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सुनील गंगोपाध्याय की कविताएँ सुलोचना का अनुवाद

बांगला भाषा के मूर्धन्य कवि-उपन्यासकार सुनील गंगोपाध्याय की पुण्यतिथि विगत 23 अक्टूबर को थी. उनको याद करते हुए उनकी कुछ कविताओं का मूल बांगला भाषा से अनुवाद किया है हिंदी की सुपरिचित कवयित्री सुलोचना ने- मॉडरेटर

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1. पहाड़ के शिखर पर
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बहुत दिनों से ही मुझे एक पहाड़ खरीदने का शौक है |
लेकिन पहाड़ कौन बेचता है, यह मैं नहीं जानता |
यदि उससे मिल पाता,
कीमत के लिए नहीं अटकता मामला |
मेरे पास अपनी एक नदी है,
वही दे देता पहाड़ के बदले |

कौन नहीं जानता, पहाड़ की अपेक्षा नदी की ही कीमत होती है अधिक |
पहाड़ स्थिर रहता है, बहती रहती है नदी |
फिर भी मैं नदी के बदले पहाड़ ही खरीदता |
क्यूँकि मैं ठगा जाना चाहता हूँ |

नदी को भी हालाँकि खरीदा था एक द्वीप के बदले में |
बचपन में मेरा एक छोटा सा,
साफ़-सुथरा द्वीप था |
वहाँ थीं असंख्य तितलियाँ |
बचपन में द्वीप था मुझे बेहद प्रिय ।
मेरी युवावस्था में द्वीप मुझे
आकार में छोटा लगने लगा । प्रवाहमान सुव्यवस्थित तन्वी नदी मुझे खूब पसंद आई ।
दोस्तों ने कहा, इतने छोटे
एक द्वीप के बदले में इतनी बड़ी
एक नदी मिली?
क्या खूब जीता है माँ कसम !
तब मैं विह्वल हो जाता जीतने की खुशी में ।
तब मैं सचमुच ही नदी से प्यार करता था।
नदी मेरे कई सवालों का जवाब देती ।
जैसे , बताओ तो, आज
शाम को बारिश होगी या नहीं ?
वह कहती, आज यहाँ दक्षिणी गर्म हवा है।
केवल एक छोटे से द्वीप पर होगी बारिश,
किसी त्यौहार की तरह प्रबल बारिश !
मैं उस द्वीप पर अब नहीं जा सकता,
उसे मालूम था ! सभी को मालूम है।
फिर से नहीं लौटा जा सकता है बचपन में ।

अब मैं एक पहाड़ खरीदना चाहता हूँ।
उस पहाड़ के पाँव के पास
होगा गहन अरण्य, मैं पार कर लूँगा उस अरण्य को, उसके बाद केवल असहज
कठिन पहाड़ |
बिल्कुल शीर्ष पर, सिर के
बहुत पास आकाश, नीचे विपुला पृथ्वी,
चराचर में तीव्र निर्जनता |
कोई भी नहीं सुन सकेगा मेरा कंठ-स्वर वहाँ ।
मैं भगवान में विश्वास नहीं करता, वह मेरे सिर के पास सर झुकाकर खड़े नहीं होंगे ।
मैं केवल दसो दिशाओं को संबोधित कर कहूंगा,
हर मनुष्य ही अहंकारी है, यहाँ मैं हूँ अकेला-
यहाँ मुझे कोई अहंकार नहीं है।
यहाँ जीतने के बजाय, क्षमा माँगना अच्छा लगता है।
हे दसो दिशाओं, मैंने कोई दोष नहीं किया।
मुझे क्षमा कर दो |

2. जन्म नहीं होता, मृत्यु नहीं होती
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मेरे प्रेम का कोई जन्म नहीं होता,
मृत्यु नहीं होती –
क्यूँकि मैं अन्य प्रकार के प्रेम के हीरे का गहना
शरीर में लेकर पैदा हुआ था।
नहीं रखा किसी ने मेरा नाम, तीन-चार छद्मनामों से
कर रहा हूँ भ्रमण मर्त्यधाम में,
आग को प्रकाश समझा, प्रकाश से
जलता है मेरा हाथ
यह सोचकर कि अंधकार में मनुष्य देखना होता है सहज भँवर में
अंधकार से लिपटा रहा
कोई मुझे देता है शिरोपा, कोई दोनों आँखों से हजार दुत्कार
फिर भी मेरे जन्म-कवच, प्रेम को प्रेम किया है मैंने
मुझे कोई डर नहीं लगता,
मेरे प्रेम का कोई जन्म नहीं होता,
मृत्यु नहीं होती |

