ुस्सा जाते हैं अगर कोई सरकार की निंदा करता है! कोई इतना भर भी कह के दिखाए कि प्रधानमंत्री का “विकास” एक ढकोसला है! यह अंकल बमक उठते हैं, “वो महान आदमी देश का प्रधान मंत्री है! यह सब ‘बुद्धिजीवी’ साले अपने बाप के ना हुए, देश के क्या होंगे?”

कभी गाँव जाइए।किसान का बुझा हुआ चेहरा देखिए…

जिस देश का किसान हाथ जोड़ता है, उस देश का हर वह व्यक्ति जो खाना खाता है गुनहगार है। भारत में रहने वालों से कहिए की आँख बंद करके एक किसान का चेहरा याद करें। किसी के भी मन में अमिताभ बच्चन का चेहरा नहीं आएगा (हालाँकि, काग़ज़ों में वे भी किसान हैं!)। आपकी आँखों के आगे एक झुर्राया हुआ, धूप का जला चेहरा आएगा जो सर पे गमछी बांधे हुए है और हाथ जोड़े खड़ा है। अब ये सोचिए की ऐसे किसान के सामने कौन होगा? डी.एम.? विधायक? सरकारी अधिकारी? किसी एनजीओ वाली बहनजी? सरकारी स्कूल का टीचर? या कोई भी? किसान आज किसी के भी आगे हाथ जोड़ता है। माने वो सभी के आगे हाथ जोड़ता है। आप जाइएगा तो भी जोड़ेगा। शायद यही तरीक़ा है उसके पास हमें तमाचा मारने का! और आप टीवी पे ख़बरों के नए चैनल पे सच्चाई ढूँढ रहे हैं!

जिस देश का किसान ग़रीबी रेखा के नीचे तक पहुँचने के लिए दर-दर भटकता है, उस देश में एक भी इंसान अमीर नहीं है। ग़रीबी रेखा से नीचे होने का जो कार्ड सरकार जारी करती है, उस में ही सारी लालफ़ीताशाही और राजनीति घुसी पड़ी है। किसान सिर्फ़ एक कार्ड पाने के लिए सालों तक जूझता है और फिर हार मान लेता है। जो उगता है वो भी ठीक दाम पे बेच पाए तो घर में चूल्हा जलता है। और आप बुलेट ट्रेन का इंतज़ार कर रहे हैं!

जिस देश का किसान बाढ़ से नहीं, राहत के रुपय पाने की लड़ाई से डरता है, वह देश चैन से सो कैसे सकता है? कोसी में हर साल बाढ़ आती है। जिस नदी का नाम ही ‘कोसी’ हो, वो इतना उग्र रूप क्यूँ ले लेती है? हमारा माननना है कि उस नदी में किसान की मजबूरी के आँसुओं का आक्रोश है। देश में और भी कई नदियाँ बाढ़ लाती हैं। हम हाल ही में कोसी देख कर आए तो कह रहे हैं। बाढ़ तो कहीं ना कहीं एक नयी शुरुआत भी लाती है लेकिन जान-माल के नुक़सान के साथ-साथ दूसरे झूठे वादों का बोझ भी सहना पड़ता है। पिछले साल बाढ़ में विधायक और अधिकारियों ने ख़ुद जाकर राहत कार्य किया। ऐसा ही होता रहे तो शायद बाढ़ में घर के साथ साथ कम  कम किसान का दिल नहीं डूबेगा। और आप वाई-फ़ाई की धीमी गति से परेशान हैं!

जिस देश के किसान की पत्नी सड़े हुए टमाटर और मुरझाया हुआ आलू पकाने पर मजबूर है, वहाँ हम रंगी हुई  ‘ताज़ी सब्ज़ी’ खा कर सोते रहें तो लानत है। बेचने आसान नहीं  शहर में रहने वाले साल में एक-दो बार LIC एजेंट पर, AC ठीक करने वाले लड़के पे और यहाँ तक कि घर के नौकर पर भी तरस खा लेते हैं! “बेचारा! मौसम की परवाह किए बिना घूम-घूम कर काम करता है!” किसान आपके मौसम को अर्थ प्रधान करता है। लीची ना आए तो क्या बसंत? बढ़िया आम ना मिले तो क्या गरमी? साग हरा ना हो तो क्या सर्दी? लेकिन हमें सब्ज़ी बेचने वाले से सरोकार है, किसान की किसे पड़ी है? जो दिखता ही नहीं उसके प्रति कैसी संवेदनशीलता? और यूँ भी आप तो IPL के स्कोर सो लेकर चिंतित हैं!

जिस देश का किसान रोता है, ख़ुशहाली उसे छू कर भी नहीं जाती। जो आँसुओं में अंकुरित बीज अपने खेत में बोता है वह किसान हिंदू, मुसलमान, सिख नहीं होता है। वक़्त की मार है बेमौसम बरसात, ताबड़तोड़ ओले और शीत लहर। लेकिन उस से भी बड़ी मार है कम दामों पर फ़सल को बेचना। खड़ी फ़सल को देख कर किसान ख़ुश तो होता है लेकिन वह यह जानता है कि एक बड़ी लड़ाई अब शुरू होगी। हर मंडी में अलग दाम। कोई ऊपर, कोई नीचे। बेचने के बाद किसान का भाव वैसा ही होता है जैसा ठगे जाने पर किसी मुसाफ़िर का। ठगने के बाद कोई सफ़र पर जाना थोड़े ही बंद कर देता है? बस हर बार यही बेकार उम्मीद रहती है कि इस बार कोई नहीं ठगेगा। लेकिन ऐसा होता नहीं है… सरकार अगर सच में किसान का हित चाहती तो सारा अनाज अच्छे दामों पे ख़रीद लेती। और फिर आगे बिक्री करवाती। लेकिन सरकार काम सियासत करना है, किसान के आँसू पोंछना नहीं। उत्तर प्रदेश में इस दिशा में कुछ पहल होने लगी है लेकिन अभी बहुत लम्बा सफ़र है। और आप ‘नरेंद्र मोदी’ ऐप पे सेल्फ़ी वाली फ़ोटो डाल रहे हैं!

कभी गाँव जाइए!

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