मृणाल पांडे के किस्से: अथ एक कौड़ी के तोते का प्रबंध- 3

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प्रसिद्ध लेखिका मृणाल पाण्डे अपने लेखन में नए नए प्रयोगों के लिए जानी जाती हैं. इस बार वह किस्सागोई की पारंपरिक शैली में किस्सों की एक श्रृंखला लिख रही हैं. जिनको पढ़ते हुए समकालीन सन्दर्भ याद आने लगते हैं. आज उनके किस्सों की श्रृंखला की तीसरी कड़ी प्रस्तुत है. हमें गर्व है कि मृणाल जी के ये किस्से जानकी पुल के माध्यम से आपके बीच आ रहे हैं. जैसा कि किस्सों में होता है हर किस्सा पहले से अधिक रोचक होता जाता है. इस बार का किस्सा और भी रोचक है. नीचे पिछले दोनों किस्सों के लिंक भी दिए गए हैं- मॉडरेटर

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अथ एक कौड़ी के तोते का प्रबंध- 3  

मंदमति नामक बहेलिये ने मुंबा देवी के मंदिर के समीप जंगल से एक तोता पकडा और उसे मुंबा नगरी के हाट में बेचने को लाया। पर तोता निकला एक पैर से लंगडा और एक आँख से काना। उसे भला कौन खरीदता? दिन बीत चला तो थके हारे बहेलिये ने घर से ही कुछ पैसा लाकर ज़रूरी सौदा सुलुफ खरीद लेने की सोची और तोते का पिंजडा अपने एक भरोसेमंद मित्र दूकानदार के पास रखवाने गया।

‘कहो कैसे हो?’ उसने मित्र से पूछा, तो दु:ख का परनाला बह निकला। सहृदय श्रोता को सन्मुख पा कर दूकानदार अपने सांसारिक दु:खों का सांगोपांग विवरण देने बैठ गया। उसकी भार्या कितनी झगडालू, भाई कितना दुर्विनीत, भाई की बहू कितनी आलसी और कुसंगत में पडा उसका इकलौता पुत्र सुनास कैसा लंपट बन चला है, आदि।

‘घर घर हैं मिट्टी के चूल्हे मित्र’, उसे चुप कराने को यह व्यर्थ का दिलासा दे कर बहेलिये ने अपने काम की बात उठाई, कहा –‘ मेरे यहाँ भी तो दुर्दशा का साम्राज्य फैला है। पत्नी बीमार रहती है, सास उससे भी अधिक बीमार। घर में खाना दाना नहीं, और पक्षी पकडा भी, तो काना लंगडा जो किसी भाँति नहीं बिक रहा है। हमारा ललाट लेख ही खोटा होगा। अब तुम तनिक देर इस तोते को रखो, तब तक मैं घर जा कर कुछ पैसा लाता हूँ। यदि इस बीच इस अभागे का कोई गाहक मिल जाये तो उसे एक कौड़ी में बेच देना।’

जैसे ही बहेलिया गया, तोते ने पिंजडा खडखडा कर दूकानदार को अपने निकट बुलाया और बोला, ‘यथा नाम तथा गुणवाला वह मंदमति बहेलिया मेरी वास्तविक कीमत नहीं आँक सका। मैं निभृत एकाकी वन में मुंबा देवी की निरंतर चरण सेवा करते हुए उनके आशीर्वाद से बडा ही कुशल कथाकार और नाना निगमागमों शास्त्रों का जानकार बना एक दुर्लभ प्रजाति का हीरामणि नामक शुक हूँ। अभी उचित समय है। मंदमति मेरे गुणों से परिचित होकर अपनी बोली ऊंची करे, इससे पूर्व तुम ही मुझे एक कौडी में खरीद लो और अपने घर ले जाओ। मैं नित्य अनेक रोचक आख्यान पुराण सुना कर एक साथ तुम्हारा मनोरंजन और तुम्हारे मिथ्यादृष्टि पथभ्रष्ट परिवारजनों का ज्ञानवर्धन करता रहूंगा।’

हीरामणि तोते की बातों से प्रभावित होकर दूकानदार ने एक कौड़ी में उसे मंदमति बहेलिये से खरीद लिया और पिंजडा घर ले गया। हीरामणि तोता अब नित्य उस दूकानदार के इकलौते बिगडैल पुत्र सुनास सहित सारे परिवार को नाना नीति कथायें तथा प्रबंध आख्यान सुनाने लगा, जिनको मनोयोग से सुनते हुए वे सब निरंतर चतुर और शीलवान् ही न बने, उसका पुत्र सुनास भी अपने दुराचारी कुमित्रों का क्रमश: त्याग करने लगा।

दूकानदार को लगा चलो, कौडी व्यर्थ नहीं गई।

कुछ समय बाद एक दिन- दो दिन, कौडी मोल के तोते ने पाया कि सुनास कथा सुनने ही नहीं आता। यह भी न सुना कि उसने परिवारवालों से किसी नये त्याग प्रत्याख्यान की बात की हो।

पूछने पर उसको बताया गया, कि वह लडके ने किसी उत्सव में अचानक मुंबा नगरी के परम धनशाली नगरसेठ अंबष्ठ की कन्या दंभिनी को देखा था। प्रथम दृष्टि में ही उस पर आसक्त हो कर अब वह दिन रात मुख लटकाये अपने ही कक्ष में बैठा रहता है। न खाता है, न पीता है। कहता है यदि विवाह करेगा तो मात्र दंभिनी से ही।

‘अब चाहें भी तो हमलोग इस विवाह का प्रस्ताव कैसे रखें? उस कन्या का धनलोभी पिता अंबष्ठ इतना बलशाली इतना क्रूर है, कि मुंबा नगरी ही नहीं उत्तर में इंद्रप्रस्थ तथा दक्षिण में कुमारी अंतरीप तक शासक तथा शासित सभी उससे भय खाते हैं। साम दाम दंड भेद अपना कर वह सकल ब्रह्मांड के पृथ्वी, जल और आकाश तीनों स्तरों पर सूचना संचार तरंगों के राजपथों का अखंड स्वामी बन जाने के बाद से एकाधिक अवसरों पर राजदरबार में दंभोक्ति करता सुना गया है, कि सारे विश्व के लोगों की कुंडली उसके पास है। वह जब चाहे उनके गूढतम रहस्य उद्घाटित कर उनको राज-समाज के सम्मुख अपमानित व धूल धूसरित करने में समर्थ है।’

