इस साल की मेरी सबसे प्रिय कहानी ‘बारिश, धुआँ और दोस्त’

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इस साल पढ़ी गई कहानियों में जिस कहानी का असर मेरे ऊपर सबसे गहरा रहा वह कहानी है प्रियदर्शन की बारिश धुआँ और दोस्त. यह कहानी किसी विराट का ताना-बाना नहीं बुनती बल्कि नई कहानी आन्दोलन की कहानियों की तरह अपने समकालीन जीवन के बहुत करीब है. संबंधों की एक धूपछाँही दुनिया के होने न होने के द्वंद्व के बीच लगभग काव्यात्मक भाषा में लिखी गई यह कहानी एक तरह से समकालीन कहानी के प्रस्थान बिंदु की तरह है- टर्निंग पॉइंट. यूँ ही मैं नहीं कहता कि प्रियदर्शन को कहानियां ही लिखनी चाहिए, कविताएं नहीं- प्रभात रंजन 
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वह कांप रही है। बारिश की बूंदें उसके छोटे से ललाट पर चमक रही हैं।
`सोचा नहीं था कि बारिश इतनी तेज होगी और हवाएं इतनी ठंडी।‍`उसकी आवाज़ में बारिश का गीलापन और हवाओं की सिहरन दोनों बोल रहे हैं।
मैं ख़ामोश उसे देख रहा हूं।
वह अपनी कांपती उंगलियां जींस की जेब में डाल रही है। उसने टटोलकर सिगरेट की एक मुड़ी सी पैकेट निकाली है।
सिगरेट भी उसकी उंगलियों में कुछ गीली सिहरती लग रही है।
उसके पतले होंठों के बीच फंसी सिगरेट कसमसाती,  इसके पहले लाइटर जल उठा।
फिर धुआं है जो उसके कोमल गीले चेहरे के आसपास फैल गया है। 
`
आपको मेरा सिगरेट पीना अच्छा नहीं लगता है न। `उसकी कोमल आवाज़ ने मुझे सहलाया।
यह जाना-पहचाना सवाल है।
जब भी वह सिगरेट निकालती हैयह सवाल ज़रूर पूछती है।
जानते हुए कि मैं इसका जवाब नहीं दूंगा। 
लेकिन क्यों पूछती है?
मत दो जवाब,’ इस बार कुछ अक़ड के साथ उसने धुआं उड़ाया। 
मैं फिर मुस्कुराया।
आपकी प्रॉब्लम यही है। बोलोगे तो बोलते रहोगेचुप रहोगे तो बस चुप हो जाओगे।
मैंने अपनी प्रॉब्लम बनाए रखी। चुप रहा तो चुप रहा।
वह झटके से उठीलगभग मेरे मुंह पर धुंआ फेंकतीकुछ इठलाती सी चली गई।
सिगरेट की तीखी गंध और उसके परफ्यूम के भीनेपन ने कुछ वही असर पैदा किया जो उसके पतले होठों पर दबी पतली सी सिगरेट किया करती है।
यह मेरे भीतर एक उलझती हुई गांठ है जो एक कोमल चेहरे और एक तल्ख सिगरेट के बीच तालमेल बनाने की कोशिश में कुछ और उलझ जा रही है।
…………..
हमारे बीच 18 साल का फासला है। मैं ४२ का हूंवह २४ की।
बाकी फासले और बड़े हैं।
फिर भी हम करीब है। क्योंकि इन फासलों का अहसास है।
कौन सी चीज हमें जोड़ती है?क्या वे किताबें और फिल्में जो हम दोनों को पसंद हैं?या वे लोग और सहकर्मी जो हम दोनों को नापसंद हैं?या इस बात से एक तरह की बेपरवाही कि हमें क्या पसंद है और क्या नापसंद है?आखिर मेरी नापसंद के बावजूद वह सिगरेट पीती है।
फिर पूछती भी हैमुझे अच्छा लगता है या नहीं।
मैं कौन होता हूं टोकने वाला।
टोक कर देखूं?
अगली बार देखता हूं।  
………………………….
इतना पसीना कभी उसके चेहरे पर नहीं दिखा।
वह थकी हुई हैलेकिन खुश है।
शूट से लौटी है।
पता हैराहुल गांधी से बात की मैंने?’
अच्छाआज तो जम जाएगी रिपोर्ट।
रिपोर्ट नहींकमबख्त कैमरामैन पीछे रह गया था।
मैं घेरा तोड़कर पहुंच गई थी उसके पास।
क्या कहा राहुल ने?’
कहा कि तुम तो जर्नलिस्ट लगती ही नहीं हो।
वाहक्या कंप्लीमेंट हैऔर क्या खुशी है।
मैं हंस रहा हूं।
उसे फर्क नहीं पड़ता।
फिर उसके हाथ जींस की जेब टटोल रहे हैं।
फिर एक सिगरेट उसके हाथ में है।
और जलने से पहले धुआं मेरा चेहरा हो गया है।
उसे अहसास है।
वह फिर पूछेगी- उसने पूछ लिया।
आपको अच्छा नहीं लगता ना?’
क्या?’ मैं जान बूझ कर समझने से बचने की कोशिश में हूं।
मेरा सिगरेट पीना। वह बचने की कोशिश में नहीं है।
मैं बोलूंफेंक दो तो फेंक दोगी?’ मेरे सवाल में चुनौती है। 
हां’,  उसके जवाब में संजीदगी है।
फेंक दो।‘ मेरी आवाज़ में धृष्टता है। 
उसने सिगरेट फेंक दी हैं।
मैं अपनी ही निगाह में कुछ छोटा हो गया हूं।
अक्सर ऐसे मौकों पर वह हंसती है।
लेकिन वह हंस नहीं रही।
उसके चेहरे पर वह कोमलता है जो अक्सर मैं खोजने की कोशिश करता हूं।
उसे बताते-बताते रह जाता हूं कि जब उसके हाथ में सिगरेट होती हैयही कोमलता सबसे पहले जल जाती है।
लेकिन यह कोमलता अभी मुझे खुश नहीं कर रही।
अपना छोटापन मुझे खल रहा है।  
दूसरी सुलगा लो।
वाहमेरे ढाई रुपये बरबाद कराकर बोल रहे हैंदूसरी सुलगा लो। फिर मना क्यों किया था?’
तुम मान क्यों गई?’वह हंसने लगी। जवाब स्थगित है।
मैं चाहता हूंवह कोई उलाहना दे।
कहे कि मैं पुराने ढंग से सोचता हूं।
लेकिन वह चुप है।
हम दोनों चुप्पी का खेल खूब समझते हैं।
चुप्पी जैसे हम दोनों की तीसरी दोस्त है।
उसकी उम्र क्या हैनहीं मालूम।
कभी वह ४२ की हो जाती हैकभी २४ की।
लेकिन वह फासला बनाती नहीं मिटाती है।
हमारे बीच चुप्पी नहीं होती तो क्या होता?शब्द होते।
वे दूरी बढ़ाते या घटाते?
वह जा चुकी है। उसके पास ऐसे सवालों से जूझने की फुरसत नहीं।
……………………..
वह एक अच्छे वाक्य की तलाश में है।
इतनी संजीदा जैसे बरसों से तप में डूबी हो।
उसे एक कहानी हाथ लगी है।
कहानी क्या होती है?’
एक बार उसने पूछा था।
वह चीजजिसके आईने में हम ज़िंदगी को नए सिरे से पहचानते हैं।
सवाल खत्म नहीं हुआ था।
कहानी कहां से मिलती है?’
जिंदगी को क़रीब से देखने सेरुक करठहर कर।
लगता हैवह जिंदगी को बेहद करीब से देख कर आई है।
उसके चेहरे पर जर्द-जर्द सच्चाई है।
उसकी कांपती उंगलियां स्क्रीन पर एक शब्द लिखती और मिटाती हैं।
मैं पीछे खड़ा हूं।
कहां से शुरू करूं?’ सवाल में कुछ बेचारगी हैकुछ मायूसी।
क्या हुआ?’
मां-बेटे का मामला है। बेटा दो साल से पिता के पास रहा। अब ग्यारह बरस का है। मां अदालतों के चक्कर काटती रही। अब सुप्रीम कोर्ट ने बेटे को मां के पास जाने का आदेश दिया है।
सही फैसला है।
पता नहीं। उसकी आवाज़ में मायूसी है।
क्योंमहिलाओं के हक की तो बात सबसे ज्यादा उठाती हो तुम?’
यह ताना सुनने की फुरसत उसे नहीं है।
वह कहानी खोज रही थी।
जो कहानी मिली हैउसने बताया हैजीवन सरलीकृत रिश्तों से नहीं बनता।

