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सांसद एक सामान्य व्यक्ति की तरह क्यों नहीं रह सकता- हरिवंश

 प्रसिद्ध पत्रकार हरिवंश को राज्यसभा में आये एक साल से अधिक हो गया है. उन्होंने अपने अनुभवों को साझा किया है. प्रस्तुति युवा पत्रकार निराला की है. 
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पत्रकार हरिवंश को पढ़ते रहनेवाले, करीब से जाननेवाले जानते रहे हैं कि राजनीति उनके रग-रग में है. झारखंड को केंद्र बनाकर करीब ढाई दशक तक प्रभात खबरके जरिये पत्रकारिता करते हुए और उसके पहले रविवारऔर धर्मयुगजैसी पत्रिकाओं में पत्रकारिता करते हुए उन्होंने राजनीति पर ही सबसे ज्यादा लिखा है. सिर्फ लिखा भर नहीं है, वे वैकल्पिक तरीके से राजनीतिक हस्तक्षेप करते भी रहे हैं. झारखंड के सुदूरवर्ती गांवों, जंगल में बसे एकांत इलाके में भी जाकर लोगों को बताते रहे हैं कि यह लोकतंत्र ही दुनिया में सबसे बेहतर विकल्प है और राजनीति ही है, जो चीजों को बदल सकती है. हरिवंश का राजनीति से इस तरह का रिश्ता कई वजहों से रहा है. जिसमें एक मजबूत वजह शायद जेपी की जन्मस्थली  सिताबदियारा जैसे गांव में पैदा होने बचपन से लेकर किशोरावस्था तक वहीं गुजारना भी है. अब वही पत्रकार हरिवंश खुद राजनेता भी हैं. राज्यसभा के सांसद. लेकिन वैसे वाले सांसद नहीं, जिनके चलने के पहले जिले से लेकर कस्बे तक में सूचना रहती है, अमला से लेकर माला तक का मुकम्मल इंतजाम रहता है और चमचमाती हुई गाड़ियों का काफिला उम्मीदों-आकांक्षाओं को रौंदते हुए रोज निकलता रहता है. वे राजनीति में जाकर राजनीति सीखने की कोशिश में लगे हुए हैं. संसद के हर सत्र में जाकर सीखने की कोशिश में हैं. फिर वहां से लौटने के बाद ग्रासरूट पत्रकार की तरह आमलोगों के बीच, सामान्य तरीके से जाकर नब्ज समझने की कोशिश कर के. एक जिद की तरह कि कोई सांसद विशिष्ट बनने की बजाय आम आदमी की तरह ही क्यों नहीं रह सकता! इस जिद को पूरा करने के लिए सांसद बन जाने के बाद की दिखावे की परंपराओं के निर्वहन और तमाम दबावों को झेलते हुए खुद से लड़ रहे हैं. इस लड़ाई में वे जीत जायेंगे या कि हार जायेंगे, अभी कहना मुश्किल है. वे सांसदी फंड को लेकर भी अपने तरीके का प्रयोग कर रहे हैं. लेकिन सबकुछ चुपचाप. बिना किसी शोर के. हरिवंशजी संसद के अनुभवों को बार-बार साझा करते हैं. राजनीति से निकली हुई चीजें स्थितियां बदलेंगी- राजनीति अब कोई बदलाव नहीं कर सकती जैसी बातों का कोलाज बनता है उनकी बातों से. उम्मीदी और नाउम्मीदी के बीच, आशा और निराशा के बीच लेकिन आखिरी में खुद के अंतर्द्वंद्व से जूझने के बाद जैसे खुद से, खुद को विजयी करार देकर, निष्कर्ष भी सुनाते रहते हैं कि चीजें बदलेंगी, हालात बदलेंगे, स्थितियों में बदलाव राजनीति ही लायेगा. धीरे-धीरे ही सही, दूसरे रास्ते से ही सही. लगातार आग्रह के बाद हरिवंशजी ने पत्रकार के बाद सक्रिय राजनीति में भूमिका निभाने की प्रक्रिया से गुजरने के अनुभव को लिखने की सहमति दी. वह भी संकोच और दुविधा का आवरण इतना रहा कि कभी हां-कभी नाहोता रहा. लेकिन अंततः कुछ टूटी हुई-कुछ बिखरी हुई बातों को मिलाकर उन्होंने कुछ लिखा. उस लिखे का ही संक्षिप्त और संपादित अंश यहां साझा किया जा रहा है. जो हरिवंशजी को लगातार पढ़ते रहे हैं और उनके नियमित पाठक रहे हैं, संभव है, उन्हें इस लेख में वह प्रवाह न मिले लेकिन ताजगी और सरोकारी पक्ष का मिलना तय है. राजनीति किस रास्ते पर है और संसद भवन, जिसे लोकतंत्र का लैंप हाउस कहते हैं, वहां क्या हाल हैं, उसे बहुत ही सहजता से और बिना किसी अगर-मगर के बताने की कोशिश है इसमें. यह एक पत्रकार के नया सफर पर निकलने का शुरूआती अनुभव भर है, सौंदर्यबोध और शब्दों के साज-सज्जा से भरा संस्मरणों का दस्तावेज नहीं….
