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हृषीकेश सुलभ की कहानी ‘वधस्थल से छलांग’

हृषीकेश सुलभ हिंदी की वरिष्ठ पीढ़ी के सबसे प्रासंगिक लेखकों में है. मेरी नजर में बड़ा लेखक वह नहीं होता जो अपने समय में दो-चार अच्छी कहानियां लिखकर खुद को कालजयी समझने लगता है. बड़ा लेखक वह होता है जो हर दौर में समकालीन बना रहता है. बदलते समय के अनुसार समकालीन बने रहना बड़ी चुनौती होती है. हृषीकेश सुलभ वैसे कुछ दुर्लभ लेखकों में हैं. उनकी यह कहानी ‘वधस्थल से छलांग’ इस समय पत्रकारिता के परिदृश्य में कितनी समकालीन लगती है? आप भी पढ़िए- मॉडरेटर

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मैं यह ठीक-ठीक तय नहीं कर पा रहा हूँ कि बात कहाँ से शुरू करूँ! कहीं से भी आरम्भ की जा सकती है. उससे मेरी पहली  मुलाकात या उसके आरम्भिक जीवन में ऐसा कुछ भी विशिष्ट नहीं है, जिसके बल पर एक अच्छी शुरुआत हो सके. वैसे सूक्ष्मता से देखा जाये तो उसके अभी के जीवन में भी कुछ उत्तेजक या रोमांचक नहीं मिलेगा. पत्राकार बन गए एक कवि में ऐसा भी कुछ विशिष्ट हो सकता है क्या? मुझे नहीं लगता ऐसा. यही कि उसकी सुबह दस बजे होती है? शराब के नशे से बोझिल सिर और टूटती देह लिये वह बिना कुल्ला किये भरपेट पानी पी लेता है…? कि वह गुस्ल में दो घंटे लगाता है. पिये और बिना पिये, दोनों हालात में वह भरपूर नशे में रहता है! मैं उलझन में हूँ कि इन प्रंसगों में क्या विशिष्ट हो सकता है, जिससे मैं अपनी बात शुरू कर सकूँ.

मेरे लिए ज्यादा सहज है कि मैं रामप्रकाश तिवारी से बात शुरू ही न करूँ. बात सम्पादक जी की आवक से शुरू करता हूँ. यही बेहतर होगा. हर दृष्टि से उपयोगी और रोचक भी होगा. तो बात सम्पादक जी की आवक से शुरू होती है.

सम्पादक जी की आवक की खबर से हम सब बेहद उत्साहित थे. इस खबर के पुख्ता होते ही हमारा उत्साह शहर में फैल चुका था. उनके आते ही हम सब उत्साह के झूले पर पेंग मारने लगे. पहले दिन जब वह दफ्तर आये, हम सबका हाल-चाल पूछा और यूनियन के सचिव रमेश वर्मा को साथ लेकर अपने घर चले गए. इस शहर को उनके जन्म-स्थान और आरम्भिक कार्य-क्षेत्र होने का गौरव प्राप्त था. जिन दिनों वह यहाँ हुआ करते थे, रमेश पत्रकारिता का ककहरा सीख रहा था. सम्पादक जी ने उन दिनों उसे प्रोत्साहित किया था.

एक नया महौल शुरू हो रहा था. यूनियन और सम्पादक की बीच पिछले तीन वर्षों से चली आ रही दुश्मनी के बाद सहयोग और विश्वास की संस्कृति का नया युग शुरू हो गया था. सम्पादक की गाड़ी में बैठते हुए रमेश वर्मा ने हम सबको प्रसन्नता और विश्वास भरी नजरों से देखा था. रमेश जब लौटा, काफी सन्तुष्ट और उत्साहित था. उसके बाद दूसरे दिन की रात तक मुख्य समाचार सम्पादक सूर्यनारायण जी को छोड़ शेष सारे उप-सम्पादकों और संवाददाताओं से एक-एक कर उन्होंने घर पर बातें कीं. सबके लिए अलग-अलग बुलावा आया. इस समय हम नये युग में प्रवेश कर चुके थे.

तीसरे दिन सम्पादक जी के साथ बैठक हुई थी. इस बैठक के लिए प्रदेश के सारे जिला संवाददाताओं को तार देकर बुलवाया गया था. अस्सी हजार प्रसार संख्यावाले सवेरा टाइम्स की सारी शक्ति सवेरा हाउस के चैथे फ्लोर पर एकजुट बैठी थी. संपादक जी के आते ही सबने मेजें थपथपाकर हर्षनाद किया. एक रामप्रकाश तिवारी था, जो सबसे पिछली कतार में बैठा ऊँघ रहा था. उसकी दिनचर्या भंग हुई थी. दस बजे सोकर उठनेवाला आदमी दस बजे बैठक में उपस्थित था, इससे ही उसके कष्ट का अन्दाजा लगाया जा सकता है. बहरहाल, सम्पादक जी ने हमें सम्बोधित किया.

”मैं यहाँ विशेष मिशन पर आया हूँ. यह अखबार बन्द होने जा रहा था. पिछले सम्पादक की कारगुजारियों के कारण मैनेजमेंट ने लगभग तय कर लिया था कि अखबार बन्द कर दिया जाये… पर अन्तिम कोशिश के रूप में मुझे यहाँ भेजा गया है… मैंने यह जिम्मा आप सबके बल पर लिया है. मैं आपका आदमी हूँ… आपके बीच का आदमी. और फिर यह शहर, मेरा अपना शहर भी है. मैनेजमेंट यूनियन से भयभीत है. यह भय मैंने यहाँ जाने से पहले ही लगभग खत्म कर दिया है. मैंने मैनेजमेंट को यह बता दिया है कि यूनियन की अगली कतार के लोगों सहित अस्सी प्रतिशत लड़के मेरे हैं. मैंनेजमेंट अब चैन में हैं. अब मेरा और आपका काम है कि मैनेजमेंट को चैन से रहने दें. और वह सबकुछ धीरे-धीरे हासिल करें, जो हमें चाहिए.“

