तुषार धवल की कविताएँ

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बार-बार याद आनेवाली कविताएं

हरे प्रकाश उपाध्याय

हाल में उभरे कुछ प्रमुख युवा कवियों में तुषार धवल उल्लेखनीय हैं। उनका पहला संकलन पहर यह बेपहर का हाल ही में प्रकाशित हुआ है जो नब्बे के बाद के भूमंडलीकृत आर्थिक, सांस्कृतिक उथल-पुथल की वजह से तमाम स्थानीयताओं और उनके ठाठ में मचे उथल-पुथल एवं मनुष्य की चेतना पर पड़ रहे उनके प्रभावों को बहुत बारीकी से उजागर करता है और यही विशेषता उसे इधर के वर्षों में प्रकाशित वरिष्ठ कवियों तथा कुछ युवा कवियों के संकलनों से अलग भी खड़ा करती है। तुषार उन थोड़े से युवा कवियों में हैं जो अपने समय के सच का सामनाकरना जानते हैं और बिना भय के पूरी जिम्मेदारी के साथ अपने होने की जगह को लोकेट करते हैं। कला के नाम पर जो यथार्थ का घालमेल कर देते हैं या पक्षधरता के नाम पर जो झूठा यथार्थ रच देते हैं, तुषार उनसे बिल्कुल अलग खड़े नकार आते हैं। वे रंगों की कीमत और चकाचौंध दोनों को जाननेवाले कवि हैं।

इधर की कविता पर महानगरीय होने का भी आरोप लगा है। तुषार की कविताएं भी महानगरों के जीवन को प्रमुखता से उठाती हैं, पर वह इस महानगर में गांव से आए लोगों के जीवन को अनदेखा नहीं करतीं बल्कि वह उन प्रत्ययों को तलाशने की भी कोशिश करती जान पड़ती हैं जिनसे लोग गांव से महानगर की ओर पलायन करते हैं, इस प्रक्रम में तुषार की कविताएं गांवों तक भी जाती हैं और वहां के घरों, गली-मोहल्लों और खेतों तक घूमकर वहां के सामाजिक-आर्थिक स्थितियों को जांचती-परखती हैं। तुषार की कविताएं प्रगति के नाम पर मनुष्य के सोच, बरताव और संबंधों में हो रहे परिवर्तनों तथा पलायन की नब्ज पकड़ती हैं। वे औपचारिकताओं के बढऩे और संवेदनाओं के मिटने की चिंता जाहिर करती हैं, खेत-खलिहानों के सूने पड़ जाने की संवेदना से जुड़ती हैं। जो लोग यूपी, बिहार के गांवों से रोजी-रोटी के जुगाड़ में भागकर दिल्ली-मुंबई जैसे महानगरों में आए, वे यहां भी अपनी सामूहिकता और परंपरा को किस तरह बखूबी निभा रहे हैं और महानगरवासियों के लिए इसीलिए अचरज का विषय भी बने हुए हैं, इसके काफी प्रभावी वर्णन तुषार की कविताओं में मिलते हैं। इस संदर्भ में अक्सा बीच पर छठ पर्वशीर्षक से सात उपखंडों में लिखी कविता कभी न भूलने वाली कविताओं में एक है। इस कविता में कोई नास्टेल्जिया नहीं है। भैया लोगसारे अपमान-यातना और दु:ख को भुलाकर अपनी सामूहिक रूप से पर्व मना रहे हैं और अभिजात्य मुंबई उन्हे हिकारत से देख रही है। इतना ही नहीं, तुषार लिखते हैं, ‘‘गिद्ध चमगादड़ भेडिय़े कई यहां गश्त पर हैं/ जुगत में हैं अपनी साध के/ भीड़ यह अपने पेट में सबको छुपाकर लाई है/ ताड़ते कौन हरजाई कौन पूरे गांव की भौजाई है / मंच है सजा हुआ। ’’ खादी के व्यापारी भी लगे हैं अपनी टोह में और बाजार भी। हाल के वर्षों में राजनीति ने अपने इतने चेहरे बदले हैं कि वह दगाबाजी और क्रूरता का पर्याय बन गई है तो दूसरी तरफ उपभोक्तावादी बाजार ने जिस तरह मनुष्यता और मानवीय संबंधों पर हमला बोला है , वैसा अब तक नहीं देखा गया है और इस कवि ने उन प्रसंगों को बहुत तल्खी और करूणा के साथ प्रकट किया है। यह वह समय है जब बाजार के हजार हाथ गला घोंट रहे हैं।आदमी बस किसी न किसी भीड़ का हिस्सा मात्र रह गया है और चेहरे महानगरजैसे हो गए हैं और इन सबके बावजूद तुषार के शब्दों में सेंसेक्स कहता है यह जश्न का मौका है।नये तरह की जिस आर्थिक-आधुनिक व्यवस्था ने मनुष्य के जीवन को आसान बनाने का सपना दिखाया था, दरअसल उसने मनुष्य का जीवन और कठिन बना दिया। उसने उसके घर-परिवार, सहजता-सरलता, आपसदारी और तमाम मानवीय चीजों में झोल पैदा कर दिया। तुषार जिन्नशीर्षक कविता में इन्हीं स्थितियों से बने आदमी का चित्रण करते हैं, ‘‘फायदे का गणित सीखता / सेंसेक्स की सीढिय़ों पर ही सोता हूं/ गर्भाश्य बदलता हूं जब चाहे।’’ अब मनुष्य चैन से नहीं अनिश्चितता में और पैसे के पीछे पागल बने हुए जिंदगी जीने को अभिशप्त हो गया। एक निर्मम औपचारिकता, अपरिचय, कटुता ने अनायास ही बड़ी जगह बना ली। कवि गहरी खीझ के साथ एक कविता में तो यहां तक कह देता है, ‘‘उबलती यह रात सिझ रही है/ कुकर रेल और पहरेदार की सीटियों का फर्क मिट चुका है/ थकी हुई वेश्या हैं ये दुकानें / जो अब मजबूरन हँस रही हैं। ’’ नकली हँसी, नकली सरोकार और नकली संवेदनाएं हर जगह हावी हैं।आज मार बेशुमार चीखों से बाजार भरे हैं, पर्याप्त चमक-दमक है और दूसरी तरफ किसान आत्महत्याएं कर रहे हैं, मेहनतकश लोग भूख से मर रहे हैं और नौजवानों को काम नहीं है। यह एक अजब बिडंबनापूर्ण समय है। अभाव, भूख और यातना के किले फतह नहीं हो गए हैं, वे और भयानक तरीके से चमक रहे हैं। साधारण आदमी आज भी चाहे जहां है, इन संकटों में जीने को अभिशप्त है। तुषार इन चीजों को जानते हैं और अपनी कविता में जिम्मेदारी से इन्हें लाते भी हैं। दरअसल बड़े बाजार वाले ये जो ऊपर से चमक-दमक भरे महानगर हैं, वे ऐसे जंगल में बदल चुके हैं, जहां तरह-तरह के मानव वेशधारी जानवर विचरण कर रहे हैं और इन्हीं जंगलों में तरह-तरह के मोह और मजबूरियों में फंसे गांव के लोग भागे आ रहे हैं। गांव विरान होते जा रहे हैं। तुषार अपनी कविता में दर्ज करते हैं, ‘‘कहां चले गए सब / फुसफुसाकर हवा ने कहा ढिबरी से / वे पंजाब असम महाराष्ट्र गए / वहां भी मार दिए जाएंगे।’’ तुषार की कविताएं एक नैतिक आक्रामकता से ओत-प्रोत हैं, उनमें बाजिब असहमति और मुखरता का विवेक है।