                                                         – निराला
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नये सफर की फुटकर बातें
हरिवंश
 
लगभग ग्यारह महीने हुए, राज्यसभा का सदस्य बने. लगातार मन में यह सवाल उठता रहा है कि यह अनुभव कैसा है? हालांकि यह शुरूआत के ही दिन हैं. दिसंबर, 2014 के अंत तक दिल्ली में घर नहीं मिला या छोटा आफिस नहीं बना सका था. बिना आफिस बने एक सार्थक भूमिका (बतौर एम.पी) संभव नहीं. प्रक्रिया ही ऐसी है. अप्रैल 10, 2014 से राज्यसभा सदस्य के तौर पर कार्यकाल की शुरूआत हुई. जून में शपथ ली. एक महीने का बजट सत्र था. उसमें शरीक रहा. फिर शीतकालीन सत्र में. इस सत्र में थोड़ा अनुपस्थित रहना पड़ा. राजनीतिक काम, अस्वस्थता व झारखंड चुनाव के कारण. कुछेक पार्लियामेंट्री कमेटी की बैठकों में शरीक हुआ. इस पद पर जाने का प्रस्ताव अचानक आया. वह रात अब भी स्मृति में हैं. तब पिछले कुछेक महीनों से रात दस से साढ़े दस के बीच खाना खाकर सोने का क्रम चल रहा था. पर उस दिन किसी राष्ट्रीय मुद्दे पर एक टीवी आयोजन की परिचर्चा में भाग लेना था. टीवी चैनल के लोग अपना ओवी वैन लेकर घर आये थे. उल्लेख कर दूं कि पिछले कुछेक वर्षों से टीवी चैनलों के डिबेट से भी बचता हूं. कम मौकों पर ऐसे आयोजनों में शरीक होता हूं. उस दिन इस डिबेट के कारण सोने में देर हुई. लगभग ग्यारह बजे रात में फोन आया कि आपको राज्यसभा जाना है. अगले दिन शाम में इसकी घोषणा हुई. पहली प्रतिक्रिया एक किस्म की आनंद की, खुशी की थी. क्योंकि इस व्यवस्था में राज्यसभा, लोकसभा जाना एक बड़ी उपलब्धि मानी जाती है. इसके पहले 1991 में जब चंद्रशेखर जी प्रधानमंत्री थे, तब उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय में, प्रधानमंत्री के अतिरिक्त सूचना सलाहकार, संयुक्त सचिव भारत सरकार के रूप में, इसी तरह अचानक बुलाया. जब तक वह सरकार में रहे, रहा. जिस दिन उन्होंने इस्तीफा दिया, उसी दिन प्रधानमंत्री कार्यालय के रिसेप्शन पर इस्तीफा, गाड़ी, घर की चाबी, सबको छोड़ कर रांची लौट आया था. उस वक्त भी पहली बार खबर पाकर एक उल्लास हुआ था कि व्यवस्था की अंदरूनी दुनिया देखने का अवसर मिलेगा. तब युवा था. उत्सुकता थी कि देखूं कि सरकार चलती कैसे है? सही भूमिका की कितनी गुंजाइश है? इससे अधिक न तब कोई कामना थी, न अब कोई कामना है. यह व्यवस्था अंदर से कैसे चलती है? इसके महत्व क्या हैं? इसी क्रम में राज्यसभा जाने का यह अवसर आया. याद आया कि प्रभात खबर में आना एक बदलाव का प्रतीक था. निजी जीवन में. कोलकाता में आनंद बाजार पत्रिका (रविवार) और मुंबई, टाइम्स आफ इंडिया समूह के धर्मयुग में काम करने के बाद. यानी दो सबसे बड़े अखबार घरानों के दो सबसे महत्वपूर्ण हिंदी प्रकाशनों में काम करने के बाद एक बंदप्राय अखबार प्रभात खबर में आना. उसको खड़ा करनेवाली टीम के सदस्य के रूप में होना. पिछले 25 वर्षों तक इससे जुड़े रहने के बाद एक ठहराव का एहसास होना. उस दौर या मनःस्थिति में राज्यसभा जाने का यह प्रस्ताव, निजी जीवन में एक बदलाव का प्रतीक लगा. यह बदलाव कैसा रहेगा? पिछले कुछेक महीनों से यह सवाल मन में उठता रहा है? अंतर्द्वंद्व के रूप में यह सवाल उठता रहा कि क्यों इस पद के लिए लोग 100-200 करोड़ रुपये खर्च करते हैं?
