भैया एक्सप्रेस और चाचा की टिप्पणी

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‘बया’ पत्रिका का नया अंक अरुण प्रकाश पर एकाग्र है. इसमें मैंने भी अरुण प्रकाश जी के ऊपर कुछ संस्मरणनुमा लिखा है. देखिएगा- प्रभात रंजन 
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जब भी अरुण प्रकाश याद आते हैं मुझे अपना गाँव याद आ जाता है. सीतामढ़ी में इंटरमीडिएट का विद्यार्थी था. राजनीतिशास्त्र के प्राध्यापक मदन मोहन झा की संगत में कुछ-कुछ साहित्यिक होने लगा था और ‘क्रिकेट सम्राट’, ‘फ़िल्मी कलियाँ’, ‘मायापुरी’ जैसी पत्रिकाओं से ध्यान हटाकर कुछ बौद्धिक-वौद्धिक टाइप पत्रिकाओं की तलाश में रहता था. मदन मोहन झा सर के प्रिय लेखक कमलेश्वर थे. एक दिन उन्होंने जैसे ‘ब्रेकिंग न्यूज’ दी कि कमलेश्वर ने एक पत्रिका का संपादन शुरु किया है- ‘गंगा’ नाम है उस पत्रिका का. उसके बाद ‘गंगा’ का नियमित पाठक बन गया. शायद १९८७ में उसी पत्रिका में कमलेश्वर जी की सम्पादकीय टिप्पणी के साथ ‘भैया एक्सप्रेस’ कहानी पढ़ी थी. मुझे याद है मेरे रामकुमार चाचा ने उस कहानी को पढकर कहा था, ‘देखना एक दिन बिहार के सारे वासी भैया एक्सप्रेस में चढ़-चढ़ कर देश भर में फ़ैल जायेंगे और हर जगह दुरदुराये जायेंगे.’ तब समझ में नहीं आई थी उनकी बात. चाचा रेलवे की नौकरी छोड़कर गाँव में खेती करते थे और गाँव में मेरे एकमात्र साहित्यिक ‘सह-पाठी’ थे. बहरहाल, तभी से लेखक  अरुण प्रकाश, भैया एक्सप्रेस, चाचा की टिप्पणी दिमाग में बस गई.

सीतामढ़ी के एकमात्र लाइब्रेरी ‘सनातन धर्म पुस्तकालय’ में एकाध बार उस लेखक अरुण प्रकाश की किताबों को खोजने की असफल कोशिश भी की जिसकी एक कहानी पर कमलेश्वर ने लिखा था, उस कमलेश्वर ने जिसे मेरे झा सर हिन्दुस्तान के बेहतरीन लेखकों में से एक बताते थे. दुर्भाग्य से, उस पुस्तकालय में बरसों से नई किताबों की खरीद नहीं हुई थी. अरुण प्रकाश तब ‘नए’ लेखक थे. “ ‘नए’ लेखकों की किताबों की खरीद के तो वैसे भी संचालन समिति खिलाफ है. इस लाइब्रेरी में तुमको खाली क्लासिक मिलेगा.’ बहुत कम बोलने वाले लाइब्रेरियन साहब ने एक दिन अरुण प्रकाश का नाम लेने पर संक्षिप्त-शा उत्तर दिया था.

बहरहाल, बाद में दिल्ली आया उनकी कहानियों से परिचय हुआ, ‘पकड़उआ बियाह’ पर लिखे उनके उपन्यास ‘कोंपल कथा’ से परिचय हुआ. लेखक अरुण प्रकाश से तो अच्छा परिचय हो गया. लेकिन जब उनसे पहली बार मिला तब तक दिल्ली में आए ८-१० साल हो गए थे. उन दिनों असगर वजाहत के साथ यह योजना बनी कि आने वाले समय में इलेक्ट्रौनिक माध्यमों की पढ़ाई विश्वविद्यालयों में शुरु होगी. इसलिए उसको ध्यान में रखते हुए एक पुस्तक तैयार करनी चाहिए. फिर तय हुआ कि पुस्तक में कुछ पटकथाकारों के साक्षात्कार भी शामिल किए जाएँ. तब यह इसलिए सुविधापूर्ण था क्योंकि टेलीविजन धारावाहिकों के दो प्रसिद्ध लेखक कमलेश्वर और मनोहर श्याम जोशी दिल्ली में ही रहते थे. दोनों से मेरा परिचय भी था. असगर वजाहत ने एक नाम बताया अशोक चक्रधर का, जो जामिया में उनके सहकर्मी थे. इस नाम से मैं कुछ कुनमुना रहा था. लेकिन उससे अधिक मैं कुछ नहीं कर सकता था.

