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रेखा सेठी द्वारा अनूदित सुकृता पॉल कुमार की कविताएँ

मेरा मानना है कि कविता बस एक ही भाषा की होती है. कविता का अनुवाद मेरी नज़र में नामुमकिन के बेहद करीब है। रेखा सेठी ने निस्संदेह अपनी पूरी कोशिश की है उन अहसासों को हिन्दी में न खोने की, जो जानी-मानी कवयित्री सुकृता पॉल कुमार ने अंग्रेजी में लिखी हैं। देखकर खुशी होती है कि भारत के परिवेश, तौरतरीक़ों और यहाँ की संवेदनाओं को उन्होंने दुनिया के लोगों के सामने काफ़ी नए तरीक़े पेश किया है जो एक अलग-सा अहसास कराती है।

— अमृत रंजन

 

Of Creative Anxieties

In the process of writing,

I am ahead of myself always

And there’s no looking back

The rest of the time

I am stalking myself

And there’s no looking ahead

The issue is

That of keeping pace...

सर्जना के तनाव में   

रचने की प्रक्रिया में

मैं, हरदम अपने से आगे ही रहती हूँ

पीछे मुड़कर देखने को कुछ भी नहीं

बाकी बचे वक्त में

मैं, अपना ही पीछा करती हूँ

आगे देखने को कुछ भी नहीं

मुद्दा सिर्फ़

कदमताल बनाए रखने का है…

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Painting Sunrise

Coal blackness mingling

with clear Prussian blue

carving depth around

the border

between the earth and the sky

the horizon

Slabs,

one resting over the other

Silent rhythmic knocking

The wall crumbling

As the folds of colourful skirts

emerge, following

a long dancing foot

peeping through cracks and creeks

A thousand

dark arms

embrace the rising

bright colours

   

सूर्योदय रंगते हुए

कोयले की काली स्याही

घुलती जाती

गाढ़े नीले रंग में

किनारे-किनारे

गहराइयाँ तराशती

धरती-आकाश के बीच

क्षितिज

एक दूसरे पर ठहरी

सिल्लियाँ

खामोश लयात्मक दस्तक

रंगीन स्कर्ट की तहों-सी

चटकती दीवारें

जो उठतीं और चल पड़तीं

एक लम्बे थिरकते पैर के पीछे

दरारों और सेंधों के बीच झाँकती

हज़ार हज़ार बाँहें

उगते हुए

चमकीले रंगों को

भर लेती बाँहों में 

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The Art of Wearing Bangles

The blank page wears words

With the fondness and patience

Of girls wearing glass bangles

One by one, carefully and gently

The right fit that Should not break and injure

The hand squeezing through

They are not to dangle lose and wide

Or remain too close and feel the skin

Let them take over the throb

Jingle in glee, slide into action

Tune in to the dance of words and creation.

 

चूड़ियाँ पहनने की कला

खाली पन्ना पहनता है शब्द

उसी शौक और सब्र से

जैसे लड़कियाँ

पहनती हैं काँच की चूड़ियाँ

एकएक कर, ध्यान से, धीरेधीरे

एकदम सही माप की

चटकें, खुरचें

दबती कलाइयाँ

गुज़रती हैं जो उन गोलाइयों से

बहुत ढ़ीली, लटकती हुई न हों

न इतनी तंग कि टकरा जाएँ त्वचा से

झंकृत होने दो उन्हें

उल्लास में छलकने दो, गति में थिरकने दो

नृत्य में लय हो जाने दो

जैसे कविता होती है लय पन्ने मे।

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In the Throes of Time

The calendar buzzed

Around my ears

And the pendulum of our lobby-clock

Swung before me throughout

Is it a Sunday?

Or a Monday?

What is the date?

The time?