 
राज्यसभा में किस प्रभाव के लोग पहुंचते हैं, इसकी चर्चा पढ़ी थी. आज केंद्र में जो रक्षा राज्यमंत्री हैं, वीरेंद्र सिंह. वह हरियाणा की राजनीति में असरदार व्यक्ति रहे हैं. लंबे समय तक कांग्रेस में रहे. कद्दावर व्यक्ति. कांग्रेस छोड़ने से पहले उनका बयान आया कि सौ करोड़ में हमारे यहां से लोग राज्यसभा जा रहे हैं. इन सब बातों से परे रहकर ही बात की जाये, तो जिस झारखंड में 22 विधायक कम से कम ऐसे हैं, जो राज्यसभा चुनावों में संदेहास्पद मतदान या पक्षपतापूर्ण मतदान के घेरे में आये. सीबीआइ जांच के प्रभावों में. विजय माल्या, जो किंगफिशर के मालिक रहे हैं, और जिनकी कही खबरें सुर्खियां बनती रही हैं, वह भी राज्यसभा में हैं. कुछ ही महीनों पहले एच.डी.कुमारस्वामी, जो कर्नाटक में मुख्यमंत्री रहे, उनका एक टेपरिकार्डेड बयान, देश के सारे अखबारों की सुर्खियों में रहा. उन्होंने अपने यहां एक व्यक्ति को एमएलसी का टिकट देने के लिए पांच करोड़ रुपये की मांग की. जब यह खबर सार्वजनिक हुई, तब उन्होंने कहा कि हां, पार्टी के लिए हमलोगों ने चंदा मांगा. झारखंड से कैसे-कैसे लोग राज्यसभा पहुंचे, यह सब जानते हैं. इसी राजनीतिक माहौल या दौर से मैं राज्यसभा गया. जदयू पार्टी ने सब कुछ किया. चुनाव निर्विरोध हुआ, बिहार में. चुनाव परिणाम आने के बाद वो दस हजार रुपये भी वापस हो गये. चुनाव पूर्व डिपाजिट में यह जमा होता है. इस दौर में जब राजनीति व्यवसाय हो रही है, तब सामान्य लोगों को चुन कर राज्यसभा भेजना, चुनाव का निर्विरोध होना, कैसे संभव हुआ. बिहार पिछड़ा हो सकता है, पर बिहार की राजनीति में आज भी मूल्य व नैतिक सत्व हैं. नीतीश कुमार ने इसी राजनीतिक धारा को बिहार-देश में मजबूत किया. इस चलन से यह निजी धारणा पुष्ट हुई कि आज भी राजनीति में कुछेक लोग ऐसे हैं, जिनके अंदर मूल्य, आस्था और वैचारिक राजनीति है.
 

यह पद पा लेने के बाद अनुभव करता हूं कि एक नया सांसद, अगर वह समृद्ध पृष्ठभूमि से नहीं आता, अगर उसके पास अपना कोई व्यवसाय नहीं, बड़ी पूंजी की आमद नहीं है, उसके घर से कोई सपोर्ट नहीं है, तो वह दिल्ली में मंहगी गाड़ियां कैसे रख सकता है और उसका रखरखाव कर सकता है? यही नहीं अपने क्षेत्र में मंहगी गाड़ियां रखने के साथ-साथ, अन्य चार-पांच न्यूनतम गाड़ियां लेकर वह कैसे चलता है? मैं एक नये सांसद की बात कर रहा हूं. पिछले 10-11 महीनों से मेरे मन में एक सवाल बार-बार उठ रहा है कि अगर मैं प्रभात खबर से जुड़ा नहीं होता, तो एक सांसद के रूप में जो चीजें मुझे उपलब्ध हैं, उसकी बदौलत एक गाड़ी से अधिक मेंटेन करना असंभव है. गाड़ियों का काफिला लेकर चलने की बात दूर छोड़ दें. इस पृष्ठभूमि में मैं कई राजनेताओं को देखता हूं. वे एक-दो टर्म ही विधायक या सांसद रहे, पर खुद मंहगी गाड़ियों पर चढ़ते ही हैं, उनके आगे-पीछे कई गाड़ियां चलती हैं. सांसद हैं, तो दिल्ली में गाड़ी रखते हैं. जिस राज्य से सांसद हैं, उस राज्य की राजधानी में रखते हैं. फिर अपने क्षेत्र में रखते हैं. यह कैसे संभव है? स्पष्ट नहीं होता. सांसद बना. फिर लोकसभा चुनाव आ गये. इसमें व्यस्त रहने के कारण तत्काल शपथ नहीं ली. बाकी लोगों में शपथ लेने की जल्दी थी, ताकि सांसद के रूप में मिलनेवाली सुविधाएं शुरू हो जायें. विलंब से, जब पहले दिन संसद पहुंचा, अपना प्रमाणपत्र लेने, अपना परिचयपत्र बनवाने, तो एक अजीब अनुभव हुआ. वह स्मृति में है. अपना चुनाव प्रमाणपत्र देने के साथ, परिचयपत्र बनवाना था. सांसदों के डिप्लोमेटिक पासपोर्ट बनते हैं, वह बनवाना था. उसके लिए एक स्टेटमेंट देना होता है कि आपके खिलाफ मुकदमे या मामले नहीं हैं. जब ऐसा स्टेटमेंट देने का फार्मेट मेरे सामने आया. मैंने कहा कि नहीं, मेरे खिलाफ कोई निजी मामला नहीं है, पर मैं एक अखबार के संपादक के