बहरहाल, तब तक मैंने कुछ खास नहीं लिखा था. कुछ समीक्षाएं लिखकर जरूर मैं खुद को लेखकों की जमात में पाने लगा था. मनोहर श्याम जोशी जी के यहां आना-जाना कुछ अधिक था. एक दिन मैंने उनसे इस पुस्तक की चर्चा की और बताया कि मैं असगर वजाहत के साथ सह-लेखन कर रहा हूं. उसके लिए मैं आपसे बातचीत करना चाहता हूं. मैंने उनको विस्तार से बताया कि पुस्तक की योजना यह है कि टेलीविजन-लेखन से जुड़ी बारीकियों को विद्यार्थी समझ सकें. आप जैसे लेखकों के अनुभव का कुछ अंश इस बातचीत के माध्यम से आ जायेगा. जोशी जी उस योजना में कुछ खास दिलचस्पी नहीं दिखा रहे थे- कभी चश्मा खोलकर अपनी आंखों को मलने लगते, कभी बालों में ऐसे हाथ फिराने लगते जैसे सर खुजा रहे हों, अंत में उठकर जब वे चहलकदमी करने लगे तब मैं रुक गया. जीवन की पहली पुस्तक थी, वह भी इतने बड़े लेखक के साथ. मैं उत्साह से भरा हुआ था. ‘और किस लेखक से बात करोगे अपने पुस्तक के लिए?’ उन्होंने चहलकदमी करते हुए पूछा.
‘कमलेश्वर, अशोक चक्रधर…’ मैंने कहा. दूसरे नाम पर उन्होंने मुझे कुछ देर गौर से देखा. अब इतने सालों बाद झूठ नहीं बोलूँगा, कुछ कहा नहीं. तेजी से चहलकदमी करने लगे.

‘अरुण प्रकाश का इंटरव्यू भी ले लो,’ अचानक उन्होंने कहा. पहले मुझे लगा मजाक कर रहे हैं जोशी जी. एक पटकथाकार के रूप में अरुण प्रकाश का नाम मैंने सुना नहीं था. लेकिन यह नाम धारावाहिकों के सबसे बड़े लेखक के मुँह से निकला था इसलिए कुछ समझ में नहीं आया रहा था.
‘तुम कह रहे थे कि विद्यार्थियों के लिए तुम यह किताब तैयार कर रहे हो?’

मैंने सिर हिलाया.

‘उससे बात कर लो, बहुत अच्छा बोलेगा.’ कहते हुए जोशी जी कहने लगे कि बहुत देर हो रही है उनको कहीं जाना है.

मुझे लगा कि टेलीविजन-लेखन की इस चर्चा से वे बोर हो गए थे और अब उससे मुक्ति पाना चाह रहे थे.

उस दिन अपने होस्टल लौटते हुए मैं अरुण प्रकाश के बारे में सोचता रहा. पहली बार कमलेश्वर के लिखने के कारण उनके बारे में गंभीर हुआ था. आज अपने एक और प्रिय लेखक मनोहर श्याम जोशी ने कहा कि पटकथा पर उनसे बातचीत कर लो.

अब तो उनसे मिलना ही था. अगले दिन मैंने असगर वजाहत से कहा कि इसमें अरुण प्रकाश की बातचीत भी शामिल कर लेते हैं. उन्होंने मना नहीं किया. बीच में मैं एक साल के लिए जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में पढाने लगा था. उन दिनों उनके लड़का मनु वहां समाजशास्त्र की पढ़ाई कर रहे थे. विश्वविद्यालय में उनसे मिलना होता रहता था. मुझे याद है हमेशा प्रफुल्लित रहते थे. बहरहाल, मैंने उसके माध्यम से अरुण प्रकाश जी को संदेसा भेजा कि मैं उनका इंटरव्यू लेना चाहता हूं.

कभी आ जाओ, मैं इन दिनों घर में ही रहता हूं- जवाब आ गया. 
  
शायद सर्दियों के दिन थे, इसलिए कह रहा हूं, क्योंकि मैं उनके दिलशाद गार्डन वाले घर में एक दोपहर पहुंचा था. छोटे-से कमरे में सिगरेट के धुएं और किताबों के बीच वे बैठे मिले थे. औपचारिक बातचीत बहुत अच्छी रही. ‘पटकथा क्या होती है?’ आदि-आदि पटकथा-लेखन से जुड़े अनेक बालसुलभ सवालों का उन्होंने बड़ी गंभीरता से जवाब दिया था. सच बताऊँ तो राधाकृष्ण प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तक ‘टेलीविजन लेखन’ में सबसे अच्छी तरह से उन्होंने ही सवालों के जवाब दिए हैं. मेरे दो प्रिय लेखकों के जवाब तो आशीर्वाद नुमा अधिक लगते हैं. यह अलग बात है कि कि उन दो दिग्गजों मनोहर श्याम जोशी और कमलेश्वर की बातचीत के कारण उस किताब का कुछ महत्व बढ़ा गया.

