इंसान मिटटी से बना है, शैतान आग से

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यह मशहूर फिल्म लेखक, निर्देशक, पत्रकार ख्वाजा अहमद अब्बास की जन्म शताब्दी का साल है. उनकी आत्मकथा ‘आई ऍम नॉट ऐन आइलैंड’ के एक रोचक अंश का अनुवाद किया है भाई सैयद एस. तौहीद ने- जानकी पुल.
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लोग कहते थे इंसान मिटटी से बना है, शैतान आग से। वैज्ञानिकों के मुताबिक इंसान मिटटी से नहीं पानी से बना हैअर्थात इसके शरीर-खून-मांस व हड्डियों में पानी का हिस्सा सबसे अधिक है।  लेकिन इंसान केवल मांस-हड्डियों का पुतला ही नहीं, केवल एक जानदार ही नहीं है। यदि इसका अस्तित्व में इसकी अक़्ल की, इसके विचार व संवेदना और भावना का कोई महत्व है तो मैं कहूंगा, इंसान के सृजन में बहुत से सामाजिक, ऐतिहासिक, आर्थिक शक्तियों का हांथ होता है। सब इंसानों में से एक इंसान मैं भी हूं। जिन शख्सियतों ने मुझे बनाया वो एक दो नहीं सैकडों, हजारों बल्कि शायद करोडों हैं। क्योंकि इंसान की जिंदगी अपने माता-पिता और करीबी रिश्तेदारों या मित्रों या प्रत्यक्ष नेताओं का प्रभाव ही स्वीकार करती, इसके जीवन व किरदार की बनावट में क़ौम व सहपाठी भी हिस्सा लेते हैं। जो माहौल  एक इंसान की शिक्षा-विकास करता है, इसमें वो शारीरिक व ऐन्द्रिक भाव तो शामिल हुआ करता है जो माता-पिता से मिलता है। लेकिन यह भी कि बदलती सामाजिक परिस्थितियां एवं राजनीतिक तथा आर्थिक क्रांति के प्रभाव भी इसमें शामिल है। यह चीजें हर इंसान को मिलती हैं। वह इसे स्वीकार करना चाहे या नहीं। इंसान का जीवन आंतरिक व बाहय दोनों के ताने-बाने से बनता है। इसकी हक़ीकत से कोई इंकार नहीं कर सकता भले ही वो मार्क्स का शिष्य या फ्रायड का भक्त हो।  भला कोई बता सकता कि इंसान की बनावट में इंद्रियों का ताना ज्यादा अहम है अथवा वातावरण का बाना। इसलिए न इन तमाम शख्सियतों के नाम गिना सकता हूं जिन्होंने मेरे किरदार एवं दृष्टिकोण को बनाया। इनमें बहुतों से तो मैं प्रेरणा की हद तक ही प्रभावित हुआ होंगा और ना भरोसे के साथ इन विविध प्रभावों का मोल-तोल कर सकता हूं कि इनमें कौन अधिक महत्वपूर्ण था। केवल अपनी याद की मधम रोशनी में कुछ हस्तियों व घटनाओं की तलाश करना चाहता हूं जिन्होंने मेरी जिंदगी को प्रभावित किया। सबसे पहले और मेरे बचपन में सबसे अधिक नानाजान ख्वाजा सज्जाद की शख्सियत ने मुझे प्रभावित किया। नाना खानदान में ही नहीं बल्कि पूरे कसबे में एक मक़बूल शख्सियत थे। मेरे बचपन की पहली यादें  आपसे जुडी हैं। तीन बरस हुए नानाजान को गुजरेलेकिन बचपन ही से हम आपको बहुत बुढा समझते रहे हालांकि उस वक्त आप पचासपचपन ही के थे। इनकी दाढी पूरी सफेद नहीं थी ना चेहरे पर झुर्रियों का कोई निशान था। फिर भी हमारे मन में आपको लेकर एक अनुभवी बुजुर्ग की छाप थी।