इन तमाम मुश्किलातों के बावजूद तुषार की कविताएं अंधेरे में गर्क नहीं हो जातीं। वे उम्मीद की पगडंडियां भी पहचानती हैं। वह जो हाशिए पर खड़ा है’ , ‘गोधूलि की आबादी’, ‘ठगे गए लोग’, ‘लाल फकीरी’, ‘जब सब ठीक हो जाएगा’, ‘मुफलिस’, ‘मस्तमौला’, ‘मुझे पकड़ोजैसी कविताएं आम आदमी के जीवट की पहचान कराती हैं, ‘‘ तुम नोचोगे ही हमें / हम बांटेंगे ही भरोसा / हमारी धुरी पर दुनिया है / हमारे हाथों में बटेर हैं।’’

इसके साथ तुषार ने संबंधों को लेकर माता, पिता, बहन, प्रेमिका, पत्नी आदि से जुड़ी जो कवितांएं लिखी हैं, वे भी सकारात्मक संवेदना, गहरी आत्मीयता और मार्मिक राग से सरोबार यादगार कविताएं हैं। वे हमारे जीवन के पारस्परिक भरोसे और संबंधों के अनिवार्यता को बड़ी कुशलता से रेखांकित करती हैं। इनमें सरल और भावुक मनुष्य की विकलता जिस तरह व्यक्त है, वह विचलित करनेवाला है। आप ऑपरेशन थिएटर में अणिमाकविता की ये पंक्तियां देखें, ‘‘ तुम किसी ठंडी खोह में लड़ रही हो / पीछे छूट गई तुम्हारी चप्पलों में / तुम्हारे गोरे-गोरे / बिछुआ जड़े पैरों की / नरम आहट उठ रही है।’’ जब हम किसी से प्रेम करते हैं, तो सिर्फ उसके प्रति ही आत्मीयता से नहीं भरे होते बल्कि उससे जुड़े हर चिन्ह में हमें उसकी छवि दीखती है, हम उससे जुड़ी हर चीज के प्यार में पड़ जाते हैं। सारी चीजें सजीव हो उठती हैं। जैसे कि कवि ने यहां अपनी पत्नी के चप्पलों का जिक्र किया है। मुझे नहीं याद पड़ता कि इधर के किसी कवि ने अपनी प्रेमिका या पत्नी की चप्पलों को भी इतनी आत्मीयता से कविता में लिया हो। और बहनेंकविता में देखिए कवि ने बहन के लिए क्या उपमा दी है, ‘‘वे बाप की छप्पन साल पुरानी कमीजें हैं / वे मां के बचपन की यादें हैं।’’ तुषार सहृदय कवि हैं। इनकी कविताएं जीवन के अलग-अलग मोड़ों पर और अलग-अलग अनुभवों में याद आकर सुकून देने वाली या बेचैन कर देने वाली कविताएं हैं।

कृति : पहर यह बेपहर का (कविता संग्रह), कवि: तुषार धवल, प्रकाशन: राजकमल प्रकाशन, दरियागंज , दिल्ली-२, मूल्य:200 रूपये।

2 COMMENTS

  1. Insani jazbat o ehsas, rishton ki khushb o khoobsurati, zamane ke hazar masail, haashiye pe khade insan ka dard aur taklif, firka parasti ka nanga naach, eendhan ki jagah jalta admi ka khoon, mamta ki chhanv, mohbbat o ishq ka tazkara……..

    In sab pehluon ko ek sath chhune wale na to bahut shayar kabhi aye hain aur na hi kavi. Is daur me jab insan apni masroofiyaton se apne hi lye waqt nahi nikal pata…is kavi ne zamane bhar ke dard ko samjha, use soch ki ek udan di, use lafzon me zahir kiya, aur is sab ke baad ummid ki ek kiran..ek roshni…ek charagh…ko bhi zinda rakha hai….

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