Home / Uncategorized /     प्रमोद द्विवेदी की कहानी ‘माता जी मत कहो प्लीज…’

    प्रमोद द्विवेदी की कहानी ‘माता जी मत कहो प्लीज…’

प्रमोद द्विवेदी की कहानियों की विषयवस्तु और भाषा दोनों का अपना ही अन्दाज़ है। ‘जनसत्ता’ के फ़ीचर संपदक रहे इस लेखक ने कम लिखा है लेकिन इनके लेखन की अलग ही छाप है। उनकी नई कहानी पढ़िए-

==============================

 आज मीता जी की किस्मत खराब थी, या कहो दिन ही खोटा था। सुबह घर से निकलते ही पड़ोसी गणपत राव की बांग्लादेशी नौकरानी ने छूंछी बाल्टी दिखाई तो वे समझ गई थीं आज कुछ बंटाधार होगा। राम-राम कह मैट्रो पहुंच गईं। ना जाने क्यों मन किया कि लेडीज के बजाय आम डिब्बे में बैठा जाए। पर आज कुछ ज्यादा ही भीड़ थी। आरक्षित सीट भी भरी हुईं। उन्होंने थकी निगाह से महिला सीट की ओर देखा तो दो बातूनी लड़कियों का कब्जा था। उनसे कुछ बोलने का मतलब ही नहीं था। सीनियर सिटीजन यानी वृद्धों वाली सीट पर नजर गई तो बैठा हुआ जवान आदमी उठते हुए बोला, ‘माताजी आप बैठ जाइए…।‘

यह सुनते ही मीता सब्बरवाल का मन किया कि मैट्रो सहित सीता मइया की तरह धरा में समा जाएं। बाप रे, माता जी…एक पल में ही जैसे उनकी काया में जरावस्था ने दस्तक दे दी।

जवान आदमी का प्रस्ताव उन्होंने स्वीकार जरूर कर लिया, पर आहिस्ते से दिल की आवाज भी कह दी- ‘ऐसे पब्लिकली किसी को माता जी नहीं कहते…भइया… यह मैनर में नहीं आता।‘

 वह सदाबहार ढीठ भी मुस्करा दिया- ‘नोटेड जी, तो मैम चलेगा जी ना…।‘

‘जी अंकल जी…’ कहकर मीता सब्बरवाल ने माथा पकड़ लिया। आज मन ही नहीं किया कि मोबाइल खोलकर बैठ जाएं या गेम खेल लें।

इस माताजी ने तो उनकी सदाजवां हसरतों पर तीर ही चला दिया। वे सोचने लगीं कि कहीं इस नामुराद मुसाफिर ने नैचुरल खिजाब से मुक्त हुए उनके चंद सफेद बाल और लट देखकर तो माताजी नहीं कह डाला। आज ही तो उन्होंने आईने पर अपना गोरा चेहरा निहारकर अपने जवान होने की पुष्टि की थी। रुखसार पर अपने तिल को देखकर ‘दौलते हुस्न पर दरबान बिठा रखा है’ वाली महान लाइन याद की थी। किस्मत से एक भी झुर्री ऐसी नहीं थी जो उम्र के साढ़े पांच दशक बता सके। गले वाली सलवट ढंकने के लिए वे बड़ी होशियारी से चुन्नी गले में फंसा लेती थीं। साड़ी पहनतीं तो प्रयास होता गला ज्यादा खुला ना दिखे। हालांकि इसके इलाज के लिए वे शहनाज हुसेन वाली एक महंगी क्रीम लगाने लगीं थीं। जब भी मौका मिलता कपालभाति कर लेतीं, क्योंकि टीवी पर बाबा रामदेव से उन्होंने सुन रखा था कि कपालभाति करने से त्वचा कसी रहती है। किसी ने इलाज बताया था कि बकरी के दूध में एलोवेरा मिलाकर लगाने से गर्दन का कटु सत्य कवर हो सकता है। इसके लिए वे अपनी काम वाली बाई नगीना दास से हफ्ते में दो बार बकरी का दूध मंगाती थीं। सौ रुपए किलो के हिसाब से। एक शिव भक्त ने बता दिया कि बेलपत्र का रस और शहद मिलाकर चेहरे, गर्दन पर लगाओ त्वचा की झुर्री गुम हो जाएंगी। यह तरीका भी आजमाया। थोड़ा आत्मसंतोष हुआ। पर वाकई बुढ़ापा इतना गुस्ताख और बेबाक होता है कि असलियत की चलने नहीं देता।