हम सब दम साधे सुन रहे थे. सम्पादक जी ने नाटकीय विराम के साथ पूरी सभा को अपनी नजरों से सहलाया. ऊँघता हुआ रामप्रकाश तिवारी थोड़ा सजग हुआ. उसे खाँसी आ गई. उसके खाँसने तक सब कुछ रुका रहा. उसकी खाँसी थमते ही सम्पादक जी ने बोलना शुरू किया, ”मैं यहाँ राजनीति करने नहीं आया हूँ, और ना ही यह चाहूँगा कि इस दफ्तर में किसी तरह की राजनीति हो. यहाँ होनेवाली राजनीति से मैं परिचित हूँ. आपके बीच बैठे उन लोगों को मैं अच्छी तरह जानता हूँ, जो पत्रकारिता नहीं, सिर्फ राजनीति करते हैं. राजनीति के बल पर सम्पादकों की गोद में बैठकर चुम्मा-चाटी करनेवाले पत्रकारों को मैं आगाह करना चाहता हूँ  कि वे लोग इस अखबार से इस्तीफा देकर कहीं और चले जाएँ या अपना रंग-ढंग बदलें. मैं ऐसी ताकतों को किसी भी कीमत पर यहाँ नहीं टिकने दूँगा. मैं यहाँ आया ही इसलिए हूँ कि उन्हें बदल दूँ या उखाड़ दूँ. मैं उन सब लोगों को वाजिब हक दूँगा जो पत्रकारिता के लिए कमिटेड हैं… हाँ तो मैं कह रहा था… यहाँ राजनीति नहीं चलेगी. मैं आप सबसे कई गुना ज्यादा मँजा हुआ और पुराना राजनीतिबाज हूँ. मैंने इस प्रदेश के दो-दो मुख्यमन्त्रिायों के साथ राजनीति की है और उनकी सत्ता को चुनौती दी है. उन दिनों मैं विशेष संवाददाता था, पर अब तो संपादक हूँ… यहाँ कुछ गुंडे भी हैं, जिन्होंने पिछले संपादक के साथ मिलकर आतंक मचाया था. मैं उन गुंडों को भी होशियार करना चाहता हूँ कि वे चूहों की तरह बिल में घुस जाएँ. उनके दिन अब लद गए. उनसे ज्यादा ताकतवार आदमी अब इस अखबार का सम्पादक है. मैं राजेन्द्र नगर की सड़कों पर रामपुरिया चाकू लेकर भी घूमता रहा हूँ. मैं चाहूँ तो अभी, इसी समय उन गुंडों की बाँहें उखाड़कर सवेरा हाउस के नीचे फेंक दूँ. पर फिलहाल उन्हें एक मौका देना चाहता हूँ…“

सभा मौन थी. स्तब्ध. पिछले सम्पादक के प्रियजनों के चेहरे हल्दी पिसे सिल की तरह पियराने लगे. सम्पादक जी ने फिर एक नाटकीय विराम के साथ सिकुड़कर छोटी हुई आँखों से पूरी सभा को बेध डाला. लगभग सारे लोग हाँफ रहे थे. मरने-मरने को हो रहे थे. उनके प्राण हुकहुका रहे थे. सिर्फ एक रामप्रकाश तिवारी था, जो जीवित था. उसकी ऊँघ खत्म हो चुकी थी. वह पूरी तरह सतर्क था. तनकर बैठा हुआ रामप्रकाश तिवारी सम्पादक जी को एकटक घूर रहा था.

सम्पादक जी ने सभा समाप्ति की घोषणा की और अपने कक्ष में चले गए. लोगों के प्राण लौटने शुरू हुए. मुख्य समाचार सम्पादक सूर्यनारायण जी का कहना था कि सवेरा टाइम्स के लिए अपनी पत्रकारिता का दौर अब शुरू हो रहा है. बाहर की साख भीतरी संघर्ष के कारण नहीं बन पा रही थी. अब बनेगी साख. प्राण लौटते ही सूर्यनारायण जी उत्साहित हो गए थे. बिना यह गौर किये कि लोग उन्हें सुन रहे हैं या नहीं, वह बोलते ही जा रहे थे, ”पहली बार किसी सम्पादक ने इतना जोरदार भाषण दिया… पहली बार अखबार को दमदार सम्पादक मिला है. अब काम करने में मजा आएगा. पिछले दिनों सम्पादक तो लल्लू-जगधर थे. आये और गए.“

शेष लोग अभी स्वस्थ नहीं हुए थे. हो रहे थे. मैं भी स्वस्थ होने के लिए संघर्ष कर रहा था कि रामप्रकाश तिवारी ने अपने दानों हाथों से मेरे कन्धे को स्पर्श किया. गलबहियाँ डालते हुए बोला, ”चलो डार्लिंग, नींबूवाली चाय पीते हैं.“

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मैं पिछले तीन-चार वर्षों से उन तीनों को इस शहर के भीतर मँडराते हुए देख रहा हूँ. अकसर तीनों एक साथ होती हैं. चाहे कोई भी मौसम हो, तीनों पंख फैलाये उड़ती फिरती हैं. शहर का कोई भी कोना उनसे अछूता नहीं. दिन पर दिन शहर बड़ा होता जा रहा है. फिर भी, सुबह से साँझ तक वे कहीं-न-कहीं दिख ही जाती हैं. उन्हें देखते ही रामप्रकाश तिवारी की आँखें चमक उठती हैं. वह बछड़े की तरह हुमकने लगता है. उसका ऐसा मानना है कि उन तीनों से उसे जीवन की ऊर्जा मिलती है. आप इसे रामप्रकाश तिवारी का पागलपन समझ सकते हैं… पर मैंने स्वयं अनुभव किया है कि उसके लिए यह सच है. अकसर वह हमारा साथ छोड़कर उन तीनों के पीछे घंटों घूमता है. कभी-कभी जब वह बेहद उदास और थका-टूटा होता है, उन तीनों की खोज में निकल पड़ता है. जब तीन के बदले वे दो होती हैं,रामप्रकाश तिवारी का मन चिन्ता से भर उठता है कि तीसरी का क्या हुआ? मैंने ऐसी स्थिति में उसे बुदबुदाते हुए सुना है कि कहीं वह बीमार तो नहीं पड़ गई. शहर के असामान्य मौसम की भेंट चढ़ गई या किसी शरारती ने उसके पंख नोंच लिये. वह उन्हें तितलियाँ कहता है.

हम दोनों साथ निकले थे. मैं क्राइम रिपोर्टर हूँ. कोतवाली के अलावा रोज पाँच-सात थानों की सैर करता हूँ. मुझे गांधी मैदान थाना जाना था. और रामप्रकाश तिवारी गांधी मैदान में उन तीनों का मजमा ढूँढ़ने निकला था. वह सांस्कृतिक सम्वाददाता है और एक साप्ताहिक कॉलम ‘शहरनामा’ भी लिखा करता है. उन तीनों पर वह अपने कॉलम में अकसर लिखा करता है. वे तीनों शहरनामा के प्रमुख पात्रों में हैं.

गांधी मैदान की वलयनुमा भीतरी राह के किनारे खड़े एक वृक्ष की घनी छाँह में मजमा लगाये तीनों दिखी थीं. उनके हाथों में पत्थर के छोटे-छोटे चपटे टुकड़े थे, जिन्हें अपनी अँगुलियों में कलात्मक ढंग से फँसाकर ताल देती हुई तीनों गा रही थीं. भीड़ जुटी थी. कुछ बैठे, कुछ खड़े लोगों की भीड़. पुष्पदलों के बीच पुंकेसर-सी तीनों झूम रही थीं. उनकी आवाज लहरा रही थी. ”मोर चढ़ल वा जवनिया गवना ले जा राजा जी.“

रामप्रकाश तिवारी मन्त्रामुग्ध उन्हें सुन रहा था. वे बीच-बीच में चुहल कर रही थीं. लोग उन्हें छेड़ रहे थे. वे तीनों छेड़ती आवाजों,, भद्दे संकेतों और वहशी नजरों को मुँह चिढ़ाती हुई गूँज रही थीं. मैं उस मजमे से बाहर निकलना चाहता था. पर तिवारी के कारण मेरा निकल पाना मुश्किल था. अगर निकल जाता, तो कई दिनों तक तिवारी मुझसे गुमसुम रहता. हालाँकि, वह उन तीनों को सुनते हुए मुझसे बेखबर था.