रूप में काम करता रहा हूं, वहां मानहानि के जो मुकदमे होते हैं, उसमें कुछेक मेरे खिलाफ भी हैं. क्योंकि जब भी किसी खबर के खिलाफ मामला या शिकायत होती है या मानहानि का मुकदमा होता है, तो वह संपादक, मुद्रक, प्रकाशक आदि सब पर होता है. नियमतः मैं इस दायरे में हूं. यह सब विवरण चुनाव आयोग को दे रखा है. इसलिए डिप्लोमेटिक पासपोर्ट बनाने के लिए मैं कैसे कह सकता हूं कि मेरे खिलाफ मामले नहीं हैं. मुझे पता चला कि नहीं, आमतौर पर लोग ऐसा करते हैं. मैंने मना कर दिया. इसलिए तत्काल मुझे पासपोर्ट नहीं मिला. मैंने स्पष्टतः उसमें उल्लेख किया कि मेरे खिलाफ मानहानि के मामले हैं. उसमें विमर्श के बाद फिर पासपोर्ट बना. उसी तरह सांसदों को सेक्रेटेरियेट काम के लिए भत्ता रूप में लगभग 30 हजार रुपये मिलते हैं. यह तब मिलता है, जब आप अपने सहायक के नाम दे दें. चूंकि सांसद के रूप में मैं दिल्ली गया था, मेरा कोई ठौर-ठिकाना नहीं था. मेरा कोई सहायक नहीं था, इसलिए मैं किसी का नाम नहीं दिया. मुझे पता चला कि नहीं यहां अपने घर के परिचित लोगों के, सगे-संबंधियों के नाम दें दे, ताकि यह भत्ता प्रतिमाह मिलने लगे. मैंने मना कर दिया. मैंने कहा कि जब तब ऐसे लोग मेरे साथ कामकाज के तौर पर नहीं जुड़ जाते, दिल्ली में घर नहीं मिल जाता, मैं ऐसे लोगों को रख नहीं लेता, तब तक मैं कुछ नहीं लूंगा. मुझे पता चला कि आमतौर से कुछ लोग ऐसे ही लेते हैं. तब मुझे याद आया, लगभग वर्ष भर पहले इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर कि कैसे लगभग एक वर्ष पहले तक कुछेक सांसद अपने बेटे, बेटी या सगे-संबंधियों के नाम अपने सहायक के रूप में दे देते थे.

एक सामान्य व्यक्ति की तरह एक सांसद क्यों नहीं रह सकता? यह सवाल भी मेरे मन में उसी दिन शुरू हुआ, जिस दिन मुझे यह सूचना मिली कि मैं राज्यसभा जानेवाला हूं. इसलिए जब पटना में नामांकन दाखिल करने गया, तो अकेले गया. पटना सेक्रेटेरीएट में अपना नामांकन फाइल करने गया, तो देखा नामांकन करनेवाले लोग अपने-अपने समर्थकों के साथ आ रहे थे. चुनाव बाद भी मैं अकेले ही गया. प्रमाणपत्र लिया, तब भी अकेले. कोशिश की कि माला वगैरह से दूर रहूं. पार्टी की जो औपचारिकता थी, वो मैंने पूरी की. कपड़े का जहां तक सवाल था, तो जिस तरह रहता था, उसी तरह रहते हुए यह दायित्व संभालू, मन में इच्छा थी. इसलिए आमतौर से शर्ट-पैंट पहनते हुए, सामान्य कपड़े पहने हुए रहना, यह शुरू की दिनचर्या रही है, उसी तरह रहा. फिर एक सांसद मित्र ने मजाक में ही कहा कि लेफ्टिस्ट (वामपंथी) की तरह सोचिए, बात करिए, सिद्धांत रखिए, पर जीवन राइटिस्ट (दक्षिणपंथी) की तरह जियें. यानी एक सांसद के तौर पर आपको जो सरकारी या व्यवस्थागत सुख-सुविधाएं मिलती हैं, उनका पूरी तरह उपयोग करें. और बात सामान्य लोगों की करें. मुझे लगा कि एक सांसद को जहाज में एक्जिक्यूटिव क्लास में यात्रा करने की अनुमति है. पर अगर सामान्य स्थिति में सामान्य श्रेणी में यात्रा कर सकता हूं, अब तक करता रहा हूं, तो क्यों करूं बिजनेस क्लास में? यह देश का पैसा है, टैक्स देनेवालों का पैसा है. इसलिए तब से आज तक सिर्फ एक-दो बार खास परिस्थितियों के कारण एक्जिक्यूटिव क्लास में हवाई यात्रा किया. शेष लगभग 99 फीसदी यात्रा सामान्य क्लास में. सबसे सस्ता विमान टिकट लेकर यात्रा करने की कोशिश की. पुनः सांसद होते ही, अपनी यात्रा में, चाहे रेल से जा रहे हों या किसी अन्य साधन से, राजनेता यह एहसास कराते हैं कि राजनीतिज्ञ (सांसद-विधायक), समाज के विशिष्ट व्यक्ति हैं. इससे दूर रहना चाहता था. इसलिए हवाई जहाज में सामान्य श्रेणी की यात्रा या रेल यात्रा भी करनी है, तो खुद अपना सामान खुद उठाया. अगर कुछेक बैग अधिक है, तब किसी की मदद ली. नहीं तो अपना सामान एक सीमा तक खुद ढोना. एयरपोर्ट