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निर्मल को पढने से मन निर्मल हो जाता है


आज महान लेखक निर्मल वर्मा की पुण्यतिथि है. लेखिका दिव्या विजय ने उनके लिखे किरदारों को नाटक में जीने के अपने अनुभव के आधार पर लिखा है कि किस तरह निर्मल वर्मा के लिखे को महसूस किया जा सकता था. हिंदी के उस विश्वस्तरीय लेखक को श्रद्धांजलि- मॉडरेटर 
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निर्मल वर्मा को पढ़ना अपने मन की वे बातें पढ़ना है जिनसे हम ख़ुद भी वाक़िफ़ नहीं होते। प्रकट में दिखती हुई ख़ुशी के बरअक्स वे हमारी गोपन उदासियों को मन के बाहर निकाल हमारे सम्मुख रख देते हैं। विरेचन-सी इस क्रिया के पश्चात् मन धुला और निर्मल हो जाता है। हम सब इसीलिए बार-बार उनके पास लौटते हैं। उनका अक्स उनके लिखे हर हर्फ़ में महसूस होता है और उन्हें निजी तौर पर जानने की इच्छा बार-बार सर उठाती है। उन्हें पढ़ते हुए उन्हें और उनके क़िरदारों को महसूस करना लाज़िमी है पर उनका लिखा हुआ क़िरदार हो जाना लम्बे समय तक साथ रहने वाला अनुभव है। 
एक दफ़ा मुझे उनके लिखे  वीकेंड एकालाप  का मंचन करने का अवसर मिला। जब मुझे तीन एकांत के दो स्त्री मोनोलॉग में से एक चुनने को कहा गया तो मुझे सबसे अधिक वीकेंड ने अपील किया था. वीकेंड ने मुझे चमत्कृत कर दिया था। प्रेम में होते हुए हमारे लिए संसार प्रेममयी हो जाता है। प्रेम से उपजी पीड़ा में संसार-भर की पीड़ा में हम अपना अक्स खोजने लगते हैं। प्रेम का अभाव हमें प्रेम से भर देता है वहीं प्रेम की उपस्थिति में हम और अधिक प्रेमिल हो उठते हैं। प्रेम हमें एकांत की ओर धकेलता है, एकांत हमें आनंदित करता है, प्रेम का न होना उस एकांत को उजाड़ देता है, एकांत का आनंद निर्जनता में बदल जाता है। 
महीने-भर की रिहर्सल में मैं बार-बार उनके लिखे हुए शब्दों के निकट पहुँचती परंतु वे दूर होते चले जाते। अक्सर झुंझला कर स्क्रिप्ट रख देती। फिर-फिर स्क्रिप्ट उठाती और उतनी ही बार उसे परे खिसकाती। फिर धीरे-धीरे मुझे उस लड़की के भीतर के अंतराल आवाज़ देने लगे…लड़की की पीड़ा से परे धकेलती चेताती-सी पर उतनी ही आकर्षक आवाज़। मैं खिंचने लगी…मैं लड़की हो जाने के ख़्वाब देखने लगी। पर क्या उस लड़की जितनी पीड़ा जुटाना सरल था। प्रेम को वीकेंड्ज़ के खाँचे में बँटे हुए देखना और अपने मन को उन टुकड़ों से सींचना। मन रेगिस्तान हुआ जाता….पानी की बूँद को तरसता। मैंने ये कहानी उन दिनों एक दोस्त को सुनायी थी। वो रोने लगा था। उसने लड़की में अपने अधूरे-प्रेम का अक्स देखा था। उसका रोना सुन मैं हतप्रभ थी। मृत्य में से जीवन खोज लेने वाला प्रेम कैसे मस्तिष्क को परजीवी-सा कर देता है…प्रेम पर आश्रित। प्रेम किस तरह मस्तिष्क को चेतना शून्य करता चला जाता है…किसी प्रबल औषधि की तरह। 
लड़की एक बच्ची के एकल पिता के संग प्रेम में थी। लड़की निर्णय चाहती थी मगर उस पर दबाव डालने से डर जाती थी। जैसे उस आदमी की पत्नी से उसे खो दिया वह उसे खोना नहीं चाहती थी। वो गहरे प्रेम में थी। वीकेंड वाले प्रेम में…चोरी छिपे किए जाने वाले प्रेम में…पास के शहर के किसी कमरे में किए जा सकने वाले प्रेम में। वह इतने गहरे प्रेम में थी कि अपने हिस्से के प्रेम को कैसे भी बचाए रखना चाहती थी। उद्विगनता में आदमी के सामने क्षणिक विद्रोह प्रेम के आगे विफल हो जाता। यह सचेत क्षण आहिस्ता- आहिस्ता ऊँघने लगता और उन दोनों का प्रेम कई घाटियाँ पार करता हुआ शीर्ष पर जा पहुँचता। मुझे उस प्रेम को जीना था। लड़की की तेज़ अधीर साँसों के नृत्य को सबसे ऊँची चोटी पर जा थमना था…उसकी थकन को वाष्पित होते प्रेम को पकड़े रख उसके नीचे ठहरना था। 
उसको जीते हुए मेरी साँस रुकने लगती। उदासी का एक घेरा होता जिसमें मैं प्रवेश कर जाती और देर तक बाहर निकलने को तड़फड़ाती रहती। मगर लड़की में धैर्य था…साहस था। वह अपने अकेलेपन में दम नहीं घोंट देती थी। उसमें वीकेंड्ज़ को पड़ाव की तरह स्वीकारने का साहस था। अपने एकांत-से प्रेम की मिठास तक पहुँचने का धैर्य था। मैं जलती बुझती रोशनियों की तरह अवसाद की रेखाओं के बीच हाथ -पाँव मारती। इस अवशता के बीच मैं उस लड़की का आह्वान करती। वो नहीं आती। मैं वहीं मर जाती। वो लड़की कान में आकर कुछ फुसफुसाती। अपने रहस्य कहती। प्रेमी के स्पर्श दिखाती…मन के ज़ख़्म ज़ाहिर करती। मैं फिर जी जाती मगर मैं वहीं रह जाती। 