उन तीनों ने अपनी आवाज को समेटा. कुछ लोगों ने जेब टटोलने का बहाना किया और खिसक लिये. कुछ लोगों ने पाँच-दस या चवन्नी-अठन्नी का सिक्का फेंका. कुछ ने पैसा देने के बहाने उनकी अँगुलियों को छुआ, आँचल खींचे और कुछ ने चिकोटी काटकर ठहाके लगाये. वे तीनों पैसे सहेजकर भीड़ के बीच राह बनाती हुई एक्जीविशन रोड की ओर निकलीं. और सिनेमा हॉल के अहाते के पास जाकर लोप हो गयीं.

लोग उन तीनों के जीवन, यौवन और चरित्र पर टिप्पणियाँ करते हुए चले गए. मजमा बिखरने के बाद रामप्रकाश तिवारी बेंच पर धप्प-से बैठ गया.
”क्यों, चलना नहीं है क्या?“ मैं खीझ रहा था.

”देखा तुमने? तीनों का साहस देखा? वामन अवतार की तरह तीन डेग में पूरी पृथ्वी नापकर चली गईं तीनों.“ वह स्वप्निल स्वर में बोल रहा था.
उसका कन्धा पकड़कर झकझोरते हुए मैंने कहा, ”तू चलेगा या मैं जाऊँ? देर हुई तो थाना इंचार्ज निकल जाएगा और मैं पूरी पृथ्वी का चक्कर लगाता फिरूँगा.“

मेरी फटकार से वह बेमन उठा और मेरे साथ हो गया.

एक जवान लड़की ने प्रेम में असफल होने पर आत्महत्या कर ली थी. बस यही एक खबर लेकर हम दोनों थाने से वापस लौट रहे थे. लड़की का प्रेमी उसकी सहेली के साथ भाग गया था. लड़की यह सदमा नहीं झेल सकी. वह जहर खाकर अस्पताल पहुँचते-पहुँचते असफल प्रेमिकाओं के इतिहास में दर्ज हो गई. वापस लौटते हुए रामप्रकाश तिवारी ने टिप्पणी की, ”दुनिया से सारी अच्छी चीजें तेजी से नष्ट हो रही हैं.“

मैंने पूछा, ”जैसे?“
उसका संक्षिप्त उत्तर था, ”जैसे प्रमिकाएँ.“

हम चुपचाप पैदल चलते हुए अखबार के दफ्तर पहुँचे थे. मैं डाक संस्करण के लिए खबर बनाकर सूर्यनारायण जी को सौंपने के बाद ताजा खबरों के लिए बाहर निकल गया. रामप्रकाश तिवारी अपना कॉलम लिखने में जुटा हुआ था.

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सम्पादक जी विशेष बैठक को सम्बोधित करनेवाले थे. पहली बैठक के लगभग डेढ़ माह बाद यह दूसरी बैठक हो रही थी. इस बीच जो महत्वपूर्ण घटनाएँ घटीं, उनकी संक्षिप्त सूचना बिना किसी ताम-झाम के आपको देना चाहता हूँ. सम्पादक जी ने यूनियन सचिव रमेश वर्मा को अपना दाहिना हाथ घोषित किया था. अपने ऊपर सम्पादक जी का विश्वास और स्नेह उसके गले में मछली के काँटे की तरह फँसा था. पूर्व सम्पादक द्वारा की गई प्रोन्नतियों की पुनर्समीक्षा तक वेतन में हुई बढ़ोतरी के भुगतान पर रोक लगा दी गई थी. मुख्य संवाददाता नगरपालिका के बाबुओं की तरह दफ्तर आते, पान चबाते और सारे दिन ऊँघते रहने के बाद चले जाते. सम्पादक जी के अनुसार उन्हें फ्रीज कर दिया गया था. कुछ जिला संवाददाताओं के तबादले हुए. कुछ लोगों को प्रदेश-बदर करने के लिए मैनेजमेंट को रिपोर्ट भेज दी गई थी. सवेरा हाउस के चैथे फ्लोर पर ठहाकों, चुहलों, विचार-विमर्श, गर्म बहसों और खबरों  को लूटने-लुटाने का दौर ठिठका हुआ था. लोग फुसफुसाहटों से काम चला रहे थे. सम्पादक जी को शोर से नफरत थी. वह अपने मातहतों को मौन देखना चाहते थे. डेढ़ माह में किसी के सामने, किसी दूसरे से उन्होंने कोई बात नहीं की थी. हर किसी से वह अकेले में बातें करते थे.

अपना भाषण शुरू करने से पहले सम्पादक जी ने रामप्रकाश तिवारी से कहा, ”आप आगे आ जाएँ.“

पिछली कतार में बैठे तिवारी के लिए अगली कतार में बैठे सूर्यनारायण जी ने जगह खाली कर दी. वह चुपचाप आकर बैठ गया. आज मजमावाली लड़कियों पर उसकी रिपोर्ट उसके कॉलम ‘शहरनामा’ में छपी थी. कल गांधी मैदान में उसकी तन्मयता देखकर ही मुझे लगने लगा था कि पट्ठा कोई जबर्दस्त पीस लिख रहा है. मेरा यह विश्वास कि रामप्रकाश तिवारी की प्रतिभा का लोहा सम्पादक जी को मानना ही पड़ेगा, सही साबित होने जा रहा था.

सम्पादक जी बोल रहे थे, ”मैं यह बात साफ-साफ बता देना चाहता हूँ कि रंडियों के बल पर राजनीति में पद और बीवियों के बल पर नौकरी में प्रमोशन पानेवालों का मैं सख्त विरोधी हूँ. एक पत्रकार पिछले दिनों अपनी बीवी के साथ मेरा हाल-चाल पूछने मेरे घर गए थे. मैं नाम नहीं बताऊँगा. ऐसे लोगों को मैं हाशिये पर ही रखूँगा. वे बीवियों के बल पर अखबार की मुख्यधारा में नहीं रह सकते.“

सारी सभा को साँप सूँघ गया. सबने एक-दूसरे को कनखियों से देखा. विवाहित पत्रकारों पर संकट के गहरे बादल छा गए. कौन था? कौन गया था अपनी बीवी के साथ? यह सवाल सबको उद्विग्न कर रहा था. सिर्फ रामप्रकाश तिवारी निश्चिन्त था. मुस्कुरा रहा था. मेरी तो दहशत से टाँगें थरथराने लगी थीं. सबने मन ही मन अपनी समझ के अनुसार कोई एक नाम रेखांकित किया कि हो सकता है कि यही अपनी बीवी के साथ गया हो. सन्देह के घने बादल छा चुके थे.

