जयंती रंगनाथन और ‘बॉम्बे मेरी जान’

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वरिष्ठ पत्रकार जयंती रंगनाथन की किताब आई है ‘बॉम्बे मेरी जान’. इस किताब पर कादम्बिनी पत्रिका के पत्रकार अरुण कुमार जेमिनी की यह टिप्पणी- मॉडरेटर

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मैं लगभग छह साल पहले इनसे पहली बार मिलाथा। वह भी तब जब इन्होंने ‘हिंदुस्तान’ ज्वाइन किया। कह नहीं सकता कि अगर ये ‘हिंदुस्तान’ नहीं आतीं तो इनसे पहली मुलाकात का सबब कब और कैसे बनता।इसलिए कहा जा सकता है कि यह संयोग यहीं बनना लिखा था। यह बात अलग है कि मैं इनके नाम और काम से पहले से ही परिचित था। फिर भी आमने-सामने की मुलाकात का संयोग यहीं बना, जहां हम साथ-साथ काम कर रहे हैं। यहां मैं बात कर रहा हूं वरिष्ठ रचनाकार और पत्रकार जयंती रंगनाथन जी की। जयंती जी से उस पहली मुलाकात से लेकर आज तक की मुलाकातों से एक बात तो साफ हुई है कि वे बातचीत करने या मिलने में कभी औपचारिक नहीं होतीं। तमाम सादगी और गंभीरता के बावजूद चेहरे पर अठखेलियां करती मुस्कान, लहरों जैसी चंचल भाव-भंगिमाएं उन्हें अपने बचपन से दूर नहीं जाने देतीं। यह आज के गलाकाट प्रतियोगिता के जमाने में एक बड़ी बात है…

एक बात और… लेखकों के बारे में एक धारणा-सी बनी हुई है कि वे थोड़ा लापरवाह किस्म के इनसान होते हैं, लेकिन जयंती जी इस धारणा को भी तोड़ती हुईं दिखाई देती हैं। इनके पूरे व्यक्तित्त्व में खासा सलीकापन है। और यह सलीका उनके व्यक्तित्त्व के साथ-साथ उनकी तमाम रचनाओं में भी दिखाई देता है। लिख लेना बड़ी बात नहीं है, सलीके से लिख लेना बड़ी बात है और इसके लिए जयंती जी बधाई की हकदार हैं।

यहां इन बातों का जिक्र करने की एक वजह है और यह वजह पैदा की है जयंती जी ने। हाल ही में इनकी एक पुस्तक आई है— ‘बॉम्बे मेरी जान।’ इस पुस्तक में इन्होंने अपनी यादों को समेटा है। ये यादें सिर्फ इनकी ही नहीं हैं, बल्कि उन तमाम लोगों की भी हैं, जो जिंदगी की तलाश में एक शहर से दूसरे शहर भटकते हैं। पिता के जाने के बाद किसी तगड़े सपोर्ट सिस्टम की तलाश में अम्मा के साथ मुंबई आना। ‘धर्मयुग’ से कॅरियर ही नहीं, बल्कि जीवन की भी एक नई शुरूआत करना और उसके बाद ‘सोनी एंटरटेनमेंट टेलीविजन’ के साथ जुडऩा। नौकरी और जीवन की तमाम जद्दोजहद के बीच अपने भीतर की ‘जयंती’ को बचाए रखना इनके लिए किसी चुनौती से कम नहीं था, लेकिन इन्होंने इसे भी कुबूला।

आज भी मुंबई को याद करते हुए इनकी आंखों में चमक देखी जा सकती है। जितना मुंबई के बारे में ये अपने शब्दों से कहती हैं, उससे कहीं ज्यादा इनकी आंखों में आपको मुंबई झांकती हुई दिखाई देगी। मायानगरी मुंबई है ही ऐसी। जो एक बार यहां आ जाता है, वह फिर यहीं का होकर रह जाता है। इसकी एक बानगी जयंती जी भी हैं।लगभग उन्नीस साल हुए मुंबई छोड़े, लेकिन वह आज भी इनकी सांसों में बसता है। मुंबई से जुड़ी इनकी यादें और उन यादों से जुड़ी शख्सियतें इन्हें आज भी उस दुनिया मेंले जाती हैं।

अपनी इस पुस्तक में जयंती जी ने उन्हीं गुमनाम चेहरों को पहचान देने की कोशिश है,

जो पात्र कल तक सिर्फ इनके जीवन का हिस्सा थे, आज हम सभी उनसे रूबरू हो रहे हैं। चाहे वह लोकल ट्रेन में गाना-बजाने वाला बेफिक्र चरसी लडक़ा हीरा हो या अपने ही गुरूर में रहनेवाली डांसर शबनम या फिर अपनी ही तरह के खास मिजाज वाला हिजड़ा ज्योति… इन सभी के जीवन में झांकते हुए आपको उनकी दुनिया से रूबरू होने का मौका तो मिलेगा ही, साथ ही उस दौर की मुंबई को भी आप महसूस करेंगे। वक्त की रफ्तार के साथ-साथ शहर भी बदलता है, यह वे बेहतर समझ पाएंगे जिन्होंने उस और इस दौर की मुंबई को देखा है। इस पुस्तक को पढ़ते हुए एक बात तो महसूस होती है कि जयंती जी रिश्तों को बुनते हुए ‘आचार-संहिता’ की पुस्तक को अपने हाथों में नहीं पकड़ती हैं, शायद इसलीए इन रिश्तों को इतनी शिद्दत से जी रही हैं।

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