मैं टाइल्ज़ पर होती…मैं छत को भेद कर पार्क का आसमान देखती। बिना जली सिगरेट से धुआँ उठता.. उस धुएँ में लड़की का प्रेमी दीख पड़ता। उसकी बच्ची दिखती। बच्ची की चीखें…बच्ची की आँखें…और बच्ची के मौन प्रश्न दिखायी देते।  मैं पवेलियन की सीढ़ियाँ चढ़तीं और सबसे ऊपर पहुँच कर लड़की को आवाज़ देती।  दिन भागते हुए आता और सब धुँधला जाता। मैं लड़की की बाँह पर सिर रखे आदमी और बच्ची को खेलते देखती। मैं लड़की की आँखें देखती…वो उन्हें मूँद लेती। मैं उसकी पीड़ा टटोलना चाहती…लड़की चमक में खो जाती। मैं आदमी को देखती….मेरी आँखें एक्स-रे हो जातीं…पर मुझे उसके भीतर कुछ नहीं दिखायी देता। उसके बंधनों के बीच प्रसन्नता झाँकती। लड़की की ईर्ष्या मुझे छूकर गुज़र जाती। दिन घिरने लगता। मैं परछाइयाँ बुनतीं। उनसे प्रेम बरसता….लड़की का प्रेम अनंत था। लड़की की आत्मा निर्वस्त्र हो मेरे सामने अलख जगाती। उसका विश्वास मुझे चकाचौंध करता। उसका प्रेमी बिस्तर पर बैठ मेरे बाल सहलाता। मुझे सुगबुग़ाते अंधेरे दिखायी देते…बिस्तर की सिलवटें नज़र आतीं। मुझे निर्णय-अनिर्णय के बीच झूलती लड़की दिखायी देती। लड़की चिनार के पत्ते देखती…गरमियों के दिन गिनती। मैं लड़की के छूट गए हिस्से बटोरती। लड़की स्वीकार करती कि हर रोज़ किसी के साथ सोए हुए बिस्तर पर उठना उसकी नियति नहीं है….उसके ठंडेपन को झकझोर कर मैं देखती कहीं वो अपने प्रेमी की दुर्बलता को ढकने का प्रयत्न तो नहीं कर रही। 
नियत दिन मैं मंच पर थी। घुप्प अंधेरे में ख़ुद के ही ट्राली बैग से मेरा पैर चोटिल हो गया था। मेरा नाख़ून कोने से उखड़ कर ख़ून से भीग रहा था। मैंने दूसरे पाँव से उस जगह को ज़ोर से भींच लिया। दस सेकंड के अन्दर पीले आलोक के वृत्त में मैं होने वाली थी। निर्लिप्त अंधेरे में मेरा वॉयस ओवर गूंजा और प्रकाश के केंद्र में मैं थी…ख़ुद की आवाज़ सुनते हुए। अब मुझे दर्द नहीं हो रहा था। ख़ून का बहना ठहर गया था। लड़की के छिपे हुए स्थानों से मैं अवगत थी। मैं उन स्थानों को लाँघते हुए ख़ुद को उत्सुकता से देख रही थी। मौसम मेरे आगे ठिठक कर खड़े थे। रेलों की सीटियाँ सुरंग से गुज़रते हुए अपने निशान छोड़ रही थीं। उजड्ड जंगल मेरे भीतर उग रहे थे। मैं बेतरतीब उनके बीच पगडंडियाँ तलाश रही थी। साँसें मेरे आगे करवट बदल रहीं थीं। शुरू में मैं चौकन्नी थी….धीरे-धीरे बहने लगी। फिर वो क्षण आया जो मुझे कभी नहीं भूलता। मुझे निर्णय लेना था। ठीक उस क्षण… उसी क्षण मैं ब्लैंक हो गयी थी। नहीं…मैं कुछ भूली नहीं थी। पर मैं शून्य में थी…लड़की के भीतर उतर रही थी। लड़की जा रही थी…मैं क्या सचमुच चली जाऊँगी। मैं ठहर गयी थी। पॉज़ का अंतराल बढ़ गया था। मैं नहीं जाना चाहती थी। लड़की जाना चाहते हुए भी अगले वीकेंड के इंतज़ार में थी। उस एक पल के लिए मैं लड़की थी। मंच पर लैम्प पोस्ट उतर रहे थे…कंदीलों की तरह। मैं उन्हें वहीं उसी वक़्त बुझा देना चाहती थी। दीवारें पारदर्शी हो गयी थीं। मुझे कमरे के भीतर की गंध बुला रही थी….अलसायी-सी क़ुनमुनाती गंध। लड़की को पलटना था…मगर मैं सिर्फ़ ठिठकी थी…मैं पीछे देखना चाहती थी। पर मैंने बग़ैर पीछे देखे ही कमरा और उसमें ठहरे क्षण देख लिए थे। मैंने एक गहरी साँस भरी…और स्वयं के पूर्ण होने की प्रतीक्षा लिए मैं लौट आई थी। 
दिव्या विजय 