सम्पादक जी ने भाषण जारी रखते हुए कहा, ”मेरे अखबार में कुछ कवि-साहित्यकार वगैरह घुस आये हैं. मेरा ऐसा मानना है कि ऐसे लोग पत्राकारिता की दुनिया के लिए कोढ़ होते हैं. समाज के सच में इनकी कोई जगह नहीं, मुझे साहित्यकारों और कुत्तों से नफरत है. मैं इनसे अपने अखबार को बचाना चाहता हूँ. किसी भी कीमत पर मैं इन्हें अपने अखबार के दफ्तर में नहीं देखना चाहता… जो लोग अपने कवि-लेखक होने के गरूर में इतराये फिरते हैं, वे अपना चाल-चलन बदल दें, वर्ना उन्हें सवेरा हाउस से नीचे फेंक दिया जाएगा.“

अगली कतार में बैठा रामप्रकाश तिवारी बड़ी उत्सुकता से सम्पादक जी को सुन रहा था. उसके चेहरे पर प्रसन्नता के भाव थे. वह नन्हे शिशु की तरह उत्साहित था जबकि शेष सारे लोग अस्वस्थ होने लगे थे. सूर्यनारायण जी के तो प्राण ही अटके हुए थे. सम्पादक जी ने तनकर बैठे हुए रामप्रकाश तिवारी पर अपनी नजरें टिका दीं और सारी शक्ति केन्द्रित करते हुए गरजे, ”मिस्टर रामप्रकाश तिवारी! आप कविता झाड़ना बन्द करके पत्रकारिता शुरू कर दीजिये, नहीं तो…“

क्रोध के मारे सम्पादक जी के शेष शब्द गुम हो गए. उनके कंठ से गों-गों की आवाज निकली. उनकी आँखें अँधरे में चमकती किसी शातिर लकड़बग्गे की आँखों जैसी चमक रही थीं. रामप्रकाश तिवारी ने अटके हुए आगे के शब्दों को सुनने के लिए अधीर होते हुए पूछा, ”नहीं तो… नहीं तो क्या होगा सम्पादक जी?“

”दो कौड़ी की रंडियों के पीछे रात-दिन घूमते-फिरते हो और मुझसे जुबान लड़ा रहे हो… पत्रकार बने फिरते हो तुम?“ सम्पादक जी अपनी सारी शक्ति संचित करके बोल रहे थे, ”तुम्हारे बारे में एक-एक खबर है मेरे पास. दारू पीकर बाजारू औरतों के पीछे रात भर डोलते हो और साहित्यकार-पत्रकार बनते हो?“

सम्पादक जी हाँफने लगे थे. जैसे-तैसे अपनी साँसों पर काबू पाते हुए उन्होंने अपने सामने रखा आज का अखबार बीच टेबल पर फेंक दिया. आप से तुम के बाद तुम से आप पर उतरते हुए बोले, ”यही रिपोर्ट है?… यही है अखबार की भाषा? इसमें खबर कहाँ है? रंडियों पर लिखने के लिए नहीं है यह अखबार समझे आप… मैं जनता का पत्रकार हूँ. जनता पर लिखिये, जनता पर. रंडियों और जनता के बीच फर्क होता है. कविता नहीं होती है पत्रकारिता… बहुत फर्क होता है कविता के झूठ और पत्रकारिता के सच में… आज से आपका यह शहरनामा कॉलम बन्द… और आप सांस्कृतिक प्रतिनिधि का काम भी नहीं करेंगे. आप क्राइम देखेंगे आज से. सूर्यनारायण जी! सबकी बीट बदल दीजिये आज से. आज से. आइये मेरे चैम्बर में. मैं बिलकुल नये ढंग से अलाटमेंट करना चाहता हूँ.“

सम्पादक जी अपने चैम्बर में चले गए. रामप्रकाश तिवारी ने सूर्यनारायण जी को सहारा देकर उठाया और सम्पादक जी के चैम्बर के दरवाजे तक पहुँचा आया.

रमेश वर्मा सबसे पहले उत्तेजित हुआ था. तत्काल उसकी उत्तेजना ने रंग दिखाया और कुछ गिने-चुने लोगों को छोड़कर शेष लोग उत्तजित हो गए. मैं तो तत्काल सम्पादक को जूते लगाने के पक्ष में था. कुछ लोग घेराव के लिए तो कुछ लोग नारेबाजी के लिए उतावले थे. कुछ का मत था कि मैनेजमेंट को नोटिस देकर कल से कलमबन्द हड़ताल कर दी जाये. सिर्फ रामप्रकाश तिवारी की राय बिलकुल विपरीत थी. वह कुछ भी करने के पक्ष में नहीं था.

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क्राइम रिपोर्टर रामप्रकाश तिवारी का अपराध की दुनिया में प्रवेश धमाकेदार ढंग से हुआ. जिस दिन उसे क्राइम बीट पर लगाया गया,उसी शाम शहर के व्यस्ततम इलाके के चौक पर एक घटना घटी. अपने पिता के साथ रिक्शे पर बैठकर चौक से गुजरती एक खूबसूरत लड़की को गुंडों ने घेरकर नीचे उतार लिया. लड़की का बाप गिड़गिड़ाता रहा, गुंडे नहीं माने. हिन्दी फिल्मों में दिखाया जानेवाला एक ऐसा दृश्य, जिसे देखकर दर्शक सीटियाँ बजाएँ और सिसकारी भरें, गुंडों ने रचा. उन्होंने लड़की की साड़ी बीच चौक पर उतार दी. ब्लाउज-पेटीकोट पहने लड़की दोनों हाथों से अपने वक्ष को छुपाती सड़क पर लुढ़क गई. गुंडे मोटरसाइकिल पर उड़ गए. साड़ी लेते गए, जाते-जाते कह गए ”हरामजादे. आज तो छोड़ दिया. अगली बार एक भी कपड़ा नहीं बचेगा… तेरी बेटी को नंगा नचाएँगे इसी चैराहे पर.“
रामप्रकाश तिवारी ने यह सब घटित होते हुए अपनी आँखों से देखा. जुल्मी राजा के घुड़सवारों की तरह गुंडे आए और बूढ़े पिता की जवान बेटी को फसल की तरह रौंदकर चले गए. बाप-बेटी भीड़ से घिरे थे. सब कुछ देखने-सुनने के बाद वह बदहवास सवेरा हाउस पहुँचा. खबर बनाकर सूर्यनारायण जी को सौंपी. सूर्यनारायण जी बोले, ”तिवारी प्रभु! भाग्यशाली हैं आप. पहले ही दिन ऐसी महत्वपूर्ण खबर.“

उसने घूरकर सूर्यनारायण जी को देखा. मेरे पास आया. मैं अपने काम से फुर्सत पाकर उसकी प्रतीक्षा कर रहा था. मैं अपराध की दुनिया से खेलों की दुनिया में भेज दिया गया था. स्कूली बच्चों का क्रिकेट मैच देखकर लौटा था. पिछले कई दिनों का तनाव बच्चों को खेलते हुए देखकर धुल गया था. मैंने तिवारी को छेड़ा, ”वैलकम, क्राइम किंग.“
वह गम्भीर था. कुछ-कुछ उदास और थका हुआ भी. मेरे जुमले पर कोई प्रतिक्रिया दिये बिना उसने कहा, ”चलो, चाय पीते हैं.“

हम दोनों चाय पीकर यूँ ही बेमतलब सड़कों पर टहलते रहे. घटना के बारे में संक्षिप्त सूचना देकर वह चुप लगा गया. मैं उसकी मनःस्थिति समझ रहा था. लड़की के साथ जो घटित हुआ, ऐसी एक भी घटना रामप्रकाश तिवारी का पूरा जीवन नष्ट करने के लिए काफी है. मैं चिन्तित था. अपराध की निर्मम दुनिया की भयावह खबरें लिखते-लिखते तिवारी जीवित बच पाएगा या नहीं. यही थी मेरी चिन्ता.