बहरहाल, उस औपचारिक बातचीत के दौरान ही माहौल अनौपचारिक हो चुका था. उन्होंने अपनी पत्नी को बुलाकर परिचय करवाया. पढ़ाई-लिखाई को लेकर खूब बातें हुईं. मुझे याद है उनके कमरे में सैमुएल हंटिंगटन की पुस्तक ‘क्लैश ऑफ सिविलाइजेशन’ की प्रति रखी थी. उन दिनों अंग्रेजी की पत्र-पत्रिकाओं में उस किताब की खूब चर्चा थी. तब इंटरनेट का जमाना नहीं आया था गूगल पर सर्च करके किसी भी किताब के बारे में जानकारी जुटाई जा सकती हो, किताब से परिचय पाया जा सकता हो. तब दिल्ली में किताब पाना मुश्किल होता था. मैं उस किताब को वहां देखकर चौंका था. क्योंकि उस तरह की किताबें मैंने मनोहर श्याम जोशी, वागीश शुक्ल जैसे विद्वानों के घर पर देखी थी, जो विद्वान माने जाने वाले लेखक थे. लेकिन अरुण प्रकाश…

दो-तीन बार बाद में उनके घर और गया. वहीं दिलशाद गार्डन. सच बताऊँ, तो उनसे बात करके यही लगता था कि वे बेपरवाह किस्म के लेखक थे, आजीविका के लिए अनुवाद, लेखन करते रहते, सहज भाव से रहते. कभी उन्होंने हम जैसे ‘लड़कों’ पर ज्ञान का आतंक जमाने की कोशिश नहीं की, कभी कमअक्ली का मजाक नहीं उड़ाया, हमेशा लिखने के लिए प्रोत्साहित ही किया.

बाद में उनसे मिलना कम होता गया. लेकिन फोन का ज़माना आया गया था. मेरे कहने का मतलब है कि फोन मेरे जैसों के लिए भी सहज सुलभ हो गया. फोन पर बीच-बीच में बात हो जाती. मुझे याद है सन २००० के आस-पास उन्होंने विद्यापति पर उपन्यास लिखना शुरु किया था. बहुत उत्साहित रहते थे. जिस मिथिला से वे लगभग आजीवन निर्वासित रहे विद्यापति के बहाने उस मिथिला में लौट रहे थे. वैसे ‘जलप्रांतर’ कहानी कि वजह से भी वे मुझे मिथिला के लगते रहे. बाढ़ आखिर मिथिला के लोगों के जीवन का हिस्सा है. बहरहाल, मैं जब महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की पत्रिका ‘बहुवचन’ का संपादक बना तो मैंने उनसे विद्यापति के जीवन पर लिखे जा रहे उस उपन्यास का अंश प्रकाशन के लिए माँगा, उन्होंने सहर्ष दिया भी. तब वे कहते कि बस उपन्यास पूरा होने वाला है. जल्दी ही छप जायेगा. करीब दस सालों बाद मुझे उस अप्रकाशित उपन्यास की याद तब आई जब उनका देहांत हो गया. बाद में गौरीनाथ जी से पूछा उस उपन्यास की बाबत तो उन्होंने बताया कि वह अधूरा ही रह गया.

बातचीत होती रहती थी. उनकी सम्पूर्ण कहानियों का संग्रह ‘विषम राग’ आया तो मैंने उनको फोन किया था. उनके पास भी मेरा फोन नंबर हमेशा रहा. जब मुझे ‘जानकी पुल’ कहानी पर सहारा समय कथा सम्मान मिला तो सबसे आत्मीय फोन उनका ही आया था. कम लिखने के लिए मुझे उन्होंने टोका था और कहा अब समय आया गया है खूब लिखो. जब भी कुछ पढते और उनको किसी लायक लगता तो फोन जरूर करते. मिलना कम होता था. अरुण प्रकाश को मैं एक ऐसे लेखक के रूप में याद करता हूं पूछने पर हमेशा सही मार्ग बताते, कभी दिग्भ्रमित नहीं करते. मिलने पर पास बिठाकर इतने अपनेपन से बात करते कि दुःख-दर्द कुछ कम हो जाता. अभावों में घिरे रहते, लेकिन मैंने उनको कभी अभावों का रोना रोते नहीं देखा. कलम से मेहनत करते, जो मिलता उसी में शान से रहते. इसीलिए फ्रीलांसिंग के दौर में वे हम जैसे फ्रीलांसर्स के आदर्श सरीखे थे.