जब पांच बरस की उम्र में घर की चाहरदीवारी से स्कूल की दुनिया में आया । यह स्कूल अलताफ हुसैन हाली के नाम पर हाली स्कूल कहलाता था। ख्वाजा सज्जाद इसके संस्थापक सचिव व देखरेख करने वाले थे। कह सकता हूं कि आपने पूरी जिंदगी स्कूल के नाम कर रखी थी। अब मुझे मालूम पडा कि मुसलिम समुदाय में आधुनिक शिक्षा को बढावा देने के लिए आपने अनेक कुर्बानियां दी। कलकत्ता विश्वविद्यालय से गेजुएट होने वाले पहले मुस्लिम युवाओं में आप भी शामिल थे। युपी के गवर्नर ने इनाम के तौर पर इन युवाओं को बेहतरीन नौकरियों का आफर दिया। एक ने सीविल सेवाओं का चुना और दस बरस में कमीशनर का दर्जा हासिल कर लिया। दूसरे युवा ने पुलिस विभाग को पसंद किया एवं आईजी तक तरक़्क़ी कर पहुंचा। तीसरा कानून व अदालत की तरफ गया व सेशन जज होकर रिटायर हुआ। किंतु नानाजान ने वह विभाग चुना जो सरकारी नौकरियों में सबसे घटिया माना जाता था। आपने शिक्षा विभाग का चयन किया था। नानाजान इस विभाग में बहुत से पदों पर रहे, लेकिन नौकरी बाक़ी रह्ते हुए मर्जी का रिटायरमेंट ले लिया। इसके बाद आपने पेंशन व बाक़ी संपत्ति से कसबे में स्कूल कायम किया। नाना के बाद मेरी शख्सियत पर दूसरा अहम प्रभाव अब्बाजान ख्वाजा ग़ुलाम का रहा । यदि बाबा की जिंदगी देश व समाज सेवा को समर्पित रही तो अब्बा के किरदार से मैंने बचपन ही में इंसा्नियतदोस्ती तथा प्रजातंत्र के उसूलों को समझा और सीखा। जिस खानदान तथा जिस माहौल में पैदा हुआ वहां छोटीमोटी जिम्मेदारियों पर झूठी तारीफ हो्ती थी। वहां भलमनसाहतकठोरता, ऊंचा खानदाननीचा खानदान,जातियों में कटटरता, ब्याहशादी में फिजूल खर्च, क़ब्रपरस्ती, उर्स व कव्वालियां, पीरीमुरीदी,मजलिस व मातम आम था। यदि मैं शुरू से ही इन चीजों के गलत प्रभावों से बचा रहा, उसमें अब्बा का किरदार अहम था। पांच बरस की उम्र तक मैंने लोकतंत्र का नाम भी नहीं सुना था ना इंसानी बिरादरी का मामला मुझे किसी ने समझाया था। इतना जरूर याद आ रहा कि हमउम्र मुलाजिम को गलत रूप से संबोधित करने की सजा तौर पर मुझे  घंटों अंध्रेरे कमरे में बंद रखा गया। अब्बा को सादगी कट्टरता की हद तक पसंद थी। ना आपको अंग्रेजी फैशन पसंद आए ना हिन्दुस्तानी टीपटाप ठीक लगे। अब्बा ने ना बेटियों के लिए आभूषण बनवाए ना ही बेटों को लंबे अंग्रेजी बाल रखने की आजादी दी। उर्स में जाकर क़व्वाली सुनना व सिनेमा को भी खराब मानते थे। चाय पीना व पान खाने के लिए भी बडी मनाही थी। आपकी ख्वाहिश रही कि मेरी औलाद सादा व ईमानदार जिंदगी के आदि हों ताकि  बेकार की चीजों से बचते हुए मुस्तक़बिल संवार सके। किसी को पान से होंठ रचाए हुए देखकर गंभीर चेहरा बना लेतेफरमाते खैरियत तो है? क्या चोट लगी कि मुंह से लहू जारी है? चाय को भांग कहतेचाय का शौकीन दोस्त मिलने आता तो कहते अरे अंदर जाकर कहो