सुनास की माता रोती हुई बोली: ‘ हे शुक हीरामणि, मेरी सखियों ने बतलाया कि अपनी पुत्री दंभिनी पर भी उस पापशंकी अंबष्ठ ने गुप्तचर नियुक्त कर रखे हैं जो उसमें रुचि दिखाने अथवा उसकी रुचि के विषय बने पुरुषों पर जानकारियाँ एकत्र कर तुरंत पिता को देते हैं। उनकी सूचनाओं के बल पर अंबष्ठ यह भली भाँति जान गया होगा कि उसके महल के आसपास दिन रात, भ्रमर बन मँडराता यह नया युवा प्रत्याशी कौन है, किसका पुत्र है। और यह भी, कि शिष्टसमाज मान्य सूचकांकों की कसौटी पर उसका परिवार कथमपि उनकी मुँहलगी इकलौती कन्या के योग्य नहीं ठहरता। मुझे दिन रात यह भय खा रहा है कि कहीं ऊँचे राज समाज में भारी पैठ रखनेवाला गर्वी नगरसेठ मेरे सुनास को भी पुत्री से संबंध बनाने के इच्छुक कतिपय अन्य युवाओं की भाँति कारागार में न भेज दे। चार अपमानजनक बातें सुना सुना कर कह देगा सो अलग।

‘अपने एक गुहावासी आध्यात्मिक गुरु के अतिरिक्त वह गर्वी गुर्जर किसी की नहीं सुनता हम किस भाँति उससे अनुनय करें?’

द्रवित तोते ने माता से चिंता न करने को कहा। और आश्वासन दिया कि वह स्थिति से उबरने का कुछ न कुछ उपाय निकाल लेगा।

कुछ दिन उपरांत हीरामणि तोते ने परिवारजनों को समेकित किया और कहा कि उसके पास एक योजना है। पहले वे यह जानकारी प्राप्त करें कि किस दिन नगरसेठ अपनी माताश्री सहित गुरुजी की गुफा में उनका प्रवचन सुनने जानेवाला है। उस तिथि की पूर्वरात्रि को सुनास का पिता चुपचाप उसका पिंजड़ा ले जा कर उसे कंदरा के पीछे किसी अदृश्य स्थान पर टाँग आये। फिर अगली सुबह स्वयं भाई सहित भीतर जा कर गुरु के चरणों में अपने पुत्र की कुंडली रख कर नगरसेठ की माता की ओर कातर दृष्टपात करता हुआ, गुरुचरणों में नगरसेठ पुत्री से सुनास के विवाह संबंध का विनम्र प्रस्ताव रखे।

‘शेष मुझ पर छोड दें,’ दो कौड़ी मोल के कथाकार शुक ने कहा।

मरता क्या न करता? सुनास के पिता ने ऐसा ही किया। जान हथेली पर लिये गुहा में घुस कर वह सीधे गुरुजी के चरणों पर जा गिरा, फिर कौड़ी के तोते की सीख के अनुसार कन्या की पितामही तथा अंबष्ठ को सुना सुना कर गुरु जी से अनुनय करने लगा कि उसके पुत्र का विवाह नगरसेठ की दुहिता से करवा दें।

कोई कुछ कहता, उससे पूर्व कंदरा के द्वार से सबको चकित करती हुई एक गंभीर वाणी आई, ‘देखो सेठ, मैं मुम्बा देवी बोलती हूँ। नगर तथा समुद्रजल की अधिष्ठात्री। अपने वाणिज्य को समुन्नत तथा अपनी कन्या को सुखी देखना चाहते हो तो मेरा आदेश मानते हुए उसे इस सेठ के सुलक्षणी पुत्र सुनास को शीघ्र विवाह में दे दो।’

गुरु की आज्ञानुसार उस वाणी को बडी देवाज्ञा मान कर नगरसेठ ने भी शिरोधार्य किया। और कुछ ही दिन बाद सुमुहूर्त देख कर बहुत धन धान्यसहित अपनी कन्या का विवाह सुनास से कर दिया।

सेठ कन्या, जैसे कि बडे सेठों की बेटियाँ होती हैं, नामानुसार दंभिनी थी। श्वसुरकुल में नित्य सबको सुनासुना कर कहती, ‘मैं सबसे अलबेली, मेरा पिता विश्व के सबसे धनिकों में सर्वोपरि, मेरा तो विवाह भी दैवाज्ञा से हुआ है।’

उसकी गर्वोक्ति सुनते हुए एक दिन शुक को बाजरा और हरी मिर्च खिला रही सुनास की चाची को हँसी आ गई। दंभिनी ने कारण पूछा तो पति सुनास ने उसे सत्य बता दिया। कुपित हो सेठकन्या ने तब से कपटी कथाकार हीरामणि तोते के प्रति दुर्भावना पाल ली और उसे दंड देने के लिये उचित समय की प्रतीक्षा करने लगी।

एक दिन जब घरवाले किसी देवपूजन यज्ञादि की तैयारी में लगे थे, सेठकन्या चुपचाप तोते को पिंजड़े सहित जंगल में उठा ले गई और कहने लगी, ‘बडे भारी पंडित कथाकार बनते हो, अब देखती हूँ तुम्हारी पंडिताई !’ यह कह कर उसने तोते का एक पंख उखाड़ लिया।

दर्द से कलपते तोते ने सोचा, ‘हा हंत हम कथाकारों की जाति। पहले अपने ही ईर्ष्यालु जाति जनों की चोंचों- नखों से विदीर्ण हो हो कर काने लंगड़े बनाये जाओ, फिर किसी बहेलिये के जाल में फँस कर पिंजड़े में कौड़ी के मोल बिको, और तदुपरांत दिन रात मूर्ख दुकानदारों का सपरिवार मनोरंजन करो। यही नहीं, इस सबके बाद भी तो हम कथाकारों पर निरंतर किसी राजा, नगरसेठ या उनकी हठीली संतान के हाथों अपने पर नुँचवाने का भय मँडराता रहता है! विधना, तेरी लीला भी विचित्र है!

संभवत: हम मरणधर्मा कथाकारों के लिये कवि के शब्दों में यही श्रेयस्कर होगा, कि मरो परंतु यूं मरो कि याद जो करें सभी!