”गांधी मैदान चलते हैं. दूब पर लेटेंगे थोड़ी देर.“ मैंने तिवारी को सुकून देने की गरज से प्रस्ताव रखा.
”नहीं. बस-स्टैंड चलते हैं. वहीं होंगी तीनों. इस समय वहीं मिलती हैं.“ तिवारी आकुल हो उठा.

हम बस स्टैंडवाली राह की ओर मुड़ चले थे. वह बुदबुदाया ”पता नहीं, तीनों होंगी भी या नहीं. कोई भरोसा नहीं. कब,…कौन,…कहाँ गुम हो जाये,… कोई भरोसा नहीं.“

तीनों बस स्टैंड के भीतर दिख गयीं. यात्रियों की भीड़ को अपनी वेगमय उपस्थिति से चीरती हुई घूम रही थीं. दारू के नशे में डगमगाती,पान की गिलौरियाँ चबातीं, खलासियों-ड्राइवरों और रंगदारों के व्यूह में निर्भय होकर विचर रही थीं. अभिसार के लिए जाती रीतिकालीन नायिकाओं की तरह वे लाज से सहमी, सिकुड़ी नहीं थी. वे दमक रही थीं. मृदंग की  तरह बज रहा थीं. तितलियों के पीछे भागते बच्चों की तरह रामप्रकाश तिवारी उनके पीछे-पीछे भाग रहा था. वह उल्लसित था, जिज्ञासु था. वह उन तितलियों को छूना चाहता था. उनके रंग-बिरंगे पंखों के जादू का रहस्य पाना चाहता था… पर एक बस से उतरे हुए मुसाफिरों की भीड़ के रेले ने हमें रोक दिया और वे तीनों गुम हो गईं.

मैं जब दूसरे दिन अखबार के दफ्तर पहुँचा, रामप्रकाश तिवारी पहले से मौजूद था. मुझे सन्देह हो गया था कि वह पहुँच चुका होगा. इसी सन्देह के चलते मैं प्रेस कान्फ्रेंस के बीच से उठकर भागते हुए पहुँचा था. सम्पादक जी अभी नहीं आये थे. उनके चैम्बर के दरवाजे पर नजरें टिकाये तिवारी चुप बैठा था. सम्भवतः प्रतीक्षा कर रहा था. सूर्यनारायण जी ने इशारे से मुझे बुलाया और फुसफसाये, ”तिवारी एकदम गुम्मी मारे बैठा है. बात क्या है. खतरनाक मूड में लग रहा है.“
”मुझे नहीं मालूम.“ मैंने बात टालने की कोशिश की थी.
”पर बात कुछ है जरूर.“
”रात को ज्यादा पी गया होगा… भकुआया है.“ मैं बात टालते हुए रमेश वर्मा के पास जाकर बैठ गया.

सूर्यनारायण जी भयभीत लग रहे थे. बार-बार लिफ्टवाले दरवाजे की ओर देख रहे थे. सम्पादक जी की अनुपस्थिति में शायद अपने को असुरक्षित महसूस कर रहे थे. बीच-बीच में वह तिवारी को देखने की कोशिश करते, पर उससे आँखें न मिल जाएँ इस भय से उसे भर आँख देख नहीं पा रहे थे.

सम्पादक जी आये. अपने चैम्बर में गए. बहुत तेजी से रामप्रकाश तिवारी उठा और उनके पीछे-पीछे चैम्बर में घुस गया. कुछ देर बाद जब सम्पादक जी चिल्लाये, उनके चैम्बर के सामने भीड़ लग गई. तिवारी ने क्या कहा, यह तो किसी ने नहीं सुना, पर सम्पादक जी की तेज आवाज सब तक पहुँच रही थी.

”…पुलिस नहीं पहुँची थी वहाँ, इसका मतलब यह नहीं होता कि पुलिस के स्टेटमेंट में बगैर आप क्राइम रिपोर्ट फाइल करके चले जाएँ. क्राइम रिपोर्ट के लिए घटना से ज्यादा महत्व तथ्य का होता है, जो पुलिस के पास मिलता है. समझे आप… पहले पत्रकारिता सीखिये, फिर जवाब तलब कीजिएगा… और आपने हिम्मत कैसे की मुझसे…सम्पादक से जवाब तलब करने की? घटना की रिपोर्ट करते हुए आप पत्रकार नहीं, उस लड़की के आशिक हो गए हैं… आपका काम विक्टिम का पक्ष लेना नहीं है… जाइये,… पहले जाकर इस कांड के तथ्यों को खोजिये…जाइए,…जल्दी जाइए यहाँ से… सड़ चुके हैं आप… बदबू दे रहे हैं आप…“

रामप्रकाश तिवारी बाहर निकला. हम सब बेहद उत्तेजित थे. हमारी उत्तेजना को अँगूठा दिखाते हुए बिना एक शब्द बोले या बिना हमारी ओर देखे वह दफ्तर से बाहर निकल गया.

कल की घटना पर उसकी रिपोर्ट किल कर दी गई थी. सुबह अखबार देखकर सबको यह पता चल गया था. खबर पूरी तरह बदल गई थी. खबर में कोतवाली के थाना इंचार्ज का बयान था कि एक लड़की को बीच चैराहे पर कॉलेज के कुछ मनचले छात्रों ने छेड़ने की कोशिश की,पर पुलिस के पहुँचते ही वे भाग खड़े हुए. लड़की को पुलिस संरक्षण में उसके घर पहुँचा दिया गया.

रामप्रकाश तिवारी लिफ्ट से नीचे नहीं उतरा. वह सीढ़ियों से उतरकर जाने कहाँ चला गया. रमेश वर्मा नीचे जाकर ढूँढ़ आया, पर वह मिला नहीं. यूनियन की तत्काल बैठक हुई. तिवारी के साथ हुए अपमान भरे व्यवहार पर हम सबने आँसू बहाए. तय किया गया कि मैनेजमेंट को एक विरोध-पत्र भेजा जाए.
रामप्रकाश तिवारी सप्ताह भर गायब रहा. मैं इस बीच कई बार उसके कमरे तक गया. वह मिला नहीं. यह कोई नयी बात नहीं थी. ऐसा अक्सर होता था. अचानक अदृश्य होते हुए भी अपनी उपस्थिति का एहसास बनाये रखना उसकी विशेषता थी. उसने दफ्तर को कोई सूचना नहीं दी थी. सात दिनों तक गायब रहने के बाद वह पे डे के दिन कैश सैक्शन में प्रकट हुआ. सम्पादक जी ने नियमतः सात दिनों का वेतन काट लेने का आदेश दिया था. वेतन लेकर जब वह चैथे फ्लोर पर आया, काफी मस्त दिख रहा था. सीधे सूर्यनारायण जी की मेज के सामने जाकर बैठ गया.