एक भंगड आया है, इसके लिए थोडी सी भांग घोल कर भेज दो। फिर भी अब्बा सभी के मतों का यथोचित सम्मान करते थे। आपने हमें अपनी राय रखने  की आजादी दे रखी थी। वो आखिर में मुस्लिम कांफ्रेंस की ओर झुके जबकि मैं सेक्युलरिजम का समर्थक था। लेकिन अब्बा ने कभी अपने आदर्श मुझ पर जबरन नहीं डाले । उनका जोर सियासी बहस पर जरूर हुआ करता था। आपके बहुत से दोस्तों ने बारबार समझाया कि अपने बेटे को क्रांतिकारी तहरीक का साथ देने से रोको,लेकिन एक बार भी आपने मुझसे नहीं कहा कि अब्बास कांग्रेस व सोशलिस्ट पार्टी का साथ छोड दे। दर असल वो इस बात से खुश थे कि उनका बेटा अपने उसूलों पर कायम रहने का हौसला रखता है।
यह तो हमें बचपन से मालूम था कि सभी मां की तरह हमारी अम्मी अपने बच्चों से बेपनाह मुहब्बत करती है। वक्तबेवक्त हम उनकी मुहब्बत का नाजायज़ फायदा भी उठाया करते, लेकिन उनकी जिदगी के आखरी दिनों में मुझे अम्मी के इंसानियत पसंद मजबूत किरदार का एहसास हुआ्। सन सैंतालीस में जब देश को बटवारा देखना पडा, अब्बा गुजर चुके थे। मेरी मां व बहनें पानीपत में जबकि मैं बंबई में था। पश्चमी पंजाब के पीडित हिन्दु सिख शरणार्थियों के आ जाने बाद पानीपत में मुसलमानों का रहना ठीक नहीं था। ज्यादातर लोगों के पास पाकिस्तान पलायन का ही विकल्प रह गया था। मेरी मां पर भी दोस्तों व रिश्तेदारों ने दबाव डाला कि वो उनके साथ पाकिस्तान चलें, मुझे भी बंबई से करांची बुलाने के लिए कहा गया।  अम्मी ने साफ मना कर दिया कि हम अपना वतन नहीं छोडेंगेमेरे बेटे ने हिन्दुस्तान में रहने का फैसला किया है। इस फैसले में मैं उसके साथ हूं ! आपने दंगों से डर से अपना घरवतन नहीं छोडा। यह फसाद बीस रोज से अधिक कायम रहे, अनेक बार कर्फ्यु लागू हुआ। घर में चटनी रोटी खाकर गुजारा करना पड्रता और पान जिसके बिना अम्मी का रहना मुश्किल हो जाता था वो भी नेमत हो चुका था। पान पत्ते के दस छोटे टुकडे आप किसी तरह दिन भर गुजारती। एक मिलट्री गाडी इन सबको पानीपत से निकाल लाने के लिए दिल्ली से रवाना हुई। रातों रात मुसलमान औरतों को अपना घर और वतन छोडना पडा। बीस दिन वो सब दिल्ली में रहे। एक कमरे में तीस आदमियों को रखा गया, इसी बीच खबर आई कि पानीपत में हमारे घर लूट गए। उन हालात में अम्मी हवाई जहाज से मेरे पास बंबई चली आईं । जान बचाने के लिए बुर्क़ा छोडना पडा आपको। मैं डरा हुआ था कि बुरे दिनों का अम्मी के दिमाग़ पर जाने क्या गलत असर पडा होगा। मगर पहले लफ्ज जो एयरपोर्ट पर आपसे सुने भइ मैं तो अब हमेशा हवाई जहाज में सफर किया करूंगी। बडे आराम की सवारी है! उस रात पानीपत के हालात सुनाते हुए इन्होंने कहा कि ना यह अच्छे ना वो अच्छे, ना मुसलमानों ने कसर उठा रखी ना हिन्दुओं और ना ही सिखों नेसबके सरों पर खून सवार है। मगर मुसलमान होने की हैसियत से मैं तो मुसलमानों को