बुद्ध की धरती पर ऐतिहासिक बौद्धिक आयोजन

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होली से ऐन पहले पटना में विभिन्न भाषाओं के लेखकों का रंगारंग आयोजन रहा पटना लिटरेचर फेस्टिवल. २२ मार्च की शाम पटना के तारामंडल ऑडिटोरियम में फरहत शहज़ाद के शेरों-नज्मों ने समां बाँधना शुरु किया और विदुषी गायिका कुमुद झा दीवान ठुमरी, होरी और चैती के संगीत स्वर रोशन किए. उसके बाद अगले दो दिनों तक करीब डेढ़ दर्जन सत्रों में लेखक-कलाकारों की बहसों, रचना पाठों को देखने-सुनने न केवल बड़ी तादाद में बिहार की बौद्धिक जमात मौजूद रही बल्कि अपने प्रिय लेखकों के साथ उन्होंने जमकर संवाद भी बनाया.

सत्रों का आयोजन बहुत कल्पनाशील तरीके से किया गया था. २३ मार्च को सुबह जब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इसका विधिवत उद्घाटन करते हुए इस भारतीय भाषाओं के प्रमुख सम्मलेन के रूप में हर साल आयोजित किए जाने और इस संबंध में आयोजकों की हर तरह से मदद करने की बात कही. लेकिन उससे पहले उभरते हुए भारत में भाषा, साहित्य संस्कृति के सवालों को लेकर ज्ञान प्रकाश, इम्तियाज अहमद, पवन के. वर्मा और ओम थानवी में गरमागरम बहस हो चुकी थी. यह सत्र हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में चला. इस आयोजन का यह एक दिलचस्प पहलू था कि भाषा को लेकर किसी तरह की दीवार नहीं दिखाई दी. सम्मलेन में हिंदी-उर्दू अंग्रेजी में इस तरह की आवाजाही कई अन्य सत्रों में भी दिखाई दी.

मूलतः अंग्रेजी में एक दिलचस्प सत्र रहा ‘रीडिंग यंग इण्डिया: इमर्जिंग रीडरशिप’, इस मॉडरेशन रक्षंदा जलील ने किया. उस सत्र की मुख्य आकर्षण रहीं लोकप्रिय उपन्यास-लेखिका अनुजा चौहान, जिनको सुनने बड़ी संख्या में पटना के युवा जुटे थे. इसी तरह ‘याद शहर’ वाले निलेश मिश्र के साथ सत्यानन्द निरुपम की बातचीत के सत्र में युवाओं ने अच्छी दिलचस्पी दिखाई. यहां पर आकर लिटरेचर फेस्टिवल का असल महत्व समझ में आता है- लेखकों को पाठकों से सीधे तौर पर जोड़ना. इस लिहाज से बांग्ला के दलित लेखक मनोरंजन ब्यापारी के उदाहरण को लिया जा सकता है. २४ तारीख को पहले सत्र में उन्होंने जब अपने लेखन और अपने जीवन के बारे में बोलना शुरु किया तो लोग जैसे मंत्रमुग्ध रह गए. अगले दिन हिन्दुस्तान टाइम्स जैसे अखबार ने पहले पन्ने पर उनके बारे में छापा. ‘स्टार लेखकों’ की मौजूदगी के बावजूद वे सबसे बड़े स्टार लेखक बनकर इस आयोजन से उभरे. पटना लिटरेचर फेस्टिवल को इसके लिए भी याद किया जाना चाहिए.

इसमें कोई शक नहीं कि पटना लिटरेचर फेस्टिवल के मुख्य आकर्षण रहे शायर-गीतकार गुलजार, जिनके सत्र को मुख्यमंत्री एवं उप-मुख्यमंत्री ने भी बैठकर सुना. लेकिन पहले दिन शुरुआत में मशहूर शायर कलीम आज़िज़ के शेरों को जो दाद मिली, उसने यह बताया कि पटना में अच्छी शायरी के कद्रदान कितने हैं- ‘रखना है कहीं पांव तो रखो हो कहीं पांव/ चलना जरा आया है तो इतराए चले हो…’ जैसे उनके शेर सियासतदानों की मौजूदगी में और भी अर्थवान हो गए. मुख्यमन्त्री ने उनके इस गज़ल की फरमाइश की, जो इमरजेंसी के दौर में बड़ी मानीखेज हो गई थी- ‘दिन एक सितम एक सितम रात करो हो..’ मशहूर शायर वसीम बरेलवी ने गंगा-जमुनी तहजीब पर बहुत अच्छा वक्तव्य दिया तथा अपनी गजलें और भोजपुरी गीत भी सुनाया. आजकल बोलियों की अस्मिताओं के उभार का दौर है. यह और अच्छी तरह से उभर कर आया ‘बोली खड़ी बजार में’ सत्र में, जिसमें उदय नारायण सिंह और अरुणेश नीरन के बीच सार्थक संवाद के सूत्रधार रहे सत्यानन्द निरुपम. भाषा का लिखित हस्तक्षेप कितना आवश्यक होता है इस सत्र से समझ में आया.