पर आगे बढ़कर अपने सांसद होने का या खास होने का परिचय नहीं बताना. आमतौर से स्थिति यह रहती है कि सांसदों के पास जो दो चार लोग रहते हैं, वे उनके पहुंचते ही वीवीआइपी रूम खुलवाते हैं, उनके अलग से बैठने की व्यवस्था करते हैं. उनकी विशिष्टता के बारे में आसपास के लोगों को बताते हैं. वहां के अधिकारियों को एहसास कराते हैं. इस तरह से लोगों से अपने बारे में कहना वल्गर लगता है. गांधी, लोहिया, जेपी की परंपरा में कहूं, तो अश्लीलता जैसी. इसलिए अब तक इससे बचता रहा. कुछ खास होने का एहसास कराना, यह राजनीति में दिखाई देती है. उससे बचना. एयरपोर्ट पर भी आम लोगों के बीच बैठना, उसी तरह चेकिंग कराना, साथ खड़े लोगों को यह एहसास तक नहीं होने देना कि हम समाज के आम लोगों से अलग हैं. लगभग आठ महीने बाद आवास आबंटित हुआ. उसमें थोड़ा बहुत काम हुआ. आबंटन के समय मैंने कहा था कि जो मामूली काम है, उसे आप करा दें, ताकि रहने लायक हो जाये. मेरी कोई खास पसंद नहीं है. स्पष्ट कर दूं, ऐसा जीने-करनेवालों में मैं अकेले नहीं हूं. अनेक सांसद-विधायक हैं. खासतौर से साम्यवादी-समाजवादी पृष्ठभूमि के. पहले के चाहे कांग्रेसी हों या जनसंघी या अन्य, अधिसंख्य गांधीवादी जीवन शैली में रहते-जीते थे.

एक एयरपोर्ट पर, एक दिन मैंने बहुत रोचक दृश्य देखा. केंद्र सरकार (यूपीए) के मंत्री रहे एक व्यक्ति को मैंने देखा. पहले जेपी भक्त थे. जनता पार्टी में थे. बाद में कांग्रेसी हो गये. वह जहाज से उतर कर टर्मिनल तक बस से नहीं गये. सबके साथ वे जहाज से उतरे. एक दूसरे मंत्री (एनडीए) भी उतरे, वह अपना सूटकेस लेकर जा रहे थे. लेकिन पूर्वमंत्री तब तक वहां खड़े रहे, जब तक वीआइपी गाड़ी उन्हें लेने नहीं आ गयी. दिल्ली एयरपोर्ट पर भी ऐसा एक और दृश्य देखा. एक सज्जन, जो आज के छह साल पहले केंद्र में मंत्री रहे थे, यूपीए- एक में. जिस एयरलाइंस से हम सब आ रहे थे, एयरपोर्ट से प्लेन पकड़ने के लिए वह कॉमन बस से नहीं आये. उनके लिए अलग वीआइपी गाड़ी की व्यवस्था की गयी. ऐसे अनेक दृश्य रोज दिखते हैं.

दरअसल, गुजरे महीनों में यह सारा जो जद्दोजहद रहा, वह इस मानस के कारण कि सांसद बनकर सामान्य नागरिक की तरह क्यों नहीं रहा जा सकता? देखता हूं कि भाजपा के बड़े नेता दीनदयालजी की बातें करते हैं. उन्हें योजनाओं के द्वारा अमर बनाने की कोशिश करते हैं. हम सब तो लोहिया, जेपी की बात करते रहे हैं. पर आज सार्वजनिक जीवन में सादगी के प्रति आदर है? आप राजनीति में मामूली विधायक या जिला परिषद के सदस्य या मुखिया हैं तो आप खास हैं, यह एहसास सामनेवाले को कराना जरूरी हो गया है. यह है, नये दौर की राजनीति. अगर राजनीति को सचमुच बदलना है तो सोचने का तरीका बदलना होगा. यह याद दिलाना होगा कि यह देश कामराज का है, लालबहादुर शास्त्री जैसे नेताओं का है, यह लोहिया जैसे नेताओं का है, जो दो जोड़ी कुरता-धोती लेकर रेल में यात्रा करते रहे. ऐसे लोगों की बड़ी जमात है. रामसुभग सिंह, रामसेवक यादव, भोला पासवान शास्त्री, कर्पूरी ठाकुर, रामानंद तिवारी जैसे लोग आज स्मृति में हैं? समाज की प्रेरणा के स्रोत हैं. मैं मानता हूं कि यह दौर पैसे का दौर है, लोभ व लाभ का दौर है, भोग का दौर है, इसमें अगर आपके पास संसाधन नहीं है, तो आप समाज में टिक नहीं सकते हैं. समाज का सामाजिक आधार, भावात्मक आधार टूट चुका है. पहले गांवों में संयुक्त परिवार होते थे. वह ढांचा बिखर चुका है. इस तरह सोशल सपोर्ट सिस्टम टूट गया है. इसलिए आज एक ईमानदार आदमी को भी जीवन के अंतिम दौर के लिए ईमानदार तरीके से संग्रह या संचय कर जीना जरूरी है. अपनी चिकित्सा के लिए. बेतहाशा बढ़ते दबावों के बीच सामान्य जीवन स्वाभिमान के साथ जीने के लिए. पर यह सब एक सीमा तक. यह सीमा खुद तय करनी है. इस सीमा का अतिक्रमण होना लोभ है.

