आखिर दुख़्तरान जो ठहरीं

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शिक्षाविद पूर्वा भारद्वाज के इन किस्सों में गहरा सामाजिक सरोकार तो दिखाई देता ही है, दास्तानगोई का जादू भी इन किस्सों में है. किशनगंज के ईरानी बस्ती के कुछ किस्से आपके लिए- मॉडरेटर.
यह दास्तान निरंतर संस्था ‘जेंडर और शिक्षा सन्दर्भ समूह, दिल्ली’ में रहते हुए ‘मुसलमान लड़कियों की शिक्षा’ विषय पर किए गए शोध का परिणाम है. निरंतर के वरिष्ठ साथियों  के अलावा प्रोफ़ेसर इम्तियाज़ अहमद सहित कई विद्वानों ने इस शोध को दिशा देने में मदद की. इस प्रोजेक्ट टीम में हुमा खान साथ थी और समीना मिश्रा भी. किशनगंज में रुकैया और उसके पूरे परिवार के साथ बातचीत करने मैं और हुमा दोनों थे और दास्तान को लिखा मैंने है. इस साल ऐसी ही बारह दास्तानों की किताब छपकर आ जाएगी, यह उम्मीद है- पूर्वा भारद्वाज
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ईरानी बस्ती
दुख़्तरान