3. उत्तराधिकार
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नवीन किशोर, तुम्हें दिया मैंने भुवन तट का मेघों भरा आकाश
तुम्हें दी मैंने बटन विहीन फटी हुई कमीज़ और
फुफ्फुस भरी हँसी
दोपहर की धूप में घूमना पैयाँ-पैयाँ, रात के मैदान में सोना होकर चित
यह सब अब तुम्हारे ही हैं, अपने हाथों में भर लो मेरा असमय
मेरे दुःख-विहीन दुःख क्रोध सिहरन
नवीन किशोर, तुम्हें दिया मैंने मेरा जो कुछ भी था आभरण
जलते हुए सीने में कॉफ़ी की चुस्की, सिगरेट चोरी, खिड़की के पास
बालिका के प्रति बारम्बार गलती
पुरुष वाक्य, कविता के पास घुटने मोड कर बैठना, चाकू की झलक
अभिमान में मनुष्य या मनुष्य जैसे किसी और चीज के
सीने को चीर कर देखना
आत्म-हनन, शहर को अस्तव्यस्त करता तेज क़दमों से रौंदता अहंकार
एक नदी, दो-तीन देश, कुछ नारियाँ –
यह सब हैं मेरे पुराने पोशाक, बहुत प्रिय थे, अब शरीर में
तंग हो कसने लगे हैं, नहीं शोभते अब
तुम्हें दिया, नवीन किशोर, मन हो तो अंग लगाओ
या घृणा से फेंक दो दूर, जैसी मर्जी तुम्हारी
मुझे तुम्हें तुम्हारी उम्र का सब कुछ देने की बहुत इच्छा होती है |

4. व्यर्थ प्रेम
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हर व्यर्थ प्रेम देता है मुझे नया अहंकार
बतौर मनुष्य, मैं हो जाता हूँ तनिक लम्बा
दुःख मेरे सिर के बालों से पैर की उंगलियों तक
फैल जाता है
मैं सभी मनुष्यों से अलग होकर एक
अज्ञात रास्ते में सुस्त कदमों से
चलने लगता हूँ
सार्थक मनुष्यों के अधिकाधिक माँगों वाले चेहरे मुझे सहन नहीं होते
मैं रास्ते के कुत्ते को बिस्कुट खरीद कर देता हूँ
रिक्शेवाले को देता हूँ सिगरेट
अंधे आदमी की सफेद छड़ी मेरे पैरों के पास
आ गिरती है
मेरे दोनों हाथों में भरी है भरपूर दया, मुझे किसी ने
लौटा दिया है इसलिए पूरी दुनिया
लगती है बहुत अपनी
मैं निकलता हूँ घर से नयी धुली हुई
पतलून कमीज पहन कर
मेरे सद्य दाढ़ी बनाये हुए मुलायम चेहरे को
मैं खुद ही सहलाता हूँ
बहुत गोपन में
मैं एक साफ आदमी हूँ
मेरे सर्वांग में कहीं भी
नहीं है जरा सी भी गंदगी
ज्योतिर्वलय बन रहती है अहंकार की प्रतिभा
माथे के पीछे
और कोई देखे या न देखे
मुझे भान हो ही जाता है
ले आता है अभिमान मेरे होठों पर स्मित हास्य
मैं ऐसे रखता हूँ पाँव मिट्टी के सीने पर भी
कि नहीं पहुँचे आघात
मुझे तो किसी को भी दुःख नहीं देना है |

