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जिसने हुनर में कमाल हासिल किया वह सारी दुनिया का चहेता

आज विश्व प्रसिद्ध पेंटर मकबूल फ़िदा हुसैन की पुण्यतिथि है. उनकी विवादास्पद पेंटिंग्स या उनकी माधुरी दीक्षित की प्रति दीवानगी और उनके फ़िल्मकार तक बन जाने की कहानी से तो सब वाकिफ़ हैं पर वे एक अच्छे लेखक भी थे ये उनकी आत्मकथा पढ़कर पता चलता है. आमतौर पर आत्मकथा ‘मैं’ की शैली में होती है पर हुसैन ने अपनी आत्मकथा ‘वह’ की शैली में लिखी. उनकी आत्मकथा ‘हुसैन की कहानी अपनी ज़बानी’ के चुनिंदा अंश — दिव्या विजय


 

बड़ौदा का बोर्डिंग स्कूल–

 

मकबूल अब लड़का नहीं रहा क्योंकि उसके दादा चल बसे. लड़के के अब्बा ने सोचा क्यों न उसे बड़ौदा के बोर्डिंग स्कूल में दाख़िल करा दिया जाए. वरना दिनभर अपने दादा के कमरे में बंद रहता है. सोता भी है तो दादा के बिस्तर पर और वही भूरी अचकन ओढ़े, जैसे दादा की बग़ल में सिमटकर सोया हो.

अब्बा ने फ़ौरन मकबूल को चाचा के हवाले किया और हुक्म दिया कि “इसे बड़ौदा छोड़ आओ, वहाँ लड़कों के साथ इसका दिल लग जाएगा. पढ़ाई के साथ मज़हबी तालीम, रोज़ा, नमाज़, अच्छे आचरण के चालीस सबक़, पाकीज़गी के बारह तरीक़े सीख जाएगा.”

महाराजा सियाजीराव गायकवाड़ का साफ़-सुथरा शहर बड़ौदा. राजा मराठी प्रजा गुजरिती. शहर में दाख़िल होने पर ‘हिज़ हाइनेस’ की पाँच धातुओं से बनी मूर्ति, शानदार घोड़े पर सवार. ‘दौलते बरतानिया’ के मेडल लटकाये, सीना ताने दूर से ही दिखाई देती है.

दारुलतुलबा (छात्रावास) मदरसा हुसामिया, सिंह बाई माता रोड, गैडी गेट. तालाब किनारे सुलेमानी जमात का बोर्डिंग स्कूल. गुजरात की मशहूर अरके तिहाल की ख्याति वाले जी. एम. हक़ीम अब्बास तैयबजी की देख-रेख में, जो नेश्नल कॉंग्रेस और गाँधीजी के अनुयायी, इसीलिए छात्रों के मुँड़े सिरों पर गाँधी टोपी और बदन पर खादी का कुरता-पायजामा.

मौलवी अकबर धार्मिक विद्वान, कुरान और उर्दू साहित्य के उस्ताद. केशवलाल गुजराती ज़बान के क्लास टीचर. स्काउट मास्टर, मेजर अब्दुल्ला पठान. गुलज़मा ख़ान बैंड मास्टर. बावर्ची गुलाम की रोटियाँ और बीवी नरगिस का सालन गोश्त.

मकबूल को इसी बोर्डिंग के अहाते में छोड़ा जाता है. यहाँ उसकी दोस्ती छः लड़कों से होती है, जो एक-दूसरे के क़रीब हो जाते हैं. दो साल की नज़दीकी तमाम उम्र कभी दिल की दूरी में नहीं बदल पाई. हालाँकि हर एक अलग-अलग दिशाओं में बँटे, छः हीले और बहाने हुए. एक डभोई का अत्तर व्यापारी बनातो दूसरा सियाजी रेडियो की आवाज़. एक बना कराची का नागरिक तो दूसरा मोती की तलाश में कुवैत पहुँचा. एक पहुँचा बम्बई और अपना कोट-पतलून पीली धारी की टाई उतार फेंकी, अबा-कबा पहन मस्जिद का मेंबर बना. एक उड़ने वाले घोड़े पर, पैर रकाब में डाले बना कलाकार और दुनिया की लंबाई-चौड़ाई में चक्कर मार रहा है.

मदरसे का सालाना जलसा, मुगलवाड़े के मशहूर फ़ोटोग्राफ़र लुकमानी ट्राइपॉड पर रखे कैमरे पर काला कपड़ा ढँके जैसे उसके अंदर घुसे जा रहे हों. सिर्फ़ ख़ास मेहमानों और उस्तादों का ग्रुप फ़ोटोग्राफ़ खींचा जा रहा है. दूर लड़कों की भीड़ में खड़ा मकबूल मौक़े की तलाश में है. जैसे ही लुकमानी ने फ़ोकस जमाया और कहा ‘रेडी’ मकबूल दौड़कर ग्रुप के एकोने में खड़ा हो गया. इस तरह उस्तादों की बिना इजाज़त उसने अपनी कई तस्वीरें खिंचवाई.

