हृषीकेश सुलभ कथाकार हैं, क्रॉनिकल राइटर नहीं!

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हृषीकेश सुलभ के छठे कहानी संग्रह ‘हलंत’ की कहानियों को पढ़ते हुए यह मैंने लिखा है- प्रभात रंजन 
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हृषीकेश सुलभ की कहानियों का छठा संग्रह ‘हलंत’ पढ़ते हुए बार बार इस बात का ध्यान आया कि संभवतः वे हिंदी के अकेले समकालीन कथाकार हैं जिनकी कहानियों का कंटेंट लगातार समकालीन बना रहा है. बिखरते-बनते समाज के रोयें-रेशे से बुनी उनकी कहानियाँ कई अर्थों में समकालीन समय-समाज के दस्तावेज की तरह हैं. स्पैनिश भाषा के लेखक मारियो वार्गास योसा ने गल्पकार को परिभाषित करते हुए लिखा है कि जो सबको दिखाई देता हो गल्पकार का काम उसको बताना-दिखाना नहीं है. यह काम तो क्रॉनिकल राइटर का होता है. लेखक का काम होता है जो दिखाई दे रहा है, जो सामने चमक रहा है उसके पीछे छिपे सच को दिखाना. चमक-दमक के पीछे की स्याही को दिखाना. हृषीकेश सुलभ की कहानियां यही काम करती हैं. विस्थापन के दौर में छूटती जाती, बदलती जाती दुनिया की वह कहानी जिसके बारे में कहीं लिखा नहीं जाता. सुलभ जी मूल रूप से कथाकार हैं क्रॉनिकल राइटर नहीं. इसलिए उनकी कहानियों की ज़मीन लगातार विस्तृत होती गई है, समृद्ध होती गई है.  

‘हलंत’ संग्रह की पहली ही कहानी है ‘अगिन जो लागी नीर में’. विस्थापन के कारण गाँव की अपनी संस्कृति, अपनी परम्परा का किस कदर क्षरण हुआ है यह कहानी बड़ी बारीकी से इसकी कहानी कहती है, किस तरह विकास के बनते नक़्शे से गाँव बाहर होता जा रहा है, किस तरह गाँव की पहचान गुम होती जा रही है, लेखक ने बिना जजमेंटल हुए इस कहानी में इन पहलुओं को उठाने की कोशिश की है. गाँव को लेकर यह कहानी विकास बनाम विनाश के प्रचलित फ़ॉर्मूले को तोड़ती है और भावुकता से हटकर गाँव का बदलता हुआ यथार्थ सामने लाती है. गाँव की कहानी के नाम पर हिंदी में या तो जाति संघर्ष की कहानियां लिखी जाती हैं या राजनीतिक चक्र-कुचक्र की कहानियां. विस्थापन के दबाव में गाँव की सामाजिक संरचना किस तरह बदल रही है, गाँव में शहर बन जाने की लालसा किस तरह बढ़ रही है यह कहानी बिना लाउड हुए इस पहलू को सामने रखती है. रेणु की कहानियों की तरह ‘अगिन जो लागी नीर में’ कहानी में भी गाँव पूरी जीवन्तता के साथ मौजूद है, जो इस बात से आश्वस्त करता है कि गाँवों की सामाजिकता अभी भी कायम है लेकिन उसका रंग ढंग बदल रहा है. मुझे नहीं लगता है कि नई शताब्दी में गाँव को लेकर ऐसी कोई कहानी लिखी भी गई है. निस्संदेह यह इस संग्रह की सबसे यादगार कहानी है. बदलाव को मजबूती से रेखांकित करती हुई.

संग्रह में ग्रामीण परिवेश की एक और जीवंत कहानी है ‘काजर आँजत नयन गए’. कहानी हमें लेकर जाती है गाँव-देहातों की जातीय राजनीति, उसकी बदलती हुई दुनिया और उसमें स्त्री शक्ति की केन्द्रीयता है. यह एक अजीब विरोधाभास है कि जिस दौर में महिला आरक्षण के कारण ही सही हिंदी पट्टी में पंचायत चुनावों में महिलाओं की राजनीतिक सहभागिता बढ़ी है, उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा बढ़ी है, उस दौर में ग्रामीण समाज में महिलाओं की राजनीतिक सहभागिता को लेकर हिंदी में कहानियां न के बराबर लिखी गई हैं. यह एक उदाहरण भर है जो यह बताता है कि हिंदी कहानियां अपने समाज से, अपनी जड़ों से कटती जा रही हैं. उनमें अपने समकाल की आहट कम सुनाई देती है. हिंदी कहानियों के कुछ बने बनाए फ़ॉर्मूले हैं, कुछ परम्पराओं के फीते हैं जिनसे कहानियों नाप तौल की जाती है. जिनकी रचनाओं में यथार्थ उनसे भिन्न होता है उनको कहानियों की तथाकथित चौहद्दी से बाहर कर दिया जाता है. इसकी वजह से होता यह है हिंदी कहानियों में बदलते समाज की आहटें कम दर्ज हो पाती हैं. जो कहानियां इन बने बनाए फ़ॉर्मूले से भिन्न होती है, उनको जैसे जात निकाला दे दिया जाता है, कथा परम्परा के हाशिये पर ठेल दिया जाता है.