अपनी कराह गले में ही अवरुद्ध कर हीरामणि ने सुनास की पत्नी से कहा, ‘हे सुंदरी, तुमको भ्रम हुआ है। वस्तुत: देश में असली पंडित या कथाकार यदि कोई है, तो वह मैं कदापि नहीं। वह तो है इंद्रप्रस्थ नगरी की मत्स्यगंधा नाम से भी जानी जानेवाली एक रूपमती, गुणमती सुनयना हिमुली। पंख लुंचन की पीडा से मुझे अभयदान दो, तो मैं तुमको उसकी रोचक लोमहर्षक कथा सुनाऊंगा।’

इस पर उसके पंख नोंचना छोड कर दंभिनी स्त्रियोचित कुतूहल से कौडी मोलवाले कथाकार तोते से पूछने लगी, चलो कुछ देर को छोडा। अब कहो कि यह हिमुली मत्स्यगंधा नाम्नी तथाकथित पंडिता कौन है और उसका यह नाम कैसे पडा?

उत्पीडक का ध्यान बाँटने में सफल हो कर तोता कथावाचक सुनास की घरवाली दंभिनी को हिमुली मत्स्यगंधा की कथा सुनाने लगा।

अथ हिमुली मत्स्यगंधा की कथा :

राजनीति, धर्म और वणिक् जगत के अनेक महत्वपूर्ण पुरुषों को पूरी तरह मूंड कर भी कभी न पकडी जा सकनेवाली एक धूर्तिनी इंद्रप्रस्थ तथा मुंबा नगरी के अनुभवी बुज़ुर्गों के मध्य हिमुली मत्स्यगंधा करके प्रसिद्ध थी। वृद्धजन बताते थे कि उसका विगत किंचित रहस्यावृत था । एक पूर्णिमा के दिन यह पूर्णयौवना युवती मुंबा देवी मंदिर के समीपवर्ती समुद्र से अर्द्ध नग्नावस्था में बाहर निकली थी। उसकी क्षत विक्षत देह समुद्री जीवों के लंबे सहवास से मछली की तरह गँधा रही थी, किंतु अर्द्धचेतनावस्था में भी वह वाणी की मधुर और परम आकर्षक देहयष्टिवाली थी । कुछ अभद्र उत्सुकता से उसे छू रहे जनों को फटकार कर एक शीलवान् वणिक अपने भृत्यों की सहायता से उस सुंदरी को पास ही समुद्र तट पर स्थित अपनी हवेली में ले गया, जहाँ उसके पुण्यकर्मी परिवारजनों ने उस अनामा युवती को शरीर स्वस्थ होने तक के लिये शरण दे दी । जब वह गृहवैद्य की दी औषधि से स्वास्थ्यलाभ कर रही थी, तो उस अंतराल में परस्पर चर्चा के लिये भद्र परिवार की महिलाओं ने उसे मत्स्यगंधा का नाम दे दिया ।

तनिक सुस्थिर होने के उपरांत युवती ने उन सबको बताया कि वह गुर्जर देश की कुलीन कन्या थी, जो एक मेले से समुद्री दस्युओं द्वारा जबरन अगवा कर मानव हाट में बेचने के लिये यवन देश ले जाई जा रही थी । बीच समुद्र में उनकी दृष्टि बचा कर वह समुद्र में एक खाली घट के साथ कूदी और तैरती हुई येन केन एक सप्ताह बाद मुंबा नगरी के तट तक आ पहुँची थी । उसका मूल नाम हेमांगिनी था किंतु उसका उच्चारण करने में असमर्थ यवन दस्यु उसे हिमुली कहते थे ।

‘अच्छा ! पुरुषों ने कहा । हूँ, महिलाओं ने किंचित अविश्वास से कहा । फिर सब काम में लग गये ।

कुछ समय बाद जैसे ही उसके शरीर की मत्स्यगंध अलोप हुई, हिमुली मत्स्यगंधा ने गृहकार्यों में अपनी प्रवीणता से सब घरवालों का मन जीत लिया । खाना पकाना, खिलाना, घर का प्रक्षालन कार्य, तांबूल विट (बीडे) लगा कर देना, घर के पशु पक्षियों की सेवा, सब कार्य वह बडी दक्षता से कर सकती थी । धीरे धेरे महिलाओं की शंका भी जाती रही और प्राय: जब वरिष्ठ सदस्य तीर्थाटनादि पर जाते गृह के ताले चाभी उसको ही सौंप जाते थे ।

एक बार जब सारे वरिष्ठ जन कुल देवता की पूजा को ग्राम गये हुए थे और गृह के अन्य सदस्य युवाजन- सुलभ मनोविनोदों में लीन थे, हिमुली मत्स्यगंधा अपने शरणदाता कुल की महिलाओं के अनेक रत्नाभूषण तथा गृह के सुवर्ण तथा चाँदी के बहुमूल्य पात्र लेकर अदृश्य हो गई । उसे कई दिन तक खोजा गया पर उसे न मिलना था, न मिली । वणिक् परिवार ने उसके विषय में मौन धारण कर लिया । कुछ लोगों के अनुसार गृह का एक माँस, मदिरा तथा वेश्याप्रेमी ज्येष्ठ पुत्र जो हिमुली की विशिष्ट देह परिमल की ओर प्रारंभ से ही आकृष्ट था, वरिष्ठजनों की अनुपस्थिति में देर रात प्राय्: हिमुली के कक्ष की ओर जाता देखा गया था । संभव था कि उसके मोहपाश में फँस कर वह रत्नाभूषणों सहित हवेली से भागने में उसका सहायक बना हो ।

उपरोक्त कथा को इस बात से भी प्रत्यय मिलता था कि बाद को जब जलोदर से उस युवक की अकाल मृत्यु हुई तो सुना कि मृत्यु के समय जो अंतिम नाम उस हतभागे युवक के मुख से निकला वह ईश्वर का नहीं, हमारी हिमुली मत्स्यगंधा का ही था ।