The iron fetters have not rusted

For aren’t we

Forever polishing them

The moon has been eclipsed wholly

The dreamy road has tumbled

Into a thicket

But the groping has not begun

As yet

The clouds have passed by

Leaving behind,

Deep chasms

My heart leaps and bounces

To fill these hollows

And now

When they are filled

And satiated

My heart is

Void and empty

 

समय की कसक में

कैलेंडर भनभनाता है

मेरे कानों के आस-पास

और हमारी लॉबी की घड़ी का पेंडुलम

झूलता रहता लगातार

क्या आज रविवार है ?

या सोमवार ?

क्या तारीख़ है ?

समय क्या ?

जंग नहीं लगा है लोहे की बेड़ियों में

या फिर हम ही

चमकाते रहते हैं उन्हें हरदम

घने झंखाड़ में

चाँद पूरा निस्तेज हो गया है

बदल गई हैं सपनीली सड़कें 

लेकिन अभी तक

उसे टोहना भी शुरू नहीं किया

बादल गुज़र गए

पीछे छोड़

अपनी दरारें

मेरा दिल

इन गहराइयों को भरने के लिए

कुलाँचे-मारता उछलता है

और अब

जब वो भरी-पूरी हैं

परितृप्त

मेरा हृदय

खाली और शून्य

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Guru

Trees are yogis

Standing erect on their roots

Exuding an aura

Of unrelatedness

Each one is

One and content

Swinging proudly in

The silent music of the gentle breeze

Meditating into a state of thoughtlessness

And blowing its spiritual breath

Into every little leaf on its being

At noon it throws its cool shadow

For the earth to rest in peace

The yogi does not participate

In his glory

The tropical summer cannot

comprehend

Its glorious freshness

The tree shoots upwards

in an aimless search

Its height giving it a vital

Security in the soil

The distant exuberance of

The sun is dimmed by the yogi

I have one in my compound

I inhale its philosophy power and light

For my own

Roots branches and leaves

 

गुरु

योगी हैं पेड़

तन कर खड़े अपनी जड़ों पर

दिव्य निस्संगता की

प्रभा बिखेरते

हर एक

अनूठा

और संतुष्ट

धीरे से बहती हवाओं के मौन संगीत में

गर्व से झूमते

विचारशून्य स्थिति में ध्यान मग्न

अपने अस्तित्व की एक-एक पत्ती में

पवित्र साँसें फूँकते

भरी दोपहर में

ठंडी छाया देते हैं,

शांत, विश्राम कर सके धरा

अपनी महिमा से निर्लिप्त

योगी वृक्ष

मैदानों की कठोर ऊष्णता

कैसे समझ सकेगी

उनकी आनंदमय ताज़गी को

ऊपर की ओर उठता पेड़

किसी उद्देश्यहीन खोज में

उसकी ऊँचाई रखती है सुरक्षित

मिट्टी में उसे

दूर दमकते सूरज की प्रफुल्लता

मद्धिम पड़ जाती इस योगी

की आभा में

एक मेरे आँगन में भी है

मैं साँस लेती हूँ,

उसके दर्शन, ऊर्जा और रोशनी में

जिससे

अपनी जड़ों, शाखाओं और पत्तियों को

सींच सकूँ

 

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The Strange Gift of Sharad Purnima

…feeling

From the centre of the earth It rose as a streak of lightening

And entered the soles of my feet

Travelling through veins Into the heart, then the head

Bursting my skull Tearing into the skies

Flying out with messages of madness In search of reason…

…thought

The bright ray of the sun

Pierced the dark clouds

Broke open my head

Settling in the cage,

Whiffs of reason and logic

Filling the cranium

Stretched in anguish as if

In search of madness…

 