 मैट्रो में कोई आईना होता तो जरूर एक बार अपना मुखड़ा निहारतीं, सिर्फ यह देखने के लिए कि क्या वाकई वे माताजी लगने लगी हैं। वे गुस्से में उस खलनायक को भी बीच-बीच में देख लेतीं, जिसने घोर अज्ञानता से या दृष्टि-मतिभ्रम से उन्हें माताजी कह डाला था। खलयात्री यमुना बैंक में उतर गया तो उन्होंने चैन की सांस लेते हुए अपनी पतली अंगुलियां चटकाईं। जिन पतली भिंडी जैसी अंगुलियों पर उन्हें नाज था, जिन पर वे रात को वैसलीन चिपड़कर सोती थीं, वे आज रूखी और बूढ़ी दिखीं। अपने दांतों के बीच एक अंगुली दबाकर उन्होंने पुष्टि की कि ये अडिग हैं और कई साल तक कठोर रहने वाले हैं।

‘रांदेवू’ टीवी प्रोग्राम वाली सिमी ग्रेवाल उन्हें इसीलिए प्रिय लगती थीं कि सत्तर की उम्र में भी जवान और हसीन दिखती थीं। चालीस साला औरत वाला कसदार सौंदर्य। यह तो बाद में मीता जी को पता चला कि सिमी ने प्लास्टिक सर्जरी से अपने चेहरे की चमड़ी कसवा रखी थी। ऐसी कसावट के कारण ही उन्हें छोटा मुंह खोलकर हंसना पड़ता था।

 मीता जी को उतरना तो प्रगति मैदान था, पर हताशा ने उन्हें इतना पका दिया कि झपकी आ गई और वे बाराखंभा पहुंच गईं। अचानक नींद खुली और वे झटके से दरवाजे की ओर भागीं। पर यह दरवाजा तो उनकी इच्छा से खुलने वाला नहीं था। उन्होंने गौर किया कि आसपास के लोग उनकी बदहवासी ताड़ रहे थे। वे बार-बार अपना बैग संभाल रही थीं। इस बेचैनी में एक और पत्थर उछला। किसी नामुराद ने पीछे से टुइयां जैसी आवाज में कहा, ‘एक्सक्यूज मी आंटी… आपका हैंकी नीचे गिर गया है…।‘  फिर उनके सीने पर धक्का लगा…आंटी…हे राम…हरामी खुद बैल जैसे हैं, पराई औरत माता जी,  आंटी लग रही हैं….नाश हो…।

भारी मन से वे दूसरी मैट्रो पकड़कर प्रगति मैदान को लौटीं। वहां से थोड़ा पैदल जाना था। दफ्तर पहुंचने में आज लेट हो रही थीं। शर्म आ ही रही थी कि क्या कारण बताएंगी बॉस को। तीन बार लेट होने पर एक दिन की तनख्वाह कट जाती थी। पर ऐसी नौबत कभी आई नहीं। वे भारी मन से अपनी सीट पर गईं और कंप्यूटर खोल लिया। बेमन से मेल चेक करने लगीं। बगल में बैठी निर्देश रूंगटा ने उनकी शकल देखते ही पूछ लिया , ‘मैम जी सब ऑलराइट है ना…।‘

वे पहली बार मर्दानी बन कर बोलीं, ‘घंटा चंगा है…आज यार एक हरामी ने माता जी बोल दिया, तब से मूड ऑफ है। मैं कहां से माताजी लगती हूं।‘

यह दर्द सुनकर स्वघोषित अविवाहिता मिस रूंगटा खिखियाकर हंस पड़ी, ‘ओ माई गॉड, यह प्रॉब्लम तो कभी सुनी नहीं। पर आपको दिक्कत क्या है माताजी से। आपका मैटीरियल तो लॉक हो गया है। बेटा आपका बीवी को लेकर दुबई में मौज कर रहा है। आप भी किसी तनहा पिताजी का हाथ थाम लीजिए। ना जाने कितने मारे-मारे फिर रहे हैं। एक तो अपने घई साहब हैं ही, आपके दीवाने। और वो तीस हजारी वाले वकील साब….।‘

 यह सुनकर मीता सब्बरवाल के चेहरे पर जवान मुस्कान आ गई, ‘पर यार माताजी सुनते ही ऋषिकेश जाने का मन करने लगता है। मैटीरियल लॉक होने का यह मतलब थोड़ी कि दरवज्जा ही बंद हो गया है। अभी एक सर्वे भी आया है कि जवानी की उम्र साठ साल तक मान ली गई है। हम तो दो-तीन साल पीछे ही चल रहे हैं।‘

दोनों औरतों के बीच उम्र का काफी फासला था। पर संसार में एकाकी रहने के कारण उनकी समस्याएं मिलती थीं। वे खुलकर चर्चा कर लेतीं। स्त्री रोगों के देसी इलाज पर भी बात होती। अलसी, कलौंजी से लेकर दालचीनी के गुणों पर व्याख्यान हो जाता। विचार और दास्ताने-दर्द मिलने के कारण वे दोस्त ज्यादा बन गए थे। दोस्ती के कारण अब सांकेतिक बातों का दौर शुरू हुआ। दोनों के बीच गरम-मादक बातें होने लगी थीं…मसलन, मेनोपॉज यानी रजोनिवृत्ति के बाद भी संभावना खत्म नहीं होती। आवारा मन कहां मानता है…आदि- आदि। इसी झोंके में मीता जी बता गईं कि बेटे से उन्होंने पूछ लिया है और अगले माह ही वे अपने तरीके के एकाकी एडवोकेट यानी तीस हजारी वाले हितेंद्र मोहन जी का हाथ थामने वाली हैं।

 ‘तो मतलब आपका कनेक्शन पक्का है…और बेटे को पता भी है…?’