पैर का ज़ख़्म भरने में महीनों लगे थे। मन यूँ रीता था कि फिर हर दफ़ा भरते-भरते रह जाता। लड़की का क्या हुआ होगा….मैं सचमुच नहीं समझ पायी थी. उसका लौटना सदा के लिए था अथवा अस्थायी। यह एक कड़ी उलझी रह गयी थी.
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दो बरस बाद मैं शिमला के इंडीयन इंस्टिट्यूट ऑफ़ एडवांस्ड स्टडीज़ के भीतर खड़ी थी। निर्मल वर्मा की धूप में नहाई अनदेखी उजली तस्वीर उनके समकालीन लेखकों के साथ वहां एक दीवार पर थी। मैंने उनकी आँखों में झाँक कर देखा. उनके जन्मस्थल पर उनकी आँखें अधिक मुखर थीं. मुझे उत्तर मिल गया था। 

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2 comments

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ’ फ्लॉप शो का उल्टा-पुल्टा कलाकार – ब्लॉग बुलेटिन’ में शामिल किया गया है…. आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी….. आभार…

  2. कभी-कभी हमारे पास कुछ ख़ास लिखे के लिए कोई आम या ख़ास शब्द भी नही रहता… इस लिखे को पढ़ने के बाद भी यही हुआ……..

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