काजर आँजत नयन गए कहानी के केंद्र में वह जातीय संघर्ष है जो हिंदी पट्टी की राजनीति की धुरी रही है. बदल कुछ नहीं रहा, वही षड़यंत्र, वही कुचक्र, बस उसकी डोर स्त्री बड़ी मजबूती से थाम रही है. कहानी में सुधा सिंह यादव का किरदार बड़ी मजबूती से केंद्र में आता जाता है. स्थानीय राजनीति में स्त्री का गुड़िया की तरह उपयोग की एक रूढ़ छवि से यह भिन्न स्त्री है जो हिंदी कहानी की बदलती जमीन की तरफ इशारा करती है. वह सत्ता का नया कोण बनकर सामने आ रही है.  

इन दो कहानियों की चर्चा से से बात आरम्भ करने का मतलब यह नहीं है कि सुलभ जी ग्रामीण समाज के उल्लेखनीय कथाकार हैं. नहीं, यह निवेदन मैंने आरम्भ में ही किया था कि गाँव बनाम शहर के क्लीशे को तोडती हुई कहानियां हैं हृषीकेश सुलभ की. वे बदलाव के कथाकार हैं जिनकी कहानियों के कथानक  विस्थापन के इधर और उधर अवस्थित हैं. संग्रह की एक कहानी है ‘हलंत’. विस्थापितों के शहर में बढ़ती अजनबियत ने किस कदर हमारे जीवन को असुरक्षित बना दिया है, आपसी संबंधों में संवेदनहीनता बढती जा रही है. शहर में अहिंसा मैदान है, उस मैदान में एक दिन कुछ अज्ञात लोगों द्वारा धमाका किया जाता है और उसके बाद शहर के ज्ञात लोगों में भय व्याप्त हो जाता है. न जाने कब कौन पकड़ा जाए. आखिर में जो पकड़ा जाता है उसके बारे में किसी ने सोचा भी नहीं था. कहानी में कहीं यह संकेत नहीं आता है कि किस शहर के अहिंसक माहौल के हिंसात्मक होते जाने की यह कहानी है. सिवाय इसके कि कहानी में यह उल्लेख आता है कि वह शहर कस्बाई है. यानी जो रोग महानगरों के माने जाते थे. जिनकी वजह से नई कहानी के दौर में कमलेश्वर की कहानी ‘दिल्ली में एक मौत’ बहुत मानीखेज मानी जाती थी. इसमें सिग्नेचर ट्यून की तरह एक ट्रेजिक प्रेम कहानी है, जिसमें भावनात्मकता की जगह व्यवहारिकता हावी होता जाता है. इतना कुछ हो जाता है लेकिन क्यों हो जाता है यही समझना मुश्किल होता जा रहा है. सब कुछ पीछे छूटता जा रहा है.

संग्रह में एक अलग मूड की, अलग कैफियत की कहानी है ‘उदासियों का वसंत’, जो विशेष तौर उल्लेख किये जाने की मांग करती है. हम सब जानते हैं कि आभासी दुनिया का हमारी वास्तविक दुनिया में दखल बढ़ता जा रहा है, लेकिन उसके गंभीर प्रभाव को हम सभी स्वीकार करने से बचते हैं, सार्वजनिक तौर पर उससे कतराते हैं. हम जानते हुए भी यह नहीं मानना चाहते हैं कि संबंधहीनता के दौर में संबंधों की यह आभासी दुनिया सुकून देती है. यह कहानी उसका न सिर्फ सहज स्वीकार है बल्कि हमारे एकाकी होते जाते जीवन में उसकी सकारात्मक भूमिका के ऊपर बहुत विश्वसनीयता से मुहर लगाती है. इस कहानी पर टिप्पणी करते हुए अपने फेसबुक पोस्ट में वरिष्ठ आलोचक पुरुषोत्तम अग्रवाल ने इस बात को सही रेखांकित किया है-  फेसबुककी आभासी दुनिया हमारे वास्तविक अनुभवों की दुनिया को केवल विपन्न नहीं करती, उसे संवेदना के लिहाज से संपन्न भी करती है।“ संवेदनहीन होते समय में संवेदना से संपन्न कहानी है यह.