विद्या मंदिर स्कूल के पहले आम का बड़ा सा बाग है। कब्रिस्तान के पार। रुकैय,नगमा,नज्जो का झुंड चुपके से बाग में घुसा और कच्चे आम तोड़कर जल्दी से रफू-चक्कर हो गया। स्कूल पहुँचने तक के 10 मिनट के वकफे में जितने आम थे उनमें से ज़्यादातर सफाचट हो गए और जो बचे-खुचे, उन्हें उन्होंने कागज़ में लपेटकर सहेलियों के लिए सहेज लिया। क्लास की दोस्ती इतनी ही गाढ़ी थी। आए दिन झगड़े भी होते थे, मगर मन पर कोई खराश नहीं आती थी। झगड़े की वजह भी क्या होती? किस कतार में बैठना है,किस बेंच पर बैठना है और किसके साथ बैठना है, इसको लेकर खींचतान होती थी। रुकैया खुशखत नहीं थी। सुंदर लिखावट देखकर उसका मन ललचाता और वह क्लास के लड़के-लड़कियों की खुशामद करती कि उसकी कॉपी में वे लिख दें। कॉपी में लिखने को लेकर मार-पीट तक हो जाती, मगर उसका एक-दो घंटे से ज़्यादा असर न रहता।
रुकैया किशनगंज की बाशिंदा है। वहाँ वार्ड नं. 5 में कर्बला की ईरानी बस्ती में रहती है। वह बताती है, मेरी फुफेरी बहन है नगमा और खलेरी बहन है नज्जो। एक और फूफी की बेटी फरहा भी दोस्तों के झुंड में है। वह हमारी ईरानी बस्ती से अलग पांजीपाड़ा में रहती है। पांजीपाड़ा है तो बंगाल में,लेकिन एकदम बिहार के सीवान पर। ईरानी बस्ती से लगभग 8 किलोमीटर दूर। सब इकट्ठे पढ़ती थीं, खेलती-कूदती थीं। विद्या मंदिर के बाद सबके रास्ते अलग-अलग हो गए, मगर किस्मत हम सबकी एक ही है। आखिर दुख़्तरान जो ठहरीं।
दुख़्तरान मतलब बेटियाँ। यह फारसी का लफ्ज़ है। रुकैया की मादरी ज़बान फारसी है। किशू बेगम रुकैया की दाई हैं और अनवर अली बुआ। उसकी जो फारसी ज़बान है उसमें दाई मतलब है माँ और बुआ का मतलब है पिता। किशू बरेली की रहनेवाली हैं। उनके 9 भाइयों में से 3 भाइयों ने काम चलाने लायक पढ़ाई की थी। 5 बहनों में से किसी ने कभी किताब को हाथ नहीं लगाया। किशू का निकाह अपने फुफेरे भाई अनवर अली से हुआ। जो तब मुजफ्फरपुर में रहते थे। अब वे दुनिया में नहीं रहे। इंतकाल के पहले वे सालों किशनगंज से 90100 किलोमीटर दूर सिलीगुड़ी के अस्पताल में भर्ती रहे थे। लंबा इलाज उतनी दूर से चलाना मुश्किल हो रहा था तो भाई और चाचा किशनगंज ले आए। किशू को बताया गया कि सदर अस्पताल खस्ता हाल में है और बेहतर इलाज के लिए अनवर अली को लायंस क्लब अस्पताल में रखना होगा। उनका अपने मौला पर यकीन काम नहीं आया कि राख-भभूत से भी वे बीमार को चंगा कर देंगे, उनके रहमोकरम से मुर्दा जिंदा हो जाएगा। तावीज़ गंडा में यकीन भी कारगर नहीं हुआ। दुखभरी आवाज़ में किशू ने बताया कि अनवर अली चश्मे का बिज़नेस कर रहे थे। दालखोला, बहादुरगंज वगैरह पास के इलाकों में बस से जाते थे। दूर-दूर जाने के लिए टेªन लेनी पड़ती थी। मान लो गौहाटी की तरफ निकल गए तो एक-एक, दो-दो महीने में उनका लौटना हो पाता था। बीच-बीच में खैरियतनामा भेज देते। उन दिनों फोन का चलन नहीं था। हिंदी में लिखी चिट्ठी को पढ़ने के लिए किशू किसी लड़के को पकड़ती थीं जो या तो उम्र में छोटा हो या रिश्ते में। अक्सर थोड़ा बहुत जो पढ़ा-लिखा होता था, वह किसी न किसी बिजनेस के काम में फँसा होता था, फिर भी कोई न कोई हाथ में आ जाता। इसलिए किशू ने सोच रखा था कि अपने सभी बच्चों को थोड़ी बहुत तालीम जरूर देंगी। हालाँकि मुस्कुराते हुए यह भी कहती हैं कि अब चिट्ठी लिखने-पढ़वाने की नौबत नहीं आती। फोन जि़ंदाबाद!
रुकैया 4 भाई और 2 बहन है। दो भाइयों की उनकी ममेरी-चचेरी बहनों से शादी कर दी गई है। दोनों बाल-बच्चेदार हो गए हैं और नग व चश्मे के व्यापार में लगे हैं। बड़ा भाई शिराजी अली असम में रहता है। असम की लड़की से शादी करके वहीं बस गया है। वक्तन-फवक्तन पैसे भेज देता है। सँझला भाई सावर अली नहीं पढ़ पाया। बदमाश माना जाता था। खरदिमाग ऐसा कि मास्टर तक को पीट देता। बड़ी बहन रजि़या ने शादी नहीं की। लोग कहते हैं कि उसे शादी के नाम से ही एलर्जी है। किसी ने उसके लिए रिश्ता नहीं भेजा और अपनी तरफ से लड़कीवाले बात नहीं चलाते, यह भी एक मसला था।
सबसे छोटी है रुकैया जिसकी शादी की बातचीत खाला के घर में चल रही है। लड़के के परिवार का असम में बिज़नेस है। किशू बेगम रुकैया की शादी के लिए पैसे जोड़ रही हैं। 2 तोला सोना,20 भर चाँदी, बर्तन, कपड़ा – सब दहेज़ के लिए इकट्ठा करना है। उनका जी चाहता है कि कभी जि़यारत के लिए कहीं होकर आएँ,पर रुकैया और रजि़या दोनों को छोड़कर कहाँ जाएँ। 1718 साल की होने को आई रुकैया। गोरी-चिट्टी, तीखे नाक-नक्श की मालिक रुकैया का कद भी माशाअल्ला है। लंबी नाक, थोड़े घुँघराले-भूरे से बाल,काली आँखें। वह अपने सपनों के शहजादे के ख्वाब देखती रहती है। क्या ही अच्छा होता कोई शाहर्रुख खान जैसा मिल जाता। उसकी दोस्त नज्जो का मनपसंद हीरो शाहिद कपूर है और जिससे उसका रिश्ता होने जा रहा है उसकी अदा शाहिद कपूर से मिलती है। ऐसा ही कुछ उसके साथ हो सकता है,रुकैया का यह मंसूबा बाँधना गलत तो नहीं!
नगमा भी कम हसीन नहीं। ज़ाफरानी रंग, कागज़ी चमड़ी। नगमा को देखो, उसके तो पैर ज़मीन पर नहीं। उसका बन्ना इतना कमसिन और खूबसूरत है कि सब उससे रश्क कर रहे।

खूबसूरती मानो ईरानी बस्ती की पहचान है। लड़कों के छरहरे बदन, गुलाबी गोराई और बात करने का दिलकश अंदाज़ बरबस लोगों का ध्यान खींच लें। यहाँ थोड़े स्थूल और दरमियाने कद के लोग भी हैं, पर अमूमन रूप-रंग बढि़या है। उस पर आँखों में सजा सुरमा चार चाँद लगा देता है। नगमा ने हमारी जानकारी में इज़ाफा किया यह बताकर कि जुमा के दिन सुरमा लगाना सुन्नत है। मोहम्मद साहब ने जो काम किया, जिसका अमल किया,वह सुन्नत कहलाता है और इस्लाम माननेवाले को उसी राह पर चलना चाहिए।

