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उमा झुनझुनवाला की कहानी ‘दो औरतें’

उमा झुनझुनवाला नाटकों की दुनिया का जाना माना नाम हैं। वह नाटक और कहानियाँ लिखती भी हैं। यह उनकी एक कहानी है। आप भी पढ़िए-

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दो औरतें साथ साथ थीं मगर कटी कटी-सी थीं। वजह ऐसी कोई ख़ास बड़ी नहीं थी, फिर भी बहुत बड़ी वजह तो थी। एक औरत के पास हुक्म देने का अधिकार था और दूसरी औरत को उसके मातहत काम करना ही होता था। दोनों एक दूसरे के काम आती थी; एक दूसरे का काम करती थी; निर्भर भी थी; उसके बावजूद एक औरत को बड़ी मुश्किल होती थी दूसरी औरत के होने को बर्दाश्त कर पाने में। तमाम पसंदगी और नापसंदगी के दरमियान दोनों औरतें एक दूसरे का मुँह ताकती, पतझड़-सी झरती जाती।

एक बार हुक्मरान औरत अपने नाखूनों को संवार रही थी। सलीके से किनारे घिस कर खूबसूरत आकार देने के बाद उस पर सुर्ख लाल रंगों की पॉलिश लगाई उसने। दूसरी औरत अचंभित आँखों से देख रही थी सब। उसने एक बार अपने नाखूनों की तरफ़ देखा। उसके नाखूनों ने उसे शिकायती निगाहों से देखा जैसे, “कितनी बेतरतीब हो तुम… देखो मेहंदी की लाली अजीब तरीके से पुती हैं हम पर… अपने बालों में मेहंदी लगाते वक़्त तुम हमारी मर्ज़ी भी नहीं पूछती, हमारी देखभाल भी नहीं करती… ऊह्हूँ“ ; उस औरत ने घबरा कर अपने नाखूनों को अपनी मुट्ठी में बंद कर दिया ताकि वे ज़्यादा शिकायत न कर पाए।

क्या हुक्मरान औरत सही कहती है मुझसे कि मैं किसी काम की नहीं – मातहती औरत ने सोचा।

मातहत काम करने वाली औरत के चेहरे पर दौड़ते भागते भावों की रेस को देखकर हुक्म देने वाली आँखों ने माजरा समझ लिया। कजरारी आँखें मुस्कुराई। इन आँखों में ग़ज़ब की कशिश थी कि जो देखे एक बार तो उनकी ओर खींचता ही चला आए। रस से भरपूर थी ये हुक्मरान आँखें। जब कभी इन आँखों से नमक बहता, जाने कितनों के ज़ख्म हरहरा उठते; कितने नमकीन टीले ऊँचे पहाड़ बन जाते; तड़पते दिल आह भरने लगते। आँखों का काजल कितने दिलों के लिए मरहम का काम करता, इसका तो कोई हिसाब ही नहीं था। मातहत काम करने वाली आँखें रुखी सूखी थीं; न सपने थे उनमें; ना ही सपनों को देखने का साहस था। उन आँखों के पास अतीत भी नहीं था कि उसके वर्तमान की कोख में भविष्य का अंकुरण हो…। बड़ी सपाट आँखें थीं।

नाखूनों की तरह आँखें भी अपने सौन्दर्यहीन होने का अपराधी इस मातहती औरत की लापरवाही और बेवकूफी को मान रही थी। हुक्मरानी औरत ने अपनी श्रेष्ठता का दबदबा बढ़ाते हुए उसके गाल को सहलाते हुए ढाढ़स बंधाया कि “पाँचों उँगलियाँ बराबर नहीं होती; यह फ़र्क ईश्वरीय है। विशेष फूल और सामान्य फूल ईश्वर की ही देन है। अपने सामान्य होने पर अफ़सोस न करो, बस हुकुमों का पालन किए जाओ। सब एक जैसे नहीं होते।”