कहानी में कथानायक के सामने यह द्वंद्व है कि वह अपने अतीत से कैसे निकले, उस अतीत से जो घाव के जख्म की तरह बचा रह गया है, बीच बीच में टीस देता हुआ. पत्नी और बेटी की यादें धुंधलाती जा रही हैं लेकिन वह उससे मुक्त नहीं हो पा रहा है. पत्नी शोध करने अमेरिका गई और वहां से कभी नहीं लौटी, बाद में उसकी बेटी को भी ले गई. जिससे उसके बाद उनका मिलना कभी नहीं हो पाया. हाँ, फेसबुक पर वह उनके साथ चैट करती रहती है. उसी फेसबुक के माध्यम से उनके जीवन में बिन्नी नाम की एक अपेक्षाकृत युवा लड़की आ जाती है, उसके अकेलेपन के साथ अपने अकेलेपन को साझा करने लगती है. उसका भी अपना अतीत है. जिसे पीछे छोड़ वह आगे बढ़ना चाहती है. उम्र के फासले के बावजूद जीवन के फासले कम होते जाते हैं. कथानायक अपनी स्मृतियों की अतीत यात्रा पर मन्नार जाता है और वहीं अपने अतीत से मुक्त हो जाता है, दोनों अपने  वर्तमान को स्वीकार कर कर लेते हैं. मुझे रूथ प्रवर झाबवाला की कहानी ‘इन द माउंटेन्स’ याद आती रही. हालाँकि उस कहानी का सन्दर्भ अलग है, पृष्ठभूमि अलग है लेकिन एकाकीपन यही है.

यह आज की कहानी है और अलग से बहस की मांग करती है. छह कहानियों के अपेक्षाकृत इस छोटे से संग्रह में ये चारों कहानियां समकालीन वृहत्तर समाज के बदलाव के दस्तावेज की तरह हैं, उनके गाँव भी गत्यात्मक हैं, उनको लेकर कहीं यह भाव नहीं है कि हाय-हाय हमारा गाँव क्यों बदल गया? हम बदले तो बदले लेकिन हमारे मन में बसा वह गाँव क्यों बदल गया. अब हम किसको याद करके भावुक होंगे. ये सारी कहानियां भावुकता से मुक्त हैं, बल्कि भावुकता के स्थान पर इन कहानियों में एक अन्तर्निहित व्यंग्यबोध है. लेकिन किसी तरह का सिनिसिज्म नहीं है.

सुलभ जी की कहानियों में एक बात जो पढ़ते हुए सहज रूप से अपना ध्यान खींचती है वह उनकी नाटकीयता है. ‘अगिन जो लगी नीर में’ और ‘काजल आँजत नयन गए’ कहानियों में नाटकीयता कहानी को नए नए सन्दर्भों, नए नए संकेतों से भर देती है. लोकगीतों की हुक जिसमें टेक की तरह मौजूद है. कहानियों की भाषा सम्मोहक है, वाचिक शैली की याद दिलाती हुई. उनको पढने का नहीं सुनने का भी अपना आनंद है- सामने नदी थी…नदी में जल न के बराबर  था। लगभग सूखी हुई नदी। बीच-बीच में…कहीं-कहीं…छिट-पुट जल के छिछले चहबच्चे थे। नदी-तल में बिछे पत्थर के निरावृत्त टुकड़े। निस्तेज। धूमिल। जल ही तो था जो उन्हें सींचता…जिसका प्रवाह उन्हें माँजकर चमकाता…आकार देता और अपने साथ लाए खनिजों से उन्हें रंगता…आभा देता। जल की थाप से ही मृदंग की तरह बोलते थे ये पत्थर और लहरें अपने प्रवाह से इन्हें तारवाद्य की तरह झंकृत करतीं थीं। अब जल नहीं था.

जिस कहानी संग्रह में चार कहानियां ऐसी हों जो ट्रेंडसेटर हों, कहानियों के नए सीमांतों की तरफ इशारा करती हों, वह निस्संदेह हमारी भाषा के लिए, हमारी कथा-परम्परा के लिए एक उपलब्धि की तरह है. वर्ष 2014 में जितने कहानी संग्रह आये उनमें अलग से उल्लेख करने योग्य- हलंत. उम्र के 60 वें साल में छह कहानियों के इस संग्रह के साथ हृषीकेश सुलभ ने कथा-जगत में एक बड़ी लकीर खींची है.    

समीक्षित पुस्तक: हलंत; कथा सग्रह; लेखक- हृषीकेश सुलभ, राजकमल प्रकाशन, मूल्य- 250 रुपये. 

5 COMMENTS

  1. जितनी अच्छी सुलभ जी की कहानियाँ उतना ही आपका लिखा हुआ भी।

  2. छठे कथा-संग्रह तक की यात्रा सुखद है ; सुलभ जी का रचना-संसार लगातार समृद्ध हुआ है और पाठको से निकटतर भी ।

  3. मैंने पहली बार सर का कोई संग्रह पढ़ा और यही बात कौंधी मन में.. कितने यूनिवर्सल हैं.. अपने एप्रोच में. रिलेट कर सकते हैं आप.. भाषा और चित्रण इतना सहज है.. बहुत विस्तृत कैनवस..

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