कुछ सत्र बेहद जीवंत रहे, जिनमें ‘उर्दू है जिसका नाम: जुबान का मुस्तकबिल’ के सत्र का जिक्र खास तौर पर करना चाहूँगा. सत्र का मॉडरेशन करते हुए सुबोध लाल ने उर्दू के बारे में ‘दिल’ से आगे जाकर सोचे जाने का सवाल उठाया, जिसमें सत्र में मौजूद उर्दू के उपन्यासकार अब्दुस्समद, फहमीदा रियाज़ और फरहत शहज़ाद के अलावा गुलजार साहब और सभागार में मौजूद अनेक लोगों ने खुलकर बहस की, लेकिन मामला दिल का ही भारी रहा. एक अच्छी बहस सिनेमा की भाषा को लेकर हुई, जिसका संचालन किया प्रसिद्ध फिल्म पत्रकार अजय ब्रह्मात्मज ने. सत्र में संजय चौहान, चंद्रप्रकाश द्विवेदी, विनोद अनुपम के साथ निर्देशक सुभाष कपूर मौजूद थे, लेकिन सबसे व्यवहारिक बातें सुभाष कपूर ने ही की. वैसे भाषा की बारीकियों को लेकर, विषय की बारीकियों को लेकर चंद्रप्रकाश द्विवेदी को सुनना यादगार रहा. इसी तरह ‘महफ़िल गायकी: पूरब देस’ के सत्र में पटना और आसपास की महफ़िल गायकी के सबसे बड़े विद्वान गजेन्द्र नारायण सिंह को सुनना भी यादगार रहा. एक रोचक बातचीत रही ज्ञान प्रकाश और आलोक राय के बीच ज्ञान प्रकाश की किताब ‘मुंबई फेबल्स’ के बहाने मुम्बई भागने वालों पर, सबसे बढ़कर नानावती केस के ऊपर जिसने १९६० के दशक में परिवार, ‘चरित्र’ को लेकर एक बड़ी बहस को जन्म दिया था, जिसके ऊपर उस दौर में ‘ये रास्ते हैं प्यार के’ जैसी फिल्म बनी थी. मजेदार रहा.

एक अच्छी बहस रही ‘क्या हम दकियानूस हो रहे हैं’ सत्र में, जिसका मॉडरेशन किया अपूर्वानंद ने, जिसमें मौजूद थे त्रिपुरारी शरण, अन्तर देवसेन, डॉ. सैबल गुप्ता. यह सचमुच महाशक्ति बनने के सपने देखते देश के सामने सबसे बड़ा सवाल है. जिसके जवाब इतनी आसानी से नहीं मिलते. बहरहाल, इस सम्मलेन ने संस्कृति के क्षेत्र में मौजूद सभी तरह के सवालों से सीधे-सीधे संवाद कायम करने की कोशिश की. कहानी पाह के अलग-अलग सत्रों में असगर वजाहत ने ‘गुरु-शिष्य संवाद’ की कुछ कथाओं को प्रस्तुत किया तो हृषिकेश सुलभ ने ‘पिकुल कथा’ जैसी अपनी कहानी का रोचक कथा का पाठ किया, जो अपने आपमें इस बात के उदाहरण थे कि रचनाओं के पाठ किस तरह से किए जाने चाहिए.

नवरस स्कूल ऑफ परफॉर्मिंग आर्ट्स तथा बिहार सरकार के कला, संस्कृति एवं युवा विभाग द्वारा आयोजित पटना लिटरेचर फेस्टिवल के प्रमुख पार्टनर थे वाणी प्रकाशन एवं दैनिक जागरण. वाणी प्रकाशन ने अपना बुक स्टॉल लगाया जिस पर सभी लेखकों की किताबें मौजूद थीं, चाहे उनका प्रकाशन किसी भी प्रकाशन के द्वारा किया गया हो. मेरे जानते पहली बार हिंदी के किसी बड़े साहित्यिक प्रकाशन ने किसी लिटरेचर फेस्टिवल में इस तरह से बतौर सहयोगी भाग लिया हो. समूचे आयोजन के दौरान वाणी प्रकाशन के स्टॉल का अपना अलग ही आकर्षण रहा. इसमें कोई शक नहीं कि ‘सदा समय के साथ’ रहने वाले वाणी प्रकाशन ने समय की मांग को पहचाना है. इसका भी स्वागत किया जान चाहिए.

फेस्टिवल का समापन काव्य-गोष्ठी से हुआ. जिसमें उदय नारायण सिंह ने मैथिली और बांग्ला में कविताएँ सुनाई, कासिम खुर्शीद की गज़लों ने समां बाँधा, तो हमारे प्रिय कवि आलोक धन्वा, अरुण कमल और निलय उपाध्याय की कवितायें भी खूब पसंद की गईं.

डॉ. अजित प्रधान-अन्विता प्रधान, आराधना प्रधान, नवरस स्कूल ऑफ परफॉर्मिंग आर्ट्स की पूरी टीम के साथ पटना लिटरेचर फेस्टिवल के कल्पनाशील संयोजन के लिए इसके क्रिएटिव डायरेक्टर सत्यानन्द निरुपम को बधाई दी जानी चाहिए.       

3 COMMENTS

  1. पटना मे मैथिली, भोजपुरी और मगही उतस्व होना चाहिये था। इस लिहाज से यह एक घटिया कदम है बिहार सरकार का

  2. बिहार में भोजपुरी भाषा के भी साहित्यकार रहते हैं, ऐसे साहित्यिक जामवाडे में उनकी मौजूदगी कहीं नहीं दिखती..

  3. ऐसा लगता है नितीश कुमार बुद्ध के बाद बिहार के सब से बड़े 'बौद्धिक ' के रूप में उभर रहे हैं !! आने वाले दो एक साल बेहद दिलचस्प होने जा रहे हैं , क्योंकि उनके मित्र- प्रतिद्वंदी के पास न बुद्ध हैं , न बौद्धिक. लेकिन समझ में नहीं आता कि इस रपट में पटना के जाने माने हिन्दी लेखकों के नाम कैसे छूट गए .

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