खिड़की के बाहर वाला दरख़्त खिड़की के अन्दर से आने जाने वाली हर साँस की गंध से परिचित था। उसने इस लिजलिजे सौन्दर्य की चिढ़ की गंध को खींच लिया था अन्दर अपने विशालकाय मजबूत तनों के ज़रिये। इसलिए एक बार पत्तों का रंग बैंगनी हुआ था… हुलसा हुआ-सा… हुक्मरानी औरत चौंकी भी थी पत्तों के इस अजीबोग़रीब रंग को देखकर। उसने दूसरी औरत से जब इसका ज़िक्र किया तो उसके चेहरे पर उसकी अक्कासी नज़र भी आई –

“ क्यूँ री, सूरज तो उलटी तरफ है; फिर इस रंग की छाया तेरे चेहरे पर कैसे… ये क्या मामला है…?”

– “मैं क्या जानूँ मालकिन, जो भी दिख रहा है, वह आपको दिख रहा है; मेरी आँखें, मेरी त्वचा, नाक, कान, जिह्वा- सब आपकी ज़बान ही समझते हैं और मानते हैं… तब मैं कैसे कुछ कहूँ…!”

जवाब का रंग पिघल रहा था, मातहती औरत रंगहीन होती जा रही थी। मालकिन के कमरे की ज़मीन बैंगनी होती जा रही थी। सब फ़ैल रहा था किसी गंध की तरह। नाक और आँख ने काम करना बंद कर दिया था कुछ पल और फिर उड़ गया सब कुछ।

झिलमिलाते आसमान में कई रंगीन ख्वाबों की सैर होती रहती थी जिसकी डोर चमकीली गालों वाली औरत के सुर्ख लाली से रंगे नाखूनों वाले हाथों में रहती थी। पुरुष के साथ हुक्मरानी की सतरंगी ठहाकों की महफ़िल अभिमानी हो जाया करती थी। अलग अलग रंगों के ज़ायके पुरुष के नथुनों से होते हुए उसकी शिराओं को मज़ा पहुँचाया करते थे। एक बार बैंगनी रंग की गंध उसके नथुनों में दाखिल हो गई। मालिक और मालकिन की साँसे जब लिपटी हुई थीं, होठों और गर्दन से होते हुए नाभि पर फैल रही थीं कि अचानक वहाँ बैंगनी रंग का घेरा बन गया और अभिमान चटक गया। सकपकाए नथुनों ने अपने इन्द्रियों की चुगलखोरी पर उलटी तबाही मचाई। हुक्मरानी नाभि सिकुड़ गई।

बरसों पहले पुरुष ने हुक्मरानी औरत के लिए ब्रह्माण्ड में एक जगमगाता कोना ऐसा बनाया था जहाँ हुक्मरानी का अभिमान परवान चढ़ता जाता था हर रोज़। उसकी ठुड्डी की ऊँचाई गर्व से दपदपाती रहती थी। अचानक एक दूसरा कोना जगमगाया… मगर कब और कैसे…? हुक्मरानी औरत को दूसरे कोने की जगमगाहट घुन की तरह खाने लगी। घृणा गहराने लगी आँखों में; साँसों में; आवाजाही में; यहाँ तक संडास में भी जब वह मल-मूत्र त्याग रही होती थी, तब भी। नहाते वक़्त भी उसकी छाया हुक्मरानी के जिस्म से छूटती नहीं, साबुन घिस डालती, घंटों शावर के नीचे खड़ी जाली से जिस्म को इस तरह मसल डालती कि चमड़ी छिल जाती। फिर भी बैंगनी गंध उसे सिर से पाँव के नाखूनों तक पसरती महसूस होती। अब जब भी औरत और पुरुष की साँसे एक होने को होती औरत को उल्टियों का दौरा पड़ने लगता। दूसरे कोने की जगमगाहट बढ़ जाती तब।