राज्यसभा में आने के बाद अनेक लोगों ने संपर्क करना शुरू किया कि मेरे बच्चे का नामांकन करा दें. आमतौर से मेरे मन में यह सवाल उठता रहा है कि सिस्टम ऐसा हो कि बच्चा जन्म ले या बच्ची जन्म ले, तो आसपास स्थित स्कूलों में स्वतः उसका दाखिला हो जाये. चीन में यह व्यवस्था है. जिस मुहल्ले में आप रहते हैं, उस मुहल्ले के स्कूल में ही आपके बच्चे पढ़ सकते हैं. साम्यवादी देश चीन में ही सिर्फ यह व्यवस्था नहीं है. ऐसी ही व्यवस्था पूंजीवादी देश अमेरिका में भी है. पर गांधी के देश में एकसमान शिक्षा की व्यवस्था महज सपना रह गया. बहरहाल, मुझे पता चला कि सांसद के पास यह कोटा है कि एक सांसद होने के नाते वह छह बच्चों के नामांकन के लिए सेंट्रल स्कूल में अनुमोदन कर सकता है. इसके तहत सबसे पहले मुख्यमंत्री के निवास पर एक चपरासी मिला था. तब सांसद बना भी नहीं था, पेपर भरने जा रहा था कि उसने अपने दो बच्चों के नाम एडमिशन के लिए दिये. तब तक मुझे अपने कोटे की उपलब्धता के बारे में जानकारी नहीं थी. मुझे लगा कि उसने कहा कि जब आप सांसद हो जायेंगे, तो सांसद होने के प्रभाव के तहत यह दाखिला करायेंगे. पर बाद में पता चला कि नहीं एक सांसद को सेंट्रल स्कूल में नामंकन कराने के लिए कोटा है. सही रूप में आप पूछें तो किसी भी तरह के सांसदों के ऐसे कोटे या विशेषाधिकारों के खिलाफ हूं. एक सांसद को प्राथमिकता के आधार पर किसी को टेलीफोन या गैस देने-दिलाने की बात पहले हुआ करती थी. बजाज स्कूटर या और भी कई चीजों के आबंटन के विशेषाधिकार होते थे. निजी दृष्टि में ये चीजें गलत हैं. पेट्रोल पंप, गैस एजेंसी, क्यों सांसद-मंत्री बांटे? हमारे समाज में स्पष्ट नीति होनी चाहिए ताकि गैस हो, टेलीफोन हो, गाड़ी या स्कूटर हो … ये सब चीजें उस नीति के तहत लोगों तक पहुंचे. नीतियां बनाने का काम जरूर राजनीति के हाथ है. पर अपने हाथ में विशेषाधिकार रखना तो एक गैर बराबरी वाले समाज को जन्म देना है. पर भारत के शासक या राजनेता, चाहे वह किसी पंथ या विचारधारा के रहे हों पिछले साठ वर्षों में अपने अधिकार कम करने की ओर कम उन्मुख हुए. गांधी के सपनों के तहत. अभी यह यात्रा पूरी होनी बाकी है. यह सही है कि अब टेलीफोन या गैस देने का वह विशेषाधिकार नहीं रहा क्योंकि बाजार में यह प्रचुरता से उपलब्ध होने लगा है. अब ऐसी चीजें आप देने भी जायें तो कोई लेनेवाला नहीं मिलेगा? इसलिए जो चीजें हम सबको दे सकते हैं उनके लिए नियम या नीति बनाकर हमें चलना चाहिए. सांसद होने की वजह से या ताकतवर राजनीतिज्ञ होने की वहज से कोई किसी मनपसंद या खास का भला करे व्यवस्था ऐसी नहीं होनी चाहिए. फिर भी जब यह अधिकार था तो इस अधिकार के तहत उस चपरासी के एक बेटे को एडमिशन के लिए रिकमेंड किया. मेरे गांव के एक अध्यापक हुआ करते थे. वह थे तो किसी और जगह के. बाद में उनकी हत्या हो गयी थी. उनके  बेटे के बेटे यानी पौत्र को, जो कक्षा चार में होगा, पढ़ने में अच्छा था लेकिन गांव में पढ़ रहा था, उसे चुना. गुरुऋण. तीसरा एक मेरे परिचित व्यक्ति के ड्राइवर के बेटे को, जिसे बड़ी इच्छा थी कि वह कहीं अच्छा स्कूल में पढ़े, उसका दाखिला कराया. हालांकि उस ड्राइवर से मेरा निजी परिचय या मिलन नहीं हुआ है. एक पार्टी कार्यकर्ता, जो पार्टी में बहुत दिनों से काम कर रहे हैं, उन्होंने एप्रोच किया. सीतामढ़ी के एक गांव के एक