हरिइच्छा ! भलाई का तो युग ही नहीं रहा आदि.. यह सुन कर करुणामय नागरिकों ने कहा ।

कई दिन बाद मुंबा नगरी से वणिज व्यापार के लिये उत्तर दिशा में स्थित राजधानी इंद्रप्रस्थ से लौटे वणिकों से समाचार मिला कि आर्या हिमुली नाम्ना एक नगरवधू इंद्रप्रस्थ नगर के संभ्रांत क्षेत्र की एक दुमहली अट्टालिका में विराजमान  थी । नगरी के अनेक रूपलुब्ध संगीतप्रेमियों का ही नहीं राजनीति, अर्थनीति तथा विदेश वाणिज्य से जुडे अनेक वरिष्ठ अधिकारियों का भी वहाँ रात गये आना जाना, खाना पीना होता था और रूप, गुण, बुद्धि की धनी तथा कलाओं की प्रवीण हिमुली का नाम अब इंद्रप्रस्थ में सभी के मुख पर था । बडी ही कठिनाई से सामान्यजन को दर्शन देनेवाले राजा सचिवों से उसके अपने गृह या कि राजभवन में भी समागम होते रहते थे । अन्य कुछेक कथायें भी सुनी जाती थीं : हिमुली के शयनकक्ष में स्पर्धी युवाओं के मध्य रक्तरंजित टकराहटों, मदिरा से उन्मत्त भद्रजनों के बीच अभद्र शब्दों के तथा लात घूंसों के वीथि में आदानप्रदान की, किंतु नामित सभी जन मान्य शिष्टवर्ग के थे, अतएव प्रगल्भ समाचार प्रसारकों द्वारा भी कुछ सुवर्ण के आदान प्रदान के बाद उनकी वे कलंक कथायें बार बार दबा दी जातीं थीं ।

इंद्रप्रस्थ के दंडाधिकारियों के पास भी हिमुली तथा उसके संदिग्ध अनुयाइयों के समवेत कुटिल उपक्रमों की अनेक सप्रमाण कथायें इंद्रप्रस्थ के गुप्तचर लाते रहते थे । उनको दंडाधीश के आगे विधिवत् रखा जाता तो हिमुली को अवश्य प्राणदंड मिलता । आजन्म अवधि के लिये कारागार तो भेजा ही जा सकता था । पर हिमुली मत्स्यगंधा के संसर्ग में आये सत्पुरुष न जाने क्यों हर बार अंतिम क्षण पर दंडाधीशों के आगे उसकी धूर्तता का सत्यापन करने से पलट जाते थे ।

कोई कहता हिमुली को मुंबा देवी सिद्ध थीं, वह तंत्र मंत्र से कर्णपिशाची को बुला सकती थी । देवी या पिशाची को कुपित किस प्रकार किया जाये ? कोई कोई उसे किसी महाबली पिशाच की रक्षिता बताता था, जो उसके अनेक शत्रुओं के रक्तरंजित शव हिमुली के महल के बाहर सरणी में छोड चुका था । इन शवों में तीन की पहचान नगर की दुर्जय, शशक तथा जटिलक नाम्ना चर्चित धूर्त त्रयी के रूप में नगर कोतवाल ने की ।

जो हो, यह अविकल सत्य था कि इतनी कथाओं के बाद भी हिमुली मत्स्यगंधा पर किसी राजकीय न्यायपद्धति का पाश कभी नहीं पडा था ।

‘ देखने में कैसी है हिमुली ?’ सेठपुत्री ने स्वयं को अपनी अँगूठी के दर्पण में निहारते हुए हीरामणि तोते से पूछा ।

नुँचे पंख की कम होती पीडास्थली को जिह्वा से चाटते हुए उस दो कौडी के कथाकार ने कुछ क्षण आँखें बंद रखने के उपरांत कहा, ‘अहो, सोलहबानी खरे सोने जैसी आभा से उद्भासित आनन वाली, विशाल कज्जलधारी चंचल नेत्रों, अपने भारी नितंबों और क्षीण कटि के चंचल आंदोलन से बडे बडे धीमानों को भी बोलते समय आधे वाक्य में अटकाने में समर्थ वह वाक्चतुर हिमुली मत्स्यगन्धा तो अपनी प्रौढावस्था में भी संपूर्ण जंबूद्वीप स्थित भरतखंड के हर आयु के सत्तावानों की जिज्ञासा और कामना एक साथ जाग्रत करने में समर्थ है । वह नारीशिरोमणि तो अनुपमेय, चिरयौवना और नित्यसुमंगली है ।

‘ अपि च । पके हुए बिंबाफल सदृश्य अधरोष्ठ वाली उस सरसिज नयनी के अधखुले नेत्रों में न जाने कितने अधूरे पूरे अभिसारों की स्मृतियाँ मछली सी तैरती हैं । उन नेत्रों में झाँकना एक अन्य ही प्रकार के सुकुमार सुखों से परिपूर्ण इतिहास की गहराइयों में डूबना है ..’

बीच में ही उसे टोक कर दंभिनी बोली । नारी की चर्चा हुई नहीं कि तुम कथाकारों की जिह्वा कोस भर लंबी हो जाती है । यह स्फीतिमयता ही तुम सबकी बडी दुर्बलता है । बात को कहाँ कहाँ अमूर्तन के झमेलों में उलझाते हो ! सीधे क्यों नहीं कहते कि उस सरीखी औरत कामुकता की एक पोटली है, और वह कपटी पुरुषवर्ग की सतत दोलायमान मति को अपने रससिद्ध हाव भावों से हर कर उनको पल भर में मिमियाता भेडा बना सकती है  ?’

‘संभवत: तुम सही हो,’ हीरामणि ने प्रकट में कहा, और सोचा, जिसका पिता सकल ब्रह्मांड के सूचना संचार पथों का स्वामी तथा समुद्र से तैल निकाल कर उसे सुवर्ण में परिवर्तित करने की क्षमता रखता हो, उसकी बात को यह दो कौडी का तोता अभी कैसे काटे ? पर मुन्नी, कवि-कथाकार से कौन जीता है ?  कभी न कभी मेरा भी दिन आयेगा !

फिर उसने बात पुन: उठाई, ‘ हिमुली का वशीकरण मंत्र पुरुषों ही नहीं महिलाजगत पर भी  खूब चलता रहा है । सच तो यह है भद्रे, कि अपनी उठने बैठने की शालीनता, और रुचिकर वाग्विलास से सभी बडे घरों के पुरुषों की सराहना का पात्र बनी हिमुली मत्स्यगंधा बडे बडे घरानों के पुरुषों के बीच ही नहीं, उन विवाह योग्या कन्याओं की माताओं पितामहियों आदि में भी बडा मान पाती है, जो सुयोग्य वर की कामनावाली अपनी किशोरी पुत्रियों को हिमुली की भाँति व्यवहार करने को कहती रहतीं हैं ।