मकबूल ने खेल-कूद में हिस्सा लिया, हाई जंप में पहला ईनाम, दौड़ में फिसड्डी. जब ड्रॉइंग मास्टर मोहम्मद अतहर ने ब्लैकबोर्ड पर सफ़ेद चॉक से एक बहुत बड़ी चिड़िया बनाई और लड़कों से कहा “अपनी-अपनी स्लेट पर उसकी नकल करो” तो मकबूल की स्लेट पर हूबहू वही चिड़िया ब्लैकबोर्ड से उड़कर आ बैठी. दस में से दस नंबर.

 

दो अक्तूबर, स्कूल गाँधी जी की सालगिरह मना रहा है. क्लास शुरू होने से पहले मकबूल गाँधीजी का पोट्रेट ब्लैकबोर्ड पर बना चुका है. अब्बास तैयबजी देखकर बहुत ख़ुश हुए. मदरसे के जलसे पर अकबर ने मकबूल को इल्म पर दस मिनट भाषण याद कराया, बाकायदा अभिनय के साथ, उसमें एक फ़ारसी का शेर था–

 

कस्बे कमाल कुन कि अज़ीज़त जहाँ शवी

कस बेकमाल नियारज़द अज़ीज़े मन

 

यानी जिसने हुनर में कमाल हासिल किया वह सारी दुनिया का चहेता, जिसके पास कोई हुनर कमाल नहीं वह कभी दिलों को नहीं जीत सकता. किसे मालूम यह कस्बे कमाल हुनर का कमाल सारी दुनिया में फैलेगा.

 

रानीपुर बाज़ार —

चाचा मुराद अली से पहलवानी छुड़वाकर उनके बड़े भाई फ़िदा ने एक जनरल स्टोर की दुकान खुलवा दी. जनरल स्टोर न चला तो कपड़े की दुकान, वह भी नहीं चली तो तोपखाना रोड पर आलीशान रेस्त्राँ. मकबूल भी उन दुकानों पर बैठा मगर उसका सारा ध्यान ड्रॉइंग और पेंटिंग में. न चीज़ों की क़ीमतें याद, न कपड़ों की पहनाई का पता. हाँ गल्ले का हिसाब-किताब सही. शाम को हिसाब में दस रुपये लिखे तो किताब में बीस स्केच किए.

 

जनरल स्टोर के सामने से अक्सर घूँघट ताने गुज़रने वाली एक मेहतरानी का स्केच, गेहूँ की बोरी उठाए मज़दूर की पेंचवाली पगड़ी का स्केच, पठान की दाढ़ी और माथे पर सिज़दे के निशान, बुरका पहने औरत और बकरी का बच्चा. अक्सर मेहतरानी कपड़े धोने के साबुन की टिकिया लेने आती. चाचा को देखकर घूँघट के पट खुल जाते और अक्सर मकबूल की नाक पकड़कर खिलखिला उठती. मकबूल ने उसके कयी स्केच बनाए. एक स्केच उसके हाथ लग गया जिसे उसने फ़ौरन अपनी चोली में डाल लिया. मकबूल ने पिपरमिंट की गोली हाथ में थमाई और स्केच निकलवाया.

 

एक दिन दुकान के सामने से फ़िल्मी इश्तिहार का ताँगा गुज़रा. (साइलेंट फ़िल्मों के ज़माने में शहर में चल रही फ़िल्म का इश्तिहार ताँगे में ब्रॉडबैंड के साथ शहर के गली-कूचों से गुज़रता. फ़िल्मी इश्तिहार रंगीन पतंग के कागज़ पर हीरो-हीरोइन की तस्वीरों के साथ छपे, बाँटे जाते) कोल्हापुर के शांताराम की फ़िल्म ‘सिंहगढ़’ का पोस्टर, रंगीन पतंग के कागज़ पर छपा, मराठा योद्धा, हाथ में खिंची तलवार और ढाल. मकबूल का जी चाहा कि उसकी ऑयल पेंटिंग बनाई जाए. आज तक ऑयल कलर इस्तेमाल ही नहीं किया था. वही रंगीन चॉक या वॉटर कलर. अब्बा तो बेटे को बिज़नेसमैन बनाने के सपने देख रहे थे, रंग-रोगन क्यों दिलाते. पोस्टर ने मकबूल को इस क़दर भड़काया कि वह गया सीधे अलीहुसैन रंगवाले की दुकान पर और अपनी दो स्कूल की किताबें, शायद इतिहास और भूगोल, बेचकर ऑयल कलर की ट्यूबें ख़रीद डालीं और पहली ऑयल पेंटिंग चाचा की दुकान पर बैठकर बनाई. चाचा बहुत नाराज़, बड़े भाई तक शिकायत पहुँचाई. अब्बा ने पेंटिंग देखी और बेटे को गले से लगा लिया.

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