ज्यादा इल्जाम दूंगी । शख्सियत जिन्होंने मुझे प्रभावित किया? यह सुचि तो लंबी होती जा रही, किसकिस का नाम गिनाऊं? अपने रिश्तेदारों में एक और हस्ती का जिक्र करना जरूरी है। वो मेरे चचाज़ाद भाई ख्वाजा गुलाम थे,आप केंद्र सरकार के शिक्षा विभाग में सचिव रहे। लेकिन बचपन से आजतक मैं आपको भाईजान कहता आया हूं। मेरे ख्याल में बचपन में हर किसी का एक आदर्श हुआ करता है। आमतौर पर वो उसका बडा भाई होता है। वो आदमी जिसको देखकर बच्चा उसकी नक्ल करना चाहता है। इस तरह बचपन में प्रेरणा के तहत छोटा भाई बडे भाई के नक्शकदम पर चलना चाहता है। मेरा अपना कोई भाई नहीं था, चचाज़ाद भाइयों को अपना सगा भाई समझता था। भाईजान मुझसे दस बरस बडे हैं, जब मैं पानीपत के प्राईमरी स्कूल में था उस वक्त आप अलीगढ में पढ रहे थे। छुटटियों में वो जब आते उनकी भारी भरकम अंग्रेजी की किताबों व टेनिस रैकट का बडा प्रभाव पडता था। आप जब युनिवर्सिटी मैगजीन के लिए आलेख तैयार करते तो मेरा भी मन कहता कि कभी किसी दिन मेरी कलम में भी ताकत हो जाए कि आलेख लिख सकूं। आगे की पढाई के लिए भाईजान इंग्लैंड चले गए। वहां से उनकी खत-तस्वीर व कार्ड्स आने लगे तो हमारे लिए हैरत व दिलचस्पी का सामान हो गया। लंदन-लार्ड्स-केंब्रीज-आक्सफोर्ड-पेरिस व जेनेवाहम एटलस में इन शहरों को तलाश करने लगे। वहां से आई तस्वीरों को संभाल कर अल्बम में लगाना भी काम हो गया। दिल ही दिल में सोंचते कि क्या कोई दिन ऐसा आएगा कि हम भी उस दिलचस्प व रंगीन दुनिया की सैर कर सकेंगे। आप विलायत से कामयाब होकर अलीगढ में प्रोफेसर नियुक्त हुए।
सन पच्चीस में अलीगढ युनिवर्सिटी की सिल्वर  जुबली थी । जिद करके नाना के साथ मैं भी अलीगढ चला आया। युनिवर्सिटी के शानदार इमारतों और जुबली के हंगामों के बीच डिबेट का कार्यक्रम सबसे हटकर था। जुबली डिबेट कंपीटिशन में भाईजान हीरो बनकर उभरे। अगर मैं किसी घटना को याद करूं जिसने मेरी जिंदगी को सबसे ज्यादा प्रभावित किया, वह यही डिबेट कंपीटिशन होगा। तकरीबन पांच हजार लोगों की भीड होगी। मंच पर मुसलमानों के सबसे मशहूर नेता मौजूद थे। मुहम्मद अली जिन्ना-सर आगा खान- मुहम्मद इक़बाल- अली इमाम आदि। डिबेट का विषय हिन्दुस्तान के मुसलमानों को क़ौमी सियासत में बाक़ी क़ौमों के साथ मिलकर काम करना चाहिए, अपनी अलग सियासी पार्टी नहीं बनानी चाहिए। यह बात पक्ष में भाईजान ने रखी जिसको वहां आए सभी मशहूर लोगों ने काटने की कोशिश की। उस वक्त मैं अंग्रेजी ना के बराबर जानता था लेकिन देख सकता था कि भाईजान ने वहां तक़रीर की। आपने वो तक़रीर की जो अलीगढ के इतिहास में आज भी यादगार है। इसने मेरी जिंदगी का रूख मोड दिया था। आपकी तक़रीर खत्म होते ही पंडाल तालियों से गूंज उठा। आपके विपक्ष में बोलने वाले मिस्टर अली इमाम ने आपको गले लगा लिया था। इस पर मेरे धडकते हुए