फिर तोते ने हिमुली के स्वर में कहा : ‘अयि श्रेष्ठिप्रिया, किधर हो ?’ और दंभिनी को बताने लगा कि किस भाँति यह स्वर सुन कर सेठानियाँ सौ काम छोड कर भागी चली आतीं हैं । जब तक घर की लडकियाँ पाटंबर डाल कर उसे सादर चंदन चौकी पर बिठाएं, बहुएं आर्या हिमुली हेतु ताम्बूल, सुगंधित पेयादि लाने को पाकशाला भेज दी जातीं हैं । जब यह सब औपचारिकतायें पूर्ण हो गईं और महिलावृंद आनंदपूर्वक उसके चारों ओर जम गया, तो एक हाथ से अपने रेशमी दुकूल से मुखकमल पर हल्का सा आवरण डालने के बाद हिमुली की बतकही शुरू हो जाती है ।

बस, फिर तो किसी का उसके पास से उठने को जी नहीं चाहता ।

बडे रईसों में से किस ने किसे घर में नज़रबंद कर रखा है, किस का किस से काँटा भिड रहा है, कौन किसे अपदस्थ करने या पटाने में जुटा है, किसने ऐसी वैसी बेटी के ऐब छुपाने को भारी भरकम विवाह में तमाम सारा रुपया कंकरी कर डाला, उसका तमाम दुर्लभ कच्चा चिट्ठा हिमुली मत्स्यगंधा बडे बडे घरों की बालिका सरीखी उत्सुक बूढियों को थमा जाती है । उस पर दिनों तक खुसुर पुसुर चलती है और कैसे न चले ? दाई से पेट भले छिप जाये, पर मजाल कि हिमुली से किसी घराने के गुण दोष छुपे रहें ?

जभी कमउम्र लडकियाँ, बहुएं पीठ पीछे उसका मज़ाक भले बना लें, सामने पडने पर भींगी बिल्ली बनी रहतीं हैं । उनके उठने बैठने, पूर्व और वर्तमान प्रेम संबंधों ही नहीं, मायकों पर तक जिस कुटनी की दृष्टि निरंतर बनी रहती हो, उस महाचतुर हिमुली की शत्रुता बिना जातिच्युत होने के भय के मुंबा नगरी अथवा इंद्रप्रस्थ में कौन भद्र परिवार मोल ले सकता है भला ?

कथाकार तोते ने दंभिनी को यह भी बताया कि हिमुली के पास कुछ अचूक सिद्धियाँ भी हैं, जो उसके अनुसार समय समय पर उसकी सेवाओं से प्रसन्न उसके सिद्ध साधक प्रेमी उसे कृतज्ञता ज्ञापन स्वरूप प्रदान कर गये थे । उनमें से एक दुर्लभ सिद्धि है उसकी हथेली पर जडे गये एक अदृश्य वीक्षणयंत्र द्वारा महत्वपूर्ण भद्रजनों के अनजाने उनके कुछ परम गोपनीय अंतरंग क्षणों के सजीव चित्र पकडने और उनको सही समय सही नेत्रों को दिखला देने की क्षमता ।

इस सिद्धि के कारण बडे घरों अथवा राजकीय पुरुषों के बीच करतल पर सचित्र वृत्तांतों को दिखा सकने की क्षमता के कारण हर तरह का वैयक्तिक या दलगत गठजोड कराना, सतर्कतापूर्वक गुप्त प्रस्ताव एक दल के तलघर से दूसरे दल के तलघर तक लाना ले जाना, अप्रिय गठबंधन तुडवाना, मित्रों के बीच फूट पडवाना हिमुली मत्स्यगंधा के बाँयें हाथ का खेल है ।

इंद्रप्रस्थ से कुमारी अंतरीप तक राजभवनों में उसे निरंतर वैदेशिक कूटनीति या व्यापार नीति पर मंत्रणा करने को महाराज तथा नगर सेठों की मंडली द्वारा द्वारा आहूत किया जाता था । यदि बात उलझ जाती तो कहा जाता था कि हिमुली कर्णपिशाची की सिद्धि के प्रयोग से म्लेच्छभाषा में –

‘आजा रे आजा आलमगीर, साहों का साह औलिया ज़िंदा होवे पीर !’

जैसे मंत्र का सस्वर पाठ कर विगत काल के कई कुख्यात यवन नृपतियों के जिन्न वेताल भी जगा सकती थी, जो परवर्ती राजपुरुषों द्वारा भेंट व पूजनोपरांत प्रसन्न किये जाकर उनको अनेक अतिरिक्त गूढ तथ्य तथा उपयुक्त विमर्श दे जाते थे ।

तो इस प्रकार जो हिमुली मत्स्यगंधा कुछ व्यापार वाणिज्य किये बिना कुछ ही समय में प्रचुर समृद्धि की स्वामिनी बन गई, सहज था कि उसकी समृद्धि शहर के चोरों के बीच भी चर्चा का विषय बनती । बनी ।

एक दिन वसंतकाल में जब देर रात गये हिमुली किसी गुप्त विमर्श के बाद राजभवन से सुरा रंजन कर घर लौटती थी, सुगंधित पवन से सुरम्य हुए वातावरण में एक गहन श्वासोच्चार सहित अंगरक्षकों से पैदल ही वन की राह से घर लौटने की इच्छा व्यक्त की । उसके भयार्त वाहनचालक उत्तानपाद ने वन प्रदेश के चोरों का भय दिखा कर अनुनय की कि आर्ये के लिये उस गहन वनाकांतार की दुर्गमता देखते हुए संभवत: यह उचित न होगा । तब हिमुली ने तीखी दृष्टि से देख उससे कहा कि उसे बाधित न किया जाये । ऐसा नरपुंगव इंद्रप्रस्थ अथवा मुंबा नगरी में कोई जनमा ही नहीं जो उसे भय से अवश कर सके ।

इस प्रकार अनिच्छुक वाहनचालक तथा अंगरक्षकों को सपदार्थ घर भेज प्राकृत के कुछ सुमधुर आर्या छंद गुनगुनाती हिमुली वन प्रांतर में प्रविष्ट हुई । वह कुछ ही दूर गई होगी, कि उसने पाया कि हठात् पीछे से आए कुछ दस्युओं ने उसे जकड लिया है । दस्युओं का प्रमुख कपर्दि नामक यक्ष बोला, ‘हे लोल लोचनी हिमुली, अपना समस्त आभरण उतार कर तुरत हमको दे ! तू इंद्रप्रस्थ के खाये अघाये इंद्रियभोग रत बूढों को अपनी वार वंचना से छल सकती है, हम कठोर वनवासी यक्षों को नहीं । वन्य प्रदेश में तो दुष्काल के समय मनुष्य मनुष्यों को राक्षस की तरह खा जाते हैं । बाघ के छोडे माँस को नोंचती श्रृगालियाँ नाचती हैं और उनके छोडे हाडों की प्रतीक्षा में घुग्घू कर्कश शब्द कर गाते हैं । ’