‘पूरा कनेक्शन, पर टैंपरेरी। परमानेंट के लिए समझो एप्लाई कर दिया है। वकील साहब तो भूखे बंगाली की तरह हनीमून के लिए तैयार बैठे हैं…।‘ मीता जी कहते-कहते थोड़ा हांफ गई। एकबारगी तो थूक का एक छींटा मिस रूंगटा के कपोल से जा टकराया। रूंगटा को थोड़ा बुरा लगा, पर बिना जाहिर किए अंगुली से पोंछ लिया। जैसे कुछ हुआ ही ना हो।

नकली मुस्कान के साथ उसने कहा, ‘आप तो खिलाड़ी निकलीं मीता मैम।‘

‘यार, मनुष्य सोशल ही नहीं, भुक्कड़ प्राणी है। अकेले रह नहीं सकता। दीवारें खाने को दौड़ती हैं।‘

‘खासकर यह औरत के मामले में…।‘

‘धत्त, दोनों। आतिशें-इश्क तो दोनो तरफ होती है मेरी जान…।’

‘क्या बात है…आतिशे-इश्क बुझाइए माताजी…’ मिस रूंगटा ने चुटकी ली।

मीताजी ने उसकी सुंदर नाक पकड़कर हिलाई, ‘छुटकी तेरी गर्मी भी निकलेगी। जल्दी निपट ले यार। बायलॉजिकल डिमांड भी कोई चीज होती है। बुढ़ापे में बच्चे भी आसानी से नहीं पैदा होते। होते भी हैं तो बड़े लिमझिम टाइप के एबनार्मल…हो सकता है मेरा सोचना गलत भी हो….।’

मिस रूंगटा की बड़ी आंख बार-बार झपकी, ‘बच्चे-फच्चे होते रहेंगे, अब ये बताओ, कहीं देख रही हो मेरे लिए आप।‘

‘क्यों क्या हुआ उस डिस्कवरी वाले फोटोग्राफर  का। तेरे चक्कर में खुद भी ओवरएज हो रहा है।‘

‘कौन… राघव जोशी…अरे वो दिखावटी यारी है। लंबी ईनिंग वाला बंदा नहीं है वह। वह अच्छा हेल्पर हो सकता है, हसबैंड नहीं।‘

‘ओके’, मीताजी शरारत भरी गंभीरता लेकर बोलीं। ‘शादी डॉट कॉम में एड दे दो।‘

‘एक बार दिया था। एज का इशू आ गया। सब पांच साल बड़े पीछे पड़ गए। दो-तीन डायवोर्सी थे। अपनी उम्र का कोई मिला ही नहीं, इसलिए इरादा कैंसिल कर दिया। राघव रिजर्व में है। जिम में ऐंवई बॉडी बनाए जा रहा है। पता नहीं मुझसे कौन-सी कुश्ती लड़ने वाला है।‘

मीता जी को समस्या का हल मिल गया। उन्होंने रूंगटा का हाथ अपने हाथ में लेकर कहा, ‘देख अपनी तो जैसे तैसे कट जाएगी। बंश तो डूबने से रहा। मैं राघव से बात करती हूं। कहो तो उसका मेडिकल चेकअप करवा दूं…एक बार उसका इरादा जान लेते हैं। हरामी मर्दों की दुनिया में ऐसा कमिटेड बंदा कहां मिलेगा, तेरे लिए इतने साल से बैठा है। अपनी जवानी फोटोग्राफी और जिम में फूंक रहा है।‘

मिस रूंगटा का रंग बदल गया। वह आज ऐसे शर्माई जैसे किसी ने सूचित कर दिया हो कि लड़के वाले देखने आ रहे हैं।

‘तो मैं यह रिश्ता पक्का समझूं।‘ मीता जी ने शोले के अमिताभ बच्चन जैसा डॉयलॉग बोला।

‘यस…’मिस रूंगटा ने हरी झंडी दिखा दी।

इस तरह दो दुखी औरतों में एक का केस हल हुआ।

 पर मीताजी उस माताजी कांड को आसानी से कैसे भूल जातीं। सत्तावन साल की उम्र में वे अपने को मार्गरेट थैचर और एलिजाबेथ टेलर जैसी हसीन अधेड़ तो मानती थीं। पर यह कतई मंजूर नहीं कि कोई सरेराह उन्हें माताजी, आंटी जी कहकर चला जाए।