दिल ने कहा भाईजान ने बहुत खूबसुरत व काबिले तारीफ तक़रीर पेश की है, एक दिन मैं भी इनकी तरह बनूंगा। लेकिन इसके लिए बहुत कुछ पढना-लिखना पढेगा, बडे आदमियों का मुक़ाबला करना पडेगासब करूंगासब करूंगा। इनके अलावा वो शख्सियत भी जिनसे मैं ही नहीं मेरी उम्र के करोडों हिन्दुस्तानी प्रभावित हुए हैं। जिनकी छाप हमारी जिंदगी व किरदार पर कायम है। महात्मा गांधीइनको पहली बार जब देखा तो उस वक्त मेरी उम्र पांच या छह बरस की थी,लेकिन उस बचपन में भी उनकी महान शख्सियत ने मुझे प्रभावित किया। भगत सिंह जिनकी शहादत के दिन मैं और मेरे कालेज के बहुत से साथी इस तरह फूट-फूट कर रोए कि हमारा सगा भाई शहीद कर दिया गया है। जवाहरलाल नेहरू जिनको कालेज के दिनों से हम युवाओं का लीडर समझते थे। आपकी क्रांतिकारी भाषणों व अभियानों का एक-एक लफ्ज मुझे याद हो गया था। मुंशी प्रेमचंद जिनकी किताबों से सीखा कि अदब में इंसानी जिंदगी का सच्चा अक्स  होता है।
घटनाएं… ? पहली कभी ना भुलाए जाने वाली घटना सन अठारह-उन्नीस की थी। उस वक्त तकरीबन मैं पांच बरस का था, पानीपत के प्राईमरी स्कूल की पहली क्लास में पढ रहा था। जालियांवाला का खूनी खेल खेला जा चुका था। तमाम पंजाब की आबादी को हुक्मपरस्ती व फरमाबरदारी का सबक पढाया जा रहा था। दिल्ली से पेशावर जाने वाली सडक के किनारे आबाद शहरों के स्कूलों को कहा गया कि वो अपने बच्चों को सडक के किनारे क़तार में खडा करें क्योंकि वहां से अंग्रेजी फौज के घुडसावर गुजरने वाले थे। सुबह सवेरे से हम वहां गर्मियों की धूप में वहां खडे रहे, बहुत से बच्चों को लु लग गई। एक भूख व दहशत से बेहोश हो गया। तब जाकर अंग्रेजी फौजों के लाल-लाल चेहरों के दर्शन हुए। उस जमाने में राकेट व एटम बम का ईजाद नहीं हुआ था। लेकिन अंग्रेजी टुकडी के पास जितने भी खतरनाक हथियार रहे वो सभी इस जुलुस में हमारी आंखों से गुजरे। तोप-मशीन गन-राइफल-बंदूक-भाले-पिस्टल व तलवार हमारे दिलों में बर्तानिया हुक्मरानों का भय बनाने के निकाले गए थे। फौजी टुकडी व हथियारों का यह जुलूस तीन घंटे तक जारी रहा। जिस मकसद से यह नुमाईश की गयी उसमें कोई कामयाबी नहीं मिली क्योंकि बच्चों के दिलों में अंग्रेजो के लिए नफरत डर से बहुत ज्यादा थी। शाम को हम जब भूखे प्यासे घरों को लौटे तहरीक़ ए खिलाफत व असहयोग के जनवादी गीत गाते हुए घरों को आए। उस दिन एक चार-पांच साल के लडके ने दिल ही दिल में यह तय कर लिया कि अंग्रेजों की सरकारी नौकरी नहीं करूंगा। अब पचास बरस बाद भी जब अंग्रेज नहीं रहे ।  आजाद हिन्दुस्तान की अपनी खुद की हुकूमत कायम है,

2 COMMENTS

  1. Bahut khoob….dil ko chhune waali rachna hai ..ab to Puri novel padhne ko jee kar raha hai ..yah extract sajha karne ke liye shukriya.

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