5. इच्छा
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काँच की चूड़ी को तोड़ने के समान रह-रहकर इच्छा होती है
कि तोड़ डालूँ दो चार नियम क़ानून
पाँव के नीचे पटक कर फेंकूँ माथे का मुकुट
जिनके पाँव के नीचे हूँ, उनके सर पर चढ़ बैठूँ
काँच की चूड़ी को तोड़ने के समान ही इच्छा होती है अवहेलना में
कि धर्मतला में भरी दुपहरी बीच रास्ते पर करूँ सुसु |
इच्छा होती है दोपहर की धूप में ब्लैक आउट का हुक्म देने की
इच्छा होती है कि करूँ झाँसा देकर व्याख्या जनसेवा की
इच्छा होती है कि मलूँ कालिख धोखेबाज नेताओं के चेहरों पर
इच्छा होती है कि दफ्तर जाने के नाम पर जाऊँ बेलूर मठ
इच्छा होती है कि करूँ नीलाम धर्माधर्म मुर्गीहाटा में
बलून खरीदूँ बलून फोडूँ, काँच की चूड़ी दिखते ही तोडूँ
इच्छा होती है कि अब पृथ्वी को तहसनहस करूँ
स्मारक के पाँव के पास खड़े होकर कहूँ
मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लगता है |

*धर्मतला, मुर्गीहाटा,बेलूर मठ =कोलकाता के विभिन्न स्थान

6. वो सारे स्वप्न
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कारागार के अंदर उतर आयी थी ज्योत्स्ना
बाहर थी हवा, विषम हवा
उस हवा में थी नश्वरता की गंध
फिर भी फाँसी से पहले दिनेश गुप्ता ने लिखी थी चिट्ठी अपनी भाबी को,
“मैं अमर हूँ, मुझे मार पाना किसी के बूते की बात नहीं |”

मध्यरात्रि में अब और देर नहीं है
घंटा बजता है प्रहर का, संतरी भी क्लांत होते हैं
सिरहाने आकर मृत्यु भी विमर्श बोध करती है |
कंडेम्ड सेल में बैठ लिख रहे हैं प्रद्युत भट्टाचार्य,
“माँ, तुम्हारा प्रद्युत क्या कभी मर सकता है ?
आज चारोंओर देखो,
लाखों प्रद्युत तुम्हें देख मुस्कुरा रहे हैं,
मैं जिंदा ही रहा माँ, अक्षय”

कोई नहीं जानता था कि वह था कहाँ,
घर से निकला था लड़का, फिर वापस नहीं आया
पता चला कि देश से प्यार करने के लिए मिला उसे मृत्युदंड
अंतिम क्षण से पहले भवानी भट्टाचार्य ने
पोस्ट कार्ड पर बहुत तेज़ गति से लिखा था अपने छोटे भाई को,
“अमावस्या के श्मसान में डरते हैं डरपोक,
साधक वहाँ सिद्धि लाभ करते हैं,
आज मैं बहुत ज्यादा नहीं लिखूँगा
सिर्फ सोचूँगा कि मौत कितनी सुंदर है। ”

लोहे की छड़ पर रख हाथ,
वह देख रहे हैं अंधकार की ओर
दीवार को भेद जाती है दृष्टि, अंधेरा भी हो उठता है वाङ्‌मय
सूर्य सेन ने भेजी अपनी आखिरी वाणी,
“मैं तुम लोगों के लिए क्या छोड़ गया ?
सिर्फ एक ही चीज,
मेरा सपना एक सुनहरा सपना है,
एक शुभ मुहूर्त में मैंने पहली बार इस सपने को देखा था । ”

वो सारे स्वप्न अब भी हवा में उड़ते रहते हैं
सुनायी पड़ता है साँसों का शब्द
और सब मर जाता है स्वप्न नहीं मरता
अमरत्व के अन्य नाम होते हैं
कानू, संतोष, असीम लोग …
जो जेल के निर्मम अंधेरे में बैठे हुए
अब भी इस तरह के स्वप्न देख रहे हैं

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One comment

  1. वाह बहुत बढ़ियां। मुझे याद आती है कहीं पढ़ी एक प़क्ति( शायद धर्मयुग या फिर दिनमान‌ रहा होगा, मेरे बचपन का) और ठिठका खड़ा हू़ अब भी वहीं उसी एक पंक्ति पर: “मैं चाहता हूं मेरे शब्द अपने पैरों पर खड़े हों”.

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