 मीताजी के बारे में संक्षेप में बताना उचित होगा। बचपन उनका पठानकोट और जम्मू में बीता। जवानी चंडीगढ़ में। पिता जी की ट्रांसफर वाली नौकरी थी। इसलिए कई शहर बदले। पहले वे मीता सचदेव थीं। चंडीगढ़ के एमसीएम कालेज से पढ़कर निकलते ही वे दिल्ली आ गईं। बाद की पढ़ाई जाकिर हुसेन कालेज में और यहीं उन्हें मिले इतिहास पढ़ने वाले सब्बरवाल साहब यानी संजय सब्बरवाल। प्रेम विवाह हुआ। तीन साल के इंतजार के बाद एक बेटा हुआ। दोनों नौकरीपेशा थे, इसलिए फैसला कर लिया था दूसरे बच्चे की जरूरत नहीं।

 जिंदगी में सब ठीक ही था। पर अपनी कमाऊ प्रेम दीवानी को संजय सब्बरवाल ने यह नहीं बताया कि इस सुघड़ शरीर के भीतर एक कमजोर, शिकस्तादिल है। डॉक्टर की हिदायत से जीने वाले शख्स। ज्यादा बोझा उठाने से भी परहेज करने वाले। अचानक एक दिन ज्यादा दिमागी श्रम के कारण अपने दफ्तर में चकरा कर गिर पड़े। दो दिन बाद नर्सिंग होम से लौटकर उन्होंने मीता जी के सामने कबूल कर लिया कि बचपन में उनके दिल में छेद था। मैंने तुम्हें धोखा दिया। बिना बताए प्रेम करने की गलती के लिए मुझे माफ कर दो…।

 पर मीता जी का दिल बड़ा था। उन्होंने पतिव्रता तत्वज्ञानी की तरह कह दियाः जब जिंदगी और मौत ऊपर वाले के हाथ में है तो गिला किससे किया जाए। हो सकता है किस्मत में यही बदा हो…।

इस तरह वे दोनों बीस बरस तक साथ जी भर के जिए। यह मान लिया था कि शरीर ही सब कुछ नहीं। कुछ बावरा मन भी तो है। और एक दिन दूसरे अटैक में सब्बरवाल साहब इस संसार और अपने चंद प्रियजनों को छोड़ गए। बस एक ही तसल्ली थी कि उनकी कथित निशानी एक बेटे के रूप में मीताजी के पास है।

  पैंतालीस साल की उम्र में पति को खो देने के बाद के बाद उनका कभी मन नहीं किया कि किसी का हाथ थाम लें। पर एक अकेली और सुंदर औरत के साथ जिस तरह किस्से जुड़ते हैं, उससे वे भी अछूती नहीं रहीं। मरदों के सोचने के लिए इतना ही काफी था कि विधवा होने के बावजूद वे शानदार कपड़े पहनतीं हैं। जब चाहें कसी जींस, लैगी पहन लेती हैं। कभी काली तो कभी लाल बिंदी लगा लेती हैं। लाल लिपस्टिक लगा लेती हैं। कजरा लगा लेती हैं। काम कमान भौंहें बना लेती हैं…।

 यानी लोगों के लिए मतलब यही था कि उनके करेक्टर में झोल है। कोई दिल लगाकर ट्राई करे तो काम बन सकता है।

इन मर्दाने कयासों ने कई किस्से गढ़े। एक यह भी था कि मीताजी के बेटे के फीचर्स पर गौर करो, वह इलाहाबादी प्रोफेसर आरडी ओझा की फोटोकापी लगता है। वैसा ही लंबा कद, गोरा, घुंघराले बाल। सबसे अजीब, वही हिल-हिलकर बोलने की अदा। सब्बरवाल साहब तो साढ़े पांच फुट के, टी सीरिज वाले गुलशन कुमार जैसे दिखते थे। इस किस्से से यह बताने की कोशिश थी कि जन्मजात हृदयरोगी सब्बरवाल साहब संतानोत्पत्ति में असमर्थ थे। लेकिन उन्होंने मीताजी को यह छूट दे दी थी कि वह मर्यादित ढंग से वंश परंपरा चलाने का जतन कर सकती हैं। बस यह राज़, राज़ ही रहे। इस गुप्त विधि से उनके घर में बेटे यथार्थ सब्बरवाल का अवतरण हुआ। यह राज मीताजी के पास ही रहा होता। पर बेटे के नैन-नक्श ने तो सारा किस्सा बयां कर डाला। बावले लोग तो कहने से बाज नहीं आते  कि एक बार डीएनए टैस्ट करवा लो ओरिजनल पिताश्री का पता चल जाएगा।