कपर्दि के कठोर वाक्य सुन कर भी हिमुली डरी नहीं । दिव्य स्मित से उद्भासित आनन सहित बोली : ‘अरे बावलो ! मैं क्या निस्तेज निर्वीर्य धनिकों तथा राजाधिकारियों की अक्षमता से अपरिचित हूँ ? उनसे विरक्त हो कर ही तो मैं तुम सरीखे शूरवीरों से मिलने और समवेत काम करने की एक चतुर योजना लेकर इस अंधेरे गहन वन में एकाकी आई हूं । तुम अपने सहयोगियों को भेज कर पता कर लो कि यहाँ मैं बिलकुल एकाकी हूँ । मेरे साथ कोई सशस्त्र तो क्या निरस्त्र अंगरक्षक भी नहीं ।’

कपर्दि के दूतों ने तभी आकर उसके कान में बताया कि आर्या हिमुली सत्य कहती हैं । इनके साथ या पीछे इस वन में कहीं कोई अंगरक्षक या राजकीय अधिकारी नहीं आया है ।

हिमुली पुन: हँसी । सत्यापित हुआ न ? अब चलो भी, हम सब तनिक विस्तार से मित्रवत् वार्तालाप करते हैं । रही बात मेरे आभरणों की, सो हे सुवीर भट, मेरा शरीर भी तुम्हारे आधीन है, आभरणों की तो बात ही क्या ?

यह सुन कर कपर्दि के संकेत पाकर यक्षों ने हिमुली को छोड दिया । और कपर्दि ने उसके पाश खोलने के बहाने बार बार उसके उन्नत उरस्थल को स्पर्श करते हुए मादक स्वर में कहा: ‘बोल चारुलोचने तुझे जो कहना है, रात्रि शेष हो इससे पहले वह सब इस कपर्दि यक्ष को शीघ्र बता दे । ’

‘सुन सह्दय यक्षराज,’ हिमुली बोली, ‘अभी लगभग चार घडी रात शेष है । जो कहती हूँ ध्यान से सुन । तुम्हारा विश्वास जीतने को बताती हूँ कि आज राजभवन से मुझे काम का प्रचुर बयाना ही नहीं मिला है, राजा के विपक्षी गुटों को भंग करने हेतु दिये जानेवाले उत्कोच का एक रत्नपूरित सुवर्ण घट भी मुझे गुप्त राजकोष से दिया गया है । अब तक वह सब धन वाहनचालक के साथ मेरे राजकीय आवास पहुँच चुका होगा । यदि दो घडी में मैं घर न पहुँची तो वह राजरक्षकों को लेकर खोजता हुआ यहाँ आ सकता है ।

‘अत: यदि तुम आज्ञा दो तो अभी मैं घर को जाती हूँ । वहाँ प्रवेश करने के उपरांत अपने वाहन चालक तथा द्वारपालों को विषैले सुरापान से मत्त बनाने के बाद उन सबको अनुचर आवास भेज कर सामने से कुंडी लगा कर सब दीप बुझा दूंगी । तीन घडी बाद तुम पिछवाडे से मेरे आवास में घुसना, उस द्वार पर अर्गला नहीं लगी होगी । वहाँ वह सारा राजकीय धन साथ लेजाने योग्य पोटलियों में तैयार रखे मैं सुरापान सामग्री सहित मिलूंगी । सुरापान तथा भोजनोपरांत एक एक गठरी लेकर तुम पीछे के मार्ग से इधर आ जाना, वह सारा धन तुम्हारा ।

मैं सुबह देर से उठती हूँ, जब तक पुरुष राजभवन जा चुके होते हैं । देर सुबह मैं रोती हुई हल्ला कर दूंगी कि वाहनचालक तथा रक्षकगण मुझे अकेली पा कर मेरा शीलभंग कर सब धन ले उडे हैं । उनको सूली दे दी जाये ।

‘हे विशाल छाती वाले नरपुंगव, तुमको क्या बताना ? साम दाम दंड भेद से चलती आई इस इंद्रप्रस्थ नगरी में तो राजकीय क्षेत्र द्वारा शत्रुपक्ष में फूट डलाने के लिये अथवा कतिपय विशेष नगरसेठों को नवीन वाणिज्य विपणन संबंधी संधि-विग्रहों से लाभान्वित करने के लिये कुछ चतुर मध्यस्थजनों को उत्कोच देने की प्रथा चिर काल से रही है ।

ज्ञातव्य है कि इस भाँति दिये गये धन की कोई लिखा पढी राजकोषों में नहीं की जाती । राजकीय खातों में उसे पाताली धन मात्र लिखा जाता है । अत: जो अलिखित होने से कहीं है ही नहीं, ऐसे धन की चोरी पर सदा आवरण पडा रहता है । इस बार भी खोज बस हिमुली के शीलभंग के दोषियों की ही होगी । जब तक राजकीय गुप्तचर और दंडाधिकारी किसी मूर्ख दीन निर्दोषी को सदा की भाँति पकड कर उसको शारीरिक यंत्रणा दे दे कर उससे अपराध की स्वीकृति करवायें, आप लोग उनकी लाशों को लेजाकर किसी अंधे कुएं में फेंक देना । संदेहपारायण गुप्तचर प्रमुख तक को तब तक उनकी दशा को लेकर संदेह न होगा । बाद को उनकी क्षतविक्षत लाशें मिलीं तो सब यही कहेंगे उन्होंने ग्लानिवश आत्महत्या कर ली होगी । जैसे को तैसा । ’

यक्ष प्रमुख कपर्दि ने सोचा, अहो यह मैं कैसा आकर्षण अनुभव करता हूँ ? किंतु क्या करूं ? वसंत ॠतु में काम जाग्रत हो तो सत्पुरुषों को मूर्खा भी आकृष्ट करती है, फिर यह महिला तो रूपमती ही नहीं, बुद्धिमती भी है । पुरुष मन की वृत्ति प्रकृत्या ऐसी चपल होती है कि वृद्धावस्था में भी मोहपाश में जकड सकती है, फिर मैं तो युवा हूँ ।

यदि लक्ष्मी स्वयं विलास क्रीडा के आमंत्रण के साथ न्याय या अन्याय से मेरे पास आने को आतुर हो तो हिचक कैसी ?

