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अज़हर फ़राग़ की शायरी

हाल में ही ‘सरहद के आर-पार की शायरी’ ऋंखला के तहत राजपाल एंड संज प्रकाशन से कुछ किताबों का प्रकाशन हुआ जिसमें एक जिल्द एक जिल्द में एक हिंदुस्तानी और एक पाकिस्तानी शायर की शायरी है। संपादन किया है तुफ़ैल चतुर्वेदी ने। मैंने इसमें पहली बार अज़हर फ़राग़ की ग़ज़लें पढ़ीं। कुछ आप भी पढ़िए- प्रभात रंजन
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1
कोई भी शक्ल मेरे दिल में उतर सकती है
इक रिफ़ाक़त में कहाँ उम्र गुज़र सकती है
 
तुझसे कुछ और तआल्लुक भी ज़रूरी है मेरा
ये मोहब्बत तो किसी वक़्त भी मर सकती है
 
मेरी ख़्वाहिश है कि फूलों से तुझे फ़तह करूँ
वरना ये काम तो तलवार भी कर सकती है
 
हो अगर मौज में हम जैसा कोई अंधा फ़क़ीर
एक सिक्के से भी तक़दीर संभल सकती है
 
सुब्ह दम सुर्ख़ उजाला है खुले पानी में
चाँद की लाश कहीं से भी उभर सकती है
 
2
मुड़ के ताकते नहीं पतवार को लोग
ऐसे जाते हैं नदी पार को लोग
 
साये का शुक्र अदा करना था
सज्दा करते रहे दीवार को लोग
 
मैं तो मंज़िल की तरफ़ देखता हूँ
देखते हैं मेरी रफ़्तार को लोग
 
आईना मेरे मुक़ाबिल लाए
ख़ूब समझे मेरे मेयार को लोग
 
नाम लिखते हैं किसी का लेकिन
दुःख बताते नहीं अशजार1 को लोग
1.वृक्षों
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