शरद पूर्णिमा का अनोखा उपहार

….भावना

धरती के मध्य से

बिजली की कौंधसी उठी

और मेरे पैरों के तलुवों में घुस गई

नसों से होती हुई

दिल तक पहुँची, फिर दिमाग में

खंडखंड करती खोपड़ी को

आसमान को चीरती

पागलपन के संदेश भेजती

विवेक की तलाश में

….विचार

सूर्य की उजली किरणसा

काले बादलों को बेधता

सर को तोड़कर

उस पिंजड़े में पैठता

तर्क और विवेक का अहसास

पूरे कपाल को भर जाता

पीड़ा में फैला जैसे कि

पागलपन खोजता हो

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A Tale Untold

This way or that way

Whichever way

Chaubeji looked

Tales spilled over

Tales told and retold

Squirrels scurrying out of

his eyes, his ears

Baby hedgehogs stumbling from

his hairy nostrils

Stories climbing up his legs

Nawabs and begums

Rajas and ranis crawling all

Over him as red ants

Their pinpricks and bites

Traveling from Gopalpur

To London and back

In English

The spice and sting

Softened on entering

The white ears

of William Crooke

Ladoos became chocolates

mogra turned bluebells

The many tongues of

Pandit Ramgharib Chaube

Flapped smartly,

From Avadhi, Braj, Khadi boli

Bhojpuri and even Sanskrit

And Persian

To the language of Englishsthan

Fanning people’s imagination

from the times of creation

in the United Provinces

More and even more

Stories surfaced

from deep tunnels of memories

and poured into the already full cauldron of

Chaube’s mind

Swirls of insanity;

Invisible to history

a whole century deaf

He lay mummified

Packed between the covers

Of his handwritten book of tales

Until stirred by the smell of

Ink in the pen of a fellow traveler

Once again The squirrels came scurrying

out of his eyes

And the pigeons flew from his ears

In the Folklore Society of London.

 

एक अनकही कथा

इधर या कि उधर

जिधर भी चौबे जी देखते

बिखर जाती हैं कहानियाँ

सुनी-सुनाई बार-बार दोहराई कथाएँ

उनकी आँखों और उनके कानों से

उछल पड़ती हैं गिलहरियाँ

उनके रोयेंदार नथुनों से

लड़खड़ाकर निकल जाती हैं छोटी छोटी साहियाँ

उनके पाँवों पर चढ़ आती हैं कहानियाँ

लाल चींटियों-से रेंगते हैं उनके ऊपर

नवाब और बेगम

राजा और रानियाँ

अंग्रेज़ी में

बेहद हलका हो जाता है

उनका चटपटा-चुटीलापन

विलियम क्रुक के सफेद कानों में पड़कर

चाकलेट हो जाते हैं लड्डू

और ब्लू बेल्स में बदल जाता है मोगरा

बेदह चतुराई से पलट जाती हैं

पंडित रामगरीब चौबे की कई ज़बानें,

अवधी, ब्रज, खड़ीबोली, भोजपुरी

यहाँ तक कि संस्कृत और फारसी से

इंगलिशस्तान की ज़बान में

इस संयुक्त प्रांत के बनने के समय से ही

लोगों की कल्पना को हवा देती हैं

और–और कहानियाँ जो

यादों की गहरी सुरंगों से

सतह पर उभर आती हैं

और भर देतीं

पहले से लबालब भरे

चौबे जी के दिमाग की देगची को

पागलपन की तरंगें

इतिहास के लिए अदृश्य

बधिर पड़ी पूरी एक शब्तादी से 

वे पड़े हैं मिस्र की ममी की तरह 

अपनी हस्तलिखित कथाओं

की जिल्दों के बीच

जब तक कि 

हिलाकर न जगा दे उन्हें

किसी सहयात्री की कलम की स्याही की गंध

एक बार फिर

उनके कानों से उड़ने लगते हैं कबूतर 

आँखों से उछलने लगती हैं गिलहरियाँ

 लंदन की ‘फोकलोर’ सोसाइटी में

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About Amrut Ranjan

कूपरटीनो हाई स्कूल, कैलिफ़ोर्निया में पढ़ रहे अमृत कविता और लघु निबंध लिखते हैं। इनकी ज़्यादातर रचनाएँ जानकीपुल पर छपी हैं।

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3 comments

  1. नहले पे दहला अनुवाद! यदि भूमिका नही पढ़ता तो उल्टा समझता। हिंदी संस्करण ज्यादा मौलिक लगता है। बधाई और आभार, इतनी अच्छी रचनाएँ पढवाने के लिए!

  2. बहुत धन्यवाद !

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