किसान परिवार के बच्चे को करवाया. इस तरह ऐसे लोगों के बच्चों के बीच अपना एक-एक कोटा बांट दिया. इसके लिए संबंधित कार्यालयों को लिखा. लिखने के बाद भी मेरे मन में यह सवाल उठता रहा है कि क्या हम कोई ऐसी व्यवस्था बना सकते हैं, जहां पूरे देश में एक समान, एक स्तर के स्कूल हों. नीतीश कुमार ने बड़ी पहल की थी, जब वह पहली बार बिहार में सत्ता में आये थे. समान शिक्षा की नीति. जहां तक मुझे ज्ञात है पूर्व विदेश सचिव मुचकुंद दुबे इस समिति के अध्यक्ष थे. उन्होंने रिपोर्ट भी तैयार की थी. पर बाद में अनेक राजनीतिक कारणों में उलझने के बाद शायद रिपोर्ट पीछे छूट गयी. पर एक राज्य चाहे भी, तो यह बड़ा कदम नहीं उठा सकता है. यह कदम नयी राजनीति का एजेंडा होना चाहिए. साथ ही यह कदम पूरे देश में एक साथ उठना चाहिए. ऐसे सारे बुनियादी सवालों से नयी राजनीति शुरू हो तो शायद संभव है. पर उस नयी राजनीति का माहौल अभी दिखायी नहीं देता. आज की राजनीति सत्ता तक सीमित हो गयी है. राजनीति का मकसद सत्ता पाना है. आज से सात-आठ महीने पहले जो लोग सत्ता पाने के लिए बड़े सपने, बदलाव की बड़ी-बड़ी बातें और धरती पर स्वर्ग उतार देने की बात किया करते थे, क्या वे आज ऐसे बड़े परिवर्तन, जिससे समाज बदले, समाज में समानता आये, उठा पा रहे हैं? नहीं कर पा रहे हैं.

पार्लियामेंट का दो सत्र नजदीक से देखा. राष्ट्रपति का संबोधन देखा, उसके बाद बजट सत्र देखा. बजट सत्र में दो बार, दो विषयों पर बोला भी. पर प्रभात खबर के स्थापना दिवस यानी 14 अगस्त 2014 को मुझे रांची आना पड़ा. उस दिन इस बजट सत्र का अंतिम दिन था. उस दिन उपस्थित नहीं रह सका. नहीं तो रोज समय से सदन जाना और बैठने का काम किया. गंभीरता से. बहुत इन्वाल्व होकर. दो दिनों का नये सांसदों का प्रशिक्षण हुआ. उसमें उपस्थित रहा. हालांकि इसमें कम लोग रहे, पर मैं रहा. डिफेंस कमेटी, हाउस कमेटी का सदस्य बना. डिफेंस कमेटी के आरंभिक दो बैठकों में रहा. बाद की दो-तीन बैठकों में छठ और अन्य व्यस्तता के कारण उपस्थित नहीं हो सका. उनके टूर कार्यक्रम में नहीं जा सका. चूंकि दिल्ली में तब तक आवास नहीं मिल सका था. (दिसंबर 6-7 के पास आवास मिला. पर पूरी व्यवस्था करने में 20-25 दिन लगे). आवास पाना भी जटिल प्रक्रिया है. अगर आपका प्रभाव नहीं है. एसर्ट नहीं कर सकते. निजी तौर पर दबदबा नहीं है, तो आपकी चीजें सामान्य गति से चलती हैं. और सामान्य गति यही है कि घर आबंटन, जो जुलाई-अगस्त तक हो जाना चाहिए था. दिसंबर में हुआ. पहला घर जो उन्होंने दिखाया, वह छोटा था. इसमें एक-दो  कमरे अधिक है, इसे लेने में थोड़ा विलंब हुआ. बहरहाल, संसद में जाने पर यह एहसास हुआ कि दिल्ली में निवास हो, एक छोटा कार्यालय हो, काम को गंभीरता से लिया जाये, तो एक सीमा के तहत सार्थक हस्तक्षेप संसदीय कार्यों में संभव है. पर देश में एक नयी राजनीति शुरू करने के लिए, नयी राजनीति का वाहक बनने के लिए, देश जिस मोड़ पर खड़ा है उस मोड़ पर कुछ नया करने के लिए बड़ा मंच चाहिए. बड़ा मंच का आशय बड़े संगठन से नहीं है. विचार बहुत प्रभावी हो तो मंच बड़े बन जाते हैं. गांधी का विचार प्रभावी था, लोहिया, जयप्रकाश खड़े हुए. उनके साथ समाजवादी विचारधारा थी. उनके शब्द और कर्म में एकाकी ताकत थी, तो मंच बड़े बन गये. आज देश में ऐसे लोगों की जरूरत है जो एक बड़े सपने दिखा सके.