”अरे तिवारी प्रभु! कहाँ रहे इतने दिनों.“ सूर्यनारायण जी ने पूछा.
”ऐसे ही जरा घूम-टहल रहा था.“ बेहद इत्मीनान के साथ उसने कहा. जेब से कुछ पन्ने निकालकर उनके सामने रखते हुए बोला, ”बड़े भाई,यह एक रिपोर्ट है. सम्पादक जी तक भिजवा देंगे.“

रामप्रकाश तिवारी अब हमारे बीच में था. अधिकांश लोग उससे बातें करना चाहते थे. पूछना चाहते थे कि वह अचानक क्यों गायब हो गया? पर चाहकर भी कोई पूछ नहीं पा रहा था. सम्पादक जी अपने चैम्बर में थे.
मेरी इच्छा हो रही थी कि तिवारी को अपनी बाँहों में भर लूँ… उसके गले लगकर खूब रोऊँ. इन सात दिनों में जिस तरह उसके लिए आकुल रहा, उसका कारण तलाश पाना मेरे लिए मुश्किल था. मैं स्वयं से सवाल करता रहा कि आखिर इतना बेचैन क्यों हूँ ?  मैं इन सात दिनों में निरन्तर आकुल और असहाय होता गया था. मैं अपने को नियन्त्रित किये बैठा था. एक बार यह भी इच्छा हुई कि उठूँ और एक जोरदार तमाचा तिवारी के गालों पर जड़ते हुए पूछूँ कि कहाँ गायब था मरदूद? पर मैं ऐसा कुछ भी नहीं कर पाया. अपनी कुर्सी से उठा और उसकी बाँह पकड़ते हुए धीरे से बोला, ”चल, नींबूवाली चाय पीते हैं.“

हम दोनों नीचे आये. चाय पीकर निरुद्देश्य सड़क किनारे खड़े होकर आने-जानेवालों को घूरते रहे. मेरे भीतर तिवारी के लिए लाड़ उमड़ रहा था कि वह सबकुछ करूँ जो तिवारी को सुख दे सके,… जो तिवारी के लिए इच्छित हो. मैंने उससे कहा, ”दोस्त. तू शादी कर ले.“

वह मुस्कुराया. मैंने फिर कहा, ”मेरी बातों को हँसी में मत टाल… मैं सीरियस हूँ. शादी कर ले, तेरे भीतर का हाहाकार थोड़ा थम जाएगा.“
”क्या तेरे भीतर का हाहाकार थम गया शादी के बाद…?“ तिवारी ने प्रश्न किया.
मैं निरुत्तर था. फिर उसने स्वयं जवाब दिया, ”शादी करने से हाहाकार नहीं थमता…! नहीं थमता दोस्त… अगर ऐसा होता तो सारे शादी-शुदा लोग सुखी और निश्चिन्त होते.“
”पर एक डायवर्जन तो मिलता है.“ मैंने तर्क दिया.

”मेरे भीतर कोई हाहाकार मचा हो, तब तो उसे डायवर्जन दूँ. कोई हाहाकार नहीं है. यही तो ट्रेजेडी है कि कहीं कोई हाहाकार नहीं है. तू मेरे चिन्ता छोड़. चल, ऊपर चलते हैं.“ उसने मेरी चिन्ता, मेरे सोच और दुखों पर पानी छोड़ दिया.

हम चैथे फ्लोर पर पहुँचे. सूर्यनारायण जी ने सूचना दी कि सम्पादक जी ने रामप्रकाश तिवारी को बुलाया है. वह सम्पादक जी के चैम्बर में गया. उसके जाते ही लोगों के कान कान खड़े हो गए. किसी अशोभन क्षण का सन्देह मन के भीतर जाग उठा. सब सहमे हुए प्रतीक्षा कर रहे थे.

कुछ ऐसा ही घटित भी हुआ. सम्पादक जी चीखने लगे. उनकी आवाज सवेरा हाउस के चैथे फ्लोर पर बैठे सवेरा टाइम्स के पत्रकारों पर प्रक्षेपास्त्रों की तरह गिर रही थी.

”तुमने मुझे क्या समझ रखा है?… मैं तुम्हारी नस-नस पहचानता हूँ. साही हूँ मैं… कँटीला साही हूँ. मेरी देह में काँटे ही काँटे हैं. इन्हीं काँटों के बल पर राजनीति के माफिया सरदारों की भीड़ में निडर घूमता हूँ. समझे तुम…? मुझसे टकरानेवाला लहूलुहान हुए बिना नहीं रह सकता. मैं तुम्हें बरबाद कर दूँगा. निकल जाओ मेरे चैम्बर से,… तुम बदबू दे रहे हो… भागो यहाँ से…“

रामप्रकाश तिवारी बाहर निकला. हम सबके बीच से गुजरते हुए सूर्यनारायण जी की मेज के सामने बैठ गया. हम सब पिछले दिनों की तरह उत्तेजित थे. रमेश वर्मा झटके से सम्पादक जी के चैम्बर में घुसा.
”आपका यही रवैया रहा तो अखबार बन्द हो जाएगा.“ रमेश उत्तेजना से भरा हुआ था.
”बन्द हो जाये, पर मैं ऐसे लोगों को बरदाश्त नहीं कर सकता.“
”अखबार बन्द हुआ तो आप सम्पादक नहीं रह जाएँगे.“
”मेरी फिक्र छोड़ो. मैं हवाई जहाज पर घूमता हूँ. अखबार बन्द होने पर तुम लोग अपनी बीवियों के साथ दूसरों के घर घूमते फिरोगे.“
”आप अपनी भाषा बदलिये… यही है पत्रकारिता की भाषा?“ रमेश चीखा.
”मुझे भाषा की तमीज मत सिखाओ. जिन दिनों तुम्हारी नाक से नेटा-पोटा बहता था, उन दिनों तुम्हें लिखना सिखाया है्ृ….. मैंने पैदा किया है तुम्हें पत्रकारिता की दुनिया में… पर साँप हूँ मैं. अपने ही अंडों को फोड़कर खा सकता हूँ… मैं तुम्हें खा जाऊँगा. जो जी में आये कर लो…लूले-लँगड़ों की यूनियन से नहीं डरता मैं.“

रमेश बाहर निकल आया. तत्काल बैठक हुई. बैठक में यह निर्णय लिया गया कि कल से कलमबन्द हड़ताल. रामप्रकाश तिवारी भी बैठक में था. उसने इस निर्णय का विरोध किया. बोला, ”हम सम्पादक जी की इच्छानुसार काम करने लगे हैं. वे चाहते हैं कि हम हड़ताल करें क्योंकि मैनेजमेंट भी यही चाहता है. मैनेजमेंट प्रादेशिक संस्करणों को बन्द करना चाहता है. हमारी हड़ताल से उन्हें मौका मिलेगा. हम सब जान रहे हैं कि मालिकों के आपसी बँटवारे के बाद हम जिसके हिस्से में हैं, वह अपना व्यवसाय बदलना चाहता है. सम्पादक जी को इसी काम के लिए यहाँ भेजा गया है.“
रामप्रकाश तिवारी की बातों में दम था. हड़ताल का निर्णय आपसी बहस-मुबाहिसों के बाद स्थगित हुआ और एक तीखा विरोध-पत्र दिया जाना फिर तय किया गया.