बहुत पहले एक बार खाने की मेज पर कुछ बचा हुआ खाना रखा हुआ था। दोबारा उस पदार्थ को खाने का मन किसी का भी नहीं था। पदार्थ की गंध नासिका छिद्रों को उत्तेजित कर रही थी। मातहत औरत के घर के बर्तनों में रुखा सूखा ही होता था, इसलिए ये गंध उसकी इन्द्रियों को बेकाबू किये जा रही थी। हुक्मरानी की इजाज़त लेकर उसने अपनी इन्द्रियों, नासिका छिद्रों और मचलती जिह्वा को शांत किया। अब यदाकदा जूठन में भी रस मिलने लगा। शुरुआती दिनों में एक के लिए जूठन निपटाना सामान को कचरे में फेंकने से बचाना था और दूसरे के लिए रूखे-सूखे से इतर सुगन्धित रस से जिह्वा और पेट दोनों को शांत करना था। इसलिए जूठन आहिस्ता आहिस्ता माध्यम बन गई अहसान मनवाने और अहसान मानने का। लेकिन इस मनवाने और मानने के दरमियान खिड़की के बाहर वाले दरख़्त पर उस गंध के जाले पड़ने लगे थे; लसलसे-से जाले; लार से ग्रसित जाले; वासना के जाले। इन जालों से घर के अन्दर की दीवारों पर जाने कितनी ही आकृतियाँ बनती, बिगड़ती, डरातीं, असुरक्षा का भाव उत्पन्न करती। सबमें मातहती शक्लें अलग अलग आकारों में उभर कर हुक्मरानी के कलेजे को छलनी करने लगी।

अब आँखें चार तो होतीं; नज़रों का उठना और झुकना भी होता; एक में प्रश्न तो दूसरे में बेहयाई रहती। अक्सर हुक्मरानी को अपने सिंहासन पर मातहती के पिछवाड़े की गरमाहट महसूस होती। सवालों पर झूठे जवाबों की चादर डालने की कोशिश होती। मगर तेज़ आँखों को अन्दर की नंगई नज़र आ ही जाती थी और तब हुक्मरानी औरत की कठोरता ज़्यादा से ज़्यादा तीखी होने लगी। संदेह की स्थिति ऐसी हो गई कि धुँधला भी शफ़ाफ़ आईने-सा चमकता नज़र आने लगा। अब श्रृंगार करते वक़्त जब चोटी में बेणी लगाती तो जाने क्यों हुक्मरानी हाथों में दुर्गन्ध बस जाती और आँखों का काजल उसे चेहरे पर कालिख जैसा प्रतीत होने लगता; होंठो की लाली में मवाद भरा हुआ दिखता आईने में और कमर पर चमकती सोने की तगड़ी किसी तवायफ़ की भद्दी-सी कमर लगने लगती।

एक दिन मातहती लिजलिजी आँखों में अपने बिस्तर की छवि देख हुक्मरानी की आँखों से जो ज्वाला फूटी उसमें बिस्तर ख़ाक हो गया। दरख़्त भी झुलस गया उसकी तपिश में – “मैं क्यूँ सखी, मैंने तो तुम्हें हमेशा आगाह किया है, तब मैं क्यूँ तपिश का शिकार हुआ?”

– “मेरी देह जल रही है सखा; तुमने सब क्यों नहीं सोख लिया? क्यों उसकी आकृतियाँ मेरे ज़ेहन में बनने दी? अपनी ठंडक तुमने सबके लिए बना रखी थी… और जो सबका, वह मेरा नहीं… जो मेरा, वह किसी का नहीं…”

– “ नहीं, नहीं नाराज़ मत हो… तुम्हें थोड़ी शीतलता की आवश्यकता है। आओ, अपने इस कमरे से बाहर, अपने इस आँगन से बाहर आओ और मेरी शीतलता से अपनी देह की जलन को शांत करो सखी…”

और फिर दरख़्त एक बहुत ही मीठा गीत गाने लगा हुक्मरानी औरत की पीड़ा की अगन को शांत करने के लिए – भींगती रातें / महकती सौगातें / शीतल…नरम…/ अपने में समाता…/ उपवन…/ वन…/ क्यारियाँ…/ किलकारियां…/ महामाया की लहरियां…/ सौंदर्य सीढ़ियां…/ आकार प्रवास…/ हस्ताक्षर अनायास…/ हृदय मणि…/ सृजन ध्वनि…/ और मैं तुम…