 मीता जी किस्सों की बाढ़ कैसे रोक पातीं। इन किस्सों की छाया से बचाने के लिए उन्होंने बेटे को शिमला में पढ़वाया। फिर ऊंची तालीम बंगलौर में। जब गुड़गांव की एक बड़ी कंपनी में उसकी नौकरी लगी तो मुद्दतों बाद दिल्ली में मां का साथ मिल गया। जीवन के सबसे सुखद दिन थे ये। जब वे बेटे के साथ निकलतीं तो यह कमेंट जरूर सुनने को मिलता, ‘यार एकदम हीरो है यह। इससे मॉडलिंग कराओ….’आदि आदि…।

 गजब था मीता जी का जीवन। अब तो बेटे के लिए जीना था। रोहिणी में अपना प्लैट हो गया। पूरी प्लानिंग हो गई कि इस वाले कमरे में बेटा-बहू रहेगा। यह कमरा मीताजी का होगा। बाहर एक गेस्ट रूम। इनवेस्टमेंट पर दोनों चर्चा करते। मीताजी ने बताया कि उसके पिता की कुछ प्रापर्टी फरीदाबाद में है। एक बार चलकर देखते हैं। पर बेटा यथार्थ तो परम संतोषी जीव निकला। कहने लगा, ‘जितना टाइम इसमें खर्च करेंगे, उतना ऐसे ही दुबई जाकर कमा लेंगे।‘ इसी बहाने उसने मां को इशारा कर दिया कि वह उनके साथ ज्यादा दिन नहीं रहने वाला। पर ईमानदारी से यह जरूर कह दिया कि ‘शादी करके निकलते हैं।‘

 शादी भी गुप्त हुई। वजह यह भी थी कि यथार्थ बाबू एक हैदराबादी मुसलमान लड़की पर निसार थे। मीताजी ने भी आजाद कर दिया, जाओ मेरे लाल दुबई में जाकर अपनी दुनिया बसा ले। उनके मन की इतनी हुई कि लड़की ने अपना नाम इमाम मिर्जा से बदलकर वाणी सब्बरवाल कर लिया। मीताजी को यही तसल्ली थी कि उनके गबरू श्रवणकुमार ने प्रेम के फेर में अपना धर्म नहीं छोड़ा, बल्कि दूसरे को ले आया। असली में मीताजी के आर्यसमाजी संस्कार ही ऐसे थे कि बेटा विधर्मी हो जाता तो वे यमुना जी में कूद जाती। पर इस सुखांत ने उन्हें संतोषी बनाया। मन से जवान तो वे थी हीं। एकदम सतर जिस्म। कमर बत्तीस से ऊपर कभी जाने नहीं दी। बेटा भी कभी-कभी मजाक में कह डालता, ‘मम्मी प्रैक्टिकल बनो, आप भी एक से दो हो जाओ, मुझे तो कोई समस्या नहीं। कम से कम कंपनी तो मिल जाएगी…। ‘

 यानी मीता जी को हरी झंडी तो मिल ही चुकी थी। सही वक्त का ही इंतजार था।

                                       ——————————-

 मीताजी के लिए फिर सपने देखने का वक्त था। पर जिंदगी का मजाक तो चलता ही रहता है।

आज मैट्रो में सरेभीड़ माताजी कहे जाने, फिर आंटी कहे जाने का दुख इतना अपार था कि उन्हें लगा जरूर आज बीपी बढ़ गया होगा। नाड़ी दिन भर बेढंग फुदकती रही। आम तौर पर वे दफ्तर में टॉयलेट जाने से बचती थीं। यूटीआई की मार वे कई बार झेल चुकी थीं। पर आज दो बार जाना पड़ा। पानी की बोतल और मदर डेयरी की छाछ बैग में रखी रह गई। कुछ पीने की हिम्मत ही नहीं हो रही थी। मन तो यह किया कि वहीं गैलरी में खड़े होकर जवान लोगों से पूछ कर देखे कि क्या मैं माताजी लग रही हूं…पर बात जबान तक आते ही दिल तेजी से धड़क जाता। पर आधा काम तो किया ही उन्होंने। असिस्टेंट मैनेजर जुनैद अली त्यागी के पास जाकर कहा, ‘बतइयो जरा मैं माताजी लगती हूं क्या…? ’

जुनैद मुरादपुरिया रसिया था। उनसे दो साल छोटा, पर जवानों  जैसी हसरतें और हरकतें। सीट से खड़ा हो गया और करीब आकर आंखों से शरारत बरसाते बोला, ‘ना जी, कोई सूरदास जी ही कह सके है ऐसा तो…! आप तो हमारे दफ्तर की ओवरएज जयपिरदा हो जी…!‘

 यह कुछ ज्यादा ही हो गई। मीताजी ने थोड़ा चिढ़कर कहा, ‘पहले ये बताओ बीबी आपकी श्रीदेवी है कि नहीं…।‘