‘ठीक है, तू जा, हम आते हैं,’ वह बोला ।

-‘आऊँजो ।’ नैन नचाय हिमुली कह्यो मुसकाय । ‘आर्यपुत्र विपुल विमर्श के इच्छुक हों तो अकेले आयें । शंकालु होकर  डरते हों, तो अपने सभी सुभटों को संग लेकर आवें दासी हिमुली प्रतीक्षा करेगी ।’

ठीक जैसा कि हिमुली ने सोचा था, रात्रि के अंतिम प्रहर में अपने साथियों को  बाहर उपवन में छिप कर रुकने को कहता दस्युराज कपर्दि एकाकी ही पिछवाडे से उसके घर के भीतर घुसा ।

पर यह क्या ?

‘उसके भीतर आते ही किवाड की ओट में तलवार लिये खडी हिमुली ने एक झटके से उसकी नाक काट डाली । स्तंभित हो पीडा से भागो भागो, चिल्लाता कपर्दि बाहर उपवन की ओर भागा । उसके साथियों ने जब अपने आर्तनाद करते नेता का रक्तरंजित मुख देखा तो वे सब भी उसके साथ साथ वन की ओर भाग गये ।

तब हिमुली मुस्काई और लौह ॠंखला से सब द्वार गवाक्ष बंद कर सो गई ।

अगले दिन जब प्रतिशोध में बाहर खडे यक्षों ने हिमुली को मंद शिथिल गति से वाहन में चढते और सशस्त्र अनुचरों सहित राजभवन को जाते देखा तो वाहन एक असुरक्षित क्षेत्र में पहुँचने पर घात लगा कर उसके अंगरक्षकों का संहार किया और कपर्दि के निर्देशानुसार हिमुली को मारने की बजाय जीवित ही पकड लिया ।

’तूने क्या सोचा था कि हमारे मुखिया की नाक काट कर तू बच जायेगी ?’ शुकनास नामक यक्ष ने हिमुली से कहा ।

‘ नहीं मित्र । पलायन करें मेरे शत्रु । चलो अच्छा हुआ आप सब मिल गये,’ हिमुली बोली । ‘ मैंने तो जो किया, आप सबके ही हितार्थ किया । अब क्या छुपाना ? मैं नहीं चाहती थी कि आपका नेता अकेले उतना धन समेट कर बिना उसे अपने साथियों में समान रूप से वितरित किये, चुपचाप निकल ले । क्या उससे तुम सबकी नाक दस्युओं के बीच न कट जाती ? उस एक की ही नाक काट कर समझो कि मैंने तो तुम सबको लज्जा से बचा लिया ।’

तभी चेहरे पर दुकूल लपेटे, ‘ छोडना मत इस चाण्डालिनी को ! पाश से कस कर जकडो, भागने न पाये’ आदि कहता कपर्दि वन से निकला ।

उसे देख कर हिमुली पहले सहमी, फिर शोक का नाट्य करती अपना सर हिलाने लगी : हाय यह कैसे हुआ आर्य कपर्दि ? हाय तुम्हारी वह खड्ग सी सुंदर  नासिका किसने काट ली ? चलो चलो मेरे घर में राजवैद्य का दिया एक विशेष लेप है । लगा देती हूँ । व्रण शीघ्र भर जायेगा ।’

कपर्दि ने सर के इंगित से अपने दल को कहा मत छोडना । फिर कटी नाक के कारण सानुनासिक बन गये स्वर में हिमुली मत्स्यगंधा से चुपचाप साथ चलने को कहा ।

हँसी छुपाने को हिमुली ने इधर उधर देखा । और बचने की राह न पा कर चुपचाप यक्ष टोली के साथ चल पडी । उसे आशा थी कि संभवत: आगे जा कर किसी मोड पर कोई ऐसी स्थिति बने कि वह इनके पाश से मुक्त हो कर भाग सके । किंतु कुछ दूर जा कर कपर्दि का एक विश्वस्त यक्ष बोला, ‘हे आर्य, आप दोनो वृक्ष तले विराजें हम भोजनादि लेकर आते हैं ।’

हिमुली को बैठना ही पडा । उस शून्य प्रांतर में बस उसके अंगरक्षकों के शव पडे थे और यक्ष दस्युओं के अतिरिक्त दूर दूर तक कोई जीव न दिखता था ।

जैसे ही वे बैठे, कपर्दि के इंगित पर एक यक्ष ने मूर्छना की औषधि से भीगा एक वस्त्रखंड हिमुली की नाक से सटा दिया और उसकी चेतना जाती रही ।

जिसका जन्म न हुआ हो, जो चित्र में लिखित हो और जो मर गया हो, इन तीन पुरुषों को छोड चौथे का विश्वास कभी न करना, मूर्छित होती हिमुली ने स्वयं से कहा ।

जब हिमुली चैतन्यावस्था में लौटी वह मुंबानगरी में थी । और वहाँ के एक अति क्रूरकर्मा किन्नर कलाल को कपर्दि द्वारा वह बेच दी जा चुकी थी । पट के अन्तराल से चेतना लाभ करती हिमुली ने कपर्दि को जाते जाते उस कलाल से कहते सुना :’यह सुंदर किंतु परम कुमार्गी युवती है । कठोरता से रखना अन्यथा पछताओगे ।’

‘चिंता न करो,’ किन्नर कलाल को हिमुली ने कपर्दि से कहते सुना : ‘ हम किन्नरों का काम वीतराग, ब्रह्मचारी होने से ही चलता है । किसी भी कपटिनी स्त्री को राह पर लाना मैं जानता हूँ ।’

जानता है तू अण्डा, हिमुली ने सोचा । किंतु प्रकट में मुँह नीचा किये रही ।

किन्नर कलाल को कठोरता दिखाने की आवश्यकता ही नहीं पडी । हिमुली उसके एक ही इंगित पर बडी विनम्रता से दिव्य सुंदरी बारबाला बनी और जैसा जैसा उससे कहा गया, बिना विवाद के बडी ही निपुणता से करती गई । ‘आत्मा वात्मा कुछ नहीं है, किंतु पुनर्जन्म है, सो हे कन्ये कभी न कभी तेरे दिन पलटेंगे,’ उसने स्वयं से कहा ।

