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यतींद्र मिश्र की कुछ वासंती कविताएँ

आज बसंत पंचमी है। सूफ़ी परम्परा में भी बसंत का बड़ा महत्व रहा है। इसी अवसर पर जाने माने कला मर्मज्ञ , कवि यतींद्र मिश्र की कुछ कविताएँ पढ़िए। बसंत की इस परम्परा को उन्होंने शब्दों में पिरोते हुए यह याद दिलाने की कोशिश की है कि इस देश में बसंत मिलजुलमन का प्रतीक रहा है, एक ऐसा प्रतीक जो भारत की बहुलता को आनंद से याद करने का प्रतीक है। कुछ बेहद वासंती कविताएँ पढ़िए- मॉडरेटर

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खेलो बसन्त, बसन्त खेलो
 
खेलो बसन्त, बसन्त खेलो
रंग दो बसन्त, बसन्त खेलो
 
बन्दिशों के अर्थ खोलो
परनों को लूट, तोड़े-टुकड़ों को छूट
गमकों के बीच में खेलो
खुसरो के घर में खेलो
औलिया से फाग खेलो
जो पाग धरी रह जाये सिर
उसे रंग के सराबोर खेलो
 
इकतारे के सुर में खेलो
सारंगी के सब दर्द ले लो
सुर के जल को रंग में घोलो
ख़ुद ही में ख़ुद से खेलो
 
गुरबत के रंग धो लो
जो ना पा सको कोई राहत
अपनी गुदड़ी को रंग में बोरो
 
दोनों हाथों में रंग है गुलाल है
दोनों ज़हाँ फिर भी बेहाल है
इस अबीर को, इस गुलाल को
सारे ज़हाँ की खुशियों को दे दो
 
प्रेम का रंग ही मजीठा है
उसे जितना चाहे उड़ेलो
खेलो बसन्त, बसन्त खेलो।
 
 
 
आरण्यक से बहकर आती नदी
 
जहाँ तक मुझे याद पड़ता है
सबसे पहले मैंने एक नदी को
जातक की किसी कथा में बहते हुए देखा था
अथाह खनक से उस कथा को तरल बनाती सदानीरा
 
इसी तरह एक नदी को उसके रंग से पहचाना था
एक को उसके स्पर्श से और एक नदी तो
अपनी स्वर्णाभा में दीप्त थी इतनी लगता था उसके आगे
सूर्य अपने सातों घोड़ों के साथ फीका पड़ गया हो
 
इसके अलावा कुछ नदियाँ
बचपन से लेकर आज तक
बहती रहीं हैं स्मृति के वन में उसी तरह
जैसे कोई शुतुद्री बहती है लगातार
धूल से लथपथ उपनिषद के जीर्ण पन्नों पर
 
समय के अमरकोष में दर्ज सैकड़ों नदियों को
छूकर उनका हाल जानना चाहता हूँ
सुनना चाहता हूँ विलुप्त हो गयीं उन वेगवती नदियों को
इतिहास की किताबों में जो सदैव मिलती थीं
 
हो सके तो पता लगाना चाहिए
उनमें से ढेरों अब कहाँ बहती हैं
किन प्रदेशों में मिलता है उनका भूगोल
कितनी हैं जो आज भी करती हैं प्रतीक्षा
किसी ब्रह्मा के कमण्डल का
 
गंगा-यमुना और सतलज से पूछना चाहिए
क्या आज भी उन्हें सरस्वती की याद आती है
उकसाना चाहिए मोहनजोदड़ो हड़प्पा और सिन्ध पाकिस्तान को
सिन्धु नदी जिस कारण अपना संस्मरण सुनाए हमें
इसी तरह अपनी जलवायु और प्रकृति से दूर
दज़ला-फ़रात की ख़बर भी ली जा सके तो बेहतर है
 
अमरता की परख के लिए शुभस्रवा से मिलने
ऋग्वेद के पास जाना चाहिए
ढूँढ़ना चाहिए गोदावरी तमसा और नर्मदा के किनारे
हमेशा आगे बढ़ते गए संघर्ष के सनातन पदचिन्ह
शायद लौटते हुए उन रास्तों पर हमें
कोई शबर कोई जारा मिल जाए
अपनी वीरता के भार से द्रवित होता हुआ
 
कभी-कभी मुझे लगता है पृथ्वी सभ्यता और जल पर
जिस तरह संकट गहरा होता जा रहा इन दिनों
और जीवन में जिस तेजी से घट रहा हमारे अन्दर का पानी
ऐसे में हमेें सिर्फ नदियाँ ही बचा सकती हैं
 
मेरा अनुमान है सिर्फ़ उनके पास ही सुरक्षित होगा
मनुष्यता को भिगोने का ढंग
वे ही किसी आरण्यक से निकलकर
सीधे चली आऐंगी घरों के भीतर छपछप करतीं
 