सम्पादक जी और तिवारी के बीच आज जो भी हुआ, उसका कारण वे तथ्य थे, जिनकी खोज के लिए सप्ताह भर पहले स्वयं सम्पादक जी ने उसे उकसाया था. बीच चैराहे पर लड़की की साड़ी खोलनेवाले गुंडे जिसके इशारे पर आये थे, रामप्रकाश तिवारी ने साक्ष्य के साथ उसका पता लगा लिया था. इसी ताकतवर आदमी की पैरवी के बल पर सम्पादक जी सवेरा टाइम्स के सम्पादक बने थे. प्रदेश की राजनीति के इस शीर्ष व्यक्तित्व के पुत्र ने बहुमंजिली इमारतों के निर्माण का धन्धा शुरू किया था. थोड़ी-सी जमीन खरीदकर अगल-बगलवालों को आतंकित किया जाता था. लोग अपनी जमीन औन-पौने दाम बेचकर पीछा छुड़ाते और इमारत की नींव पड़ जाती. इसी प्रक्रिया में उस लड़की का बाप आड़े आ गया था. उस बूढ़े के जीवन का एक ही सपना था. रिटायरमेंट के बाद अपना मकान बनवाने का सपना. सो वह अड़ गया था. इस कांड का एकमात्र अदना-सा उद्देश्य था कि वह अपनी जमीन का टुकड़ा भयभीत होकर बेच दे. साक्ष्यों के साथ तथ्यों को रिपोर्ट में लिखते हुए रामप्रकाश तिवारी अपनी औकात भूल गया था. वह साँप के बिल में हाथ डाल बैठा था.
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सम्पादक जी लौट आये थे. उन्हें अचानक दिल्ली जाना पड़ा था. मुख्य सम्पादक ने इस्तीफा दे दिया था. अन्य संस्करणों के स्थानीय सम्पादकों की चेयरमैन के साथ बैठक थी. गए थे दो दिनों के लिए और सप्ताह भर जमे रहे. उनकी अनुपस्थिति के दौरान जो कुछ हुआ उसका विवरण गैरजरूरी है. फिर भी मात्र सूचना के लिए आपको बता दूँ कि इस बीच अखबार ने तीस हजार की प्रसार संख्या के घाटे में से दस हजार का घाटा पूरा किया. कुछ साथियों ने सूर्यनारायण जी पर डोरे डाले. उन्हें फाँसा और दारू पिला दी. दारू के नशे में उन्होंने सीना ठोंकते हुए दावे के साथ सूचना दी कि इस बार सम्पादक जी कुछ लोगों के तबादले और कुछ लोगों की विदाई का सन्देश लेकर लौटेंगे. सूची साथ लेकर गए हैं.

दिल्ली से वापसी के बाद सम्पादक जी पहले की अपेक्षा गम्भीर और अबूझ लग रहे थे. उन्होंने रामप्रकाश तिवारी को अपने चैम्बर में बुलाकर कहा कि वे प्रदेश के माफिया सरदारों, अपराधियों के बीच हड़कम्प मचा देना चाहते हैं. इन दिनों अपहरण की घटनाओं में तेजी आयी थी. उन्होंने तिवारी को निर्देश दिया, ”एक भी अपहरण की घटना छूटने न पाए… खोजी रपटें तैयार कीजिये. अखबार की बिक्री पर नजर नहीं रखते हैं आप लोग. नजर रखिये, नजर.“

रामप्रकाश तिवारी चैम्बर से बाहर निकला. सब उसे उत्सुकता से निहार रहे थे. तिवारी पहली बार बिना किसी शोर के निकला था. वह हम सबकी मनःस्थिति समझ रहा था. हम सब जानना चाहते थे कि उसे तबादले या निलम्बन का आदेश तो नहीं मिला. पर यह पूछने का साहस किसी में नहीं था. सूर्यनारायण जी से नहीं रहा गया. उन्होंने पूछा, ”तिवारी प्रभु! सब कुशल-मंगल तो है?“

”हाँ बड़े भाई, श्राद्ध की तिथि टल गई. आपका महाभोज टल गया… पर इसमें मेरा कोई दोष नहीं.“ तिवारी नाटकीय ढंग से मुस्कुराते हुए सूर्यनारायण जी की मेज के सामने खड़ा था. उसकी बातों पर जोरदार ठहाका लगा. सवेरा हाउस के चैथे फ्लोर पर अर्सा बाद पाहुन की तरह हँसी की आवक हुई थी.
शाम हो चुकी थी. सड़क रोशनी से जगमगा रही थी. रामप्रकाश तिवारी मस्ती के मूड में था. मेरी बाँह पकड़ मुझे खींचे लिये चला जा रहा था. हम दोनों ‘हैव मोर’ बार के सामने से गुजर रहे थे. यह तिवारी का पसन्दीदा बार था. छोटा और अपेक्षाकृत सस्ता. खास बात यह कि इस बार का मालिक तिवारी को ‘कवि जी’ कहकर बुलाता और बार में घुसते ही हाल-समाचार पूछता था. पर तिवारी बार में नहीं घुसा. मैंने चैंककर पूछा, ”क्या बात है. घसीटते हुए कहाँ लिये जा रहा है.“
”लस्सी पीएँगे…लस्सी.“ वह बोला.
”लस्सी!“ मैं आसमान से गिरा.
”हाँ, लस्सी… फिर मगही पान.“
”बहुत मस्ती में है तू! बात क्या है आखिर. लगता है, सम्पादक जी से चुम्मा-चाटी करके आ रहा है.“
”हाँ, आज बहुत प्यार किया उन्होंने… पर तू नहीं समझेगा. जल्दी ही, हफ्ता-दस दिनों में क्लाइमेक्स आ जाएगा.“
”मैं तेरी बातें समझ नहीं पा रहा हूँ.“

”अगर तू पहले क्लाइमेक्स समझ गया तो मजा क्या खाक आएगा.“
हम दोनों सड़क किनारे एक ठेले के पास खड़े लस्सी पी रहे थे कि तीनों दिख गईं. झूमतीं, लहरातीं, हवा में आँचल उड़ातीं,… चारों तरफ आँखें नचाकर देखती हुई तीनों स्टेशन की ओर जा रही थीं. इसके पहले कि वे हमारे सामने से गुजरें, एक कार आकर रुकी. कार से कुछ लोग उतरे. उन्होंने तीनों से बातें कीं. पहली खिलखिलाई. दूसरी ने हाथों को नचाते हुए मना किया और पहली के साथ हँसती हुई आगे बढ़ने लगी. तीसरी रुक गई थी. वह नाराज स्वर में कुछ बोल रही थी. तीनों निर्भय थीं. बीच चैक पर साड़ी खुल जाने के बाद असहाय लुढ़क जानेवाली उस लड़की से बिलकुल अलग. हम दम साधे देख रहे थे. तिवारी मन ही मन उनकी बहादुरी पर फिदा हो रहा था. उन लोगों ने तीसरी का हाथ पकड़ लिया. वह चिल्लायी. गालियाँ बकने लगी. पहली और दूसरी ने तीसरी को उलझते देखा तो वापस आ गई. इस बीच भीड़ जुट आयी थी. तीन लड़कियों के साथ बीच सड़क पर ऐसा रोचक तमाशा देखने का लोभ रोक पाना लोगों के लिए मुश्किल था. लोग मजा ले रहे थे. तीनों लड़कियाँ कार से उतरनेवालों की गिरफ्त में थीं. वे लोग तीसरी को कार में ठूँस चुके थे. पहली और दूसरी पर दबाव बढ़ रहा  था और वे छटपटा रही थीं. वे लोग तीनों को कार में बैठाकर कहीं ले जाना चाहते थे. तीनों जाने को तैयार नहीं थीं. अन्ततः उन लोगों ने पहली और दूसरी को भी गोद में उठाकर कार के भीतर ठूँस लिया. तीनों चीखती-चिल्लाती रहीं, पर कार उन्हें लेकर ट्रैफिक सिग्नल की परवाह किये बगैर चली गयी.