ईरानी बस्ती में कुछ जो हिंदुस्तानी बहुएँ ब्याह कर आई हैं उनसे अपने शौहरों की तारीफ सुन लीजिए। ज़्यादातर आशनाई के किस्से मिलेंगे। अपने कारेाबार के सिलसिले में कोई कहीं गया तो उसने मनपसंद लड़की से शादी का प्रस्ताव रखा और रस्म पूरी करके ईरानी बस्ती ले आया। 1516 साल की दुबली सी आस्मां असम की रहनेवाली है। रुकैया का ममेरा भाई उसे ब्याहकर यहाँ ले आया था। बस्ती में यह शान बरकरार है कि हम लड़की लाते हैं,देते नहीं बाहर। हिंदुस्तानी लड़की यहाँ आती है और हमारे पूरे रीति-रिवाज़ अपना लेती है। कई के तो रिश्तेदार भी आकर बस जाते हैं।
खानाबदोशी

रुकैया अपनी बस्ती के इतिहास, भूगोल से काफी हद तक वाकिफ है,भले वह किशनगंज की चैहद्दी से बाखबर नहीं। ईरानी बस्ती के लोग शहर में रहते हुए भी अलग-थलग हैं, इसका उसे पूरा अहसास है। दूसरों से अलग होने का सबसे बड़ा आधार है – अपना ईरानी मूल। उसके फुफेरे भाई बैजू अली के मुताबिक मुगलों के काल में ईरानी लोग खानाबदोश की तरह घूमते-घूमते हिंदुस्तान की तरफ आ निकले। किसी ने कहीं डेरा जमाया, किसी ने कहीं तंबू ताना। इन ईरानियों का पुश्तैनी काम था सौदागरी। घोड़ा बेचना। वे रईसों – नवाबों के साथ सौदा करते। थोड़े दिन एक जगह रुकते और फिर बोरिया-बिस्तर समेट कर नए सौदे की तलाश में चल पड़ते। इसी दौरान उन्होंने किशनगंज में अपना खेमा लगाया जो अभी तक उखड़ा नहीं है। गालिबन खगड़ा मेले की वजह से ही उन्होंने इधर का रुख किया था। किशनगंज का खगड़ा मेला मवेशी मेला था और बिहार के सोनपुर मेले के बाद इसी का नंबर आता था। खगड़ा के नवाब मोहम्मद फकरुद्दीन ने इसे शुरू किया था। महीने भर चलनेवाले इस मेले में सौदागर ईरानियों की अच्छी कमाई हो जाती थी।

धीरे-धीरे ईरानियों का घोड़े का व्यापार बंद हो गया। उसके बदले वे ताले, चाकू, फोटो फ्रेम,चश्मा वगैरह बेचने लगे। अब ज़्यादातर लोग कीमती पत्थरों का बिजनेस करते हैं। तरह-तरह के कीमती नग जयपुर और कलकत्ता से खरीदते हैं और उन्हें दूर-दूर तक बेचते हैं। किसी के घर में कोई मुसीबत आन पड़े, शौहर गुज़र जाए या बीमार हो जाए तभी औरत कदम कारोबार में बढ़ाती हैं। जैसे बस्ती की बुर्जुग औरत हैं खैरूनिसां,70 साल की। उनके परिवार में 5 लड़की 5 लड़के हैं। वे अपने और परिवार के गुजर-बसर के लिए कारोबार में लगी हैं।

बैजू अली हमारे साथ बातचीत करते हुए दिल्ली तक आने को तत्पर नज़र आते हैं। उनके पेशे की माँग ही यह है कि जहाँ ग्राहक मिले वहाँ जाओ। ग्राहक पैसेवाले हों और उनके पत्थरों पर यकीन हो कि वे उनके ग्रह-नक्षत्र सुधार देंगे, यह बुनियादी जरूरत है। इस पेशे को वे इल्मे नुजूम से जोड़ते हैं। इसकी जड़ें हैं- ईरान में। यह फन बहुत पुराना है। जैसे ज्योतिष विद्या है उसी तरह है। नुजूमी की तरह ग्रह-नक्षत्र की गणना करके भविष्य बताने पर इन ईरानियों का ज़ोर नहीं रहता है। वे नगों की खुसूसियत बताते हैं और उनका व्यापार करते हैं। किशू बेगम रुकैया के बुआ के हवाले से कहती हैं कि ईरानी दूसरे व्यापारियों से अपने को ऊँचा मानते हैं। रुकैया के बाशू यानी दादा का भी कुछ ऐसा ही ख़याल था।

यहाँ ईरानी बस्ती में 3032 परिवार हैं। तकरीबन 300400 आबादी होगी। एक साल पहले रुकैया अली ने बस्ती के 40

2 COMMENTS

  1. कुछ वर्षों पहले किशनगंज में रहने का मौका मिला, दो साल गुज़ारे हैं वहां। ईरानी बस्ती को करीब से देखा हैं। लेख काफी शोधपरक हैं।

  2. पूर्वा जी, आप चुपके-चुपके कितना काम कर रही हैं? और वह भी कितना अच्छा?

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