बाद में वे साहित्य अकादेमी की पत्रिका ‘समकालीन भारतीय साहित्य’ के संपादक बने. मैं हालांकि उनके लेखकों में नहीं था, लेकिन ऐसा नहीं है मैंने इसकी तरफ ध्यान दिया हो. असल बात है कि उनको एक लेखक के रूप में देखने, पढ़ने की ऐसी आदत पड़ चुकी थी कि अकसर यह भी याद नहीं रहता था कि वे संपादक हो चुके हैं. हाँ, बीच में जब वे मुंबई से ‘युग’ लिखकर लौटे थे तो उनसे एक बार मिलना हुआ था और लंबी बात हुई थी. ‘युग’ आजादी के पचास वर्ष के अवसर पर डी.डी. से प्रसारित होने वाला धारावाहिक था, जो हफ्ते में कई दिन प्रसारित होता. कमलेश्वर जी उसके मुख्य लेखक थे, कमल पांडे के साथ अरुण जी सह लेखन करते थे. बहुत भरे हुए थे. बताने लगे कि कमल पांडे उनको कितना परेशान करता था. हालांकि, धारावाहिक लेखन उन्होंने अपनी बीमारी की वजह से छोड़ा था.

संपादक होने के बाद उनकी नियमित मशरूफियत बढ़ गई. मैं भी काफी दिनों तक उनसे मिलने नहीं गया. बीच-बीच में एक बार और मनोहर श्याम जोशी ने उनका नाम बहुत सम्मान से लिया था. यह घटना उनके संपादक बनने से पहले की है. दूधनाथ सिंह का उपन्यास आया था- आखिरी कलाम. उसकी खूब चर्चा थी. उसकी एक ऐतिहासिक समीक्षा अरुण प्रकाश जी ने की थी. एक दिन जोशी जी से मिलने गया तो उन्होंने उस समीक्षा का जिक्र किया और कहने लगे कि इस तरह की सम्यक समीक्षा अब हिंदी में विरल होती जा रही है. फिर उन्होंने मुझसे अरुण प्रकाश जी का नंबर लिया और उनसे बात भी की. मेरे सामने काफी देर तक उनकी कई कहानियों की चर्चा करते रहे, उसनके आगामी लेखन के बारे में पूछते रहे. बहरहाल, संपादक के रूप में उन्होंने मुझे पहली बार तब याद किया जब मनोहर श्याम जोशी का निधन हुआ. उन्हने समकालीन भारतीय साहित्य के लिए जोशी जी की श्रद्धांजलि मुझसे ही लिखवाई थी. मैं जब उनसे पहली बार उनके दफ्तर में मिलने गया तो उनके लिए पाकिस्तानी लोक-गायक आलम लोहार की सीडी ले गया था. और उस दिन उन्होंने मुझे अमर लोहार के बारे में आधे घंटे तक बताया था. मैं चमत्कृत रह गया था. हर बार वे चौंकाते थे. कुछ नया बताकर, किसी ऐसे विषय में गहरी रूचि दिखाकर जिसकी उनसे उम्मीद नहीं रहती थी. लेकिन वे कभी प्रदर्शन करते हों अपने ज्ञान का न मुझे इसका अनुभव हुआ, न ही मैंने किसी से ऐसा सुना.

बाद में वे मयूर विहार, फेज १ में रहने लगे थे. कुल दो बार उन्होंने मुझे फोन किया था. अपने घर का पता बताया था और आने का निमंत्रण भी दिया था. लेकिन यह तो शायद दिल्ली की नियति हो गई है हम उससे मिलने की जुगत में लगे रहते हैं, उससे संबंध बनाने के फेर में पड़े रहते हैं, जो हमसे नहीं मिलना चाहता, जो हमसे पर्याप्त दूरी बनाए रखता है- उससे नहीं मिलते जो हमसे मिलना चाहता है, स्नेह प्रकट करना चाहता है. वे न कोई पुरस्कार दिलवा सकते थे, न ही कहीं कोई रचना छपवा सकते थे, किसी फेलोशिप की कमिटी में भी नहीं पाए जाते थे. बार-बार बस यही पता चलता कि वे बीमार हैं. उनको देखने का, मिलने का बहुत मन होता.

लेकिन मिलने जा नहीं सका.

मैंने कई बार सोचा कि आखिर मैं उनसे मिलने क्यों नहीं जा सका…   

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