आज उम्र 59 वर्ष के आसपास है, पर राजनीति का अनुभव छोटा है. राजनीति को दूर से देखने का लंबा अनुभव रहा. राजनीति, समाज या आज के दौर को हम कैसे देखते हैं? इसकी थोड़ी पृष्ठभूमि शेयर करना चाहूंगा. पहले आज के दौर पर नजर डालें. आज राजनीति को हम कैसे देखते हैं? मशहूर उपन्यासकार हुए, चार्ल्स डिकेंस. अंग्रेजी सभ्यता जब दुनिया में परवान चढ़ रही थी, उसका प्रभुत्व दिग्दिगंत फैल रहा था. औद्योगिक क्रांति हो रही था, उस वक्त उन्होंने कई उपन्यास लिखे, जिनके लिए आज भी वह याद किये जाते हैं. उनका एक बहुत चर्चित उपन्यास रहा है- ‘ए टेल आफ टू सिटीज. पिछले दिनों सीबीआइ आफिसर्स कन्वेंशन हुआ, दिल्ली में. उसमें इसकी चर्चा हुई. ‘हम किस दौर से गुजर रहे हैं’-  इस विषय पर बोलते हुए गोपाल कृष्ण गांधी ने चार्ल्स डिकिंस को कोट किया. कोई मुझे कहे कि आप अपने समय को डिफाइन (व्याख्या) करें, तो इससे बेहतर उद्धरण नहीं हो सकता. यह पंक्ति यहां लिख रहा हूं, ताकि जिस युग में हम सब जी रहे हैं, मेरी दृष्टि में, वह मैं आपको कन्वे (बता) कर सकूं. अंग्रेजी में है- ‘इट वाज द वर्स्ट आफ टाइम’ (यह सबसे खराब दौर था), इट वाज द ऐज आफ विज्डम (पर यह सबसे अधिक बुद्धिमत्ता ज्ञान का भी दौर था), इट वाज द ऐज आफ फुलिशनेश (यह मूर्खता का भी दौर था), इट वाज द एप्रोच आफ विलीव (पर यह आस्था का समय भी था), इट वाज द एप्रोज आफ क्रेडिबिलीटी, इट वाज द सीजन आफ लाइट (यह विश्वास का भी दौर था, यह प्रकाश का भी दौर था), इट वाज द सीजन आफ डार्कनेस (यह अंधकार का भी दौर था), बट इट वाज अ स्प्रिंग आफ होप (पर यह उम्मीद का वसंत भी था), इट वाज द विंटर आफ डिस्पेयर (यह निराशा का सर्दकाल था). मुझे लगता है कि हमारे समय को अगर परिभाषित करना हो तो इससे उम्दा पंक्ति नहीं हो सकती. उस दौर में हम सब ने जीवन का अनुभव शुरू किया. पर जो राजनीति, जिसे हम सब ने विद्यार्थी जीवन में महसूस किया वह राजनीति कैसी थी? किशोरावस्था या युवावस्था के दौरान दिमाग में जिस राजनीति का असर रहा वह राजनीति थी बदलाव की. वह राजनीति थी विरोध की. वह राजनीति थी रिबेल (बागी) होने की. चेग्वेरा की राजनीति, लोहिया की राजनीति, जेपी की राजनीति, गांधी की राजनीति. भारतीय आजादी की लड़ाई में जितने बड़े लोग हुए, वाम से दक्षिण तक उन सबके संघर्ष के प्रति आस्था और सम्मान का बोध. एक तरफ नक्सली आंदोलन (शुरू के) के प्रति आकर्षण, दूसरी तरफ बिहार आंदोलन से जुड़ाव. हमारी पीढ़ी की आस्था इस तरह की राजनीति के प्रति रही. यानी वह राजनीति जो त्याग, बदलाव, विरोध, मर्यादा, चरित्र, उसूल, मूल्यों, विचारों, सात्विकता और आध्यात्मिकता से जुड़ी हो. एक शब्द में कहें, तो वह राजनीति जो समाज के अंधेरे में रोशनी का काम करे. राजनीति की यह रोमांटिक छवि हमारी पीढ़ी के पास रही है. हमें अवसर मिला, कम से कम तीन राजनेताओं को करीब से देखने का. उस जमाने में जेपी को देखना-जानना हुआ, तब बालक या किशोर था. मैं उसी गांव से था, जहां के जेपी रहनेवाले थे, इसलिए कुछ पारिवारिक संबंध की वजह से भी उन्हें करीब से जानने-देखने का मौका मिला. बाद में श्री चंद्रशेखर और फिर हाल के दिनों में नीतीश कुमार. कम से कम इन तीन को मैं थोड़ा करीब से जानता-देखता हूं. इन तीनों का असर मन पर है. विचार पर है.

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