इस गीत को सुनते सुनते चंद पल के लिए औरत दरख्त के काँधे पर सर रखकर सो गई। आस-पास हरियाली खिली, दरख़्त खुशबुमय हुआ। फिर देह अदेह हुई; पिघल गई; मिट्टी हो गई; खुशबू बन गई और समा गई दरख़्त की हर शाखा-प्रशाखा में। देह का अदेह होना चलता रहा… कि स्वप्न-भंग हुआ और हुक्मरानी औरत ने खुद को नमक के टीले में गर्दन तक धंसा पाया। आगे पीछे दो छोर दिखे – एक अँधेरे का और एक उजाले का…। दोनों छोर उसकी पहुँच से बाहर…। उसने देखा, मातहती औरत और पुरुष और भी अनेक अनेक आकृतियाँ – सब अँधेरे की तरफ़ बढ़ रहें हैं। अँधेरे में बहुत आकर्षण है; सारे गुरुत्वाकर्षणों से परे; अंतरिक्ष के उस काले छिद्र के खिंचाव में सारी अभिलाषाएँ समा जाने को आतुर हैं; समुद्र में घटनाएँ तेज़ी से घटित होने लगीं; घटनाएँ बादल बनने की प्रक्रिया में व्यस्त हो गए; बादल नम होने लगे; नमी में उजालों के कण फ़ैलने लगे; हुक्मरानी औरत अपनी बड़ी बड़ी आँखों से उजालों के उन कणों को अपने अन्दर सुडुकने की कोशिश करने लगी; उन आँखों का गुरुत्वाकर्षण ज़्यादा मुलायम था जो मातहती औरत के रोमकूपों को भरता चला गया; मातहती औरत के अंदर हुक्मरानी औरत को लेकर संघर्ष चल रहा था अँधेरे और उजाले के मिल्न की एक छोटी सी चाह को लेकर; हुक्मरानी औरत ने उस मिलन को एक नीली रेखा में बदल दिया; एक खूबसूरत घृणित ज़हरीली नीली रेखा में जहाँ पुरुषार्थी नीला उजाला खुरदुरे जिस्म की नर्म चाहतों के साथ अँधेरे की आकर्षक धुन पर लहरों सा नर्तन करते झूमने लगा।

और हुक्मरानी औरत चाँद की मीठी रौशनी में दरख़्त के पास बैठी उसके काँधे पर सर रख फटी बिवाइयों और लपलपाते जीभ को आलिंगनबद्ध होते देखती और नमक होती गई।

नमक होती औरत की व्यथा से विचलित दरख़्त उम्मीद के हरेपन को धरती के अन्दर से पुरज़ोर ढंग से खींचता कि इस हरेपन से आसमान का हृदय ज़रूर आकर्षित होगा; उस पर सूरज की किरणें बिखरेंगी; रंगों में विस्फोट होगा; सुनहरे बादल उसकी उम्मीद की प्रतिध्वनियों को समेट किसी करिश्माई बारिश की सृष्टि करेंगे; और उसके बूंदों की लड़ियों से रक्तिम पुष्पों-सी वेणी बन जाएगी जिसे वह अपनी इस प्रिय औरत की आशा को महकाएगा।

दो औरतों का एक दूसरे का होना बर्दाश्त न कर पाना जारी था।

तमाम पसंदगी और नापसंदगी के दरमियान एक दूसरे का मुँह ताकना भी मुसलसल था।

एक का रोम रोम से घृणा करना और दूसरे का रोम रोम से घृणा सहना रोज़ का नियम बन चुका था।

पुरुष का घोड़े की अढ़ाई चाल चलना आदत बन चुकी थी।

और उधर दरख़्त अपने काँधे पर बहते नमक के टीले पर प्रेम का रक्तिम पुष्प उगाने के लिए मनुष्य जीवन पाने की अभिलाषा लिए प्रार्थना में लीन रहने लगा।

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नोट- प्रस्तुत कहानी आजकल पत्रिका के अगस्त 2019 के अंक में प्रकाशित हुई है।

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