 वह और भी आगे निकला, ‘अपनी बहणा को कुछ भी बोल लो आप…।‘

जमाने के रुख से मीताजी समझ गईं कि उनके दर्द को हवा में उड़ा दिया गया। अब वे फैसला कर लेना चाहती थीं। वकील साहब हितेंद्र मोहन को लंबा वाट्सऐप संदेश भेज दिया-‘हुजूर, आप कहां पलायन कर गए। कल मिलिए सीपी में। जिंदगी का जरूरी फैसला करना है।‘

जवाब यों आया, ‘मीताजी आप हमेशा लेट रहती हो, जिंदगी के फैसले में भी। मैंने पिछले माह ही तीसहजारी की एक वकील संपत सोनी जी के साथ घर बसा लिया है। यह नितांत ही निजी मामला था, इसलिए किसी को नहीं बताया। हां, हम अच्छे दोस्त बने रहेंगे….।‘

मीताजी का दिल धक्क से रह गया। जैसे पहले प्यार ने धोखा दे दिया हो। इस उम्र में घर बसाने का सुंदर सपना छिन्न-भिन्न हो गया। सोचने लगीं, ‘ये जालिम दुनिया सचमुच उन्हें इस उम्र में माता जी बनाकर ही छोड़ेगी।‘

पर वे यह भी जानती थीं कि दुनिया तो उम्मीद पर ही टिकी है।

रिजर्व में उनके एक और हमदर्द दिलबर थे पटपटगंज के संतोष सेंगर उर्फ भोलेनाथ। विशुद्ध कनपुरिया हस्ती। कहते थे- ‘हाथ में डंडा मुंह में पान, चाहिए इक ठो उमराव जान।‘

 दंदफंदी भोलेनाथ असल में काम प्रापर्टी का करते थे। साथ में फोटोकापी की दो बड़ी मशीनें लगा रखी थीं, जहां हर छह माह में लड़की बदल जाती। बार-बार लड़की का बदलना ही उनके चाल-चरित्र पर सवाल उठा देता। अगर धोखे से किसी ने पूछ लिया तो वह शानदार कमीनेपन से बता देते कि ‘गुरु काम से कंप्रोमाइज नहीं करते हम…मेहनत का ही पैसा मिलता है।‘

 बहरहाल उनकी वीआईपी नंबर वाली हौंडा सिटी बताती थी कि काम तो ठीकठाक चल रहा है। आजकल की मंदी के दौर में भी उनका धंधा चोखा था। भोलेनाथ बाईचांस कुंवारे नहीं बल्कि रड़ुआ प्राणी थे। पंद्रह साल पहले पत्नी गर्भाशय के कैंसर के कारण चल बसी थी। इसके बाद भोलेनाथ ने अपनी स्थूल और पतिच्युत साली का प्रेम-निवेदन ठुकराते हुए पितृधर्म को तरजीह दी। दोनों बच्चों को अंग्रेजी स्कूल में पढ़ा-लिखाकर सेट कर दिया। अब एकदम आजाद परिंदा थे। साम-दाम-दंड की बात करते पाए जाते। ज्यादा ज्ञान की जरूरत पड़ती तो चाणक्य का भी सहारा ले लेते। मानसिक शांति के लिए साल में दो बार बनियों की बस में बैठकर खांटू श्याम के दर्शन कर आते। इन दिनों मयूर विहार फेज थ्री में किसी शनि मंदिर के निर्माण में लगे थे।

 लेकिन भोलेनाथ के लिए जीवन नारी के कोमल स्वरों के बिना अधूरा था, इसलिए अवसर पाते ही मीठे वचनों से अधवयसी मगर सुघर औरतों को पटाने के चक्कर में रहते थे। प्रापर्टी डीलरी का काम इस मंशा में सहायक रहता। उनकी हरकतें बताती थीं कि वे सलमान खान टाइप के ही कुंवारे थे। अस्थाई व्यवस्था पर ऐतबार रखने वाले। असल में रोहिणी में मीता जी को फ्लैट उन्होंने ही दिलाया था। पर जब कमीशन की बात आई तो भोलेनाथ ने बड़ा दिल दिखाया कि ‘एक पार्टी से तो कमीशन ले ही लिया है। आपसे रिलेशन बना रहे, यही कमाई है।‘

 यह कमाई निश्चित ही सुंदर भविष्य के लिए थी। भोलेनाथ वाकई भविष्यचेता थे।

वे दोनों दोस्त बन गए। बस इतना ही। कभी मन की नहीं कही। भोलेनाथ वाट्स ऐप पर गुड मार्निंग से लेकर भाजपाइयों वाले वीडियो भेजते रहते। मीताजी इन्हें सहज भाव से लेतीं। वे प्रकृति से जुड़े, जल संरक्षण से जुड़े वीडियो फारवर्ड करके अपना पक्ष रख देतीं। उनकी पोस्ट बता देतीं कि सियासत में उनकी ज्यदा रुचि नहीं है।