हिमुली के निरंतर निष्काम किंतु सजीव कार्यसंपादन पर किन्नर कलाल बहुत प्रसन्न हुआ । बिना रोये कलपे, स्वर ताल को संतुलित रखते हुए उसने मात्र चार दिन के भीतर ही अपने नृत्य संगीत के कौशल से नगरी के सभी गुणी रसिकजनों के बीच प्रभूत कीर्ति अर्जित कर ली । किन्नर कलाल की कमाई चार गुनी बढ गई । हिमुली को कलाल की मदिरा के प्रेमी और उसे दूर दूर से देखने सुनने को आनेवाले अतीव उत्साही गाहकों द्वारा अपने मस्तक पर न्योछावर की जाने वाली राशि से अतिरिक्त द्रव्य मिलने लगा । माह भर बाद किन्नर प्रमुख कलाल द्वारा चयनित कुछ बडे घरों में सीमित आवाजाही की स्वीकृति भी उसे प्राप्त हुई ।

एक दिन किसी गाहक से मिलने गई हिमुली वापिस नहीं आई । किन्नर कलाल रोया पीटा किंतु कर्पूर की सुगंध सी उड गई वह सुंदरी नर्तकी उसे पुन: न मिल पाई ।

उधर इंद्रप्रस्थ लौटने पर यक्षों के दिन हिमुली के घर से उठाये गये माल से सुखपूर्वक बीतते थे । उसका शून्य पडा भाँय भाँय करता घर उनका नया अड्डा बना । दिन भर चौर्यकर्म के बाद वे माल लेकर पिछवाडे से उस उजाड घर में घुसते और पाकशाला में माँसादि पका खाते । चौर्यकर्म से मिला माल भी वह वहीं रखे कतिपय बडे पिटारों में जमा करते रहते ।

जब फाल्गुन माह के मदनोत्सव दिवस समारोह में सारी इंद्रप्रस्थ नगरी उन्मत्त हो उपवनों में विचरण करती थी, तब उनके घरों से प्रभूत माल उठा कर प्रसन्न दस्यु टोली ने अवसरानुकूल स्त्री समागम कर वेश्यालय में माँसाहार तथा सुरा पान से अपने को तृप्त किया ।

रात्रि गये शिथिलगात लिये कपर्दि जब शयनकक्ष में घुसा तो उसने वहां रत्नों की एक विराट् मंजूषा सहित स्वयं मत्स्यगंधा हिमुली को शैया पर विराजमान पाया ।

कपर्दि जब आँखें मल मल कर देख रहा था कि यह यथार्थ है अथवा मदिराप्रसूत कोई स्वप्न, तब हँसती हुई हिमुली ने उसे गाल पर चुंबन कर दूर से एक नवलखा हार निकाल कर दिखलाया और मधुर स्वर में कहा, ‘चलो प्रियतम, आज के दिन हम प्रेमीजन क्यों न पुरानी बातें भुला दें । यह देखो मैं मदनोत्सव पर्व पर कैसा उपहार मुंबानगरी के प्रसिद्धिप्राप्त अभिनेता के घर से उडा कर लाई हूँ ।’

कपर्दि ने हार लेने को हाथ बढाया तो हिमुली ने भारी हुंकार सहित उसे भुजा पर जगह जगह काट खाया । पीडा से बिलबिलाता रक्तरंजित हाथ लिये कपर्दि बाहर भागा, ‘अरे यह तो वही चाण्डाली हिमुली रक्तदंता काली बन अवतरित हो गई है रे !’ इस पर उसके अन्य सहयोगी भी डर कर भाग गये ।

उनको गया हुआ जान कर अपने घर के नाना कक्षों में नाना स्थानों पर छुपाये यक्षों के चोरी का सारा माल लेकर हिमुली भी चंपत हुई ।’

इंद्रप्रस्थ में उस चोरी का भी कोई उल्लेख न हुआ । जो धन था ही नहीं वह रहे या जाये, कौन पूछता ?

इतना कह कर तोते ने सुनास की घरवाली से कहा, अब मानोगी कि ऐसी वाक्चतुर ऐसे चौर्यकर्म की योजनाकार हिमुली मत्स्यगंधा ही सबसे बडी पंडित तथा कथाकार सिद्ध होती है ?’

सुनास की पत्नी ने एक और पंख उखाड कर कहा, ‘नहीं हिमुली नाम्ना कोई सुंदरी है ही नहीं वह तो कोरी कथाकार की कपोलकल्पना है । यदि नहीं, तो मुझे उससे मिला तब यह बात मानूंगी ।

मेरी दृष्टि में तो अभी भी तू ही पंख नुचवाने योग्य सबसे बडा पंडित है ।’

‘तुमको समझाना बहुत कटिन है अंबष्ठदुहिता,’ हीरामणि ने कहा । ‘किंतु हिमुली से मिलना हो तो मुझको उसे मुंबा देवी के मंदिर में बुलवाना होगा । दुकानदार के घर वह नहीं आयेगी । एक कौडी के उस भयार्त काने कथाकार ने अपनी पूँछ की ओर हाथ बढाती नगरसेठ की पुत्री से कहा, ‘तुम बस मुझे अभी अभयदान दो, तो मैं कल ही उसको मंदिर में बुलवा भेजता हूँ । इन दिनों वह मुंबा नगरी के अन्य बडे वणिक, वाहनों के सुविख्यात निर्माता रत्नसेन की दूती बनी मुंबा नगरी तथा इंद्रप्रस्थ के बीच आती जाती रहती है । बहुत संभव है वह पास ही हो । निश्चय ही कल दोपहर तक वह यहाँ मंदिर में आ जावेगी । बस उसी समय तुम भी किसी बहाने यहाँ आ जाना ।’

दंभिनी ने कुछ पल दो कौडी के तोते को घूरा । किंतु अब तक उसकी उत्सुकता जागृत हो गई थी, अत: वह राज़ी हुई ।

यह तय हुआ कि वह पंख टूटने से उडने में अशक्त हो गये हीरामणि तोते को मंदिर में रख आयेगी और घरवालों से कह देगी वह भाग निकला । फिर कल पितृगृह जाने का बहाना बना कर वहाँ आ जायेगी ।

‘तो कल मिलते हैं, और हिमुली मत्स्यगंधा न आई तो तेरी खैर नहीं,’ दंभिनी जाती जाती गला मरोडने के इंगित सहित तोते को धमका गई ।

(अगली बार कथित पंडिता हिमुली तथा रत्नसेन का प्रबंध-4)

पिछले दोनों किस्सों को पढने के लिए इन दोनों लिंक को क्लिक करें: http://jankipul.com/2017/02/8871.html

मृणाल पांडे का अथ पुरातन प्रबंध नव्य संस्करण -2

 

 

 

 

 

 

 

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