वे जब तक रहेंगी
सारी कलुषता के बाद भी
शापमुक्त होने का वरदान बचा रहेगा।
 
 
 
फूलों के पदचाप से
 
नये मौसम में हर बार फूल आते हैं
अपनी अविरल गति से मिट्टी के रंग पर
एक नया अध्याय रचने के लिए
 
जाते हुए मौसम के साथ
ये फूल सूख जाते हैं
प्रकृति की सहज उपस्थिति में
जीवन का अभिप्राय बताते हुए
 
जो नहीं बदलता कभी
वो मौसम या बहार या पतझड़ नहीं
फूलों के पदचाप से छूटा हुआ
सुगन्ध का रास्ता होता है
जिजीविषा के फैलाव की
अमिट सम्भावना रचता
 
बसन्त की स्लेट-पट्टी पर
कुछ नमी, कुछ खिलना उकेरता हुआ….
 
 
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राग बसन्त के लिए
 
इस जोगिया में कुछ और मिला है
खुसरो की पीली सरसो में
वारिसशाह के चिनाब का नीला
बसन्ती में थोड़े हरे की आहट
बौर की डाली पर बिछलता भूरे का स्पर्श
 
एक तान में कई गमकों का वास
कई पलटों में एक बड़ी आरोह की पुकार
कोई ढूँढता है अपने ही घर का पता
जैसे नदी चली आती हो उतारने
अपनी उदासी का गहना
 
कितने घराने मिलकर बुलाते हैं बसन्त की आहट
जैसे उस्ताद निसार हुसैन ख़ाँ की भारी सी आवाज़ से
टूटता हो हमारे दर्प का आईना
फगवा बृज देखन को चलो री गाते हुए
उस्ताद लगाते हों अपने ही मुहल्ले की परिक्रमा
 
घराने की चिक से झाँकती है
टुकड़ों में विभक्त सूरज की किरणें
नये रचे जाने के सार्थक आलाप के साथ
सरसों के खेत से होकर डामर की सड़क तक
चमकता पीला उल्लास
रागों के घर का उजाला ही तो है।
 
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सरस्वती मेला-1
 
वात्स्यायन के समय में लगता था ये मेला
महल के परकोटे से दूर सीमान्त चौक पर बैठी सभा से
कोई भी उछाल सकता था प्रश्न
नैतिकता की गह्वर परिधि से
दूर फेंकी हुई गेंद की तरह
 
गणिका हो सकती थी वो
चन्द्रमा की डाल से सौन्दर्य चुनने का अभिनय करने वाली
कोई दास हो सकता था सामन्त के रथ-मार्ग का पथ बुहारने वाला
तिरसठ कलाओं के स्थूल अर्थ समझाने वाला सयाना पण्डित
या अपनी कुटिलता के भार से दबा
राजसभा में दरबार का कुशल रचने वाला श्रीमन्त
 
प्रश्न अनसुलझे फिर भी रहते थे
मंगल ध्वनि की टेर तब भी
निहारती रहती थी प्रभाती का सूरज
पारिजात के धरती पर गिरने से बनी पगवट
तुहिन कणों से नहाकर चमकती थी अपलक
सारिकाएँ रागिनियों को सदा की तरह
करती रहती थीं लिपिबद्ध
ज्ञान को बाँटने का उत्सव फिर भी चलता रहता था
 
समाधान तब भी प्रायः कम ही होता था
अनुत्तरित प्रश्न गोधूलि में तिरोहित हो जाते थे
सिर्फ़ काल की पाटी पर मेला लगता था
 
आज यह पता लगाना मुश्किल है
वह ज्ञान बाँटने के लिए था या मापने के लिए?
 
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सरस्वती मेला-2
 
कविता के दीवट में
अर्थ की बाती धरी जाती थी
रक्ताभ सांझ के उदय से पहले
 
जिस तेल से पूरा जाता था दीवट का मन
उस सकोरे की पीताभा में
परस्पर तर्कों की लौ झिलमिलाती थी
आठों प्रहर के सारे किंवाड़ ठेलकर
 
कविता जिस राह जाए
संवेदना जिस राह जाए
मनुष्यता भी चली जाती थी उसी राह
शुक्रतारे को निहारकर
अपने हिस्से का प्रकाश संजोए
हुलसाने सत्य का चौगान….
 
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2 comments

  1. पीयूष दईया

    रागदीप्त कविताएँ—देसी और मार्गी परम्पराओं की विलक्षण अन्तर्ध्वनियों से पूरमपूर, उजास की वर्णमाला रचती। सुन्दर-सुघड़-सरस।

  2. कुमार अम्बुज

    कविताएँ अच्छी हैं, इस मायने में कि एक पुराने जीवन, बीत गई सभ्यता और लुप्तप्राय पर्यावरण की खिड़की से इधर का जीवन झाँककर देखती हैं। खासकर पहली छोड़कर अंतिम कुछ कविताएँ।
    बधाई।

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