10 COMMENTS

  1. पढ़कर बहुत अच्छा लगा। ऐसा कुछ पढ़ने को कहाँ मिलता है आजकल। इसे पढ़कर कुछ लिखने का भी मन हुआ। कहानी में जो आपने नहीं लिखा है और पाठकों के समझने पर छोड़ दिया है,वही इसका माधुर्य है।

  2. मानवीय रिश्तों की अबूझ कहानी.निर्मल छाया है.पहली बार प्रियदर्शन को पढ़ा ,लगा अब तक क्यों नहीं पढ़ा.

  3. बेशक प्रियदर्शन जी की कहानियां उनकी कविताओं से बहुत आगे हैं।

  4. बेहद ठहर कर एक एक भाव को शव्दों में उकेरती हुई एक उम्दा कहानी. बहुत दिनों के बाद यूँ लगा कि निर्मल वर्मा के लिखे जैसा कुछ पढ़ रहा हूँ. एक अलग धरातल और अलग समय में.

  5. क्या कहूं समझ नहीं आ रहा…बस किसी कविता सी पढ़ती चली गयी कहानी…| ये कहानी अपने में बाँध भी लेती है और विचारों के जंगल में भटकने के लिए छोड़ भी देती है…|
    बस और कुछ नहीं…सिर्फ बधाई…|

  6. जानकीपुल को धन्यवाद इतनी अच्छी कहानी पढ़ाने के लिये, लगा सुबह सार्थक हो गईं । समझ में नहीं आया कहानी पढ़ रही हूँ या कविता । कविता का माधुर्य भी था और कहानी की तारतम्यता भी । प्रियदर्शन जी के लिये क्या कहूँ बस लाज़बाब ।

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