  बहरहाल, अचानक आफिस वालों ने गौर किया कि शाम को एक वीआईपी नंबर वाली हौंडा सिटी मीताजी को लेने आ जाती है। अब मीताजी की जी उम्र  ही ऐसी थी कि कोई यह नहीं कह सकता कि उन्हें कोई बांका छोरा लेने आने लगा है। पर उनके रसिक रिकार्ड को देखते हुए कोई ना कोई बुदबुदा देता, ‘देखते रहो मित्रो , मीता जी अगले साल रिटायर होने के पहले इंतजाम कर लेंगी।‘

आखिरकार भूमिका बनने लगी। मिस रूंगटा ने ही कैंटीन में उनसे पूछ लिया-  ‘मैम यह वही प्रापर्टी डीलर है ना जिसने आपको रोहिणी में फ्लैट दिलवाया था?‘

‘एक्सक्यूज मी डियर रूंगटा, भोलेनाथ जी या मिस्टर सेंगर बोलो। हमारा रिश्ता कोई प्रापर्टी वाला नहीं है…।‘

‘पर आप तो किसी एडवोकेट की बात कर रही थीं, ब्याह के लिए।‘

‘वो पंछी उड़ गया यार, हवा भी ना लगने दी चोंघट ने।‘

 ‘ओह, पर क्यों….कैसे।‘

‘चैप्टर क्लोज तो क्लोज समझो…। अब नया चैप्टर शुरू हुआ है।‘ मीताजी ने मुस्करा कर कहा।

‘ओह, तो बात यहां तक पहुंच गई है। वही तो मैं कहूं कि मैम की रंगत में निखार क्यों आ रिया हैगा।‘

‘अरे यार रंगत मेंटेन नहीं करेंगे तो कोई मुआ फिर उस दिन की तरह माताजी कह डालेगा। मुझे माताजी नहीं बनना…बाई गॉड।‘

‘पर मैम यह तो जिंदगी की हकीकत है।‘

‘होगी, पर सुनकर डिप्रेशन हो जाता है।‘

 खैर, यह कहानी चलती रही। हौंडा सिटी आती रही। लोगों ने गौर किया कि मीता जी अब चिपस्टिक नहीं लिपस्टिक लगाती हैं। खासकर वह वाली जो विराट वाली अनुष्का शर्मा के अधरों पर दिखती थी। उनके कान के पास कभी-कभी गुस्ताखी से निकल पड़ने वाली सफेद लट को स्थायी तौर पर स्याह कर दिया गया। शायद इसी सफेद लट ने उन्हें मैट्रो में  माताजी वाली गाली दिलवा दी थी।

सचमुच मीता जी ने गौर किया कि जब से उन्होंने रंगत बदली है मैट्रो या सार्वजनिक स्थल पर किसी ने उन्हें कम से कम माताजी या आंटी जी नहीं कहा। कई बार तो बेहद थके होने पर भी वे बुजुर्ग सीट की ओर नहीं देखतीं। वे अपने को बुजुर्ग मानने को तैयार ही नहीं थीं। हां, महिलाओं वाली सीट पर पूरे हक के साथ बैठतीं। जवान रहने की तमन्ना वे हमेशा साथ रखना चाहती थीं। मल्लिका पुखराज का गाया, हफीज जलंधरी का लिखा वह नग्मा आज भी वे गुनगुना लेतीं- ‘अभी तो मैं जवान हूं…।‘

               ——————————————————

   वह दिन भा आ गया। आज अट्ठावन साल की उम्र में मीता सब्बरवाल सेवामुक्त हो रही थीं। हालांकि पर्सनल विभाग की नेहा मित्तल को उन्होंने लिखकर दे दिया था कि ज्यादा तमाशा ना किया जाए। पर साथी कहां मानते। उन्होंने मीताजी को मना लिया। रिटायरमेंट की लाइन में लगी अलका भारद्वाज, निधि बंसल और संजय बाना ने सारा बंदोबस्त किया। बॉस डॉ एसएन कालरा उनकी फाइल पढ़कर आए थे। जमकर तारीफ की। पर एक कमेंट करने से बाज नहीं आए, ‘आपकी उम्र में तो महिलाएं दादी-मां जैसे कपड़े पहनने लगती हैं। आप तो लुकिंग…गुड।‘ असल में वे हसीन या सेक्सी कहना चाहते थे। पर गुड कहकर बचाव कर लिया।

 दरअसल आज मीताजी इरादतन कुछ ज्यादा ही सजीली बनकर आई थीं। दोनों कानों के तीनों छेदों पर सुनहरी बालियां। फेशियल की मेहरबानी से चमकती सूरत। सोने के रंग जैसा सलवार सूट जिसकी चमक से सारा दफ्तर चमक रहा था। पार्टी दफ्तर के सबसे बड़े कक्ष में हो रही थी जहां आसा सिंह की सोहनी महिवाल वाली बड़ी पेंटिंग अलग ही माहौल बना रही थी।