रामप्रकाश तिवारी की टाँगें थरथराने लगीं. उसका चेहरा सफेद हो गया. वह घबराया हुआ था. मैंने लस्सीवाले के पैसे चुकाये. तिवारी का कन्धा पकड़कर झकझोरा. उसकी चेतना वापस लौटी. हाथ पकड़कर उसे सड़क पार कराई.
हम दोनों कोतवाली पहुँचे. थाना इंचार्ज कहीं बाहर निकल रहा था. वह कई दिनों बाद मुझे देखकर चहका, पर तिवारी का सफेद चेहरा देखते ही उसने पूछा, ”क्या बात है तिवारी जी परेशान लग रहे हैं.“
”भीतर चलिए.“ मैंने कहा.

हम लोग थाना इंचार्ज की मेज के सामने बैठे थे. सारी बातें सुनने के बाद वह मुस्कुराया. बोला, ”अरे भाई, आप लोग भी गजब करते हैं. दो नम्बर की लड़कियों को लेकर इस तरह परेशान होने से काम चलेगा? स्टेशन से लेकर गांधी मैदान तक अच्छे-अच्छे घरों की पढ़ी-लिखी लड़कियाँ रात में धन्धे के लिए निकलती हैं. मन्त्री से लेकर सन्तरी तक को औरत चाहिए… अब अगर रोक-टोक हो, तो सब जने एक रात में छटपटाकर जान दे देंगे. अब आपका ही कोई काम हो और काम करने के लिए कोई लड़की माँगे, तो आप क्या करेंगे? घर की औरतों को तो भेजेंगे नहीं. कोई दूसरा इन्तजाम ही तो करेंगे? इन्तजाम नहीं कर पाये तो सड़क से जोर जबर्दस्ती लड़की उठवाएँगे… और मैं उन तीनों को जानता हूँ. वही न, जो मजमा लगाकर गीत गाती फिरती हैं? आवारा हैं तीनों. सिपाहियों तक से दो-चार रुपया ऐंठ लेती हैं. फिर भी आप नहीं मानते, तो रिपोर्ट दर्ज कर लेता हूँ. अब आप लोगों से रोज का मिलना-जुलना है, सो बात तो रखनी ही पड़ेगी

रिपोर्ट दर्ज करवाने के बाद हम दोनों अखबार के दफ्तर पहुँचे. रामप्रकाश तिवारी ने खबर तैयार की. सूर्यनारायण जी पेज मेक-आप करवा रहे थे. तिवारी के पास इतना धैर्य नहीं था कि वह सूर्यनारायण जी के आने तक प्रतीक्षा करे. वह सीधे सम्पादक जी के चैम्बर में घुस गया. कुछ ही मिनटों बाद सम्पादक जी गरजे, ”निकल जाओ मेरे चैम्बर से.“

इस बार का दृश्य बदला हुआ था. अपने दाएँ हाथ से रामप्रकाश तिवारी की गरदन पकड़े धकियाते हुए सम्पादक जी अपने चैम्बर से बाहर निकले. वह एक मेज से टकराया और फर्श पर गिरते-गिरते बचा. सारे लोग भौचक खड़े थे. उसकी रिपोर्ट के चिथड़े उड़ाकर फेंकते हुए सम्पादक जी बोल रहे थे, ”इसी लुच्चे आदमी की तरफदारी करते हैं आप लोग?…रंडियों के अपहरण की खबर लाये हैं…सुना आप लोगों ने?रंडियों का अपहरण. इसके पहले कभी किसी ने देखा-सुना था कि कि रंडियों का भी अपहरण होता है…? वही मजमा लगानेवाली आवारा लड़कियाँ, जिनकी खबर सिटी पेज की लीड खबर बनेगी… विकृत है… पूरी तरह पवर्टेड है यह आदमी. इसे औरत और रंडी के बीच कोई फर्क नहीं मालूम. मुझसे बहस कर रहा है कि वे भी औरतें हैं… कह रहा है कि चाहे रंडियाँ ही क्यों न हों, अगर कोई उनकी मर्जी के खिलाफ उन्हें उठाकर ले जाता है, तो  उसे अपहरण कहेंगे… मुझे अपहरण की परिभाषा सिखा रहे हैं यह… मैंने पहले ही कहा था कि मुझे साहित्यकारों और कुत्तों से नफरत है और मैं इन दोनों को अपने अखबार में नहीं देखना चाहता… तुम, दोनों हो… कवि बनते हो और कुत्ते भी निकले तुम…“

साठ फीट गुना डेढ़ सौ फीट यानी नौ हजार वर्ग फीट में फैले इस चैथे फ्लोर के दफ्तर में असहाय खड़ा रामप्रकाश तिवारी रो रहा था. हिचकियाँ फूट रही थीं. वह मुझे मेमने की तरह लग रहा था, जिसे लकड़बग्घे की तरह अपने जबड़ों में दबोचे हुए चैम्बर से बाहर लाकर सम्पादक जी ने पटक दिया था.

रोते हुए रामप्रकाश तिवारी की देह में अचानक एक जुम्बिश हुई. इसके पहले कि कोई उससे सहानुभूति दिखाने, उसे चुप कराने पहुँचे या सम्पादक जी फिर आक्रमण करें, उसने अपने को नियन्त्रित किया. रोती हुई आँखों के आँसू भाप बनकर उड़ गए. हिचकियाँ लुप्त हो गईं. उसने चारों ओर आँखें घुमाकर देखा. मेरी आँखें उसकी आँखों से टकराईं. मैं उसकी ओर बढ़ा पर इसके पहले कि मैं या कोई उसे रोक सके,लकड़बग्धे के मुँह से छूटकर गिरे मेमने की तरह छलाँग लगाता हुआ वह बाहर निकल गया.

मैं नीचे दौड़ा. पर वह दिखा नहीं. वह लापता हो चुका था. मैं तेज कदमों से सीढ़ियाँ फलाँगते हुए वापस चैथे फ्लोर पर पहुँचा. सम्पादक जी हूपिंग कफ के मरीज की तरह हूँफ रहे थे. उन्होंने मुझे देखा और अपने चैम्बर में चले गए. वधस्थल पर खड़े भयभीत लोगों की भीड़ धीरे-धीरे बिखर गई. लोग अपनी-अपनी कुर्सियों पर पीठ या मेजों पर कुहनियाँ टिकाने लगे थे.

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आज सात दिन हो गए रामप्रकाश तिवारी को लापता हुए. मेरे कुछ साथियों को विश्वास है कि वह पहले की तरह वापस लौट आएगा. पर मैं जानता हूँ कि वह इस दफ्तर में नहीं लौटेगा. हाँ, शहर में लौटने से उसे कोई लकड़बग्घा नहीं रोक सकता. मुझे उसकी आवक पर पूरा भरोसा है… पर एक बात मेरे भीतर टीस मार रही है कि उस दिन, उसके जाने के बाद हम कुछ और भी कर सकते थे

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