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गाँधी का अंत संवाद की एक परंपरा का अंत था

आज की पीढ़ी गांधी के बारे में क्या सोचती है यह जानना मेरे लिए ज़्यादा ज़रूरी है।यह लेख अमृतांशु ने लिखा है जो दिल्ली विश्वविद्यालय के क्लस्टर इनोवेशन सेंटर में बीए तृतीय वर्ष के होनहार छात्र हैं- मॉडरेटर

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सम्पूर्ण भारतीय राजनीतिक संस्कृति दो विपरीत ध्रुवों में बंटी रही है, एक उच्च वर्ग की राजनीतिक संस्कृति एवं दूसरी जनमानस की राजनीतिक संस्कृति।

स्वातंत्र्योत्तर भारत में भावी राष्ट्र के निर्माण की योजनाओं की जो दो व्यापक छवियाँ रही हैं उनमे से एक लुटियंस के टीले के वासी एलीट वर्ग के यूरोपीय मानकों के हिसाब के भारत के निर्माण की संस्कृति रही है और दूसरी अंचलों में रहने वाले भारतीयों की अपने सांस्कृतिक महत्व और जरूरत के हिसाब से भावी भारत के निर्माण को योजनाबद्ध करने की संस्कृति। (मायरन विनर का Elite Political Culture और Mass Political Culture वर्गीकरण )

भारतीय राजनीतिक का विश्लेषण करने वाले अमेरिकी एडवर्ड शिल्स ने इसे राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय संस्कृति (National and Parochial Culture) कहा है, अमेरिकी चिंतक रेडफोर्ड और सिंगर ने इसे भारत की ‘महान परंपरा’ एवं ‘अल्प परंपरा’ (Great Tradition and Little Tradition) के रूप में वर्गीकृत किया है, अंग्रेजी राजनीतिशास्त्री वाश्ब्रूक ने इसे ब्रिटिश भारत से चले आ रहे सेक्युलर भारत बनाम देशज भारतीयों के अनुसार ‘पुरातनपंथी’ भारत के निर्माण के स्वप्न के रूप में वर्गीकृत किया गया है, अमेरिकी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सुदीप्त कविराज इन संस्कृतियों को उच्च विचार (Upper Discourse) एवं निम्न विचार (Lower Discourse) में बाँटा है।

गाँधी वो पहले एवं अंतिम व्यक्ति थे जिन्होंने इन दो विपरीत संस्कृतियों के बीच सेतु का काम किया, गाँधी व्यक्तिगत रूप से देशीय कल्पनाओं के भारत के पैरोकार थे, उन्होंने सदैव भावी भारत के निर्माण की योजनाओं की अल्प परंपरा का नेतृत्व किया है, जिसे कोई पुरातनपंथी भी कह सकता है। गाँधी ने इन दो विपरीत संस्कृतियों के बीच समुच्चय का काम किया, वो नेहरु जैसे यूरोपीय मानकों के अनुसार बने भारत की कल्पनाओं के नायक के साथ भी जुड़े रहे और समाज के सबसे पुरातनपंथी समूहों को भी बराबर जगह दी। गाँधी के बाद भारत में कोई ऐसा सेतु नही बन पाया जो लुटियंस के भारत को अंचल के भारत से जोड़ सके। भारत ने गाँधी के बाद जितना इस बात का हर्जाना चुकाया है संभवतः किसी और बात का नही, गाँधी का अंत संवाद की एक परंपरा का अंत था, आज उसकी जितनी जरूरत है संभवतः और किसी बात की नही।

गाँधी के बाद संभवतः कोई गाँधी इसलिये भी नही पैदा हो पाया क्योंकि किसी भी भारतीय ने आम आदमी के इतना सरल होने की कोशिश नही की, किसी ने दिलों को जोड़ने के काम को सर्वोच्च काम नही माना। प्रख्यात कन्नड़ लेखक एवं गाँधीवादी विचारक यू. आर. अनंतमूर्ति मानते हैं कि यूरोपीय जैसे भारत के निर्माण को कल्पना को सबसे ज्यादा गाँधी के अधिकृत चेलों ने ही पाला, नेहरु ऐसी योजनाओं के नायक थे, कम्युनिस्टों ने भी ऐसे ही भारत के निर्माण को जरूरी समझा, अनंतमूर्ति के अनुसार स्वतंत्र भारत में लोहिया ही एकमात्र आदमी थे जिन्होंने गाँधी के सपनों के भारत के लिए असली एवं तार्किक संघर्ष किया लेकिन लोहिया के साथ सबसे बड़ी समस्या यह थी की उनकी संवाद शैली दिलों तक असर करने वाली तो थी लेकिन दिलों को जोड़ने वाली नही।

गाँधी अपने युग के नेता थे। उन्होंने उस युग में जो गलतियाँ की हैं उनकी निंदा की जानी चाहिए, यही असली गाँधीवाद है। उस युग के गाँधी के इतर आज के युग को भी गाँधी की दरकार है, जो कई महत्वकांक्षाओं वाले समूहों के बीच सेतु का काम करे, जो सबसे आगे एक लाठी लेकर अन्याय का प्रतिकार करता रहे। जो समता, बंधुता एवं प्रेम के लिए मृत्यु को भी स्वीकार्य माने।

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