 वक्ताओं ने जमकर मीता जी की तारीफ की। उनका स्वभाव ही ऐसा था।

 अब बारी मीता जी की थी।

उन्होंने लट संवारकर, मुस्करा कर बोलना शुरू किया, ‘दोस्तों ऐसा लग रहा है जैसे कोई लड़की अपने घर से विदा हो रही है।‘

श्रोता मुस्काए… लड़की सुनकर। हर अधवृद्धा की यह हसरत रहती है कि कभी कोई  लड़की कह जाए, मजाक में ही सही

एक भाईसाहब गुनगुनाए-‘खुशी खुशी कर दो बिदा…’

मीताजी ने कातिल मगर बांकी निगाह से उनकी ओर देखा, ‘आ जाइए भाईसाहब विदा करने…तो मैं कहना चाहती थी कि ओल्ड एज इज ओनली स्टेट ऑफ माइंड… आपका सोच जवान है तो जवान रहेंगे ही। हम औरतें रिटायर होकर सोचते हैं कि जीवन बस ठहर गया। पोते-पोतियां खिलाओ। ऋषिकेश घूम आओ….ऐसा नहीं होना चाहिए। जिंदगी की दूसरी पारी और भी नए अंदाज में जी सकते हैं…आज मौका है और दस्तूर भी तो मैं अपने नए परिवार से भी मिला देती हूं…।‘

लोगों की निगाह घूमी। ब्रेकिंग न्यूज…।

‘जी, ये हैं हमारे भोलेनाथ जी और ये उनके दो बच्चे निशांत और शोभिता। बाई द वे मेरा बेटा दुबई से नहीं आ पाया…उसका मैसेज आ गया था…। ‘

 कहकर उन्होंने भोलेनाथ और दोनों बच्चों को पास बुला लिया।

गजब का दृश्य था। दोनों बालिग बच्चे पिता को वर के रूप में देख मुस्काए जा रहे थे। मीताजी ने खुशी से मगन भोलेनाथ के कंधे से सटकर तस्वीर खिंचाई। लोगों ने माला पहनाई। फोटो के सत्र चले। लगे हाथ एक केक भी कट गया।

 पर पिक्चर वाकई अभी बाकी थी। किसी ने गौर नहीं किया कि कुंवारेपन के भार से दोहरी होती जा रही मिस रूंगटा भी आज मांग भरे हाजिर थीं- ‘हैलो, एवरीवन आज हमने भी घर बसा लिया। ये हैं डिस्कवरी के टैलेंटेड फोटोग्राफर राघव जोशी। मैडम मीता ने राज से पर्दा उठाया तो हम कैसे पीछे रहते।‘

 यह कहकर मिस रूंगटा और उसका हमसफर राघव भी इनकी कतार में शामिल हो गया। केक पर इनकी छुरी भी चली।

गजब का नजारा। पार्टी  मीताजी के रिटायरमेंट की थी। पर हो कुछ और ही गया। घर बस रहे थे। ओवरएज बहुओं के चेहरे की रौनक ही कुछ और थी। उनके पति भी लजाए जा रहे थे। लोग बोले भी, यह रूंगटा कहां से कूद पड़ी।

पर चलता है।

मीता भारद्वाज ने मिस रूंगटा की खुशी में शामिल होते हुए, आज की नायिका और मुख्य अतिथि की तरह हाथ हिलाकर कहा, ‘दोस्तो मैं कहती थी ना जिंदगी को ठहरने मत दो…।‘

पर दफ्तरी जनता ने कहा, ‘भाई यह चीटिंग है। यहां लोगों ने सस्ते में घर बसाना शुरू कर दिया है। ना पार्टी-शार्टी, ना दारू-शारू। गाना-वाना भी नहीं।‘

 ‘होगा भई, वह भी होगा…।‘ मीताजी नेताओं की तरह हाथ हिला रही थीं।

दफ्तर की अधेड़ सुहागिनों ने चुहुल में कहा, ‘ओ यारा, मीताजी ने तो माताजी बनने की सारी संभावना  खत्म कर दीं।‘

मीता जी को बिदकाने के लिए इतना ही काफी था। पर आज तो खुश रहने और मचलने का दिन था। ‘प्लीज माता जी ना कहियो…।‘ वे मुस्का कर बोलीं।

सखियों ने कहा, ‘ रियली, जैसा हुकुम मेरी ओल्ड आकी, भई जोर से बोलो जै माता दी…।‘

इस जैकारे में मीता सब्बरवाल यानी अब मीता सेंगर भी शामिल हो गईं।

=================================

     प्रमोद द्विवेदी

  9667310319

 
      

About Prabhat Ranjan

Check Also

नामवर सिंह की एक पुरानी बातचीत

  डा॰ नामवर सिंह हिंदी साहित्य के शीर्षस्थ आलोचक माने जाते हैं। हिंदी ही नहीं, …

Leave a Reply

Your email address will not be published.